नई कोठरी नमस्यामो देवान् ननु हतविधेस्ते$पि वशगा, विधिर्वन्द्य: सो$पि प्रतिनियतकर्मैकफलदः । फलं कर्मायत्त यदि किममरै: किं च विधिना, नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्य: प्रभवति ।। (भतृहरि:) बस, इसी तरह की बातें मैं मन ही मन सोच रही और रो रही थी इतने ही में जेलर साहब ने आकर मुझसे यों कहा,– “बेटी दुलारी, मुझे ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे खोटे दिन गए और भले दिन अब आया ही चाहते हैं। तुम पर जगदीश्वर की करुण दृष्टि पड़ी है और तुम्हारा दुर्भाग्य सौभाग्य से बदला चाहता है। मेरे इतना कहने का मतलब केवल यही है कि एक बड़े जबर्दस्त हाथ ने तुम्हें अपने साये तले ले लिया है, जिससे इस आफत से तुम्हारा बहुत जल्द छुटकारा हो जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। बात यह है कि भाई दयालसिंह बहुत पुराने और बड़े जबर्दस्त जासूस हैं और सरकार के यहाँ इनकी बातों का बड़ा आदर है। तब, जब कि यही […]
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वी आर रेडी टू गो इन 100, 99, 98…. काउंटडाउन स्टार्ट हो चुका था। जिओसिंक्रोनोअस सैटेलाइट लांच वेहिकल एमकेIII-डी-2 के कॉकपिटशिप केबिन में उस वक़्त चार लोग थे। बाहर सबकी निगाहें उस रॉकेट पर लगी हुई थीं। ये पहला मौका होगा जब चाँद पर भारतीय तिरंगा लहराया जायेगा। लेकिन इसरो द्वारा चाँद पर भेजने का फैसला करने और साढ़े आठ सौ करोड़ रुपए इसपर ख़र्च करने की वजह सिर्फ झंडा लहराना तक सीमित नहीं थी। काउंटडाउन अपने एंड पर पहुँचा 03..02..01, रिलीजिंग द लोअर डॉक एंड इन्जेंस ऑन फायर… मिशन मून-डॉट की टीम हवा में उठ चुकी थी। उन चारों को तेज़ झटका लगा और उनकी पीठ अपनी-अपनी कुर्सियों पर तन गयी। 9537 किलोमीटर प्रति घंटे का थ्रस्ट जो S200 बूस्टर फर्स्ट स्टेज इंजिन्स की वजह से उन्हें लगा था। सबकी मुट्ठियाँ भिंच गयीं। रॉकेट स्पेस में पहुँचने और उसके बाद फिर थर्ड स्टेज एमकेIII के इजेक्ट होने तक पूरी […]
गांव जाने पर जो सबसे पहला चेहरा सामने आता है वो है हमारे “शिवबचन ठाकुर” का पौढ़ अवस्था की ओर अग्रसर शिबच्चन कांपते हाथ भी हमारे हर मांगलिक कार्यक्रम में इस ठसक से शामिल होते हैं कि क्या बताएं अम्मा कहीं लोकाचार भूल भी जाएं तो चट से अम्मा को टोकते हैं “ह नु! रवा हियां अइसे न अइसे होला”।बचपन से ठाकुर (पेशेगत जाति हज़्ज़ाम) के रूप में उन्हें ही जाना। ग्रेजुएशन के दिन थे,दिल्ली प्रवास में रहते।घर (भोजपुर) और भाषा भोजपुरी के भावनात्मक लगाव में कुछ पढ़ने का मन किया।एकमात्र सहारा गूगल में सर्च किया तब जाकर पहला साक्षात्कार हुआ,दूसरे ठाकुर! जिन्हें कोई भोजपुरी का शेक्सपियर कहता है तो कोई भोजपुरी का तुलसीदास,कहीं भरतमुनि के विधा के कलाकार कहे गए तो खुद महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा अनगढ़ हीरा कहाये जाने वाले “भिखारी ठाकुर” से। 18 दिसम्बर 1887 को कुतुबपुर में माता शिवकली देवी और पिता दलसिंग ठाकुर के घर […]
बचपन में क्राइम फिक्शन नॉवेल पढ़ते वक़्त ये बात मन में बार बार आती थी कि ‘इस तरह डकैती के आइडियाज़ लिखने वाले में क्या अनोखा दिमाग होगा, पर क्या इन्हें कोई सच में भी आजमा सकता है?’ फिर एक रोज़ पता चला था कि मशहूर पल्प फिक्शन नॉवेल राइटर, सर सुरेंद्र मोहन पाठक की एक नॉवेल पढ़कर कुछ डकैतों ने उसी तरह अपराध को अंजाम दिया’ हाल ही में अमेज़न प्राइम पर एक वेब सीरीज लांच हुई है, ब्रीथ (Breathe). यही वो सीरीज है, जिससे अभिषेक बच्चन OTT की दुनिया में अपना पहला कदम रख रहे हैं. Breathe – Into the shadows का इंतेज़ार न सिर्फ अभिषेक बच्चन के फैन्स(?) कर रहे थे बल्कि Breathe सीजन 1 के दर्शकों और प्रशंसकों की उत्सुकता भी सीजन 2 के लिए बनी हुई थी. Breathe के पहले सीजन में आपको याद होगा कि आर. माधवन एक ऐसे पिता के रोल में थे […]
