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राजा रिपुदमनबहादुर उत्तरी ध्रुव को जीत कर योरुप के नगर-नगर से बधाइयाँ लेते हुए हिन्दुस्तान आ रहे हैं। यह ख़बर अख़बारों ने पहले सफ़े पर मोटे अक्षरों में छापी।

उर्मिला ने ख़बर पढ़ी और पास पालने में सोते शिशु का चुम्बन लिया।

अगले दिन पत्रों ने बताया कि योरुप के तट एथेन्स से हवाई जहाज़ पर भारत के लिये रवाना होते समय उन्होंने योरुप के लिये संदेश माँगने पर कहा कि उसे अद्भुत की पूजा की आदत छोड़नी चाहिये।

उर्मिला ने यह भी पढ़ा।

अब वह बम्बई आ पहुँचे हैं, जहाँ स्वागत की ज़ोर शोर की तैयारियाँ हैं। लेकिन उन्हें दिल्ली आना है। नागरिक आग्रह कर रहे हैं और शिष्ट-मंडल मिल रहा है। उसकी प्रार्थना सफल हुई तो वह दिल्ली के लिये कल रवाना हो सकेंगे। अख़बार के विशेष प्रतिनिधि का अनुमान है कि उनको झुकाना कठिन होगा। वह यद्यपि सब से सौजन्य से मिलते हैं, पर यह भी स्पष्ट है कि उनको अपने सम्बन्ध के प्रदर्शनों में उल्लास नहीं है। सम्वाददाता ने लिखा है, “मैं मिला तब उनका चेहरा ऐसा था कि वह यहाँ न हों, जाने कहीं दूर हों।”

उर्मिला ने पढ़ा और पढ़कर अख़बार अलग रख दिया।

सचमुच राजा रिपुदमन बम्बई नहीं ठहर सके। छपते-छपते की सूचना है कि आज सवेरे के झुटपुटे में उनका जहाज़ निर्विघ्न दिल्ली पहुँच गया है।

एक दिन, दो दिन, तीन दिन। उर्मिला रोज़ अख़बार पढ़ती है। इन दिनों वह कहीं बाहर नहीं गई। राजा रिपु को लोग अवकाश नहीं दे रहे हैं। सुना जाता है कि वह दिल्ली छोड़ेंगे। कहाँ जाएँगे, इसके कई अनुमान हैं। निश्चय यह है कि जाएँगे किसी कठिन यात्रा पर।

उर्मिला ने सदा की भाँति यह भी पढ़ लिया।

चौथे दिन एक बड़ा मोटा-सा लिफ़ाफ़ा उसे मिला। अन्दर ख़त संक्षिप्त था। पढ़ा, और उसी तरह मोड़कर लिफ़ाफ़े में रख दिया। फिर बच्चे की ओर ध्यान दिया। वह जगने को तैयार न था। फिर भी उठाकर उसे कन्धे से लगाया और कमरे में डोलने लगी।

इधर राजा रिपुदमन को अपने से शिकायत है। उन्हें नींद कम आती है। मन पर पूरा काबू नहीं मालूम होता। सामने की चीज़ पर एकाग्र होने में कठिनाई होती है। नहीं चाहते, वहाँ ख़्याल जाते हैं। कभी तो अपनी ही कल्पनाओं से उन्हें डर लगने लगता है। अभी योरुप से आते हुए ऊपर आसमान की तरह नीचे भी गहन और अपार नीलिमा को देखकर उन्हें होता था कि क्यों इस जहाज़ से मैं इस सागर में कूद नहीं पड़ूँ। सारांश इसी तरह की अस्त-व्यस्त बातें उनके मन में उठ आया करती हैं और वह अपने से असंतुष्ट हैं।

योरुप में ही उन्होंने मानसोपचार के सम्बन्ध में आचार्य मारुति की ख्याति सुनी थी। भारत में, और तिस पर दिल्ली में रह कर वह जिन मारुति को नहीं जानते थे, उन्हीं के विषय में योरुप के देशों से वह बड़ी श्रद्धा लेकर लौटे हैं। इसलिये अवकाश पाते ही वह उनकी शरण में पहुँचे। यह यद्यपि सन् 1960 की बात है कि जिस वर्ष आचार्य का देहान्त हुआ, पर उस समय वह जीवित थे।

अभिवादन पूर्वक आचार्य ने कहा- “वैद्य के पास रोगी आते हैं। विजेता मेरे किस सौभाग्य से आये हैं?”

