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नौगढ़ के टूर्नामेंट की बड़ी तैयारी की गई थी. सारा नगर सुसज्जित था. स्टेशन से लेकर स्कूल तक सड़क के दोनों ओर झंडियाँ लगाईं गई थीं. मोटरें खूब दौड़ रही थीं. टूर्नामेंट में पारितोषिक वितरण के लिए स्वयं कमिश्नर साहब आने वाले थे. इसीलिए शहर के सब अफसर और रईस व्यस्त थे. आज स्कूल के विस्तृत मैदान में दर्शकों की बड़ी भीड़ थी. नगरपालिका के सदस्य, सचिव, अध्यक्ष आदि सभी उपस्थित थे. दर्शकों में सेठों और साहूकारों का भी अभाव न था.

    हेडमास्टर साहब तो प्रतिष्ठित लोगों का आदर-सत्कार करने में लगे हुए थे. पर इधर लड़कों में कुछ दूसरा ही जोश फैला हुआ था. यों तो कितने ही स्कूलों से लड़के आए थे, पर होड़ दो ही स्कूलों में थी – नौगढ़ और विजयगढ़. विजयलक्ष्मी भी इन्हीं दोनों के बीच में झूल रही थी. कभी वह नौगढ़ की ओर झुकती तो कभी विजयगढ़ की ओर. सभी लड़कों के ह्रदय धड़क रहे थे. सभी उत्सुक थे कि देखें कौन बाजी मार ले जाता है—ऊँट किस करवट बैठता है?

           पहले दिन 90 मीटर की दौड़ थी. नौगढ़ के लड़कों ने विजयगढ़ को नीचा दिखा दिया. पर दूसरे दिन विजयगढ़ के लड़कों ने उसकी लाज रख ली. इसी तरह दोनों स्कूलों के नंबर बराबर थे. अब सिर्फ एक दौड़ बच गई थी. विजयमाला उसी के गले में पड़ेगी जो इसमें बढ़ जाएगा. नौगढ़ की ओर से जो लड़का दौड़ने वाला था, उसकी उम्र बीस साल थी. नाम था भुवनमोहन. बड़ा तेज दौड़ने वाला था.

          विजयगढ़ की ओर से एक सत्रह वर्ष का लड़का खड़ा हुआ. वह दुबला-पतला था, पर उसके चेहरे पर बड़ी कांति थी, आँखों में तेज था. मास्टर ने उसकी पीठ ठोकी और कहा: ‘अब तुम्हारा ही भरोसा है.’ लेकिन लड़के ने आँख तक ऊपर नहीं उठाई. मास्टर ने कुछ बातें कीं. इस पर उसने जब ध्यान नहीं दिया, तब मास्टर ने उसके एक सहपाठी को बुलाकर कहा : ‘देखो, जगदानंद चिढ़ गया है. उसे समझाओ. यदि वह प्रसन्नचित्त होकर दौड़े तो मुझे जीत की पूरी आशा है. नहीं तो हम लोगों की हार है.’

          वह विद्यार्थी दौड़ता हुआ जगदानंद के पास गया. उसने जगदानंद से कहा: ‘यों सिर पकड़कर बैठ जाने से कैसे होगा ?’ जगदानंद ने कहा : ‘मेरे पीछे हाथ धोकर क्यों पड़े हो? मोहन से जाकर क्यों नहीं कहते? वह तो मास्टर साहब की नाक का बाल हो रहा है. उसी की पाँचों उंगलियाँ घी में हैं.’  उस विद्यार्थी ने कहा : ‘भाई, नाक कट जाएगी.’ पर जगदानंद चुप रहा. उसने खूब समझाया, पर वह ज्यों का त्यों बना रहा.

            इतने में भुवनमोहन उधर निकल पड़ा. उसने जगदानंद को देख कर कहा: ‘अच्छा, आप हैं.’ फिर उसने अपने साथी की तरफ देखकर व्यंग्य से कहा: ‘भाई, अच्छों से बचकर रहना चाहिए.’ जगदानंद की आँखें चमक उठीं. उसने अपने सहपाठी मित्र से कहा: ‘तुम चिंता मत करो, मैं दौडूंगा.’

            दौड़ शुरू हुई. पहले चक्कर में जगदानंद और भुवन साथ-साथ रहे. कोई आगे नहीं बढ़ा. पर दोनों इतनी तेजी से दौड़े कि मानो यह 90 मीटर की दौड़ हो और सब लड़के पीछे रह गए. कोई उनका साथ नहीं दे सका. दूसरे चक्कर में जगदानंद आगे बढ़ा, परंतु भुवनमोहन उसके दो ही कदम पीछे रहा. तीसरा चक्कर अंतिम था. पहले तो जगदानंद पचास कदम आगे बढ़ गया, पर उसकी शक्ति क्षीण होने लगी. आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा. भुवनमोहन सरपट दौड़ता हुआ उसके पास पहुँच गया.जगदानंद ने उसके साथ ही साथ दौड़ने की कोशिश की पर उसके पैरों ने जवाब दे दिया. नौगढ़ के लड़के चिल्लाने लगे: ‘ नौगढ़. नौगढ़.’ भुवनमोहन आगे बढ़ गया. 180 मीटर का फासला था.

