1 आनन्द ने गद्देदार कुर्सी पर बैठकर सिगार जलाते हुए कहा-आज विशम्भर ने कैसी हिमाकत की! इम्तहान करीब है और आप आज वालण्टियर बन बैठे। कहीं पकड़ गये, तो इम्तहान से हाथ धोएँगे। मेरा तो खयाल है कि वजीफ़ा भी बन्द हो जाएगा। सामने दूसरे बेंच पर रूपमणि बैठी एक अखबार पढ़ रही थी। उसकी आँखें अखबार की तरफ थीं; पर कान आनन्द की तरफ लगे हुए थे। बोली-यह तो बुरा हुआ। तुमने समझाया नहीं? आनन्द ने मुँह बनाकर कहा-जब कोई अपने को दूसरा गाँधी समझने लगे, तो उसे समझाना मुश्किल हो जाता है। वह उलटे मुझे समझाने लगता है। रूपमणि ने अखबार को समेटकर बालों को सँभालते हुए कहा-तुमने मुझे भी नहीं बताया, शायद मैं उसे रोक सकती। आनन्द ने कुछ चिढ़कर कहा-तो अभी क्या हुआ, अभी तो शायद काँग्रेस ऑफिस ही में हो। जाकर रोक लो। आनन्द और विशम्भर दोनों ही यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी थे। आनन्द के हिस्से […]
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अब हम थोड़ा-सा हाल तारा का लिखते हैं, जिसे इस उपन्यास के पहले ही बयान में छोड़ आये हैं। तारा बिल्कुल ही बेबस हो चुकी थी, उसे अपनी जिन्दगी की कुछ भी उम्मीद न रही थी। उसका बाप सुजनसिंह उसकी छाती पर बैठा जान लेने को तैयार था और तारा भी यह सुनकर कि उसका पति बीरसिंह अब जीता न बचेगा, मरने के लिए तैयार थी, मगर उसकी मौत अभी दूर थी। यकायक दो आदमी वहाँ जा पहुँचे, जिन्होंने पीछे से जाकर सुजनसिंह को तारा की छाती पर से खेंच लिया। सुजनसिंह लड़ने के लिए मुस्तैद हो गया और उसने वह हर्बा, जो तारा की जान लेने के लिए हाथ में लिए हुए था, एक आदमी पर चलाया। उस आदमी ने भी हर्बे का जवाब खंजर से दिया और दोनों में लड़ाई होने लगी। इतने ही में दूसरे आदमी ने तारा को गोद में उठा लिया और लड़ते हुए अपने […]
हरिपुर गढ़ी के अन्दर राजा करनसिंह अपने दीवानखाने में दो मुसाहबों के साथ बैठा कुछ बातें कर रहा है। सामने हाथ जोड़े हुए दो जासूस भी खड़े महाराज के चेहरे की तरफ देख रहे हैं। उन दोनों मुसाहबों में से एक का नाम शंभूदत और दूसरे का नाम सरूपसिंह है। राजा : रामदास के गायब होने का तरद्दुद तो था ही मगर हरीसिंह का पता लगने से और भी जी बेचैन हो रहा है।। शंभू० : रामदास तो भला एक काम के लिए भेजे गए थे, शायद वह काम अभी तक नहीं हुआ, इसलिए अटक गए होंगे। मगर हरीसिंह तो कहीं भेजे भी नहीं गए। सरूप० : जितना बखेड़ा है, सब नाहरसिंह का किया हुआ है। राजा : बेशक, ऐसा ही है, न-मालूम हमने उस कमबख़्त का क्या बिगाड़ा है, जो हमारे पीछे पड़ा है। वह ऐसा शैतान है कि हरदम उसका डर बना रहता है और वह हर जगह […]
यह किसी कुंवारी लड़की का नाम नहीं है पर लगता है जैसे किसी फिरंगी मेम का नाम हो। मोबाईल जगत में यह बहुत ही चालू एवं प्रचलित नाम है जो जन-जन की जुबान पर है। यह वास्तव में ‘‘मिस्ड कॉल‘‘ है परंतु इसका बिगड़ा रूप ‘‘मिस कॉल‘‘ ही चलन में है। आज मोबाईल हर घर में लगभग जितने सदस्य हैं उतनी ही संख्या में पाए जा सकते हैं क्या ग्रामीण क्या शहरी सब ‘‘मिस कॉल‘‘ को जानते हैं। इस मोबाईल ने सारी दुनिया को मुट्ठी में समेट लिया है। सूचना एवं संचार जगत में इसने एक जबरदस्त क्रांति ला दी है। इस छोटी सी मशीन में इतनी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं कि घर बैठे अधिकांश काम निबटाए जा सकते हैं बस उसे आपरेट करने का थोड़ा ज्ञान होना चाहिए। बैंक का काम, बिल के भुगतान का काम, टिकिट बुक करने संबंधी अनेक अन्य काम बड़ी आसानी से हो जाते […]
