दीपांशु सहाय

दीपांशु सहाय

छुटपन से ही छंदों व तुकबंदियों में विटप की छांव सा सुकून मिलता था ।अब पेशे से एक बैंककर्मी हूं , दिन भर अर्थ की नगरी में रहते हुए भी काव्य की ओर लगाव अविरल बढ़ता ही गया है । कविता सागर की लहरों को मैं क्या दे पाऊं इसमें संशय है .. किंतु इसने मुझे सबसे अमोल मोती दे दिया - आत्मा का संतोष ।

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