            एकाएक जगदानंद ने अपना सिर उठाया. चार हज़ार आँखें उस पर जमी हुई थीं. वह फिर दौड़ने लगा. पल भर में वह भुवनमोहन के पास पहुँच गया. विजयगढ़ के लड़के चिल्लाने लगे: ‘विजयगढ़. विजयगढ़.’ जगदानंद आगे बढ़ता ही गया. उसकी आँखें लाल हो रही थीं. उसने कई मीटर से भुवनमोहन को नीचा दिखलाया. लड़कों ने जयध्वनि की और दर्शकों ने करतल ध्वनि. एक ने कहा: ‘वाह, लड़का दौड़ा क्या है,  उड़ आया है.’

          छात्रजीवन कितना सुखद होता है. उस समय हमलोगों की मनोवृत्तियां ही कुछ और होती हैं. जिन लोगों का एकमात्र लक्ष्य उदरपूर्ति या धनसंचय या कीर्तिलिप्सा है, उनमें वह उमंग, वह स्फूर्ति, वह शक्ति कहाँ?

          अपने छात्रजीवन में कितने ही लोग विश्वविद्यालयों की परीक्षा में उतीर्ण होकर, सबसे मान और आदर पाते हैं.  पर जीवन की कसौटी पर कसे जाने पर उनमें से कितने खरे निकलते हैं? जीवन की दौड़ में जगदानंद से उसके कितने ही साथी आगे बढ़ गए. किसी ने उसकी कुछ भी मदद नहीं की. जीवन निर्वाह की चिंता में जगदानंद को गाँव-गाँव घूमना पड़ा. इधर ऋण का बोझ इतना बढ़ गया कि घर-द्वार तक बिक गया. उसकी मां थी और एक छोटा भाई. उसने अपने साहूकार भोंदूमल को खूब समझाया, खूब अनुनय-विनय की, पर भोंदूमल ने उसकी एक न सुनी. बड़ी मुश्किल से उसे एक दूसरे गाँव में आश्रय मिला.

            एक दिन वह दूसरे गाँव से अपने गाँव की ओर लौट रहा था. संध्या हो गई थी. वह घोड़े पर चढ़ा हुआ धीरे-धीरे जा रहा था. रास्ते में एक बड़ा भयानक जंगल पड़ता था. उसमें भेड़ियों का बड़ा डर था. अँधेरा होने के बाद कोई भी उस जंगल को पार करने का साहस नहीं करता था. पर जगदानंद अपनी चिंताओं में डूबा हुआ निर्भय जा रहा था.

           कुछ दूर जाने के बाद किसी ने उसको पुकारा: ‘ठहरो, ठहरो’. जगदानंद ने घोडा रोक लिया और लौटकर देखा कि एक बुड्ढा जी छोड़कर भागता हुआ चला आ रहा है. जब वह पास आया तन जगदानंद ने पहचाना. वह भोंदूमल था.

जगदानंद ने उससे पूछा : ‘क्या है?’

उसने गिड़गिड़ा कहा : ‘मेरे प्राण बचाओ. भेड़िये मेरे पीछे पड़े हैं. मुझे घोड़े पर चढ़ाकर ले चलो.’

क्षण भर के लिए जगदानंद के मन में एक बात आई कि मैं घोड़ा दौड़ाकर भाग जाऊं और यह दुष्ट यहीं अपने दुष्कर्मों का फल भोगे. पर ह्रदय के भीतर से न जाने किसने उसे रोका. जगदानंद ने उसे घोड़े पर चढ़ा लिया और तेज़ी से घोड़ा दौड़ाया. घोड़ा थका हुआ था. वह दो आदमियों को लेकर तेजी से नहीं दौड़ सकता था. सोच-विचार करने का अवसर नहीं था. जगदानंद ने पल भर में अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया. भेड़िये बढ़ते ही आ रहे थे. जगदानंद तुरंत घोड़े से उतर पड़ा.

घोड़ा भोंदूलाल को लेकर तेजी से चला गया. पल भर में ही अदृश्य हो गया. भेड़िये जब बिल्कुल समीप आ गए, तब जगदानंद ने दौड़ने का विचार किया. उसे अपनी पहली दौड़ का स्मरण हो आया. वह दौड़ थी बाजी के लिए और यह है प्राणरक्षा के लिए. जगदानंद ने धोती कस ली. उसने हँसकर कहा: ‘यह मेरी अंतिम दौड़ है. पर मैं तुमसे दौड़ने में किसी प्रकार का लाभ उठाना नहीं चाहता. देखें कौन आगे बढ़ता है?’

भेड़िये गरजते हुए बिलकुल उसके समीप आ गए. तीन किलोमीटर तक दौड़ बराबर जारी रही. किसी ने जयध्वनि नहीं की, किसी ने ताली नहीं बजाई. केवल मूक प्रकृति यह दृश्य देखती रही. जगदानंद सब कुछ भूल गया. उसके लिए पृथ्वी अदृश्य हो गयी. वह केवल दौड़ता ही चला गया.

दूसरे दिन , रामपुर के एक किसान ने देखा कि उसके घर के सामने जगदानंद का मृत शरीर पड़ा हुआ है. उसके शरीर पर किसी तरह की चोट नहीं है, पर चेहरे पर अभी तक हँसी झलक रही है.
क्या यह विजय की हँसी थी?

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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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