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प्रेमचन्द के बाद हिन्दी में ग्राम कथा पर आधारित धारा अवरूद्ध सी हो जाती है। बलचनमा (नागार्जुन.1952) और गंगा मैया (भैरव प्रसाद गुप्त.1952) जैसे उपन्यास लिखे तो गये, परन्तु प्रेमचन्द जैसी व्यापक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टि के अभाव में यथोचित प्रभाव नहीं छोड़ पाए। ऐसे में 1954 में मैला आंचल का आना एक सुखद आश्चर्य की तरह लगता है। हवा का एक ताजा झोंका जैसे प्रेमचन्द के काल से गुजरता हुआ रेणु तक आ पहुँचता है।
       कथ्य की दृष्टि से देखें तो मैला आँचल, गोदान का ही तार्किक विस्तार प्रतीत होता है। आदर्शवादी नवयुवक डॉ. प्रशान्त विदेश जाने के अवसर को ठुकरा कर मेरीगंज जैसे अंचल में आता है मलेरिया पर अनुसंधान करने, परन्तु कुछ ही दिनों के अनुभव से वह समझ जाता है कि गांव वालों की असली समस्या मलेरिया नहीं है- ‘‘उसने गाँव के रोग के वास्तविक कारण को पहचान लिया है। उसकी नजर में गाँव के रोग के दो ही कारण हैं- जहालत और गरीबी।’’ अन्धविश्वास में जकड़े मेरीगंज के निवासियों को वह मलेरिया की दवा देकर ठीक नहीं कर सकता। गांव में डाक्टर के आने के साथ ही अन्ध विश्वासी शक्तियों द्वारा उसके खिलाफ दुष्प्रचार प्रारम्भ हो जाता है। जोतखीजी के नेतृत्व में अन्ध्विश्वासी शक्तियाँ यह खबर फैलाती हैं कि डॉ. प्रशान्त खुद ही गांव के कुंए में हैजे के जीवाणु डालता है। वह गांव वालों को जो सुई लगाता है, उसमें रोगी मनुष्यों का लहू भरा रहता है। उसके द्वारा परीक्षण के लिए लाये गये बन्दरों से गांव में बनरमुत्ता रोग फैल रहा है। अन्धविश्वास की पराकाष्ठा तो तब होती है जब गांव की एक वृद्धा (गणेश की नानी) को डायन बताकर मार दिया जाता है। डॉ. अपने प्रयासों से हैजे के कई रोगियों को चंगा कर गांव वालों के अन्धविश्वास को कम करने में कामयाब होता है- लेकिन कम्युनिस्ट होने के आरोप में डॉ. की गिरफ्तारी के बाद अन्धविश्वासी शक्तियाँ फिर प्रबल हो जाती हैं। डॉ. को जर्मनी का जासूस तक बता दिया जाता है।
       समतावादी सोच रखने वाला डाक्टर यह समझ नहीं पाता कि ये गाँव वाले चुपचाप अपने शोषण को स्वीकार करते हुए इस निरीह अवस्था तक क्यों पहुंच गये है। वह ममता को लिखता है- ‘‘तुम जो खाना खाती हो वह ये खा नहीं सकते, तुम जो पहनती हो वह ये पहन नहीं सकते………………… डाक्टर देखता है कि गांव वालों के पास पहनने को वस्त्र भी नहीं हैं। स्त्रियाँ घरों में काम करते हुए कमर पर सिर्फ एक वस्त्र लपेट कर रहती हैं। बारह वर्ष से कम उम्र के बच्चे कपड़े नहीं पहनते। गोदान के प्रेमचन्द की तरह रेणु भी किसानों के चेहरे पर छायी हुयी मुर्दनी और असमय कुम्हला आये उनके चेहरों को देखते हैं। संथालों की स्थिति तो इससे भी बुरी है। जिनकी मेहनत से पूरे क्षेत्र को उर्वर बनाया गया, उनका इस जमीन पर कोई हक नहीं है। सामन्ती शोषकों ने मिलजुल कर संथाल किसानों को उनकी ही जमीन से बेदखल कर दिया है।
       सामन्ती शोषण के चित्र गोदान की तरह मैला आँचल में भी हैं। गोदान के सामन्त ने समय के साथ गरजने-गुर्राने की जगह मीठा बोलकर और पुचकार कर शिकार करने की कला सीख ली है, लेकिन लम्बे समय के साथ और कुछ मानवीय भावनाओं की उपस्थिति उसे अत्याचार में एक सीमा से आगे जाने से रोकती है। मैला आँचल का जमींदार या सामन्त इन मानवीय भावनाओं से पूरी तरह रहित है।
