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मेरे पंख

रंग-बिरंगे, थोड़े बेजान

जरा खुले, जरा बंद

जैसे मेरा मन

 

मेरा मन

थका सा, थोड़ा टूटा

कसक से ठिठकता, परतों में

जैसे मेरी हँसी

 

मेरी हँसी

जग को खिलखिलाती

खुद में मायूस, मगर मुसकाती

जैसे मेरे नयन

 

मेरे नयन

सब कुछ देख, सब कुछ नकारते

इंकार करते, कभी स्वीकारते

जैसे मेरी आत्मा

 

मेरी आत्मा

क्षत-विक्षत, अवलंब ढूँढती

स्वयं को मनाती, स्वयं रूठती

जैसे मेरा जीवन

मेरा जीवन

रेत-सा फिसलता, अकेला

मनमाना, अलमस्त-सा अलबेला

जैसे मेरी सोच

 

मेरी सोच

बेबाक चहकती, कलरव करती

भोली, ठहराव में डरती

जैसे मेरी बातें

 

मेरी बातें

कभी मरहम, कभी नश्तर

बचकानी, नासमझी से भीगी

जैसे मेरी लेखनी

 

मेरी लेखनी

भावाभिव्यक्ति को आतुर, बेसब्र

अंतरव्यथा उकेरने की जिद पर

जैसे मेरे आँसू

 

मेरे आँसू

क्षण-क्षण छलकते, चंचल से

गम में,अतिरेक में, एकल से

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दीपांशु

दीपांशु सहाय

छुटपन से ही छंदों व तुकबंदियों में विटप की छांव सा सुकून मिलता था ।अब पेशे से एक बैंककर्मी हूं , दिन भर अर्थ की नगरी में रहते हुए भी काव्य की ओर लगाव अविरल बढ़ता ही गया है । कविता सागर की लहरों को मैं क्या दे पाऊं इसमें संशय है .. किंतु इसने मुझे सबसे अमोल मोती दे दिया - आत्मा का संतोष ।
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