हां , एक फंदा बनाया है मैने, ये मजबूत है इतना जितना उद्विग्न मैं और जितनी अल्प मेरी जिजीविषा आंसू धुली आंखों से देख रहा हूं मैं ऐसा ही एक फंदा डोरी से बना, थोड़ा छोटा मां ने अंगुली में, इसे है रख लपेटा दूजा छोर इसका मेरे झूले से है बंधा मैं तब भी रो रहा था और अब भी इस फंदे को पार कर एक बार फिर मां की गोद में है जाना मुझे हां, कुछ नहीं सोचना अब और बस मुझे जाना है उस असीम शान्ति की ओर जहां कृत्रिम मुस्कान नहीं अनिवार्य परेशान मन रो सकता वहां बेफिक्र हो, इत्मीनान से जब तक की नहीं अंतस का आवेग उतर जाए बाढ़ के पानी की तरह मेरे जीवन के गांव से …
आधी रात का समय है। चारों तरफ अंधेरी छाई हुई है। आसमान पर काली घटा रहने के कारण तारों की रोशनी भी जमीन तक नहीं पहुँचती। जरा-जरा बूंदा-बूंदी हो रही है, मगर वह हवा के झपेटों के कारण मालूम नहीं होती। हरिपुर में चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। ऐसे समय में दो आदमी स्याह पोशाक पहिरे, नकाब डाले (जो इस समय पीछे की तरफ उल्टी हुई है) तेजी से कदम बढ़ाये एक तरफ जा रहे हैं। ये दोनों सदर सड़क को छोड़ गली-गली जा रहे हैं और तेजी से चल कर ठिकाने पहुँचने-की कोशिश कर रहे हैं, मगर गजब की फैली हुई अंधेरी इन लोगों को एक रंग पर चलने नहीं देती, लाचार जगह-जगह रुकना पड़ता है, जब बिजली चमक कर दूर तक का रास्ता दिखा देती है तो फिर ये कदम चलते हैं। ये दोनों गली-गली चल कर एक आलीशान मकान के पास पहुँचे जिसके फाटक पर दस-बारह […]
किसी देश की संस्कृति, जीवनशैली, आचार-विचार, अर्थव्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था आदि को समझना हो तो यात्रा से बढ़कर कुछ भी नहीं है। यूरोप के यात्री इस मामले में अग्रणी रहे हैं। वे दुनिया के तमाम देशों की यात्रा कर इसे समझने का प्रयत्न करते हैं तथा वृतांतों में भी इसे उद्धृत करते हैं। सेंट अगस्टिन ऑफ हिप्पो ने कहा है कि विश्व एक किताब है और यात्रा न करने वाले व्यक्ति इस किताब के सिर्फ पन्ने ही गिनते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि आप यात्रायें नहीं करते तो आपके पास मात्र सीमित ज्ञान ही होगा तथा दृष्टिकोण सीमित दायरे में ही होंगे। 18वीं सदी के पूर्वार्ध में यूरोपीय जहाजियों ने ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप की खोज की थी और कालांतर में ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी भाग पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और यहां अंग्रेजों की नई परम्पराएं पुष्पित और पल्लवित हुई। मुझे वेस्टर्न यूनिवर्सिटी पर्थ में अध्ययनरत मेरी भतीजी के उच्च शिक्षा […]
