अध्याय 21 : चोर के भाग जाने पर बुद्धि चलती है आधीरात हो गयी है, चारो ओर सन्नाटा है। मकान के बाहर तीनबार “सियाराम” की आवाज़ हुई। भोला उठ बैठा और मन ही मन बोला – यही मौका है। देखा, पुजारी की नाक बज रही है। भोला ने अपनी झोली सहित बाहर निकलकर दरवाज़े की जंजीर चढ़ा दी। फिर ड्योढ़ी पर आया। वहाँ एक लालटेन जलती थी और ढाल-तलवार बर्छी आदि हथियार जगह जगह लटकते थे। मिरजापुरी ड्योढ़ीदार जगन्नाथ चित सोया था। भोला राय ने अपनी झोली से मोटी रस्सी निकालकर जगन्नाथ को खटिये से बाँध दिया। वह चिल्लाया तो भोला ने दीवार से एक तलवार निकालकर उसको डराया। मिरजापुरी जवान चुप हो गया। भोलाराय ने झोली कमर में बाँधकर हाथ की तलवार जगन्नाथ के मुँह के पास ले जाकर कहा-“साँस न लेना समझा?” यह कहकर वह सीढ़ी से झट छत पर चढ़ गया। वह मुंशीजी की सोने की कोठरी […]
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हम आने वाले लेखों में आपको कुछ ऐसी आवशयक और विशेष जानकारी के बारे में बताएँगे जिसके जरिये यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है – वह अपराध जिसके दौरान किसी इंसान की मृत्यु हुई, वह हत्या थी या आत्महत्या। हम आपको हथियार, उनके प्रयोग और हथियार के चयन से व्यक्ति के बारे में निष्कर्ष निकालने के सम्बन्ध में बताएँगे, जिससे आप उस बिंदु तक पहुँच सकते हैं, उस महीन धागे तक पहुँच सकते हैं, जो हत्या और आत्महत्या को अलग-अलग भागों में बांटता है। आप जान पायेंगे कि कैसे किसी अपराध कथा का नायक, इन बिन्दुओं के सहारे, अपराध की गुत्थी को सुलझाने में सफल हो पाता है। आगे बढ़ने से पहले हम यह जरूर जान लें की इस प्रकार की घटनाओं को जिसमे किसी इन्सान की मौत असामान्य रूप से होती है, उसे पुलिस या डिटेक्टिव प्रोसीजर के तहत चार भागों में बांटा जाता है जो निम्न हैं:- हत्या/क़त्ल […]
सर सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के द्वारा लिखे गए लगभग सभी उपन्यास, क्राइम-फिक्शन श्रेणी के अन्दर आते हैं। चूंकि वो क्राइम-फिक्शन लिखते हैं तो उसमे क्राइम होना तो आम बात है। जब क्राइम हो कहानी में तो खून के धब्बे और उसकी धार दिखना भी साधारण सी बात है। कई बार ऐसा होता है कि मौकायेवारदात पर कुछ खून के धब्बे नज़र आते हैं जो लाश से अलग होते हैं। ऐसे में उस खून के धब्बे की जांच पुलिस जैसी इन्वेस्टीगेशन एजेंसी के लिए बहुत मुश्किल काम बन जाती है। मौकायेवारदात से उठाये गए सभी प्रकार के सूत्रों को फॉरेंसिक टीम अपने लैब में लेकर जाती है जहाँ उस पर से फिंगर-प्रिंट और दुसरे सूत्रों की तालाश की जाती है। अगर ऐसे किसी मौकायेवारदात पर कोई लाल धब्बा नज़र आये तो क्या उसे खून ही मान लेना चाहिए। गौर करने वाली बात यह है, कि सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के […]
अध्याय 20 : मुंशी जी की बैठक चूनाकली कराई हुई बैठक में चारपाई और जाजिम बिछा है। जाजिम के ऊपर कई तकिये, एक ढोलक और एक सितार रक्खे हुए हैं और ऊपर हँड़िया ग्लास में मोमबत्ती जल रही है। वहाँ मुंशी हरप्रकाश लाल, उनके बहनोई हरिहर प्रसाद, लक्ष्मी प्रसाद और पुजारी पाँडे जी मन लगाकर लाला बलदेव लाल की आफत की बात सुन रहे थे। बूढ़े बलदेव लाल मैदान में डाकू के पल्ले पड़कर किस प्रकार बच आये थे यह बात पाठक जानते हैं। बलदेव लाल ने अपनी राम कहानी पूरी करके मुंशी जी से कहा-“यह देश अराजक हो गया। मेरी जो कुछ जमीन-जायदाद है वह सब बेचकर मुझे कुछ रुपया दो तो मैं काशीवास करूँ। इस जगह अब एक घड़ी रहने का जी नहीं चाहता।” लक्ष्मी प्रसाद – “वाह साहब! देश छोड़कर भाग जायेंगे! अगर देश में जुल्म जबरदस्ती होती है तो ऐसा उपाय कीजिये कि न होने पावे। […]
