शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा, कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई है, तो गौरी खिल उठी. देवताओं में उसकी आस्था और भी दृढ़ हो गयी. इधर एक साल से बुरा हाल था. न कोई रोजी न रोजगार. घर में जो थोड़े-बहुत गहने थे, वह बिक चुके थे. मकान का किराया सिर पर चढ़ा हुआ था. जिन मित्रों से कर्ज मिल सकता था, सबसे ले चुके थे. साल-भर का बच्चा दूध के लिए बिलख रहा था. एक वक्त का भोजन मिलता, तो दूसरे जून की चिन्ता होती. तकाजों के मारे बेचारे दीनानाथ का घर से निकलना मुश्किल था. घर से निकला नहीं कि चारों ओर से चिथाड़ मच जाती वाह बाबूजी, वाह ! दो दिन का वादा करके ले गये और आज दो महीने से सूरत नहीं दिखायी ! भाई साहब, यह तो अच्छी बात नहीं, आपको अपनी जरूरत का खयाल […]
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हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन किया करते हैं। खेत उनकी हवनशाला है। उनके हवनकुंड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सुफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस अग्नि की चिनगारियों की डालियों-सी हैं। मैं जब कभी अनार के फूल और फल देखता हूँ तब मुझे बाग के माली का रुधिर याद आ जाता है। उसकी मेहनत के कण जमीन में गिरकर उगे हैं और हवा तथा प्रकाश की सहायता से मीठे फलों के रूप में नजर आ रहे हैं। किसान मुझे अन्न में, फूल में, फल में आहुति हुआ सा दिखाई पड़ता है। कहते हैं, ब्रह्माहुति से जगत् पैदा हुआ है। अन्न पैदा करने में किसान भी ब्रह्मा के समान है। खेती उसके ईश्वरी प्रेम का केंद्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते […]
वैज्ञानिक कहते हैं ,चाँद पर जीवन नहीं है. सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन (डिपार्टमेंट में एम. डी. साब) कहते हैं- वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं, वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है. विज्ञान ने हमेशा इन्स्पेक्टर मातादीन से मात खाई है. फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है- छुरे पर पाए गए निशान मुलजिम की अँगुलियों के नहीं हैं. पर मातादीन उसे सजा दिला ही देते हैं. मातादीन कहते हैं, ये वैज्ञानिक केस का पूरा इन्वेस्टीगेशन नहीं करते. उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया, वहाँ जीवन नहीं है. मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देख कर आया हूँ. वहाँ मनुष्य जाति है. यह बात सही है क्योंकि अँधेरे पक्ष के मातादीन माहिर माने जाते हैं. पूछा जाएगा, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने? नहीं, वे भारत की तरफ़ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए […]
(स्वामी रामकृष्ण परमहंस द्वारा अपने शिष्यों को सुनाई गई एक कथा पर आधारित।) एक समय की बात है।एक गाँव के चरवाहे प्रतिदिन अपने पशुओं को जंगल में चराने के लिए ले जाते थे।उनके मार्ग में एक विशाल वृक्ष पड़ता था।वृक्ष के नीचे बिल में एक विषैला नाग रहता था।यदि कोई व्यक्ति उस वृक्ष के पास जाता तो नाग फुँफकारता हुआ बिल से बाहर निकलता और व्यक्ति को डँस लेता था।इस प्रकार कई व्यक्ति प्राण गँवा बैठे थे।गाँव के लोग उस नाग से बहुत भयभीत रहते थे और कभी उस वृक्ष के निकट नहीं जाते थे।चरवाहे भी बहुत सावधानी से वहाँ से निकलते,विशेष रूप से शाम के समय उन्हें अधिक डर रहता था कि कहीं नाग बिल से बाहर न बैठा हो।वे जल्दी-जल्दी,जैसे-तैसे दौड़ते हुए उस वृक्ष के पास से गुज़र जाते थे। एक दिन एक भिक्षु उस गाँव में आये।वे रात को गाँव के मंदिर में ठहरे।प्रातः जब चरवाहे अपने […]
