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अध्याय १५ : हरप्रकाश लाल का मकान

 

पहले कही हुई कार्यवाई करके मकान लौटने में देर हो जाने से मुंशी जी अन्दर महल में न जाकर बैठक में ही सो रहे। बड़ी मेहनत के बाद अधिक रात गए, सोने के कारण, आज सबेरे सात बजे उनकी नींद खुली।

उठकर वे भीतर गए – चौक में देखा कि और कोई नहीं है, सिर्फ एक लौंडी कुछ काम कर रही है। वे कोठे पर चढ़े, वहां भी कोई नहीं है, उनके सोने के कमरे में ताला बंद है। लौंडी से पूछने पर जवाब मिला – “छत पर”। मुंशी जी छत पर चढ़ गये। दकेह कि पार्वती सिर नीचे किये पूजा के बर्तन साफ़ कर रही है। उसकी मांग के दोनों ओर काले घुंघराले बाल लटक कर मंद पवन से धीरे-धीरे हिल रहे हैं और ललाट तथा नाक पर दो एक बूंद पसीना और गालों पर ललाई आ जाने से मुँह की शोभा अपूर्व हो गयी है।

मुंशी जी पार्वती की यह अपूर्व अलौकिक मूर्ति देखते-देखते मुग्ध होकर उसके पास आ बैठे और उसके नर्म-नर्म हाथ अपने हाथों में लेकर प्रेम से बोले – “तुम क्या कर रही हो? इतनी कड़ी धुप में बैठी हो? अरे! तुम रोती क्यों हो?”

पार्वती कुछ उत्तर न देकर और जोर से रोने लगी।

मुंशी -:”क्या हुआ प्यारी? बताओ क्यों रोती हो?”

पार्वती –“रोती नहीं हूँ।”

इसी बीच में लौंडी ने आकर कहा – “हाँ, एहिजे त बानी। क सरकार। रवां कइसन हईं। रवां का बेचारी डर का मारे रातभर एको बेर त आवे के चाही। काल्ह जइसे राति कटल ह तवन रवां का जान तानी आ हम जानतानी।”

मुंशी – “अरे, तू क्या बक रही है।”

लौंडी – “सरकार, राउर नून खाइला ऐही से कहतानी नाहीं, हमरा बोलला का कवन काम बा? साच बात घुरहू कहें सब का मन उतरे रहें। रवां जवान गहना ओह मुँहजरी के दिहली तवन इनके दिहती त रउरे न रहित।”

मुंशी –“अरे तू यह सब क्या बक रही है, पागल हो गयी है क्या?”

लौंडी – “सरकार। हम पागल नइखी भइल। रउरे मति गड़बड़ा गइल बा। नाहीं त अइसन रानी के छोड़ि के एगो भिखमंगिन के ले ले फिरतीं?”

मुंशी – “तू ने तो मुझे चक्कर में डाल दिया। मैं किसको लेकर फिरता हूँ रे?”

लौंडी – “सरकार, वा नइखी जानत? काल्हि सांझ के केकरा पहिरा-ओढा के संग ले गइलीं। हम का न देखलीं?”

मुंशी जी ने मुस्कुराकर कहा – “अरे! तू ने कहाँ से देखा?”

लौंडी-“हम कतहूँ से देखले होई, बाकी इ का रवां नीक काम कइली ह?”

मुंशी – “जो गहना उसके बदन पर देखा था वह मैं अपनी स्त्री के लिए लाया हूँ। उसीके कारण रास्ते मुझे आफत आई थी।”

मुंशी जी ने यह कह और छत के किनारे जाकर दलीप सिंह को गहना का संदूक लाने के लिए पुकारा। लौंडी ने कुछ देर चुप रहकर कहा- “अच्छा सरकार। इनहीं खातिर गहना ले आइल रहलीं, हाँ त ओकरा के काहे पहिरवलीं?”

मुंशी – “किसको? वह क्या जनाना है?”

इतने में दलीप सिंह संदूक लाया।

लौंडी – “क जी प्यादा साहब। काल्हि इ कुल गहना के पहिरले रहे साँचे-साँचे कहीं।”

दलीप – “क्यों। टीमल चौबे ने पहना था।”

लौंडी – “हूँ, टीमल चौबे। उनके त डाकू मारी धललनिस। उनकर महतारी राति दिन रोवले।”

दलीप – “नहीं, दाई नहीं। कल सबेरे वे आये हैं।”

पार्वती ने धीरे से कहा – “बड़ा अच्छा हुआ। बेचारी बुढिया माँ रो-रोकर मरती थी। पांडे जी भी आये हैं क्या?”

मुंशी – “नहीं, वे न जाने किधर बह गए, कुछ पता नहीं मिला। लक्ष्मी प्रसाद बड़ी-बड़ी मुश्किलों से बचे हैं।”

दलीप-“पाण्डेय जी भी आये हैं।”

मुंशी – “ऐं! कब आये?”

दलीप – “आपके भीतर जाने के थोड़ी ही देर बाद वे आये।”

इतने में मकान के दरवाजे पर बड़ा शोरगुल मचा। थोड़ी देर बाद चकराये और कांपते हुए मुंशी जी के बहनोई हरिहर प्रसाद वहां पहुंचे।

मुंशी – “क्यों हरी जी। इतना शोरगुल क्यों मच रहा है?”

हरिहर – “इतनी आफत मचा सकते हो। क्यों सत्यानाश कर रहे हो?”

मुंशी – “क्यों क्या हुआ?”

हरि.-“तुम्हारे नाम गिरफ्तारी का वारंट आया है। ड्योढ़ी पर दारोगा, जमादार आकर धूम मचा रहे हैं। दुनिया भर के लोग जमा हो गए हैं। तुमने क्या किया है?”

मुं.-“मैंने डाकू को मारा है और डाकू को पकड़ा है।” – कहकर वे अटारी से उतरकर बैठक में आये।

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