फिल्म शोले में एक डायलॉग जबरदस्त मशहूर हुआ था- ” इलाके में 50 मील के अंदर जब भी कोई बच्चा रोता है तो मां कहती है- “चुप हो जा बेटे, वरना गब्बर सिंह आ जाएगा।” इतना आतंक था गब्बर सिंह डाकू का। गब्बर सिंह आतंक का प्रर्याय बन गया था। गांव देहात में बच्चों के मनोरंजन का साधन कम या नहीं के बराबर होने से उन्हें व्यस्त रखना एक कठिन काम होता था। बचपन में जब मां बाप अपने छोटे बच्चों को दादी मां के जिम्मे छोड़कर खेत या जंगल में काम करने जाते और घर में जब छोटे बच्चे दादी मां को तंग करते, रोते या जिद करते तो दादी मां कहती थी- “चुप हो जाओ नहीं तो “गोंगो” आ जाएगा। “इसी प्रकार मां के सामने जब बच्चा रूठता, मचलता, जमीन पर लोटता, जिद करता, बात नहीं मानता तो मां भी कहती- ”वो देखो “गोंगो” आ रहा है। “गोंगो” […]
चंद्रकांता संतति भाग 7 बयान 2 के लिए क्लिक करें रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। तेजसिंह उसी दो नम्बर वाले कमरे के बाहर सहन में तकिया लगाये सो रहे हैं। चिराग बालने का कोई सामान यहाँ मौजूद नहीं जिससे रोशनी करते, पास में कोई आदमी नहीं जिससे दिल बहलाते। बाग से बाहर निकलने की उम्मीद नहीं कि कुमारों को छुड़ाने के लिए कोई बन्दोबस्त करते, लाचार तरह-तरह के तरद्दुदों में पड़े उन पेड़ों पर नजर दौड़ा रहे थे जो सहन के सामने बहुतायत से लगे हुए थे। यकायक पेड़ों की आड़ में रोशनी मालूम पड़ी। तेजसिंह घबड़ाकर ताज्जुब के साथ उसी तरफ देखने लगे। थोड़ी ही देर में मालूम हुआ कि कोई आदमी हाथ में चिराग लिए तेजी के साथ कदम बढ़ाता उनकी तरफ आ रहा है। देखते-देखते वह आदमी तेजसिंह के पास आ पहुंचा और चिराग एक तरफ रखकर सामने खड़ा हो के बोला, “जय माया […]
अयाचित बन्धु उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे | राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः || (चाणक्य:) अस्तु, अब यह सुनिए कि कुर्सियों पर बैठ जाने पर उन नौजवान बैरिष्टर साहब ने मुझे सिर से पैर तक फिर अच्छी तरह निरख कर यों पूछा,–‘दुलारी तुम्हारा ही नाम है?” मैंने धीरे से कहा,– “जी हां।” वे बोले,—“ अच्छा तो, और कुछ पूछने के पहिले मैं अपना और अपने साथी का कुछ थोड़ा सा परिचय तुम्हें दे देना उचित समझता हूँ। यद्यपि हम लोगों का कुछ थोड़ा सा परिचय जेलर साहब तुमको दे भी गए है, पर तो भी मैं अपने ढंग पर अपना और अपने साथी का कुछ परिचय दे देना ठीक समझता हूँ। सुनो, ये मेरे साथी सरकारी जासूस हैं। ये जब बीस बरस के थे, तभी सरकारी जासूसी महकमे में भरती हुए थे, जिस बात को आज चालीस बरस हुए। अर्थात मेरे साथी की उम्र इस समय साठ बरस की […]