रिपु– “रोगी ही आपके पास आया है। विजेता छल है। और उस दुनिया के छल को दुनिया के लिये छोड़िए। पर आप तो जानते हैं।”

आचार्य- “हाँ, चेहरे पर आपके विजय नहीं, पराजय देखता हूँ। शिकायत क्या है?”

रिपु– “मैं ख़ुद नहीं जानता। मुझे नींद नहीं आती। और मन पर मेरा काबू नहीं जमता।”

“हूँ! क्या होता है?”

“जो नहीं चाहता, मन के अन्दर वह सब कुछ हुआ करता है?”

“ख़ास तौर पर आप क्या नहीं चाहते?”

“क्या कहूँ? यही देखिये कि हिन्दुस्तान लौट आया हूँ, जब कि ध्रुव पर अभी बहुत काम बाक़ी है। विजेता शब्द व्यंग्य है। ध्रुव देश भी हम सब के लिये एक उद्यान होना चाहिये। एक अकेला झण्डा गाड़ आने से क्या होता है? वह सब काम बाक़ी है। फिर भी मैं हिन्दुस्तान आ गया। भला क्यों?”

मारुति गौर से रिपुदमन को देखते रहे। बोले- “तो हिन्दुस्तान न आना ज़रूरी था?”

“हाँ, आना किसी भी तरह ज़रूरी न था।”

“क्यों? हिन्दुस्तान तो घर है।”

“घर क्या मेरा? मेरा घर तो ध्रुव भी हो सकता है।”

आचार्य ने ध्यानपूर्वक रिपुदमन को देखते हुए कुछ हँसकर कहा- “यानी हिन्दुस्तान को छोड़कर कोई घर हो सकता है!”

राजा रिपु ने उत्साह से कहा- “लेकिन क्यों कोई घर हो? और मेरे जैसे आदमी के लिए!”

आचार्य- “खैर, अब हम काम की बातें करें। अभी मैं कुछ नहीं कह सकता। कल पहली बैठक दीजिए—तीन बजकर बीस मिनिट पर। डायरी रखते हैं? नहीं, तो अब से कल तक की डायरी रखिये। साथ जो ख़र्च करें, उसका पाई-पाई हिसाब और जिनसे मिलें उनका ब्यौरा भी रखियेगा।”

रिपु– “आपका क्या ख़्याल है? नरवस सिस्टम में कुछ खराबी है?”

“वह सब अभी न कह सकूँगा। मैं सोचता हूँ कोई ख़राबी नहीं है। मैं वैज्ञानिक से अधिक विश्वासी हूँ। विश्वास में बहुत शक्ति है। अब हम कल मिलेंगे। ….जी नहीं, इसके लिये बाहर सेक्रेटरी है।”

बड़े-बड़े नोटों को वापस पर्स में रखते हुए राजा ने कहा- “मेरा स्वास्थ्य आप मुझे दे दें तो मैं बड़ा ऋणी होऊँ।”

आचार्य हँसकर बोले- “लेकिन आप तो स्वस्थ ही हैं। मैं आत्मा को मानता और शरीर को जानता हूँ। शरीर आत्मा का यंत्र है। यंत्र आपका साबित है, निरोग है, सब अवयव ठीक हैं। कृपया कल सवेरे आप यहाँ के यंत्र-मन्दिर में भी हो आएँ। सेक्रेटरी सब बता देंगे। वहाँ आपके हृदय, मस्तिष्क और शेष शरीर का पूरा निरीक्षण हो जायेगा और परिणाम दोपहर तक मैं देख चुकूँगा। यह सब शास्त्रीय सावधानी है और उपयोगी भी है। लेकिन आप मान लें कि आपका शरीर एक दम तनदुरुस्त है। …कल डायरी लाइयेगा।”

अगले दिन रिपुदमन समय पर पहुँचे। आचार्य ने तरह-तरह के नक्शे और चित्र उनके आगे रखे और कहा- “देखिए, आपके यंत्र का पूरा खुलासा मौजूद है। मस्तक और हृदय सम्बन्धी परिणाम सही नहीं उतरे हैं तो विकार उन अवयवों में मत मानिए। व्यतिरेक यों है भी सूक्ष्म …डायरी है?”

