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मुसीबत है बड़ा भाई होना- शांति मेहरोत्रा

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बड़ा भाई होना कितनी बड़ी मुसीबत है, इसे वे ही समझ सकते हैं, जो सीधे दिखाई पड़ने वाले चालाक छोटे भाई-बहनों के जाल में फंसकर आये दिन उनकी शरारतों के लिए मेरी तरह खुद ही डांट खाते नजर आते हैं. घर में जिसे देखो वही दो-चार उपदेश दे जाता है और दो-चार काम सौंप जाता है. चाचाजी को फ़ौरन पानी चाहिए, चाचीजी को ऊपर के कमरे से ब्रुश मंगवाना है. पिताजी के मेहमानों के लिए भाग कर चौराहे से पान लाने हैं.

छोटे भाई ने सुबह से जलेबी के लिए रट लगा रखी है. फिर मुझे भी अपने कपड़ों पर इस्तिरी करनी है, बस्ता लगाना है, जूते पॉलिश करने हैं और पौने नौ बजे स्कूल के लिए रवाना हो जाना है. यों हूँ तो मैं भी अभी छठी क्लास में ही, लेकिन तीन भाइयों में सबसे बड़ा होने के नाते सुबह से शाम तक चकरघिन्नी की तरह नाचता रहता हूँ.
हाल ही में एक दिन राशन की दूकान पर क्यू बहुत लंबा था. खड़े-खड़े ऊब कर अपने आगे और पीछे के सज्जनों से कहा कि : ‘मैं अभी आया. ज़रा जगह बचाए रखियेगा.’ सोचा खड़े-खड़े बोर होने से अच्छा है, बीच में जाकर दो-चार रन ही बना लिए जाएँ. बैटिंग में मन कुछ ज्यादा ही रम गया. लौटकर देखा तो मेरे आगे-पीछे जो सज्जन खड़े थे, वे चीनी लेकर जा चुके थे. मैं कनखियों से लोगों की तरफ़ देखता हुआ क्यू में सबसे आगे जाकर खड़ा हो गया. इस पर पीछे के लोग बिगड़ने लगे और लोगों ने मुझे वापस सबसे पीछे भेज दिया. काफी देर बाद जब तक मेरी बारी आई, तब तक चीनी ख़त्म हो चुकी थी. दूकानदार ने कहा कि दो-चार दिन बाद आकर ले जाना.