घटाटोप अंधेरी छाई हुई है, रात आधी से ज्यादा जा चुकी है, बादल गरज रहे हैं, बिजली चमक रही है, मूसलाधार पानी बरस रहा है, सड़क पर बित्ता-बित्ता-भर पानी चढ़ गया है, राह में कोई मुसाफिर चलता हुआ नहीं दिखाई देता। ऐसे समय में एक आदमी अपनी गोद में तीन वर्ष का लड़का लिए और उसे कपड़े से छिपाए, छाती से लगाए, मोमजामे के छाते से आड़ किये किले की तरफ लपका चला जा रहा हैं। जब कहीं रास्ते में आड़ की जगह मिल जाती है, अपने को उसके नीचे ले जाकर सुस्ता लेता है और तब न बन्द होने वाली बदली की तरफ कोई ध्यान न देकर पुन: चल पड़ता है। यह आदमी जब किले के मैदान में पहुँचा, तो बाएँ तरफ मुड़ा जिधर एक ऊँचा शिवालय था। यह बेखौफ उस शिवालय में घुस गया और कुछ देर सभा-मण्डप में सुस्ताने का इरादा किया, मगर उसी समय वह लड़का […]
दूसरे दिन शाम को खण्डहर के सामने घास की सब्जी पर बैठे हुए बीरसिंह और नाहरसिंह आपस में बातें कर रहे हैं! सूर्य अस्त हो चुका है, सिर्फ उसकी लालिमा आसमान पर फैली हुई है। हवा के झोंके बादल के छोटे-छोटे टुकड़ों को आसमान पर उड़ाये लिए जा रहे हैं। ठंडी-ठंडी हवा जंगली पत्तों को खड़खड़ाती हुई इन दोनों तक आती और हर खण्ड की दीवार से टक्कर खाकर लौट जाती है। ऊँचे-ऊँचे सलई के पेड़ों पर बैठे हुए मोर आवाज लड़ा रहे हैं और कभी-कभी पपीहे की आवाज भी इन दोनों के कानों तक पहुँच कर समय की खूबी और मौसिम के बहार का सन्देशा दे रही है। मगर ये चीजें बीरसिंह और नाहरसिंह को खुश नहीं कर सकतीं। वे दोनों अपनी धुन में न-मालूम कहाँ पहुँचे हुए और क्या सोच रहे हैं। यकायक बीरसिंह ने चौंक कर नाहरसिंह से पूछा– बीर० : खैर, जो भी हो, आप उस […]
किनारे पर जब केवल नाहरसिंह और बीरसिंह रह गए तब नाहरसिंह ने वह चीठी पढ़ी, जो रामदास की कमर से निकली थी। उसमें यह लिखा हुआ था: मेरे प्यारे दोस्त, अपने लड़के के मारने का इल्जाम लगा कर मैंने बीरसिंह को कैदखाने में भेज दिया। अब एक-ही-दो दिन में उसे फांसी देकर आराम की नींद सोऊँगा। ऐसी अवस्था में मुझे रिआया भी बदनाम न करेगी। बहुत दिनों के बाद यह मौका मेरे हाथ लगा है। अभी तक मुझे मालूम नहीं हुआ कि रिआया बीरसिंह की तरफदारी क्यों करती है और मुझसे राज्य छीन कर बीरसिंह को क्यों दिया चाहती है? जो हो, अब रिआया को भी कुछ कहने का मौका न मिलेगा। हाँ, एक नाहरसिंह डाकू का खटका मुझे बना रह गया, उसके सबब से मैं बहुत ही तंग हूँ। जिस तरह तुमने कृपा करके बीरसिंह से मेरी जान छुड़ाई, आशा है कि उसी तरह से नाहरसिंह की गिरफ्तारी की […]
रात देर तक जागना और देर रात जाग जाना बड़ा भयंकर अंतर है दोनों परिस्थितियों में, पहली में जहां आप अपनी मर्ज़ी से जाग रहे हैं और वक़्त बिता रहे हैं मनपसंद कामों में किसी फ़िल्म या किताब या किसी की बातों में डूबे सुनहले भविष्य का सपना बुनते ख़ुश – ख़ुश जाग रहे होते हैं। दूसरी में तो जैसे कोई अंधेरे का पिशाच ठोकर मार कर जगा जाता है कोई नन्हा बच्चा जैसे जाग गया हो बैमाता का थप्पड़ खा कर.. फिर ये जाग याद दिलाएगा एक एक कर वे सारी गलतियां जो आपने कर रखी हैं जाने या अनजाने.. दिल को कचोटता मरोड़ता एहसास कि आपके लगभग दोस्तों की नौकरी लग चुकी है और शादी भी हो चुकी है। या कोई ऐसा प्रपंच दिखाई देगा आंखों में तैरता हुआ जिसे आप दशकों पहले भुला कर बैठे हैं। याद दिलाएगा कि मां बीमार रहने लगी हैं पिता न जाने […]
