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अवधी और ब्रजभाषा में अंतर

  • अवधी अर्धमागधी से विकसित कोसली अपभ्रंश से निकली है। यह लखनऊँ, उन्नाव, अयोध्या, गौंडा, बहराहच, फतेहपुर, रायबरेली आदि में बोली जाती है। ब्रजभाषा शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है। यह मैनपुर, बदायूँ आदि में बोली जाती है।
  • अवधी में इकार की प्रधानता है, ब्रजभाषा में यकार की
  • अवधी में कर्ता का ने चिह्न नहीं मिलता, ब्रजभाषा में मिलता है। वैसे सूरदास की ब्रजभाषा में यह नहीं दिखता जिससे इसका विकास 16वीं शताब्दी के बाद प्रतीत होता है।
  • अवधी का उ ब्रजभाषा में व हो जाता है-   उहाँ <वहाँ , हुआ <हूवा
  • अवधी में इया और उआ के बीच में क्रमशः य- श्रुति और व- श्रुति नहीं मिलती, ब्रजभाषा में मिलती हैं। सिआर < स्यार/सियार, पुआल < प्वाल,
  • अवधी के शब्दों में दो स्वर लगातार आ सकते हैं: भइस, कउन, दुइ, दुआर। ब्रजभाषा में यह प्रवृति नहीं मिलती। इनकी जगह पर वहाँ भैंस, कौन, और, दो ,द्वार मिलते है।
  • अवधी में ऐ और औ सन्ध्यक्षर हैं – अइ, अउ- कइसा, पइसा, अउरत। ब्रजभाषा में ऐ, औ का उच्चारण ऐ, औ की तरह ही होता है- कैसा, पैसा, औरत।
  • ब्रजभाषा में जिस शब्दों मध्य या अंत में ल आता है, अवधी में उनकी जगह र का व्यवहार है: केला, फल, हल हल्दी (ब्रजभाषा) < केरा, फर, हर, हरदी (अवधी)
  • अवधी में संज्ञा के तीन रूप – सामान्य, दीर्घ, दीर्घतर मिलते हैं – घोड़ा, घोड़वा, घोड़वना ब्रजभाषा में ऐसे रूप दुर्लभ है।
  • अवधी में यदि अकारान्तता की प्रधानता है तो ब्रजभाषा में ओ या औ कारान्तता है। यह प्रवृति संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया सबमें है। जैसे: गोर, सांवर, बड़, मोर, तोर (अवधी) ; गोरो, सांवरो, बड़ो, मेरो, तेरो (ब्रजभाषा)
  • अवधी में वर्तमान काल की सहायक क्रियाए- आटे, बाटे, है, अहे; भूतकाल में- भए, रहे; भविष्यत् काल में ह, -ब प्रत्यय लगाकर होती हैं। ब्रजभाषा में हू के लिए हों और हो के लिए हों खास रूप से उल्लेखनीय हैं। उसकी अन्य वर्तमान कालीन सहायक क्रियाए मानक हिंदी की तरह ही हैं। भूतकाल में हूतों, हूती, हूते/हूतें जैसे रूप् चलते हैं। इनके अलावे भये, रहे जैसे रूपों का भी प्रचलन है। भविष्यत् काल में-ह-ग प्रत्यय लगाकर रूप् बनते हैं; रहि है, रहेंगो
  • अवधी में वर्तमान कालिक कृदन्त प्रत्यय त/इत है मारत/मारित; ब्रजभाषा में त/तु प्रत्यय है- मारत/मारतु
  • अवधी में भूतकालिक कृदन्त रूप- कृदन्त प्रत्यय के योग से बनते हैं- कहा,सुना, रहा। ब्रजभाषा मे – यो प्रत्यय के योग से रूप बनते हैं- मार्यो, कह्यो
  • अवधी में संज्ञार्थक क्रिया के रूप – ब प्रत्ययांत हैं जैसे कहब, सुनब, रहब; ब्रजभाषा में न, नो, इबो प्रत्यय के योग से बनते हैं: देखन, देखनो, देखिबो

अवधी और ब्रजभाषा में समानता

  • दोनों में भविष्यत् काल में तिड्न्त रूप् मिलते है: रहिहै, कहिहै; अवधी में अपभ्रंश की तरह रहिहइ, जइहइ जैसे रूप् है: ब्रजभाषा में इ की जगह पर य हो जाता है: रहिहय, जयहय। यही रूप् – रहिहय, जयहय, ब्रजभाषा में संकुचित होकर रहिहे, जयहे सुनाई पड़ते हैं।
  • ब्रजभाषा में तिर्यक बहुवचन के रूप् -न प्रत्यय के योग से भी बनाए जाते हैः घोड़न को, छोरन को; अवधी में – न प्रत्यय ही बहुवचन बनाने का प्रत्यय है। यहां रूप् मिलते है: घोड़न को, छोरन को जैसे। तुलसी ने लिखा:  ‘देखहुँ बनरन केरि ढिठाई। ’
  • अवधी और ब्रजभाषा दोनों में विशेषण लगभग एक ही तरह बनाए जाते हैं। मतलब संज्ञा के लिंग के अनुरूप ही विशेषण का लिंग होता है।
  • अवधी में भविष्यत् काल में-ब प्रत्यय का भी व्यवहार हैः जाब, कहब, सुनब,; ब्रजभाषा में मध्यम पुरूष में विधि और आज्ञा के रूप् मथुरा से दक्षिण बढने पर बुंदेलखंड तक ब में ई लगा कर व्यवहृत होते है: आयबी। अवधी में तुलसी की चैपाई दृष्टव्य हैः

‘पुनि आउब एहि बेरियाँ काली’(कल)

पुरानी अवधी में ऐसा रूप नहीं मिलता । वहां तिड्न्त रूप ही हैं: ‘सुनि समुझहिं जन मुदित मन’ (तुलसी)

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अवधी और ब्रजभाषा : तुलना

राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन

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