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डा. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, अवधी के भाषायी अभिलक्षण पहली शताब्दी में ही मिलने लगे थे. वे तो सोहगौरा, रुम्मिन्देई एवं खैरागढ़ के अभिलेखों में भी अवधी में लक्षण ढूढ निकालते हैं. ये अभिलेख पहली शताब्दी के ही आसपास के हैं. बाबूराम सक्सेना भी अवधी को अर्धभागधी की तुलना में पालि के अधिक करीब मानते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि पालि अवधी में एकाएक छलांग लगा गई, बल्कि यह है कि एक लंबे अंतराल के बाद भी पालि के कतिपय अभिलक्षण अवशिष्ट रह गए हैं.
अवधी‘ कुवलय माला’ की कोसली से निकली हैं, इसलिए उससे तो उसका साम्य है ही, उस दौर की अन्य रचनाओं जैसे कुमारपाल प्रतिबोध, प्रबंध चिंतामणि, प्राकृत पैंगलम आदि की भाषा से भी वह बहुत मिलती- जुलती है. इन पुस्तकों की भाषाओं में अवधी के पूर्व रूप को देखा जा सकता हैः

कसुकरू रे पुत्र, कलत, घी – कसुकर रे करसण बारी. (प्रबंध चिंतामणि)
जणणि वियं भी चितवइ, कवणु पियावउँ खीर.
दिन्न हत्यु.
भुवणि वसंत पयट्ठ.

उपर्युक्त उदाहरणों में अवधी की इकारान्तता मौजूद है. अवधी परवर्ती अपभ्रंश से ही विकसित हुई और उसने उस अपभ्रंश के बहुत सारे गुणों को बहुत दिनों तक सुरक्षित रखा. परवर्ती अपभ्रंश के ही तद्भव रूपों को और अधिक सहज बनाकर अवधी ने अपना लिया. अपभ्रंश से अवधी के निकलते हुए शब्दों को निम्नलिखित विकास क्रम के माध्यम से देखा जा सकता है:
कसुकर > केहिकर
दिन्न > दीन
पयट्ठ > पैठ
ज्हिआ > जहिया
कवणु > कवनु

प्रारंभिक चरण की अवधी

प्रारंभिक चरण की अवधी साहित्यिक भाषा के रूप में पहली दफा मुल्ला दाउद की रचना लोरकहा में देखने को मिलती है. मुल्ला दाउद ने अवधी के जनसुलभ तद्भव- प्रधान रूपों को ही साहित्यिक भाषा के रूप् में ढाला था. उनके यहाँ भी इकारान्तता की प्रवृति मिलती हैः जैसे:

दाउद कवि जे चाँदा गाइ जेहिरे सुना सो गा मुरझाइ

लालचदास ने ‘हरिचरित‘; सुरजदास ने ‘रामचंद‘; ईश्वरदास ने ‘स्वर्गारोहनी‘ और ‘सत्यवती कथा‘ तथा इशरदास ने‘भरत मिलाप एंव अंगट पैच जैसी रचनाओं में अवधी को स्थिर स्वरूप् प्रदान किया है. अवधी इस दौर में अपभ्रंश से ही निकल रही थी. उसके क्रिया रूप् तिड्न्त हैं जिस तरह अपभ्रंश के है. जैसे, अपभ्रंश में अन्य पुरूष, एकवचन वर्तमान काल का क्रिया रूप् है करइ. इसका संस्कृत प्रतिरूप था करोति. यह करइ रूप पुरानी अवधी में भी ज्यों का त्यों उपलब्ध है. आज भी अवधी में करइ, चलइ, चितवइ रूप मिलते हैं:
बिनु पद चलइ, सुनइ बिनु काना अन्य पुरूष वर्तमान काल बहुवचन में – हिं विभक्ति लगती है. जैसे- करहिं. बिल्कुल यही विभक्ति अवधी में भी मौजूद है. अपभ्रंश के हौं, कई, मौके तोके जैसे सर्वनाम रूप् तो अवधी में ज्यों के त्यों उपलब्ध हैं. केर, कर,मह, सउ, जैसे परसर्ग भी अपभ्रंश से अवधी में सीर्घ आए. एक परसर्ग के विकास क्रम को देखकर ही यह समझा जा सकता है कि अवधी और अपभ्रंश में कितनी निकटता हैः
मज्झे < मँझ <माँझ <माँह <मँह

युवराजन्हि माँझ पवित्र (कीर्तिलता), माँझ मंदिर जनु लाग आकासा (जायसी ), बरसहिं नैन चुअहिं घर माहा, मुनि समूह मँह बैठे सन्मुख (तुलसी)