दूसरे दिन यह बात अच्छी तरह से मशहूर हो गई कि वह बाबाजी जिन्हें देख करनसिंह राठू डर गया था, बीरसिंह के बाप करनसिंह थे। उन्हीं की जुबानी मालूम हुआ कि जिस समय राठू ने सुजनसिंह की मार्फत करनसिंह को जहर दिलवाया उस समय करनसिंह के साथियों को राठू ने मिला लिया था। मगर- चार-पाँच आदमी ऐसे भी थे, जो जाहिर में तो मौका देख कर मिल गए थे, पर दिल से उसकी तरफ न थे। जिस समय जहर के असर से करनसिंह बेहोश हो गए, उस समय जान निकलने के पहिले ही उनके मरने का गुल मचा कर राठू ने उन्हें जमीन में गड़वा दिया और तुरत वहाँ से कूच कर गया था। राठू के कूच करते ही धनीसिंह नामी एक राजपूत अपने नौकरों को साथ लेकर जान-बूझ के पीछे रह गया। उसने जमीन खोद कर करनसिंह को निकाला और उनकी जान बचाई। जहर के असर ने पाँच बरस […]
चंद्रकांता संतति भाग-7 बयान 1 के लिए क्लिक करें हम ऊपर लिख आए हैं कि राजा वीरेन्द्रसिंह तिलिस्मी खंडहर से (जिसमें दोनों कुमार और तारासिंह इत्यादि गिरफ्तार हो गए थे) निकलकर रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए तो तेजसिंह उनसे कुछ कह-सुनकर अलग हो गए और उनके साथ रोहतासगढ़ न गए। अब हम यह लिखना मुनासिब समझते हैं कि राजा वीरेन्द्रसिंह से अलग होकर तेजसिंह ने क्या किया। एक दिन और रात उस खंडहर के चारों तरफ जंगल और मैदान में तेजसिंह घूमते रहे, मगर कुछ काम न चला। दूसरे दिन वह एक छोटे से पुराने शिवालय के पास पहुँचे, जिसके चारों तरफ बेल और पारिजात के पेड़ बहुत ज्यादा थे, जिसके सबब से वह स्थान बहुत ठंडा और रमणीक मालूम होता था। तेजसिंह शिवालय के अन्दर गए और शिवजी का दर्शन करने के बाद बाहर निकल आए, उसी जगह से बेलपत्र तोड़कर शिवजी की पूजा की, और फिर उस […]
आशा का अंकुर अनुकूले सति धातरि भवत्यनिष्टादपीष्टमविलम्बम् । पीत्वा विषमपि शंभुर् मृत्युंजयतामवाप तत्कालम् ॥ (नीतिरत्नावली) अस्तु, जब मैं दूध पी चुकी, तो मैंने क्या देखा कि जेलर साहब दो भले आदमियों के साथ मेरी कोठरी की ओर आ रहे हैं और उनके पीछे-पीछे एक आदमी दो कुर्सियाँ लिए हुए चला आ रहा है। मेरी कोठरी के आगे दालान में वे दोनों कुर्सियाँ डाल दी गईं और जेलर साहब ने मेरी ओर देखकर यों कहा,– “दुलारी, इन दोनों भले आदमियों में से जो काला चोगा पहिरे और बड़ा सा टोप लगाए हुए हैं, ये ही तुम्हारे बारिस्टर हैं और जो सादी पोशाक पहिरे और मुरेठा बांधे हुए हैं, ये सरकारी जासूस हैं। ये लोग जो कुछ तुमसे पूछें, उसका तुम मुनासिब जवाब देना। अभी बारह बजे हैं, और ये दोनों साहब पांच बजे तक, अर्थात् पांच घंटे तक यहां ठहर सकेंगे। बस, जब ये लोग जाने लगेंगे, तब यही आदमी, […]
राजा भोज ने जब खुदाई में प्राप्त राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने का प्रयत्न किया तो सिंहासन की पहली पुतली रत्नमंजरी ने उन्हें रोकते हुए कहा- “हे राजन! राजा विक्रम के इस सिंहासन पर वही बैठ सकता है, जो उनकी तरह प्रतापी, दानवीर और न्यायप्रिय हो। मैं आपको राजा विक्रम की कथा सुनाती हूँ। इसे सुनकर आप स्वयं निश्चय करें कि आप इस सिंहासन के योग्य हैं या नहीं।” इतना कहकर रत्नमंजरी ने कथा कहनी शुरू की। आर्यावर्त में एक राज्य था जिसका नाम था अम्बावती। वहाँ के राजा गंधर्वसेन ने चारों वर्णों की स्त्रियों से चार विवाह किये थे। ब्राह्मणी के पुत्र का नाम ब्रह्मणीत था। क्षत्राणी के तीन पुत्र हुए- शंख, विक्रम तथा भर्तृहरि। वैश्य पत्नी ने चन्द्र नामक पुत्र को जन्म दिया तथा शूद्र पत्नी ने धन्वन्तरि नामक पुत्र को। ब्रह्मणीत को गंधर्वसेन ने अपना दीवान बनाया, पर वह एक दिन राज्य छोड़कर चुपचाप कहीं चला […]