आपने कई बार ऐसी पुस्तकें देखी होंगी जिनके अंत में लेखक ने अपने उस पुस्तक के लिए किये गए रिसर्च वर्क के लिए दूसरी पुस्तकों और संस्थाओं को क्रेडिट दिया होता है। वहीँ कुछ लेखक ऐसे भी होते हैं कि दिमाग में आईडिया आया और लिखने बैठ गए। लेखकों को उनके लिखने के तरीके से दो भागों में बांटा जाता है – #Plotters और #Pantsers। आइये इन दोनों बिन्दुओं पर बारी-बारी से बात करते हैं। Plotters – इस श्रेणी के #लेखक वो होते हैं जो पहले नावेल को प्लान करते हैं फिर लिखते हैं। ऐसे लेखक समय से आगे जाकर उपन्यास को लिखने की योजनायें बनाते हैं, वो परत-दर-परत घटनाओं की योजना बनाते हैं कि आगे क्या होगा। ऐसे लेखक पहले ही अपने दिमाग में या पेपर पर, घटनाओं को श्रेणीबद्ध कर लेते हैं फिर उसके बाद कहानी को लिखना शुरू करते हैं। जिस प्रकार से कठपुतली का खेल दिखाने […]
अध्याय 19 : मोदी की दुकान सरेंजा के पास पहुँचकर डाकू एक मोदी की दुकान में जा रुके। उन्होंने देखा कि मोदी कुटकी, तिलवा, चावल, दाल, सत्तू आदि चीजों से भरी हाँडी पतुकी चंगेली के बीच में गम्भीर भाव से बैठा है। और एक दूसरा आदमी उसके पास खड़ा होकर गाँजे का दम लगाते हुए बातें बना रहा है। वह जैसा ही काला है वैसा ही लम्बा-चौड़ा है। उसके सिर के बाल बहुत बढे हुए हैं। ओंठ के ऊपर बड़ी बड़ी मूँछें हैं और आँखें पकी करजनी की तरह लाल हैं। गरज यह कि उसको राक्षस कहने में कुछ दोष नहीं है। वक्ता ने मुसाफिरों को एक चटाई दिखाकर कहा -“सलाम साहब! बैठिये।” पाँडे और राय चटाई पर जा बैठे, तीसरा डाकू और एक जगह। मोदी ने चकमक पत्थर से आग जलाते हुए कहा-“भई, दलीप सिंह! यह तो बड़े अचरच की बात है। लोग सबेरे उठकर उसका नाम लेते हैं […]
सर सुरेन्द्र मोहन पाठक जी ने एक लघु कथा “किताबी क़त्ल” लिखा था जिसे एक बार उपन्यास के रूप में भी छापा गया था। अगर आप इस कहानी को पढेंगे तो आप क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन के एक नुक्ते से आसानी से परिचित हो जायेंगे। खैर, आप सभी को अगर ध्यान न हो तो मैं आप सभी की कृपा दृष्टि उस नुक्ते की ओर ले जाना चाहूँगा। “किताबी क़त्ल” की कहानी में जब इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर मौकायेवारदात पर पहुँचता है तो उसे ऐसा लगता है की वहां क़त्ल हुआ है लेकिन उसे वहां लाश नज़र नहीं आती है। मौकायेवारदात से मिले कई सूत्रों से पता चलता है की वहां घर के मालिक का क़त्ल हुआ है लेकिन लाश न मिलने की सूरत में इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर उसे एक नुक्ते के रूप में लेता है। इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर ने इस नुक्ते को “कार्पस डेलिक्टी” का नाम दिया। इस बिंदु पर जब थोड़ी बहुत इन्टरनेट द्वारा खोज […]