रिपुदमन ने क्षमा माँगी, कहा- “मैं चित्त को उस जितना भी तो एकाग्र न कर सका।”

आचार्य हँसे, बोले- “कोई बात नहीं, अगली बार सही, यह कहिये कि आपके भाई महाराज साहब और रानी माता से मिलने आप जाइयेगा? विजेता को जीतने के लिये मारके बहुत हैं, पर अपनों का मन जीतना भी छोटी बात नहीं है। मैंने कल फ़ोन पर महाराज से बातें की थी। जो आप करो उसमें उन्हें ख़ुशी है। लेकिन अपने सुख से आप इतने विमुख न रहो—यह भी वह चाहते हैं। अच्छे से अच्छे सम्बन्ध मिल सकते हैं, या आप चुन लो। विवाह अनिष्ट वस्तु नहीं है। वह तो एक आश्रम का द्वार है। क्यों, यह चर्चा अरुचिकर है?”

रिपुदमन ने कहा- “जी, मैं उसके अयोग्य हूँ। विवाह से व्यक्ति रुकता है। वह बंधता है। वह तब सब का नहीं हो सकता। अपना एक कोल्हू बनाकर उसमें जुता हुआ चक्कर में घूम ही सकता है। नहीं, उस बारे में मुझे कुछ कहने को नहीं है।”

आचार्य हँसकर बोले- “विवाह चक्कर सही। लेकिन प्रेम?”

रिपुदमन ने कुछ जवाब नहीं दिया।

“प्रेम से तो नाराज़ नहीं हो? विवाह का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। प्रेम के निमित्त से उसकी सृष्टि है। इससे विवाह की बात तो दुकानदारी की है। सच्चाई की बात प्रेम है। इस बारे में तुम अपने से बात कर के देखो। वह बात डायरी में दर्ज कीजियेगा। अब परसों मिलेंगे।”

“परसों यदि न गया।”

“कहाँ न गये?”

“यही हिमालय या कहीं।”

“जहाँ चाहे जाओ। लेकिन मेरा दो बैठकों का कर्ज़ अभी बाक़ी है, परसों वही तीन बीस पर आप आओगे। अब घड़ी हमें समय देना नहीं चाहती।

“परसों के विषय में मैं आशावान से अधिक नहीं हूँ।”

“अच्छा तो कल उन से मिल कर आशा को विश्वास बना लीजिए, जिनसे न मिलने के लिये मुझसे मिला जाता है। फ़ोन पर मिलिये, वह न हो और दूरी हो तो हवाई यात्रा कीजिये। पर खटका छोड़ कर उनसे मिलिये अवश्य और कल! रेग्युलेटर जहाँ है उसके विपरीत मेरी सलाह जाकर बेकार ही हो सकती है।”

रिपुदमन ने चमक कर कहा- “किस की बात आप करते हैं?”

“नहीं जानता, वह कौन है। और जानूँगा तो आप ही से जानूँगा। …देखिये ध्रुव से और हिमालय से लड़ाई भी ठीक-ठीक तभी आपकी चलेगी, जब अपनी लड़ाई एक हद तक सुलझ चुकेगी। प्रेम का इनकार अपने से इनकार है। …लेकिन घड़ी की आज्ञा का उल्लंघन हम अधिक नहीं करेंगे।”

“देखिये, परसों यदि आ सका।”

“आप आयेंगे। …नमस्कार।”

“नमस्कार।”

3

समय सब पर बह जाता है और अख़बार कल को पीछे छोड़ आज पर चलते हैं! राजा रिपु नयेपन से जल्दी छूट गये। ऐसे समय सिनेमा के एक बाक्स में उर्मिला से उन्होंने भेंट की। उर्मिला बच्चे को साथ लायी थी। राजा सिनेमा के द्वार पर उसे मिले और बच्चे को गोद में लेना चाहा। उर्मिला ने जैसे यह नहीं देखा और अपने कन्धे से उसे लगाये वह उनके साथ जीने पर चढ़ती चली आयी। बाक्स में आकर व्यस्ततापूर्वक उन्होंने बिजली का पंखा खोल दिया, पूछा- “कुछ मँगाऊँ?”