काज़ी गयासुद्दीन से पहली बार मैं कॉफ़ी हाउस में मिला था. मेरे एक दोस्त ने उनसे मेरा परिचय कराते हुए कहा, ‘इनसे मिलिये, यह काज़ी गयासुद्दीन हैं—प्रसिद्ध इतिहासकार.’ मैंने मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया तो मेरे दोस्त ने उचककर मेरे हाथ को पकड़ते हुए कहा, ‘यह क्या ग़ज़ब करते हो ! क्या तुम्हें नहीं मालूम कि काज़ी साहब किसी से हाथ नहीं मिलाते. इनके सीधे हाथ ने 1948 में हिन्दुस्तान के आखिरी वायसराय और पहले गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबैटन से पहली और आखिरी बार हाथ मिलाया था. उसके बाद से अब तक इन्होंने इस ऐतिहासिक ‘हथ-मिलावे को अपने हाथ में सुरक्षित रखा है. यह उसे हम जैसे ऐरे-गैरे नत्थू-खैरों से हाथ मिलाकर नष्ट नहीं करना चाहते!’ मैंने काज़ी गयासुद्दीन के हाथ में छिपे हुए उस ऐतिहासिक ‘हथ-मिलावे’ की तरफ़ देखने की कोशिश की मगर मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया. काज़ी साहब मेरा मतलब समझ गए और बोले, ‘मियाँ, […]
कवि सिंहलद्वीप, उसके राजा गन्धर्वसेन, राजसभा, नगर, बगीचे इत्यादि का वर्णन करके पद्मावती के जन्म का उल्लेख करता है। राजभवन में हीरामन नाम का एक अद्भुत सुआ था जिसे पद्मावती बहुत चाहती थी और सदा उसी के पास रहकर अनेक प्रकार की बातें कहा करती थी। पद्मावती क्रमश: सयानी हुई और उसके रूप की ज्योति भूमण्डल में सबसे ऊपर हुई। जब उसका कहीं विवाह न हुआ तब वह रात दिन हीरामन से इसी बात की चर्चा किया करती थी। सूए ने एक दिन कहा कि यदि कहो तो देश देशान्तर में फिरकर मैं तुम्हारे योग्य वर ढूँढूँ। राजा को जब इस बातचीत का पता लगा तब उसने क्रुद्ध होकर सूए को मार डालने की आज्ञा दी। पद्मावती ने विनती कर किसी प्रकार सूए के प्राण बचाए। सूए ने पद्मावती से विदा माँगी, पर पद्मावती ने प्रेम के मारे सूए को रोक लिया। सूआ उस समय तो रुक गया, पर उसके […]
जिस प्रकार सुख या आनंद देनेवाली वस्तु के संबंध में मन की ऐसी स्थिति को जिसमें उस वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जग पड़े, लोभ कहते हैं। दूसरे की वस्तु का लोभ करके उसे लोग लेना चाहते हैं, अपनी वस्तु का लोभ करके उसे लोग देना या नष्ट होने देना नहीं चाहते। प्राप्य या प्राप्त सुख के अभाव या अभाव कल्पना के बिना लोभ की अभिव्यक्ति नहीं होती। अत: इसके सुखात्मक और दु:खात्मक दोनों पक्ष हैं। जब लोभ अप्राप्य के लिए होता है तब तो दु:ख स्पष्ट ही रहता है। प्राप्य के संबंध में दु:ख का अंग निहित रहता है और अभाव के निश्चय या आशंका मात्र पर व्यक्त हो जाता है। कोई सुखद वस्तु पास में रहने पर भी मन में इस इच्छा का बीज रहता है कि उसका अभाव न हो। पर अभाव का जब तक ध्यान नहीं होता, […]
