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निति गढ बाँचि चलै ससि सूरू । नाहिं त होइ बाजि रथ चूरू ॥
पौरी नवौ बज्र कै साजी । सहस सहस तहँ बैठे पाजी ॥
फिरहिं पाँच कोतवार सुभौंरी । काँपै पावैं चपत वह पौरी ॥
पौरहि पौरि सिंह गढि काढे । डरपहिं लोग देखि तहँ ठाढे ॥
बहुबिधान वै नाहर गढे । जनु गाजहिं, चाहहिं सिर चढे ॥
टारहिं पूँछ, पसारहिं जीहा । कुंजर डरहिं कि गुंजरि लीहा ॥
कनक सिला गढि सीढी लाई । जगमगाहि गढ ऊपर ताइ ॥

नवौं खंड नव पौरी , औ तहँ बज्र-केवार ।
चारि बसेरे सौं चढै, सत सौं उतरे पार ॥17 

अर्थ: किला  इतना ऊँचा है कि सूर्य और चन्द्रमा रोज इससे बचके निकलते हैं, अन्यथा उनके रथ इससे टकराकर चूर हो जायेंगे. इसके नौ द्वार वज्र के समान कठोर हैं. इन दरवाजों पर हजारों सैनिक रक्षा के लिए तैनात हैं. पांच कोतवाल इन द्वारों के चक्कर लगाते हैं. इसी कारण इन द्वारों को पार करते समय भय से पैर कांपने लगते हैं. इन द्वारों पर सिंहों की मूर्तियाँ गढ़ी गई हैं, जिन्हें वास्तविक समझ कर लोग डर जाते हैं. ये सिंह इतनी कुशलता से बनाये गए हैं कि वास्तविक लगते हैं और यूँ लगता है जैसे अभी गरज कर सिर पर चढ़ जाएँगे. इनकी उठी हुई पूँछ और निकली हुई जिह्वा देख कर हाथी भी डर जाते हैं कि कहीं ये गरज कर उन पर आक्रमण न कर दें. किले की सीढियां सोने की बनी हुई हैं जो ऊपर तक जगमगाती हैं.

वज्र निर्मित इन नौ द्वारों को वही पार कर सकता है जो सत्य का आश्रय लेकर चारों पड़ावों को जीत ले.

नव पौरी पर दसवँ दुवारा । तेहि पर बाज राज-घरियारा ॥
घरी सो बैठि गनै घरियारी । पहर सो आपनि बारी ॥
जबहीं घरी पूजि तेइँ मारा । घरी घरी घरियार पुकारा ॥
परा जो डाँड जगत सब डाँडा । का निचिंत माटी कर भाँडा 
तुम्ह तेहि चाक चढे हौ काँचे । आएहु रहै न थिर होइ बाँचे ॥
घरी जो भरी घटी तुम्ह आऊ । का निचिंत होइ सोउ बटाऊ  
पहरहिं पहर गजर निति होई । हिया बजर, मन जाग न सोई ॥ 
मुहमद जीवन-जल भरन, रहँट-घरी कै रीति ।
घरी जो आई ज्यों भरी , ढरी,जनम गा बीति ॥18

अर्थ: इन नौ द्वारों के ऊपर राजनिवास का दसवां द्वार है, जहाँ राजा का घड़ियाल (घंटा) बजता है. घंटा बजाने वाला घड़ियाँ गिनता रहता है और हर पहर के बीतने पर घंटा बजाता है. घंटे की आवाज मानो इस संसार को दंडित करती है अर्थात् घंटे का हर प्रहार यह बताता है कि आयु का एक पहर कम हो गया. मिट्टी के बर्तन की तरह भंगुर जीवन वाले निश्चिंत कैसे हो सकते हैं. हे मनुष्य, तू कुम्हार के चाक पर चढ़े कच्ची मिट्टी के बर्तन की तरह है, जो स्थायी नहीं है. घड़ी बीतने के साथ तुम्हारी आयु भी घटती जाती है, फिर भी हे पथिक (जीवन मार्ग का), तू निश्चिंत कैसे है? हर पहर घड़ियाल का गजर मृत्यु की ओर इशारा करता है, लेकिन तेरा वज्र समान ह्रदय इस चेतावनी को नहीं सुनता और सोता रहता है.

जायसी कहते हैं कि यह जीवन रहट के घड़े के समान है…भरा हुआ खाली होकर चला है, वैसे ही जीवन बीत जाता है.