जायसी और द्वितीय चरण की अवधी

द्वितीय चरण की अवधी कुतबन की मृगावती, मंझन की ‘मधुमालती‘और जायसी की पद्मावत तथा  अखरावट जैसी रचनाओं में मिलती है. ये रचनाकार अपनी अवधी में तत्सम शबदो से परहेज रखते हैं और तद्भव शब्दों का ही खुलकर प्रयोग करते हैं. जायसी अवधी के पहले बडे कवि हैं. उन्होने अपनी चौपाइयों के अंत में प्रायः अकारान्तता का प्रयोग किया हैं, जैसे: कर्तारू, राजू,काजू, सुल्तानू आदिः सुमिरौं आदि एक कर्तारू ऊकार का प्रयोग चौपाइयों के अन्त में अन्त्यानुप्रास के लिए किया गया है. यह प्रवृति तुलसी में भी मिल जाती हैः जेहि कर जेहि पर सत्य संदेहू.से तेहि मिलत न कछु संदेहू .. जायसी जी तत्सम शब्दों का प्रयोग भी करते हैं तो तद्भव बनाकर. जैसेः   चक्राबूह, किरसुन, मुहमद आदि. जायसी जी में  तत्सम शब्दों के प्रयोग को लेकर एक सांस्कृतिक विवेक मिलता है. दृष्टि शब्द से ही डीठि शब्द बना है. जायसी डीठि शब्द का प्रयोग वहां करते हैं, जहाँ वे सामान्य तौर पर आँख के बारे में कहना चाहते हैंः “भले भलेहिं पुरूषन्ह की डीठी”, लेकिन जब वे योग, दर्शन, कुंडलिनी आदि के बारे में कुछ कहना चाहते हैं तो दृष्टि से ही ‘दिस्टि‘जैसा अर्द्धतत्सम रूप गढ लेते हैं. जैसे: “उलटि टिस्टि माया सो रूठी”. जायसी फारसी प्रभाव के कारण उल्टे समास का प्रयोग करते हैं लीक-पखान > पाषाण- लीक किरिन- रवि >रवि- किरण
लीक परवान पुरूष का बोला

तुलसी की अवधी

तुलसी ने इस अवधी को राम चरित मानस की भाषा के रूप में अखिल उतर भारतीय व्याप्ति  दी. जायसी यदि तद्भव शब्दों पर अत्यधिक निर्भर हैं तो तुलसी की निर्भरता तत्सम शब्दों पर ज्यादा है. तत्सम शब्दों के विपुल  प्रयोग के कारण ही आज तुलसी की भाषा सुबोध बनी हुई है, जबकि हर दौर के तद्भव शब्दों के कोष के अभाव के कारण जायसी की भाषा दुर्बोध होने लगी है. तुलसीदास अपनी चौपाई की प्रत्येक पंक्ति में कम से कम दो तद्भव शब्दों का प्रयोग अवश्य करते हैं. जैसेः रिषय (ऋषि), तीहन (तीक्षण), त्रिजग तिर्यक, जातना यातना सनेह स्नेह आदि. तुलसीदास जी प्राकृत और अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग वहीं करते हैं जहाँ भयानक, वीभत्स या वीर रस की व्यंजना करनी होती हैः

            जंबुक निकर कटक्कट कट्ठहिं.            खाहिं, हुआहिं, अघाहिं दपट्ठहिं..

तीसरे चरण की अवधी आलम – उस्मान से शुरू होती है. उस्मान ने ‘चित्रावली, आलम ने ‘माधवानल-कामकंदला‘ नाम की पुस्तक लिखी थी. उस्मान जायसी की भाषायी परंपरा ही अपनाते हैं और तद्भव शब्दों का अधिक प्रयोग करते हैं. आलम की भाषा में लोकोक्तियों का प्रयोग सराहनीय है. 18वीं और 19वीं शताब्दी में  नूर मुहम्मद ने इंद्रावती; कासिम शाह ने हंस-जवाहर, शेख निसार ने युसूफ- जुलेखा, और 20वीं शताब्दी में ख्वाजा अहमद ने नूरजहाँ लिख कर अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में जीवित बनाए रखा. 20वीं शताब्दी में ही ब्रजनंदन, बंशीधर शुक्ल, चंद्रभूषण द्विवेदी उर्फ रमई काका आदि ने अवधी को गध की भाषा के रूप में विकसित किया. द्वितीय चरण या आधुनिक अवधी के भाषा रूप पुरानी अवधी के ही विकास हैं. यदि प्रांरभ से 14वीं शताब्दी तक की अवधी प्रथम चरण की है, 14वीं से17वीं तक द्वितीय चरण की एंव17वीं से अब तक की यदि तीसरे चरण की अवधी है तो हम पाते हैं कि जो रूप पूर्ववर्ती में बडे़ पैमाने पर दिख रहे थे वे दूसरे चरण में कम हो गए और तीसरे चरण में नहीं के बराबर रह गए. दूसरी ओर उन्ही रूपों से जो रूप विकसित हुए वे प्रथम चरण में जो कम दिखते हैं, लेकिन क्रमशः विकसित होते हुए तीसरे चरण में छा गए. जैसे:
तिन- तिन्ह या भा रूप् क्रमशः तने- तेन्ह या भव का विकास हैं. तेन-तेन्ह या भव रूप प्रथम चरण में अधिक मिलते हैं. द्वितीय चरण में अपेक्षाकृत कम और तृतीय चरण में बहुत कम, लेकिन इन्ही से विकसित तिन – तिन्ह या भा रूप प्रथम चरण में कम, द्वितीय चरण में उससे अधिकऔर तृतीय चरण में बहुत अधिक मिलने लगता है.