पुनि चलि देखा राज-दुआरा । मानुष फिरहिं पाइ नहिं बारा ॥ हस्ति सिंघली बाँधे बारा । जनु सजीव सब ठाढ पहारा ॥ कौनौ सेत, पीत रतनारे । कौनौं हरे, धूम औ कारे ॥ बरनहिं बरन गगन जस मेघा । औ तिन्ह गगन पीठी जनु ठेघा ॥ सिंघल के बरनौं सिंघली । एक एक चाहि एक एक बली ॥ गिरि पहार वै पैगहि पेलहिं । बिरिछ उचारि डारि मुख मेलहिं ॥ माते तेइ सब गरजहिं बाँधे । निसि दिन रहहिं महाउत काँधे ॥ धरती भार न अगवै, पाँव धरत उठ हालि । कुरुम टुटै, भुइँ फाटै तिन हस्तिन के चालि ॥21॥ अर्थ: इसके बाद चलकर राजद्वार को देखें. मनुष्य कहीं भी घूम ले, ऐसा द्वार नहीं पा सकता. राजद्वार पर सिंहली हाथी बंधे हुए हैं, जो साक्षात् पहाड़ की तरह लगते हैं. इन हाथियों में कोई सफ़ेद है, कोई पीला तो कोई लाल. कोई हरा है, कोई धुएँ के रंग का […]
हिन्दी के आरंभिक उपन्यासों में देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता अग्रगण्य है। यह उपन्यास पहली बार 1893 में प्रकाशित हुआ था। कहते हैं, इस उपन्यास को पढ़ने के लिए बहुत से लोगों ने देवनागरी सीखी। तिलिस्मी-अय्यारी की रहस्यमय और रोमांचक दुनिया की सैर कराने वाला यह उपन्यास आज भी उतना ही लोकप्रिय है। न सिर्फ इस उपन्यास पर धारावाहिक का निर्माण हुआ, बल्कि वेदप्रकाश शर्मा और ओमप्रकाश शर्मा जैसे लुगदी साहित्य के लेखकों ने इसे आधार बनाकर उपन्यासों की पूरी शृंखला लिखी। इस उपन्यास को एक प्रेम कथा कहा जा सकता है। विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेन्द्र सिंह एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, लेकिन उनके परिवारों में दुश्मनी है। दुश्मनी का कारण है कि विजयगढ़ के महाराज जयसिंह नौगढ़ के राजा सुरेन्द्र सिंह को अपने भाई की हत्या का जिम्मेदार मानते है। हालांकि इसका जिम्मेदार […]
निति गढ बाँचि चलै ससि सूरू । नाहिं त होइ बाजि रथ चूरू ॥ पौरी नवौ बज्र कै साजी । सहस सहस तहँ बैठे पाजी ॥ फिरहिं पाँच कोतवार सुभौंरी । काँपै पावैं चपत वह पौरी ॥ पौरहि पौरि सिंह गढि काढे । डरपहिं लोग देखि तहँ ठाढे ॥ बहुबिधान वै नाहर गढे । जनु गाजहिं, चाहहिं सिर चढे ॥ टारहिं पूँछ, पसारहिं जीहा । कुंजर डरहिं कि गुंजरि लीहा ॥ कनक सिला गढि सीढी लाई । जगमगाहि गढ ऊपर ताइ ॥ नवौं खंड नव पौरी , औ तहँ बज्र-केवार । चारि बसेरे सौं चढै, सत सौं उतरे पार ॥17॥ अर्थ: किला इतना ऊँचा है कि सूर्य और चन्द्रमा रोज इससे बचके निकलते हैं, अन्यथा उनके रथ इससे टकराकर चूर हो जायेंगे. इसके नौ द्वार वज्र के समान कठोर हैं. इन दरवाजों पर हजारों सैनिक रक्षा के लिए तैनात हैं. पांच कोतवाल इन द्वारों के चक्कर लगाते हैं. इसी कारण […]
पुनि देखी सिंघल फै हाटा । नवो निद्धि लछिमी सब बाटा ॥ कनक हाट सब कुहकुहँ लीपी । बैठ महाजन सिंघलदीपी ॥ रचहिं हथौडा रूपन ढारी । चित्र कटाव अनेक सवारी ॥ सोन रूप भल भयऊ पसारा । धवल सिरीं पोतहिं घर बारा ॥ रतन पदारथ मानिक मोती । हीरा लाल सो अनबन जोती ॥ औ कपूर बेना कस्तूरी । चंदन अगर रहा भरपूरी ॥ जिन्ह एहि हाट न लीन्ह बेसाहा । ता कहँ आन हाट कित लाहा ?॥ कोई करै बेसाहिनी, काहू केर बिकाइ । कोई चलै लाभ सन, कोई मूर गवाइ ॥13॥ अर्थ: इसके पश्चात सिंहलद्वीप के बाजार दिखते हैं, जहाँ हर रास्ते पर नव निधियाँ* और लक्ष्मी (धन) बिखरी पड़ी हैं. सर्राफा बाजार की दुकानें कुमकुम से लिपी हुई हैं,जहाँ सिंहलद्वीप के महाजन बैठे हुए हैं. ये चांदी को ढालकर कड़े बनाते हैं जो नाना प्रकार के चित्रों से सुसज्जित हैं. सोने-चांदी हर ओर बिखरे पड़े हैं. घर […]