अध्याय : 18 मैदान में डुमराँव का तीन कोस तक फैला हुआ मैदान धू-धू कर रहा है। तीन कोस तक धान की हरियाली बिहारियों की आँखों को आनन्दित कर रही है। अष्टमी के दिन तीसरे पहर को उसी हरियाली के बीच डाँड़ो के ऊपर भयंकर डाकू भोलाराय अकेला जा रहा था। उसने जाते-जाते देखा कि एक बगुला एक गढ़ के किनारे, एक पैर उठाये चुपचाप जल की तरफ ताक रहा है। उसे देखकर भोला हँसा और मन ही मन बोला- अरे जानवर! हम लोग आदमी की देह धरकर भी तेरी ही चाल चलते हैं, तू जो करता है, मैं और हीरासिंह भी वही काम करते हैं, हम लोग आदमी होकर भी जानवर हैं। तू सिर्फ अपना मतलब ढूँढता है और हम भी वही करते हैं। जन्म भर डकैती करके मैं खुद बेहद दुखी हुआ और अनगणित आदमियों को बेहद सताया है, न जाने कितने खून किये हैं, कैसा कुकर्म किया […]
अध्याय 17. भोला और गूजरी हीरासिंह के मकान में बड़ी धूम-धाम से नवरात्र की सप्तमी पूजा हो गयी। उन्होंने उसी दिन ब्राहमणों को खिलाया।”हीरा सिंह बड़े पुण्यात्मा हैं।” “हीरासिंह दूसरे कर्ण हैं” हीरासिंह का नाम पृथ्वी पर अमर हो” आदि कहते हुए दल के दल ब्राहमण दक्षिणा ले-लेकर विदा होने लगे और कंगालों के शोरगुल और जय जयकार से आकाश गूँजने लगा। उसको देखकर कौन नहीं कहेगा कि हीरासिंह बड़ा धर्मात्मा और पक्का भक्त है! परन्तु इस समय उसका बायाँ हाथ भोलाराय कहाँ है? आइये पाठक! पातालपुरी में चलिये, वहीं उसका पता मिलेगा। उस अभागे ने दिन भर कुछ नहीं खाया है न एक बूँद पानी पिया है। हीरासिंह ने उसको खिलाने के लिए बहुत कोशिश की थी परन्तु कामयाब नहीं हुआ। भोला ने भूखों रहकर मर जाने की ठान ली थी। उसको अब जीने की लालसा नहीं थी, ज़िन्दगी भारी मालूम होती थी। तरह-तरह की भयंकर चिन्ताओं से उसका […]
मिथक में क्राइम डिटेक्शन पिछले पांच हिस्से लिखने के बाद, आज आपको फिर से ‘बैक टू स्क्वायर’ वहीं लेकर जा रहा हूँ जहां से इस सीरीज के लेखों की शुरुआत हुई थी। नहीं, मैं आपको उससे पहले के समय में लेकर जा रहा हूँ। जब लेखन नहीं किया जाता था तब कहानियों को सुना जाता था और आगे उसे सुना-सुना कर ही बढ़ाया जाता था। ऐसी कई कथाएं आप जानते होंगे, जो सिर्फ किस्सागोई के जरिये ही हम तक पहुंची है। आज हम बात करने वाले हैं, उन कथाओं एवं कहानियों के बारे में, जो मिथक कहलाते हैं, फॉल्कटेल्स कहलाते हैं। इन मिथक एवं फॉल्कटेल्स की उम्र कई सौ एवं हज़ार वर्षों की है। क्या इन मिथक कहानियों में, अपराध एवं अपराध के उलझे रहस्य का कोई अस्तित्व है, यही इस लेख में हम जानेंगे। एक सामान्य सी धारणा यह बनी हुई है कि एडगर एलन पो की कहानियों के […]
अध्याय 16 : मुंशी जी की बैठक मुंशीजी बैठक में आकर एक कुर्सी पर बैठ गये। खवास सामने अलबेला रख गया था। मुंशीजी ने तमाखू पीते-पीते कहा-“बाहर जो लोग शोरगुल मचा रहे हैं उनको यहाँ बुलाओ।” दरोगा, जमादार और लट्ठ लिये कई चौकीदार बैठक में आये। उनके साथ हमलोगों का पुराना परिचित अबिलाख बिन्द भी आया था। दारोगा फ़तेहउल्ला ने हरप्रकाश की तरफ उँगली दिखाकर अबिलाख से पूछा-“यही आदमी है!” अबिलाख – “हाँ सरकार!” दारोगा – “तुम्हारा नाम हरप्रकाश लाल है?” मुंशीजी ने फतेहउल्ला के मुँह की तरफ ताककर मुसकुराते हुए व्यंग्य से कहा-“जी हाँ हुजूर!” दारोगा -“तुम्हारे नाम गिरफ्तारी का वारंट है। कल रात को तुमने हीरासिंह के रेशम की किश्ती लूट ली है और एक नौकर को मार डाला है। तुम्हे थाने चलना पड़ेगा।” मुंशी-“अच्छी बात है। खड़े क्यों हैं? तशरीफ का टीकरा रखिये।” दारोगा- “दिल्लगी क्यों करते हो?” मुंशीजी ने कहा – “वाह बड़े मियाँ! आपसे मैं […]