व्याकरणिक विशेषताए:

·         अवधी का अ अर्ध संवृत है.
·         इआ और उआ के बीच में क्रमशः य- श्रुति, व-श्रुति नहीं मिलती. जैसेः सिआर, गुआल
·         श, ष और स के बदले सिर्फ स मिलता है.
·         ण की जगह पर न का प्रचलन है. जैसे: गुन, लवन, गनपति आदि.
·         व का व्यंजन रूप् में उच्चारण व और स्वर रूप में उ अथवा ओ होता है. जैसे: वाहन, व्याकुल, वलदेउ, ओकील आदि
·         ऐ और औ संध्यक्षर हैं- अई, अउ. जैसेः- जइसे; कइसे, पइसा, अउनर, कउवा आदि
·         अकारान्त एंव इकारान्त प्रधान भाषा है.
·         विशेषण एंव संबंधवाची सर्वनाम रूप प्रायः अकारान्त होते हैं; जैसे: बड़, छोट, भल, नीक, मोर, तोर, हमार, आदि.
·         कर्ता कारक का ‘ने’ परसर्ग नही मिलता है.
·         अन्य परसर्ग हैं: कहँ, केर, कर, माँझ, माँह, मँह, कूँ, से, सेनी, सन आदि.
·         संज्ञा शब्दों के एक ही वचन में तीन रूप मिलते हैं- सामान्य, दीर्घ, दीर्घतर. जैसे: घोड़ा, घोड़वा, घोड़वना/ घोड़ोंना
·         वा वाले दीर्घरूप तो व्यक्ति वाचक संज्ञाओं एंव विदेशी शब्दों में भी मिलते हैं. जैसे: जगदीसवा, विसनथवा, रजिस्टरवा
·         बहुवचन मानक हिंदी की तरह ही बनते हैं, लेकिन तियेक रूप में न लगाकर बहुवचन बनाए जाते हैं: हजामन बनरन आदि.
·         स्त्री प्रत्यय हिंदी की तरह ही हैं, लेकिन सिर्फ इकारान्तता आ जाती हैं. नि, इनि,आइनि
·         अवधी के सर्वनाम मइँ मै- हम, हमलोग; मोहिं- हमहिं; मोर-हमार. मघ्यम पुरूष एंव अन्य पुरूष से, ते – तवन आदि इसी तरह बनाए जाते है.
·         संबंध वाचक सर्वनाम- जे, जेइ, जवन
·         प्रश्नवाचक सर्वनाम – के, कवन
·         सार्वनामिक विशेषण हैं – अस, जस, तस
·         अवधी में भी संज्ञा के लिंग के अनुरूप विशेषण का लिंग निर्धारित होता है. जैसे: आपन- आपनि, ओहिका – ओहिकी
·         सहायक क्रियाएँ हैं: आटे, बाटे, है, अहै
·         भूतकाल में भए, रहें जैसे रूप चलने है.
·         भविष्यत् काल में – ह-ब- लगाकर रूप बनाए जाते हैं: रहिहै, रहव;
·         वर्तमान कालिक कृदन्त रूप त/इत प्रत्यय के योग से बनते हैं; जैसेः सुनत/सुनित, मारत/मारित
·         भूतकालिक कृदन्त रूप हिंदी की तरह ही आ प्रत्ययान्त हैं; जैसेः कहा, सुना, रहा आदि
·         संज्ञार्थक क्रिया के रूप्- ब- प्रत्ययांत हैं.: कहब, सुनब, रहब.

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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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