ताल तलाव बरनि नहिं जाहीं । सूझै वार पार किछु नाहीं ॥ फूले कुमुद सेत उजियारे । मानहुँ उए गगन महँ तारे ॥ उतरहिं मेघ चढहि लेइ पानी चमकहिं मच्छ बीजु कै बानी ॥ पौंरहि पंख सुसंगहिं संगा । सेत पीत राते बहु रंगा ॥ चकई चकवा केलि कराहीं । निसि के बिछोह, दिनहिं मिलि जाहीं ॥ कुररहिं सारस करहिं हुलासा । जीवन मरन सो एकहिं पासा ॥ बोलहिं सोन ढेक बगलेदी । रही अबोल मीन जल-भेदी ॥ नग अमोल तेहि तालहिं दिनहिं बरहिं जस दीप । जो मरजिया होइ तहँ सो पावै वह सीप ॥9॥ अर्थ: सिंहलद्वीप के ताल-तलैयों का वर्णन नहीं किया जा सकता ,क्योंकि उनकी संख्या का ही कोई ओर-छोर नहीं है. कमल के सफ़ेद फूलों के खिलने से चारों ओर उजाला छा गया है. तालाब में खिले कमल के फूल ऐसे लग रहे हैं जैसे आकाश में तारे उग आये हैं. बादल आकाश से नीचे उतरते […]
बसहिं पंखि बोलहिं बहु भाखा । करहिं हुलास देखि कै साखा ॥ भोर होत बोलहिं चुहुचूही । बोलहिं पाँडुक “एकै तूही”” ॥ सारौं सुआ जो रहचह करही । गिरहिं परेवा औ करबरहीं ॥ “पीव पीव”कर लाग पपीहा । “तुही तुही” कर गडुरी जीहा ॥ `कुहू कुहू‘ करि कोइल राखा । औ भिंगराज बोल बहु भाखा ॥ `दही दही‘ करि महरि पुकारा । हारिल बिनवै आपन हारा ॥ कुहुकहिं मोर सोहावन लागा । होइ कुराहर बोलहि कागा ॥ जावत पंखी जगत के भरि बैठे अमराउँ । आपनि आपनि भाषा लेहिं दई कर नाउँ ॥5॥ अर्थ: सिंहल द्वीप के बागों में विविध भाषा बोलने वाले पक्षी बसे हुए हैं, जो फलों से लदी डालियों को देख कर अपनी ख़ुशी व्यक्त करते हैं. प्रभात होते ही चुहचुही बोलने लगती है. पंडुक पक्षी भी उनके मुकाबले में बोलना प्रारंभ कर देते हैं. तोता और मैना चहचहाते हैं. लोटन कबूतर जमीन तक गिरते हुए आते […]
बारह साल बीत गए. एक युग से पावागढ़ को घेरे हुए था- गुजरात का बादशाह महमूद बेगड़ा. वह परेशान और थका हुआ था. एक दिन उसने अपने सेनापति से कहा- “लगता है कि हमें वापस ही लौटना पड़ेगा. यह हमारे लिये बड़े शर्म की बात होगी,” सेनापति ने कुछ देर सोचा फिर गंभीर होकर कहा, “जहाँपनाह, जहां बहादुरी हार जाती है, वहां अक्ल से काम लेना चाहिए. मैंने सब व्यवस्था कर ली है.” पावागढ़ पर महाराजा प्रतापसिंह चौहान का राज था. वह पताई रावत के नाम से विख्यात था. उसका एक नमकहराम साला था, सइया बाकलिया. सेनापति ने उसे ही लालच देकर अपनी ओर मिला लिया था. बादशाह ने पूछा : “कैसे?” “यह पावागढ़ के होने वाले नए महाराज सइया बाकलिया आपको बतायेंगे!” सेनापति ने अत्यन्त चापलूसी से कहा और एक अपरिचित व्यक्ति की ओर संकेत किया. बेगड़ा ने प्रश्न भरी निगाह से बाकलिया की ओर देखा. सेनापति ने फिर […]
सिंघलदीप कथा अब गावौं । औ सो पदुमिनी बरनि सुनावौं ॥ बरन क दरपन भाँति बिसेखा । जौ जेहि रूप सो तैसई देखा ॥ धनि सो दीप जहँ दीपक-बारी । औ पदमिनि जो दई सँवारी ॥ सात दीप बरनै सब लोगू । एकौ दीप न ओहि सरि जोगू ॥ दियादीप नहिं तस उँजियारा । सरनदीप सर होइ न पारा ॥ जंबूदीप कहौं तस नाहीं । लंकदीप सरि पूज न छाहीं ॥ दीप कुसस्थल आरन परा । दीप महुस्थल मानुस-हरा ॥ सब संसार परथमैं आए सातौं दीप । एक दीप नहिं उत्तिम सिंघलदीप समीप ॥1॥ अर्थ: अब मैं सिंहलद्वीप की कथा सुनाता हूँ और पद्मिनी का वर्णन करता हूँ. यह वर्णन दर्पण की तरह जिसमें हर व्यक्ति वैसा ही देखेगा ,जैसा उसका रूप है. अर्थात् हर व्यक्ति अपने स्वभावानुसार इसका आस्वादन करेगा. वह द्वीप धन्य है, जहाँ ईश्वर ने सौन्दर्य के दीपक के समान प्रकाश बिखेरने वाली पद्मिनी को जन्म दिया […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…