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हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो!

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जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद

जन्म:30 जनवरी 1889, वाराणसी, मृत्यु: नवम्बर 15, 1937 काव्य: कामायनी, लहर, झरना, आँसू उपन्यास: कंकाल, तितली कहानी: इंद्रजाल, प्रतिध्वनि नाटक: चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त
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