       मैला आँचल के गाँव में कई सामन्ती तत्व सक्रिय हैं। गाँव की अधिकांश जमीन राजा पारबंगा की मल्कियत है लेकिन उनके तहसीलदार ने भी काफी जमीन इक्ट्ठी कर ली है। इनके अतिरिक्त कृपाल सिंह और रामखेलावन महतो जैसे छोटे जमींदार भी हैं। ये स्वार्थ पूर्ति के लिए परस्पर लड़ते रहते हैं, लेकिन शोषण के मुद्दे पर सभी एक हैं। संथालों को जमीन से बेदखल करने के मामले में इनमें कोई मतभेद नहीं है। कुछ आलोचकों ने तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद द्वारा किसानों को जमीन के टुकड़े बांटने को उसका हृदय परिवर्तन बताया है और इस घटना को रेणु के आदर्शवादी सोंच का परिणाम बताया है। वस्तुतः यह रेणु के आदर्शवाद का नहीं बल्कि उनकी वस्तुवादी सोच का परिणाम है। किसानों को उनकी ही जमीन के टुकड़े देकर तहसीलदार एक साथ अपने कई मन्तव्य सिद्ध करता है। बेटी के विचित्र विवाह को लेकर गांव में जो प्रवाद फैला था, उसकी रुप में तहसीलदार को एक सामाजिक स्वीकृति की आवश्यकता थी। गाँव वालों को थोड़ी सी जमीन देकर न सिर्फ यह स्वीकृति हासिल की जा सकती थी बल्कि समतावादी सोच रखने वाले अपने दामाद को भी प्रभावित किया जा सकता था। गाँव की स्थिति से तंग आकर शहरों की ओर पलायन गोदान में गोबर के सन्दर्भ में देखा जा सकता है। मैला आँचल में भी शहर का यह आकर्षण बरकरार है। शोषण के चक्र को जारी रखने के लिए यह आवश्यक था कि किसान गाँव में ही बने रहे। पाँच-पाँच बीघे जमीन बाँटकर यह उद्देश्य आसानी से हासिल किया जा सकता था।
       गोदान और मैला आँचल दोनों की मूल समस्या जमीन की है। लेकिन, गोदान का तेवर जहाँ सामाजिक है, वहीं मैला आँचल का तेवर पूर्णतया राजनीतिक है। प्रेमचन्द जहाँ राजनीतिक सवालों से कतराकर निकल जाते हैं, वहीं रेणु कदम-कदम पर भ्रष्ट और अवसरवादी राजनीति से दो-चार होते हैं। रेणु काफी समय तक सोशलिस्ट पार्टी की राजनीति से सक्रिय रूप से जुड़े हुये थे। उन्होंने नेपाल के राजविरोधी आन्देालन में भी भाग लिया था। लेकिन यह तथ्य भी रेणु को राजनीतिक दलों की खामियाँ उजागर करने से रोक नहीं पाता। रेणु ने यह दिखलाया है कि सभी दल अवसरवादी भ्रष्ट और जातिवादी लोगों से भरे हुए हैं, जो सिर्फ व्यक्तिगत हित को ही राजनीति समझते है। आम जनता उनके लिए कोई महत्व नहीं रखती। स्वतन्त्रता की आहट सुनते ही भ्रष्ट, अवसरवादी और शोषक मनोवृत्ति के लोगों ने कांग्रेस में अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी जो लोग पहले अंग्रेजी सरकार के झण्डाबरदार थे और कांग्रेस के स्वयंसेवकों पर लाठियाँ चलवाया करते थे वही अब पार्टी में महत्वपूर्ण पदो पर सुशोभित हो रहे थे। बावनदास और बालदेव जैसे लोगों की पार्टी में कोई जगह नहीं थी। गाँधी की शहादत के साथ बावनदास की शहादत दिखाकर रेणु ने जैसे देश से गांधी और गाँधीवादी मूल्य-दोनों के अन्त की घोषणा कर दी है। रेणु यह दिखाते हैं कि राजनीतिक पार्टियाँ किस प्रकार विभिन्न जातियों में बँटी हुई हैं। यह स्थिति सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं है, शोषितों के साथी और समतावादी मानी जाने वाली सोशलिस्ट पार्टी का हाल भी कुछ अलग नहीं है। चलित्तर कर्मकार और सोमा जट जैसे डकैत अब पार्टी के सम्मानित कामरेड थे, जबकि कालीचरण जैसा आदर्शवादी युवक जेल जाने से बचने के लिए भागता फिर रहा था। तीसरा दल उन काली कुर्ती वालों का था जो फिर से आर्यावर्त की स्थापना कर हिन्दू राज्य को पुनप्र्रतिष्ठित करने का स्वप्न देख रहे थे। यह भारतीय राजनीति का वह नंगा चेहरा है जिसे रेणु ने पाठक के सामने लाकर रख दिया है।
       गोदान और मैला आंचल दोनों ही अपने अपने युग से उत्पन्न मोहभंग के परिणाम है, लेकिन दृष्टियों का अन्तर यथार्थ के स्वरूप में भी परिवर्तन ला देता है। गोदान की कथा होरी के चित होने के साथ ही समाप्त हो जाती है। यहाँ निराशा को दूर करने वाली कोई किरण दूर-दूर तक नहीं दिखती। होरी अपनी नियति के साथ निपट अकेला है।        लेकिन, मैला आंचल में उम्मीद की किरण मौजूद है, प्रशान्त और कालीचरण जैसे आदर्शवादी युवकों के रूप में। दोनों ने गांव की वास्तविक शक्ल को पहचान लिया है। प्रशान्त जहां इसे अपने अनुभव, ज्ञान और बौद्धिक विमर्श से प्राप्त करता है, वहीँ कालीचरण यह ज्ञान कर्म क्षेत्र में उतरकर पाता है। दोनों में ही लेखक ने समस्याओं से लड़ने और गांव को बदलने का जज्बा दिखाया है। जीवन और भविष्य के प्रति गहरी आस्था मैला आंचल में बार-बार दिखाई देती है यहीं कारण है कि गोदान के होरी की तरह मैला आंचल के बावनदास की मृत्यु के साथ उपन्यास का अन्त नहीं होता तमाम संकटों और निराशा के घटाटोप के बीच यही आस्था रेणु को खुशियों के पल ढूढ़ लेने को प्रेरित करती है। तमाम निराशाओं के बीच भी गांव वाले विदापत और सारंगा सदाबृज के लिए वक्त निकाल ही लेते हैं। लेखक ने इन लोक कथाओं का मनोभावों के अंकन में बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। प्रशान्त और कमली या फुलिया और खलासी जी की प्रेम कथा क्रमशः विदापत और सारंगा सदाबृज की कथा के साथ और भी प्रभावी तथा अर्थ व्यंजक होकर सामने आती है। पूरे उपन्यास की पृष्ठभूमि में जैसे लोक संगीत की धुन सी बजती सुनायी पड़ती है।

 

       इस प्रकार रेणु का मैला आंचल स्वतन्त्र भारत की पहली महत्वपूर्ण रचना है, जो गोदान की परम्परा को न सिर्फ आगे बढ़ाती है बल्कि नये प्रतिमान भी स्थापित करती है। स्वतन्त्र भारत के मोहभंग और समस्याओं के बीच गांधीवादी आस्था का एक अटूट स्वर इसे ग्राम कथा पर लिखे गये अन्य उपन्यासों से अलग खड़ा करता है। नलिन विलोचन शर्मा ने मैला आंचल की समीक्षा करते हुए यह कहा था कि मैला आंचल हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ उपन्यासों में एक है और हमे उम्मीद है कि रेणुजी इससे अच्छी कृतियाँ हिन्दी को देंगे। यह दुखद किन्तु सत्य है कि रेणु अपने जीवन में मैला आंचल की ऊँचाइयों तक दुबारा नहीं पहुंच पाये।
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मैला आँचल : गोदान का तार्किक विस्तार

राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन

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