“नहीं।”

घण्टी दबा कर आदमी को बुलाया, कहा- “दो क्रीम।”

उसके जाने पर कहा- “लाओ मुझे दो न, क्या नाम है!”

उर्मिला ने मुस्करा कर कहा- “नाम अब तुम दो।” ”

तो लो, आदित्यप्रसन्नबहादुर ख़ूब है!”

“बड़े आदमी बड़ा नाम चाहते हैं। मैं तो मधु कहती हूँ।”

“तो वह भी ठीक है; माधवेन्द्रबहादुर ख़ूब है!”

“तुम जानो। मुझे तो मधु काफी है।”

इस तरह कुछ बातें हुई और बीच ही में ज़रूरत हुई कि दोनों खेल से उठ जाएँ और कहीं जाकर आपस की सफ़ाई कर लें।

दूर जमना किनारे पहुँचकर राजा ने कहा- “अब कहो, मुझे क्या कहती हो?”

“कहती हूँ कि तुम क्यों अपना काम बीच में छोड़ कर आये?”

“मेरा काम क्या है?”

“मेरी और मेरे बच्चे की चिन्ता ज़रूर तुम्हारा काम नहीं है। मैंने कितनी बार तुम से कहा, तुम उससे ज़्यादा के लिये हो।”

“उर्मिला, अब भी मुझसे नाराज़ हो?”

“…नहीं, तुम पर गर्वित हूँ।”

“मैंने तुम्हारा घर छुड़ाया। सब में रुसवा किया। इज़्ज़त ली। तुमको अकेला छोड़ दिया। उर्मिला, मुझे जो कहो थोड़ा। पर अब बताओ, मुझे क्या करने को कहती हो? मैं तुम्हारा हूँ। न रियासत का हूँ, न ध्रुव का हूँ। मैं बस, तुम्हारा हूँ। अब कहो।”

“देखो राजा, तुम, भूलते हो। गिरिस्ती की-सी बात न करो। महाप्राणों की मर्यादा और है। तुम उन्हीं में हो। मेरे लिये क्या यह गौरव कम है कि मैं तुम्हारे पुत्र की माँ हूँ। मुझे दूसरी सब बातों से क्या मतलब है? लेकिन तुम्हें हक़ नहीं कि मुझसे घिरो। दुनिया को भी जानने की ज़रूरत नहीं कि मेरा बालक तुम्हारा है। मेरा जानना मेरे गर्व को काफ़ी है। मेरा अभिमान इसमें तीसरे को शरीक न करेगा। लेकिन मैं अपने को क्षमा नहीं कर सकूँगी, अगर जानूँगी कि मैं तुम्हारी गति में बाधा हूँ। अपने भीतर के वेग को शिथिल न करो, तीर की नाई बढ़े चलो कि जब तक लक्ष्य पार हो। याद रखना कि पीछे एक है जो इसी के लिये जीती है।”

“उर्मिला, तुमने मुझे ध्रुव भेजा। कहती थी—उसके बाद मुझे दक्षिणी ध्रुव जीतने जाना होगा। क्या सच अब मुझे वहीं जाना होगा?”

“राजा, कैसी बात करते हो। तुम कहीं रुक कैसे सकते हो? जाना होगा, नहीं जाओगे? अतुल वेग तुम में है, क्या वह यों ही? नहीं, मैं देखूँगी कि कुछ उसके सामने नहीं टिक सकता। मैं तुम्हारी बनी तो क्या इतना नहीं कर सकती? इस पुत्र को देखो। भवितव्य के प्रति यह तुम्हारा दान है। अब तुम उऋण हो, गति के लिये मुक्त हो। ध्रुव धरती के हो चुकेंगे तब कि आकाश के सामने होंगे। राजा तुमको रुकना नहीं है। पथ अनन्त हो, यही गति का आनन्द है।”

“उर्मिला, मैं आचार्य मारुति के गया था…”

“मारुति! वह ढोंगी!”

