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अवधी भक्ति काल में और उसके बाद भी हिंदी प्रदेश की एक प्रमुख साहित्यिक भाषा रही है. इसमें प्रेमाख्यानक काव्य और रामभक्ति काव्य खासतौर पर लिखे गए. उसके ये रामभक्ति काव्य और प्रेमाख्यानक काव्य हिंदी को उसकी देन हैं. रामचरित मानस तो लगभग समस्त उत्तर भारत में धर्मग्रंथ की तरह महत्व पाता रहा. तुलसी ने मानस में अवधी को विभिन्न जनपदीय भाषाई तत्वों से लैस कर एक बहुसामुदायिक भाषा के रूप में विकसित किया है. हिंदी के विकास में अवधी का योगदान महत्वपूर्ण है।
अवधी की ध्वनियां भी उच्चारण की दृष्टि से बहुत सहज हैं, इसलिए अवध क्षेत्र के बाहर भी इनके उच्चारण में वक्ताओं को कठिनाई नहीं होती. जब अवधी साहित्यिक भाषा थी, तो गैर अवधी क्षेत्र के रचनाकार भी अवधी में साहित्य रचते थे और अपने क्षेत्रीय भाषाओं को उसमें उडेलते थे. इससे विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों के भाषायी तत्व तद्भव के रूप में एक खास कालखंड की अवधी में जमा हो गए. अवधी से जब ब्रजभाषा ने साहित्यिक भाषा का आसन ग्रहण किया तो यह तद्भव भंडार भी विरासत के रूप में अवधी ने ब्रजभाषा को दिया. तद्भव शब्दों को लेकर हिंदी में जो योगदान ब्रजभाषा का है, वही ब्रजभाषा में अवधी का है. आचार्य शुक्ल ने स्मरण दिलाया है कि ब्रजभाषा का रीतिग्रंथ अधिकांशतः अवध प्रांत में ही रचा गया. जाहिर है कि रचनाकारों ने साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी की भाषायी संपदा को उसमें उडेला होगा. नरहरि दास अवध के ही थे लेकिन, ब्रजभाषा में काव्य लिखते थे. अवधी के साहित्य की ख्याति अवध क्षेत्र के बाहर भी थी. बदायूनी ने बताया है कि मुल्ला दाउद दिल्ली के मुसलमानों को चंदायन सुनाया करते थे. 17वीं शताब्दी में बंगाल के आलाओल ने पद्मावत का अनुवाद किया था, तब तक निश्चय ही पद्मावत की ख्याति हिंदी क्षेत्र को लांघ कर गैर हिंदीभाषी प्रदेशों में भी पहुँच चुकी थी. अवधी अपने साहित्य के माध्यम से अवध क्षेत्र के बाहर भी पहुँच चुकी थी और इसलिए जैसे ही खड़ी बोली साहित्यिक भाषा बनी, जहाँ-जहाँ अवधी का प्रसार था, वहां खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में लोकप्रिय होने में कठिनाई नहीं हुई. अवधी ने पुरानी हिंदी और दक्खिनी हिंदी को कई स्तरों पर प्रभावित किया है जैसे:
क. अवधी में अन्य पुरूष, वर्तमान काल एकवचन रूप हैः करइ, जाई. इसी से स्वर संकोचन के कारण क्रमशः करे, जाय जैसे रूप विकसित होते हैं. पुरानी हिंदी में करे है, जाय है जैसे रूप वर्तमान काल में चलते हैं. इसमे करे और जाय अवधी के ही क्रिया रूप हैं. इसी रूप में – गा लगा कर मानक हिंदी में करेगा, जायगा जैसे रूप बनाए गए.
ख. पुरानी अवधी में भूतकाल का रूप है कीन्ह. इसी से आधुनिक अवधी में कीन रूप विकसित हुआ: हमार कीन न होइ
इसी‘कीन’ रूप में  हिंदी का भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय- आ लगा कर कीना रूप बनाया गया.
दक्खिनी हिंदी के लेखकों ने इस रूप का प्रयोग किया है. अशरफ लिखता हैः
बाचा कीना हिन्दवी में
किस्सा मकतल शाह हुसैन.
बौद् धर्म के वैभव काल से लेकर12वीं शताब्दी के गोविंद चंद गाहड़वाल या दामोदर पंडित के समय तक कोसली संपर्क भाषा के रूप में काम करती रही है. यह कोसली जहाँ- जहाँ एक खास दौर में प्रचलित थी, वहां आज अवधी भी समझी जाती है. इसी कारण सुदूर पूरब और पश्चिम में अवधी के शब्द मिल जाते हैं. अवधी का एक क्रिया रूप हैं: पावहु. इसे ही पुरानी हिंदी के भविष्यत् काल बोधक क्रिया रूपों- पावहु गे, जावहुगे – में पाते हैं.
ग. अवधी का एक प्रश्न वाचक शब्द है- काहे. यह शब्द पुरानी हिन्दी और पुरानी उर्दू के शायरों के यहां मिल जाता है. गालिब ने अपने काल में ऐेसे गवारू और भदेस शब्दों को ढूंढ-ढूंढ  कर निकाला लेकिन फिर भी स्वयं गालिब की भाषा में यह शब्द रह गए. वैसेस टकसाली उर्दू और परिनिष्ठित हिंदी में यह नहीं मिलता है. जैसे:
मुझमें  तुममें  नामानिगारी काहे को है, मुकालमा है.
इसी तरह अवधी का अजहुँ, कभू जैसे शब्द भी पूरानी उर्दू और हिंदी में मिल जाते है. जैसे-
फिर गुल से ऐ पियारे
बुलबुल कभू न बोले- सौदा

घ. अवधी का भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय आ कहा, सुना

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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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