गढ पर नीर खीर दुइ नदी । पनिहारी जैसे दुरपदी ॥
और कुंड एक मोतीचूरू । पानी अमृत, कीच कपूरु ॥
ओहि क पानि राजा पै पीया । बिरिध होइ नहिं जौ लहि जीया ॥
कंचन-बिरछि एक तेहि पासा । जस कलपतरु इंद्र-कविलासा ॥
मूल पतार, सरग ओहि साखा । अमरबेलि को पाव, को चाखा 
चाँद पात औ फूल तराईं । होइ उजियार नगर जहँ ताई ॥
वह फल पावै तप करि कोई । बिरधि खाइ तौ जोबन होई ॥

राजा भए भिखारी सुनि वह अमृत भोग ।
जेइ पावा सो अमर भा, ना किछु व्याधि न रोग ॥19

अर्थ: इस किले में जल और दूध की दो नदियाँ (इड़ा और पिंगला की ओर संकेत) बहती हैं, जिनमें द्रौपदी के चीर की तरह अक्षय जल भरा हुआ है, अर्थात् इनका जल कभी समाप्त नहीं होता. वहीँ मोतीचूर नामक कुंड है, जिसका पानी अमृत तुल्य और कीचड़ कपूर के समान सुगंधित है. राजा गंधर्वसेन इसी कुंड का पानी पीते हैं. जो भी इस कुंड का पानी पीता है, वो आजीवन बूढ़ा नहीं होता. इस कुंड की समीप एक सोने का वृक्ष है, जो इंद्र के स्वर्गलोक के कल्पवृक्ष के समान है. उसकी जड़ें पाताल तक और शाखाएँ स्वर्ग तक गयी हैं. उस वृक्ष पर फैली अमर बेल को न तो कोई पा सकता है और न कोई चख सकता है. उसके पत्ते चन्द्रमा के समान और फूल तारों के समान हैं. जहाँ तक यह नगर है, वहाँ तक इसका प्रकाश जाता है. इस फल को कोई कठिन तपस्या से ही प्राप्त कर सकता है. वृद्ध व्यक्ति भी इस फल को खा ले तो उसे नवयौवन प्राप्त हो जाता है.

उस अमृत भोग के बारे में सुनकर राजा अपना राजपाट छोड़ने को तैयार रहते हैं. जो भी इसे पा लेता है, वह अमर हो जाता है और उसे कभी कोई रोग नहीं होता.

गढ पर बसहिं झारि गढपती । असुपति, गजपति, भू-नर-पती ॥
सब धौराहर सोने साजा । अपने अपने घर सब राजा ॥
रूपवंत धनवंत सभागे । परस पखान पौरि तिन्ह लागे ॥
भोग-विलास सदा सब माना । दुख चिंता कोइ जनम न जाना ॥
मँदिर मँदिर सब के चौपारी । बैठि कुँवर सब खेलहिं सारी ॥
पासा ढरहिं खेल भल होई । खडगदान सरि पूज न कोई ॥
भाँट बरनि कहि कीरति भली । पावहिं हस्ति घोड सिंघली ॥

मँदिर मँदिर फुलवारी, चोवा चंदन बास ।
निसि दिन रहै बसंत तहँ छवौ ऋतु बारह मास ॥20

अर्थ: किले में चार सेनानायक हैं- गढ़पति, अश्वपति, गजपति और नरपति. सबके महल सोने से सजे हुए हैं. ये अपने वैभव में राजाओं से कम नहीं हैं. वे सभी सुंदर, धनवान और सौभाग्यवान हैं. उनकी दहलीज़ों पर पारस पत्थर लगे हुए हैं. ये सदैव भोग विलास में लीन रहते हैं और इन्होने कभी किसी दुःख या चिंता को नहीं जाना है. इनके महलों में चौपालें बनी हुई हैं, जहाँ बैठ कर ये पासे खेला करते हैं. खड्ग चलाने और दानवीरता में भी इनका कोई मुकाबला नहीं है. भाट इनकी तारीफ़ करने के एवज़ में हाथी-घोड़ों से पुरस्कृत होते हैं.

इन महलों में फुलवारियाँ हैं, जिनसे सदैव चोवा चंदन की खुशबू आती है. इस कारण वहाँ रात-दिन, बारह महीने और छह ऋतुओं में वसंत ऋतु ही रहती है.

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पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड पंचम पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन

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