“वह श्रद्धेय हैं उर्मिला।”

“जानती हूँ, वह स्त्री को चूल्हे के और आदमी को हल के लिये पैदा हुआ समझता है। वह महत्त्व का शत्रु और साधारणता का अनुचर है। उसने क्या कहा?”

“तुम उन्हें जानती हो?”

“माँ उनकी भक्त थीं। वह अकसर हमारे यहाँ आते थे। उन्हीं की सीख से माँ ने मुझे संस्कृत पढ़ायी और नई हवा से बचाया। तभी से जानती हूँ। वह तेजस्विता का अपहर्त्ता है। अब वहाँ न जाना। उसने कहा क्या था?”

“कहा था, यह गति अगति है। जगह बदलना नहीं, सचेत होना गतिशीलता का लक्षण है। इसकी शायद राय है कि मुझे घूमना नहीं, विवाह करना चाहिए।”

“मैं जानती थी। और तुम्हारी क्या राय है?”

“वही जानने तुम्हारे पास आया हूँ। मारुति सब जानते हों, मुझको तुम जानती हो। इसलिये तुम्हीं कहो, मुझको क्या करना है?”

“विवाह नहीं करना है।”

“उर्मिला!”

“तुम्हारा शरीर स्वस्थ है और रक्त उष्ण है तो…।”

“उर्मिला!”

“तो स्त्रियों की कहीं कमी नहीं है।”

“बको मत, उर्मिला, तुम मुझे जानती हो।”

“जानती हूँ राजा, इसी से कहती हूँ। तुम्हारे लिये क्या मैं स्त्री हूँ? नहीं, प्रेमिका हूँ। मैं इस बारे में कभी भूल नहीं करूंगी। इसीलिये किसी स्त्री के प्रति तुममें में निषेध नहीं चाह सकती। मुझमें तुम्हारे लिये प्रेम है, इससे सिद्धि के अन्त तक तुम्हें पहुँचाये बिना मैं कैसे रह सकती हूँ।”

“उर्मिला, सिद्धि मृत्यु से पहले कहाँ है?”

“वह मृत्यु के भी पार है राजा ! इससे मुझ तक लौटने की आशा लेकर तुम नहीं जाओ। सौभाग्य का क्षण मेरे लिये शाश्वत है। उसका पुनरावर्तन कैसा?”

“उर्मिला तो मुझे जाना ही होगा। तुम्हारा प्रेम दया नहीं जानेगा?”

“यह क्या कहते हो राजा! मैं तुम्हें पाने के लिये भेजती हूँ। और तुम मुझे पाने के लिये जाते हो। यही तो मिलने की राह है। तुम भूलते क्यों हो?”

“उर्मिला, आचार्य मारुति ने कहा था साधारण रहो, सरल रहो। हम दोनों कहीं अपने साथ छल तो नहीं कर रहे हैं?”

“नहीं राजा, मारुति नहीं जानता। वह समझ की बात समझ से जो परे है, उस तक प्रेम ही पहुँच सकता है। जाओ राजा, जाओ। मुझ को परिपूर्ण करो, स्वयं भी सम्पूर्ण हो।”

“देखो उर्मिला, तुम भी रो रही हो।”

“हाँ, स्त्री रो रही है, प्रेमिका प्रसन्न है। स्त्री की मत सुनना, मैं भी पुरुष की नहीं सुनूँगी। दोनों जने प्रेम की ही सुनेंगे। प्रेम जो अपने सिवा किसी दया को, किसी कुछ को नहीं जानता।”

4

पौने चार बजे राजा रिपु आचार्य के यहाँ पहुँचे। डायरी दी। आचार्य ने उसे ग़ौर से देखा। अनन्तर नोटबुक अलग रखी। कुछ देर विचार में डूबे रहे। अनन्तर सहसा उबर कर बोले, “क्षमा कीजियेगा। मैं कुछ याद करता रह गया। आपने डायरी में संक्षिप्त लिखा। उर्मिला माता है और कुमारी है—यही न?”