बेचारे बीरसिंह कैदखाने में पड़े सड़ रहे हैं। रात की बात ही निराली है, इस भयानक कैदखाने में दिन को भी अंधेरा ही रहता है; यह कैदखाना एक तहखाने के तौर पर बना हुआ है, जिसके चारों तरफ की दीवारें पक्की और मजबूत हैं। किले से एक मील की दूरी पर जो कैदखाना था और जिनमें दोषी कैद किए जाते थे, उसी के बीचोबीच यह तहखाना था, जिसमें बीरसिंह कैद थे। लोगों में इसका नाम ‘आफत का घर’ मशहूर था। इसमें वे ही कैदी कैद किए जाते थे, जो फाँसी देने के योग्य समझे जाते या बहुत ही कष्ट देकर मारने योग्य ठहराये जाते थे। इस कैदखाने के दरवाजे पर पचास सिपाहियों का पहरा पड़ा करता था। नीचे उतरकर तहखाने में जाने के लिए पाँच मजबूत दरवाजे थे और हर एक दरवाजे में मजबूत ताला लगा रहता था। इस तहखाने में न-मालूम कितने कैदी सिसक-सिसक कर मर चुके थे। आज […]
जॉर्डन की यात्रा के दौरान शारजाह हवाई अड्डे में 7-8 अरब शेखों को बड़े-बड़े बाज पक्षियों के साथ देखा, मेरे अतिरिक्त अन्य लोगों के लिए भी यह कौतूहल का विषय था, पर यहाँ के शेखों के लिए बेहद सामान्य चीज थी। उनके चेहरे में वैभव की झलक थी। बाज का मालिक होना उनके लिए एक गर्व व प्रतिष्ठा का विषय था। दरअसल मरूस्थलीय देशों में यह खानाबदोश व घुमन्तू जाति ’’विडविन संस्कृति का प्रतीक है। यह पक्षी पारम्परिक रूप से शिकार के लिए इस्तेमाल किया जाता था और रेगिस्तान में जीवित रहने का एक स्त्रोत था। अरब के घोड़े या ऊँट के समान बाज पक्षी उनकी संस्कृति का एक अंग है। बाज शक्ति, साहस, चपलता के कारण यूएई का राष्ट्रीय प्रतीक है। यूएई में कानूनन बाज के साथ बिजनेस क्लास में हवाई यात्रा की जा सकती है। अधिकांश के लिए यह कल्पनातीत ही है। अम्मान के क्वीन आलिया अंतर्राष्ट्रीय हवाई […]
ऊपर लिखी वारदात के तीसरे दिन आधी रात के समय बीरसिंह के बाग में उसी अंगूर की टट्टी के पास एक लंबे कद का आदमी स्याह कपड़े पहिरे इधर-से-उधर टहल रहा है। आज इस बाग में रौनक नहीं, बारहदरी में लौंडियों और सखियों की चहल-पहल नहीं, सजावट को तो जाने दीजिये, कहीं एक चिराग तक नहीं जलता; मालियों की झोंपड़ी में भी अंधेरा पड़ा है। बल्कि यों कहता चाहिए कि चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। वह लंबे कद का आदमी अंगूर की टट्टियों से लेकर बारहदरी और उसके पीछे तोशेखाने तक जाता है और लौट आता है मगर अपने को हर तरह छिपाये हुए है, जरा-सा भी खटका होने से या एक पते के भी खड़कने से वह चौकन्ना हो जाता हैं और अपने को किसी पेड़ या झाड़ी की आड़ में छिपा कर देखने लगता है! इस आदमी को टहलते हुए दो घण्टे बीत गये, मगर कुछ मालूम […]
आसमान पर सुबह की सुफेदी छा चुकी थी जब लाश लिए हुए बीरसिंह किले में पहुंचा । वह अपने हाथों पर कुंअर साहब की लाश उठाये हुए था। किले के अन्दर की रिआया तो आराम में थी, केवल थोड़े-से बुड्ढे, जिन्हें खांसी ने तंग कर रक्खा था, जाग रहे थे और इस उद्योग में थे कि किसी तरह बलगम निकल जाए और उनकी जान को चैन मिले। हाँ, सरकारी आदमियों में कुछ घबराहट-सी फैली हुई थी और वे लोग राह में जैसे-जैसे बीरसिंह मिलते जाते उसके साथ होते जाते थे, यहाँ तक कि दीवानखाने की ड्योढ़ी पर पहुँचते-पहुँचते पचास आदमियों की भीड़ बीरसिंह के साथ हो गई, मगर जिस समय उसने दीवानखाने के अन्दर पैर रक्खा, आठ-दस आदमियों से ज्यादा न रहे। कुंअर साहब की मौत की खबर यकायक चारों तरफ फल गई और इसलिए बात-की-बात में वह किला मातम का रूप हो गया और चारों तरफ हाहाकार मच गया। […]

55 साल बाद इस कहानी को पढ़ कर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई