कुंदन यादव

कुंदन यादव

कुंदन यादव भारतीय राजस्व सेवा के 2007 बैच के अधिकारी हैं. ठेठ बनारसी हैं या यूं कहें कि बनारस उनकी रगों में है. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में डिग्रियां हासिल की है. सन 2003-04 में फुलब्राइट स्कॉलरशिप के तहत अमेरिका में विजिटिंग लेक्चरर के तौर पर इलिनॉय विश्वविद्यालय, शिकागो में हिंदी का अध्यापन भी कर चुके हैं। समकालीन स्थितियों पर मारक व्यंग्य उनके लेखन में दिखता है. संप्रति :- केंद्रीय प्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड नई दिल्ली में ज्वाइंट कमिश्नर पद पर कार्यरत संपर्क:-ईमेल :kundanyadav@gmail.com मोबाइल : 07905664743

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विकास जेफ
अतिथि
विकास जेफ

हृदयस्पर्शी रचना के लिए कुंदन यादव सर का आभार एवं बधाई । कुंदन सर की रचनाओं ने एक बार फिर से हिन्दी साहित्य की तरफ पाठकों का रूझान शुरू कर दिया है । रचना में प्रयुक्त शब्दावली पूर्णत भाव बिभोर करने वाली है। समाज के आसपास घटने वाली घटनाओं का ऐसा सजीव वर्णन कथा साहित्य को निश्चित ही नवीन ऊचाईयां प्रदान करेगा। एक बार पुनः कुंदन सर का आभार 👏👏

विक्की
अतिथि
विक्की

भावुक कर दिया इस कहानी ने 😢
बहुत प्यारा कहानी दिल को छुने वाली
💕💕💕💕💕💕

Digvijay singh
अतिथि
Digvijay singh

बेहतरीन, हृदयस्पर्शी कहानी, …कोतवाल रामलखन सिंह, और फूलचंद पढ़ने के बाद से मैं कुंदन जी की भाषाई पकड़ का तो पहले ही कायल था लेकिन आज की कहानी ने तो इनकी लेखनी का मुरीद बना दिया, मानवीय संवेदनाओं पर इनकी इतनी गहरी पकड़, कमाल है, गाव गिराव के माहौल का इतना सूक्ष्म विवेचन करते है कि पढ़ने वाला खुद को वही पाता है, इस कहानी में भी कई जगह मैंने अपना बचपन सार्थक के साथ जिया, मजा आ गया…👌👌👌

Puneet
अतिथि
Puneet

एक ही शब्द निशब्द। कुंदन जी से आग्रह है की वो अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर लिखते रहें।

Paramjit
अतिथि
Paramjit

मार्मिक । अंत ने रुला दिया। इतनी सुंदर कहानी के लिए बधाई स्वीकार करे।

संदीप कुमार शर्मा
अतिथि
संदीप कुमार शर्मा

लगभग चार पांच साल पहले की बात है जब मैंने गोरखपुर स्टेशन पर एक 9-10 साल के बच्चे को बूट पॉलिश करते हुए देखकर बहुत दर्द महसूस किया था और फिर उससे भी ज्यादा दर्द इस कहानी को पढ़कर महसूस किया। इस कहानी के भीतर खत्म हो रही मानवीय संवेदना और मूल्यों को दोबारा जागृत करने की क्षमता है। आजकल के बच्चे जहां अपने क्लास में कपड़े जूते आदि का दम भरते हैं वहां सार्थक कि अपने दोस्तों के प्रति संवेदनशीलता अत्यंत प्रेरणादाई है। कुंदन जी से आग्रह है कि लगातार लिखते रहें और हिंदी साहित्य की समृद्धि में योगदान… और पढ़ें »

Hitesh Rohilla
अतिथि
Hitesh Rohilla

Bahut-e-badhiya

रवीन्द्र सिंह यादव
अतिथि

मर्मस्पर्शी कहानी….. आदमी को इंसान बनने के लिये यथार्थ के रूखे मरुस्थल से गुज़रना होता तभी उसमें संवेदना के नखलिस्तान उभरते हैं.
बधाई.

विकास नैनवाल
अतिथि

मर्मस्पर्शी कहानी। सभी अभिवभावकों को यह चहिये कि वह अपने बच्चों को यथार्थ से परिचित करवाएं। इसी से मन मे संवेदनशीलता जागेगी। अगर ऐसा होता है तो एक संवेदनशील समाज जरूर बनेगा।

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