“जी।”

“तुम्हारे पुत्र की अवस्था क्या है?”

“वर्ष से कुछ अधिक।”

“उत्तरी ध्रुव जाने में उर्मिला की सम्मति थी?”

“प्रेरणा थी।”

“यह विचार उसने कहाँ से पाया?”

“शायद मुझसे ही।”

“आरम्भ से तुम विवाह को उद्यत थे, वह नहीं?”

“जी नहीं। मैं बचता था, वह उद्यत थी।”

“हुँह! बचते थे, अपनी स्थिति और माता-पिता के कारण?”

“कुछ अपने स्वप्नों के कारण भी।”

“हुँह… फिर?”

“गर्भ के बाद मैं तैयार हुआ कि हम साथ रहें।”

“विवाहपूर्वक?”

“जी, वह चाहे तो विवाहपूर्वक भी।”

“हुँह… फिर?”

“तब उसका आग्रह हुआ कि मुझे ध्रुव के लिये जाना होगा।”

“तो उस आग्रह की रक्षा में आप गये?”

“पूरी तरह नहीं। मन से मैं भी साथ रहने का बहुत इच्छुक न था। इससे निकल जाना चाहता था।”

“तुम्हारे आने से तो वह प्रसन्न हुई?”

“शायद हुई। लेकिन रुकने से अप्रसन्न है।”

“क्या कहती है?”

“कहती है कि जाओ। जय-यात्रा की कहीं समाप्ति नहीं। सिद्धि तक जाओ, जो मृत्यु के पार है।”

अकस्मात् आवेश में आकर आचार्य बोले- “कौन, उर्मिला? वही धनञ्जयजी की लड़की? वह यह कहती है?”

“जी!”

“वह पागल है।”

“यही वह आपके बारे में कहती है।”

आचार्य ज़ोर से बोले- “चुप रहो, तुम जानते नहीं। वह मेरी बेटी है।”

“बेटी!”

“मैं बुड्ढा हूँ, रिपु, तुम समझदार हो। हाँ, सगी बेटी।”

“आचार्य जी, यह आप क्या कह रहे हैं? तो आप सब जानते थे?”

“सब नहीं तो, बहुत कुछ जानता ही था। देखो रिपुदमन, अब बताओ तुम क्या कहते हो?”

“मैं कुछ नहीं जानता, कुछ नहीं कहता। मेरे लिये सब ऊर्मि से पूछिये।”

“सुनो रिपुदमन, तुम अच्छे लड़के हो। ऊर्मि मुझसे बाहर न होगी। पुत्र की व्यवस्था हो जायेगी और तुम लोग विवाह करके यहीं रहोगे।”

रिपुदमन ने हाथों से मुँह ढककर कहा- “मैं कुछ नहीं जानता। ऊर्मि कहे, वही मेरी होनहार है।”

“ऊर्मि तो मेरी ही बेटी है, रिपुदमन, निराश न हो।”

5

आचार्य के समक्ष पहुँच कर उर्मिला ने कहा- “आपने मुझे बुलाया था?”

“हाँ बेटी, रिपुदमन ने सब मुझ से कहा है। जो हुआ, हुआ। अब तुम्हें विवाह कर लेना चाहिये।”

“अब से मतलब कि पहले नहीं करना चाहिये था?”

“विवाह हुआ है; तब तो खुशी की बात है। फिर वह प्रकट क्यों न हो? तुम दोनों साथ रहो।”

“भगवान् पर तो सब प्रकट है। और साथ बहुतेरे लोग रहते हैं?”

“तो तुम क्या चाहती हो?”

“वही जो राजा रिपुदमन उस अवस्था में चाहते थे, जब मुझे मिले थे। उनके स्वप्न मेरे कारण भग्न होने चाहिये कि पूर्ण? मेरी चिन्ता उन्हें उनके प्रकृत मार्ग से हटाए, यह मैं कैसे सह सकती हूँ?”