सस्पेंस के लिए चार जरूरी कारक हैं – पाठकों की सहानुभूति, पाठकों की चिंता, करीब से करीबतर खतरे और बढ़ता तनाव। पाठकों की सहानुभूति हासिल करने के लिए किरदार को महत्वाकांक्षा, इच्छा, घाव, आंतरिक संघर्ष आदि भावों का गहना पहना सकते हैं, जिससे पाठक उनके साथ जुड़ाव महसूस करे। जितना अधिक पाठक और किरदार के साथ सहानुभूति का बंधन मजबूत होगा उतना ही पाठक कहानी के साथ खुद को जोड़ पायेगा। एक बार किरदार के साथ जुड़ाव महसूस हो जाने के बाद, जब पाठक उसके बारे में सोचने लगता है तो वह अपना सबकुछ ये देखने में झोंक देता है कि किरदार किस तरह उस चीज को पाता है जो वह पाना चाहता है। लेखक को चाहिए की ऐसा माहौल बनाए जिससे पाठक किरदार के बारे में यह चिंता करने लग जाए कि जो वह चाहता था वह उसे मिला की नहीं या मिलेगा की नहीं। जब पाठक जान जाते […]
अध्याय १५ : हरप्रकाश लाल का मकान पहले कही हुई कार्यवाई करके मकान लौटने में देर हो जाने से मुंशी जी अन्दर महल में न जाकर बैठक में ही सो रहे। बड़ी मेहनत के बाद अधिक रात गए, सोने के कारण, आज सबेरे सात बजे उनकी नींद खुली। उठकर वे भीतर गए – चौक में देखा कि और कोई नहीं है, सिर्फ एक लौंडी कुछ काम कर रही है। वे कोठे पर चढ़े, वहां भी कोई नहीं है, उनके सोने के कमरे में ताला बंद है। लौंडी से पूछने पर जवाब मिला – “छत पर”। मुंशी जी छत पर चढ़ गये। दकेह कि पार्वती सिर नीचे किये पूजा के बर्तन साफ़ कर रही है। उसकी मांग के दोनों ओर काले घुंघराले बाल लटक कर मंद पवन से धीरे-धीरे हिल रहे हैं और ललाट तथा नाक पर दो एक बूंद पसीना और गालों पर ललाई आ जाने से मुँह की […]
हत्या और आत्महत्या, हम इन दोनों शब्दों से भली-भांति परिचित हैं। दैनिक जीवन में, इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया के जरिये, हम कई ऐसे अपराधिक घटनाओं के बारे में जानते हैं, जिसमे इन दोनों टर्म का इस्तेमाल होता है। क्राइम फिक्शन पढने वाले कई पाठकों को भी इसके बारे जानकारी होती है। आपने अक्सर देखा होगा कि अधिकतर रहस्य कथाओं में यह सवाल प्रमुखता से उठाया जाता है – ‘की जो अपराधिक घटना हुई है, जिसमे एक इंसान की मृत्यु हो गयी है, वो ह्त्या है या आत्महत्या’? चालाक अपराधी बड़ी चतुराई से पुलिस या जासूस को इस बिना पर गुमराह करने में सफल रहता है की ये हत्या, हत्या ना होकर आत्महत्या है| अब तथ्यों, परिस्थितियों और अपनी इन्वेस्टीगेशन के आधार पर यह नायक जासूस (पुलिस/प्राइवेट/आम आदमी) का कार्य होता है कि वो कैसे अपराधी की इस चतुराई को भांपकर असल तह तक पहुंचेI हम आपको बताने जा रहे हैं […]
‘लफ़्ज़ों से बनते किस्से’ ‘लफ़्ज़ों से बनते किस्से’ इस पेज पर शुरू की जा रही नयी ‘प्रतियोगिता’ है। इस प्रतियोगिता में, SWCCF के वेबसाइट पर, प्रतियोगिता सेक्शन में, ‘लफ़्ज़ों से बनते किस्से’ पेज पर, एक इमेज के जरिये, आप सभी के सामने हम ‘एक वाक्य या एक पंक्ति’ रखेंगे – प्रतियोगी को इसी ‘वाक्य या पंक्ति’ से अपनी कहानी को शुरू करना है और पूरा लिखकर हमें भेजना है। ध्यान रहे आपके द्वारा लिखी जा रही कहानी का ‘पहला वाक्य या पहली पंक्ति’ वही हो जो उस इमेज में दिया गया हो। उसके बाद आप अपनी कहानी में अपनी मर्जी के किरदार, घटनाएं एवं भाव आदि डालने के लिए स्वतंत्र हैं। प्रतियोगिता से जुड़े अन्य नियम आप नीचे पढ़ सकते हैं:- महतवपूर्ण तिथियाँ:- इस प्रतियोगिता के आरम्भ होने की तिथि – १ मई, २०१७ इस प्रतियोगिता में अपनी कहानी भेजने की अंतिम तिथि – २० मई, २०१७ SWCCF के […]

Message वाह, क्या खूब लघुकथा है। शब्दों की मितव्ययिता और भावों की गहराई का ऐसा अद्भुत संगम विरले ही देखने…