     खाली हाथ घर लौटा. अम्मा ने आड़े हाथों लिया और डांटकर पूछा : ‘इतनी देर कहाँ लगा दी?’ मैं बताने जा ही रहा था कि दूकान पर भीड़ बहुत ज्यादा थी, तब तक भाई लोग बतीसी निपोरते हुए बीच में ही बोले: ‘ ये रन बनाने में लगे थे. इसी से इनका नंबर निकल गया!’
बस! फिर मेरी सुनता कौन है! तबियत होती है कि कहीं से एक हरी संटी ले आऊँ और सारे रन इन बदमाशों की हथेलियों पर गिनवा दूँ. दोनों इतने चालाक हैं और हर स्थिति को कुछ ऐसा मोड़ दे देते हैं कि मैं बराबर किसी न किसी नए चक्कर में फंस जाता हूँ और वे हाथ झाड़कर तमाशा देखने के लिए अलग खड़े हो जाते हैं. कहानियों की कोई नई किताब देखी नहीं कि चील की तरह झपटकर उसे हथिया लेते हैं. बड़ा होने के नाते मैं उनसे छीनकर पढ़ने लगता हूँ. वे जाकर अम्मा से जड़ आते हैं कि भैया पढ़ाई की किताब के नीचे छुपाकर कहानियाँ पढ़ रहा है, और मैं गरीब रंगे हाथों पकड़ा जाता हूँ. अब तो यह हाल है कि अपनी पेंसिल भी वापस मांगता हूँ तो वे चिल्लाने लगते हैं: ‘अम्मा! देखो भैया नहीं मान रहा है’ और उनके ‘देखो भैया’ तक पहुँचते पहुँचते घर भर की सहानुभूति उनके साथ हो जाती है. अम्मा नीचे से ही बिगड़ना शुरू कर देती हैं: ‘अरे बेटा! तुझे होता क्या जा रहा है? क्यों बेचारे जरा-जरा से बच्चों को सताता रहता है!’
अब मैं अम्मां को कैसे समझाऊं कि जिन्हें वे ‘बेचारे जरा जरा से बच्चे’ कहती हैं, वे बड़ों-बड़ों के कान काटते हैं. काम निकलने के पहले वे मुझे ‘बड़े भैया’ या ‘भाई साहब’ पुकारते हैं और काम निकल जाने के बाद ‘ऐ मोटू!’
दोनों ही साइकिल के बहुत शौक़ीन हैं और हमेशा इस फेर में रहते हैं कि मैं घर से अपने नाम से साइकिल लाकर उन्हें सौंप दूँ. नया-नया चलाना सीख रहे हैं. इसलिए गिरते भी ज़रूर हैं और तब बाबूजी मुझे डांटते हैं: ‘ये लोग तो नासमझ हैं, पर तू तो समझदार है! ऐसी बेवकूफी क्यों करता रहता है?’ बताइये भला, चलाते वे हैं, गिरते वे हैं और मूर्खता मेरी है! इसी को कहते हैं चित भी मेरी और पट भी मेरी. मैं बारह साल का हूँ और ‘समझदार’ हूँ , वे ग्यारह और दस के हैं और ‘नासमझ’ हैं. लेकिन जब मैं छोटे के बराबर था, तब भी मैं समझदार कहा जाता था.
यह भी समझ में नहीं आता कि कब मैं अचानक समझदार और जिम्मेदार मान लिया जाता हूँ और कब निकम्मा, झगडालू और लापरवाह. जब बड़ों को कुछ काम लेना होता है, तो फरमाते हैं : ‘ इतने बड़े हो गए और यह छोटा सा काम नहीं कर सकते? तुम्हारी उम्र के दूसरे लड़के घर का सारा इंतज़ाम कर लेते हैं!’ लेकिन जब आज्ञा पालन करने के लिए लपककर साइकिल उठाने लगता हूँ तब सहसा मेरे बारे में उनका मत बदल जाता है. तब मुझे आदेश मिलता है: ‘साइकिल मत ले जाओ. अभी बच्चे हो, रास्ते में भीड़ होगी. पैदल चले जाओ…..और हाँ, आँखें खोल कर चलना…एकदम बाएं…रास्ते में कहीं रुकना मत…..देखो एक बात का और ध्यान रखना….लेकिन इस बीच मैं वहां से खिसक जाता हूँ क्योंकि मुझे बाईं ओर चलना है, धीरे चलना है, कहीं रुकना नहीं है, सीधे घर लौटना है इत्यादि हिदायतें जब तक मैं दिखाई पड़ता रहूँगा, दोहराई जाती रहेंगी.
मेरा नाम अनुजों की कृपा से घर भर की जुबान पर चढ़ गया है. अपनी तारीफ़ करवाने के लिए अक्सर मुझे कोई प्रयास भी नहीं करना पड़ता. चिरंजीव अनुज अपनी हरकतों के फलस्वरूप किसी से पिट जायें या कहीं से कूदने-फांदने में चोट खा जाएँ और गला फाड़-फाड़ कर रोते हुए घर लौटें, तो पहला वाक्य जो सुनाई पड़ता है, वह यही होता है: ‘मार दिया न उस बदमाश ने? अरे, वह अपने भाइयों को फूटी आँखों नहीं देख सकता!’ लेकिन न भाई लोग आंसुओं का असली कारण बताने की कृपा करते हैं, न बुजुर्ग पूछने की ज़रुरत समझते हैं. सच तो यह है कि आप सद्गुणों की खान हों और छोटे भाई साक्षात शैतान के समान हों, तो भी हिसाब हमेशा यही निकलेगा कि वे आपकी देखादेखी बिगड़ते जा रहे हैं.

   अब तो मुझे यकीन हो गया है कि शरारत चाहे जो भी करे, सबकी निगाहों में दुष्ट मैं ही था, मैं ही हूँ और मैं ही रहूँगा, क्योंकि ईश्वर ने मुझे बड़ा भाई बनाने की भूल जो कर दी है.

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Rajiv Sinha

ध्यानाकर्षण के लिए धन्यवाद. अपेक्षित सुधार कर दिए हैं.

रोचक हास्य लेख। लेख आपको गुदगुदाता है। बाल मन और छोटे भाई बहन के बीच के रिश्ते को भी बहुत खूबसूरती से दर्शाया है। एक ऐसा ही लेख बड़े भाई बहनों द्वारा छोटे भाई बहनों पे ढाए अत्याचारों पे होता तो मज़ा आ जाता।
लेख में निम्न जगह 'मान' को मां किया गया है। उसे ठीक कर लीजियेगा।
'अम्मा! देखो भैया नहीं मां रहा है',यह भी समझ में नहीं आता कि कब मैं अचानक समझदार और जिम्मेदार मां लिया जाता हूँ और