हरिपुर के राजा करनसिंह राठू का बाग बड़ी तैयारी से सजाया गया, रोशनी के सबब दिन की तरह उजाला हो रहा था, बाग की हर एक रविश पर रोशनी की गई थी, बाहर की रोशनी का इन्तजाम भी बहुत अच्छा था। बाग के फाटक से लेकर किले तक जो एक कोस के लगभग होगा, सड़क के दोनों तरफ गञ्ज की रोशनी थी, हजारों आदमी आ-जा रहे थे। शहर में हर तरफ इस दरबार की धूम थी। कोई कहता था कि आज महाराज नेपाल की तरफ से राजा को पदवी दी जाएगी, कोई कहता था कि नहीं नहीं, महाराज को यहाँ की रिआया चाहती है या नहीं, इस बात का फैसला किया जाएगा और इस राजा को गद्दी से उतार कर दूसरे को राजतिलक दिया जाएगा। अच्छा तो यही होगा कि बीरसिंह को राजा बनाया जाये। हम लोग- इसके लिए लड़ेंगे, धूम मचावेंगे और जान तक देने को तैयार रहेंगे। इसी […]
घोर विपत्ति! “आकाशमुत्पततु गच्छतु वा दिगन्त- मम्बोनिधिं विशतु तिष्ठतु वा यथेच्छम्॥ जन्मान्तरा S र्जितशुभाSशुभकृन्नराणां, छायेव न त्यजति कर्मफलाSनुबन्धः॥“ (नीतिमंजरी) दुलारी मेरा नाम है और सात-सात खून करने के अपराध में इस समय में जेलखाने में पड़ी-पड़ी सड़ रही हूं। मैं जाति की ब्राह्मणी पर कौन सी ब्राह्मणी हूँ,यह बात अब नहीं कहूँगी। मैं अभी तक कुमारी हूँ और इस समय मेरा बयस सोलह बरस के लगभग है। कानपुर जिले के एक छोटे से गांव में मेरे माता-पिता रहते थे, पर किस गांव में वे रहते थे, इसे अब मैं नहीं बतलाना चाहती, क्योंकि जिस अवस्था में मैं हूँ, उस दशा में अपने वैकुंठ वासी माता-पिता का पवित्र नाम प्रगट करना ठीक नहीं समझती। साढ़े तीन महीने से मैं जेल में पड़ी हूँ। जिस समय मैं अपने गाँव से चलकर एक दूसरे गाँव के थाने पर गयी थी, वह अगहन का उतरता महीना था, और अब यह फागुन मास […]
रात पहर-भर जा चुकी है। खड़गसिंह अपने मकान में बैठे इस बात पर विचार कर रहे हैं कि कल दरबार में क्या-क्या किया जाएगा। यहाँ के दस-बीस सरदारों के अतिरिक्त खड़गसिंह के पास ही नाहरसिंह, बीरसिंह और बाबू साहब भी बैठे हैं। खड़गसिंह : बस यही राय ठीक है। दरबार में अगर राजा के आदमियों से हमारे खैरख्वाह सरदार लोग गिनती में कम भी रहेंगे तो कोई हर्ज नहीं। नाहरसिंह : जिस समय गरज कर मैं अपना नाम कहूँगा, राजा की आधी जान तो उसी समय निकल जायेगी, फिर कसूरवार आदमी का हौसला ही कितना बड़ा? उसकी आधी हिम्मत तो उसी समय जाती रहती है, जब उसके दोष उसे याद दिलाये जाते हैं। एक सरदार : हम लोगों ने भी यही सोच रक्खा है कि या तो अपने को हमेशा के लिए उस दुष्ट राजा की ताबेदारी से छुड़ायेंगे या फिर लड़कर जान ही दे देंगे। नाहरसिंह : ईश्वर चाहे […]
बहुत समय पहले राजा भोज उज्जैन नगर पर राज्य करते थे। राजा भोज एक धार्मिक प्रवृति के न्यायप्रिय राजा थे। समस्त प्रजा उनके राज्य में सुखी एवं सम्पन्न थी। सम्पूर्ण भारतवर्ष में उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। राजा भोज के शासनकाल में प्रत्येक व्यक्ति संपन्न एवं सुखी था। कृषि भी खूब होती थी। किसी भी प्रकार की कोई कमी न थी। उज्जैन नगरी में कुम्हारों की एक चर्चित बस्ती थी। इस बस्ती के कुम्हार मिट्टी से आकर्षक और मनमोहक बर्तन बनाते थे। उनके द्वारा बनाए बर्तनों को दूसरे राज्यों में बड़े ही सम्मानपूर्वक देखा जाता था। यही कारण था कि इस बस्ती के सभी कुम्हार सम्पन्न और सम्मानित थे। कुम्हारों की इस बस्ती के आस-पास मिट्टी के छोटे-बड़े टीले थे, जिनकी मिट्टी बड़ी सुगंधित और चिकनी थी। इसी बस्ती में कई वर्षों से एक गड़रिया भी काम करता था जिसका नाम सूरजभान था। अपने सामाजिक और मैत्रीपूर्ण स्वभाव […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…