“स्वप्न तो सत्य नहीं है, बेटी! तब की मन की बहक को उसके लिये सदा क्यों अंकुश बनाये रखना चाहती हो? एक भूल के लिए किसी से इतना चिढ़ना न चाहिए।”

“आचार्यजी, आप किस अधिकार से मुझसे यह कह रहे हैं?”

“रिपु ने जो अपनी हैसियत और माता-पिता के ख़याल से आरम्भ में विवाह में झिझक की, इसी का न यह बदला है?”

“आचार्यजी, आप इन बातों को नहीं समझेंगे। शास्त्र में से स्त्री को आप नहीं जान लेंगे।”

“बेटी, फिर कोई किस में से किसको जानेगा, बता तो?”

“सब कुछ प्रेम में से जाना जायेगा; जो कि मेरे लिये आपके पास नहीं है।”

“सच बेटी, मेरे पास वह नहीं है। और तेरे लिये जितना चाहूँ उतना है, यह मैं किसी तरह न कह सकूँगा। लेकिन तुम से जो सच्चाई छिपाता रहा हूँ और अब छिपा रहा हूँ, वह अनर्थ अपने लिये नहीं, तेरे प्रेम के लिये ही मुझ से बन सका है, यह भी झूठ नहीं हैं। बेटी, मैं काफ़ी जी लिया। अब मरने में देर लगाने की बिलकुल इच्छा नहीं है। ऐसे समय तेरे अहित की बात कह सकूँगा, ऐसा निठुर मुझे न मानना। रिपुदमन को भरमा मत, उर्मिला! किसी का सपना होने के लिये वह नहीं है। तुम लोग विवाह करो और राजमार्ग पर चल पड़ो।”

उर्मिला ने हँस कर कहा- “आप थक गये हैं, आचार्य जी! भीड़ चलती रही है, इसी कारण जो प्रशस्त और स्वीकृत हो गया है वही न आपका राज-मार्ग? पर मुक्ति का पथ अकेले का है। अकेले ही उस पर चला जायेगा। वहाँ पाण्डव तक पाँच नहीं हैं। सब एक-एक हैं।”

“बेटी, यह क्या कहती है? सनातन ने जिसको प्रतिष्ठा दी है, बुद्धि के अहंकार में उसका तर्जन श्रेयस्कर नहीं होनेवाला है। उर्मिला, यह एक बुड्ढे की बात सुन रक्खो। पर बेटी, उसे छोड़ो। बताओ, मुझे माफ़ कर सकोगी!”

“आप रिपुदमन को, अपनी समझ से, उसके हित की ओर मोड़ना चाहते हैं, उसके लिये आप को क्षमा माँगने की ज़रूरत नहीं है।”

“तो तुम रिपु से नाराज़ ही रहोगी? उसके साथ अपने को भी दण्ड ही देती रहोगी?”

“मुझे पाने के लिये उन्हें जाना होगा; उन्हें पाने के लिये मुझे भेजना होगा—यह आपको कैसे समझाऊँ?”

“हाँ, मैं नहीं समझ सकूँगा। लेकिन मेरा एक और दावा है। सोचता था, भगवान के आगे पहुँचूँगा, उससे पहले उस बात को कहने का मौक़ा नहीं…! क्यों, तू अपने पिता की भी बात नहीं मानेगी?”

“पिता को जीते जी इस सम्बन्ध में, मैं कब सन्तोष दे सकी?”

“बेटी, अब भी नहीं दे सकेगी?”

उर्मिला ने चौंक कर कहा- “क्या आचार्य जी?”

मारुति का कंठ भर आया; काँपते हुये बोले– “हाँ, बेटी! चाहे तो अब तू अपने बाप को सन्तोष और क्षमा दोनों दे सकती है।”

ऊर्मि स्तब्ध, आचार्य को देखती रही। उनकी आँखों से तार-तार आँसू बह रहे थे! उनकी दशा दयनीय थी। बोली-“ मुझ अभागिन के भाग्य में आज्ञा-पालन तक का सुख, हाय, विधाता क्यों नहीं लिख सका? जाती हूँ, इस हतभागिन को भूल जाइयेगा।”

6

रिपुदमन ने कहा- “आचार्य से तुम मिली थीं?”

“मिली थी।”

“अब मुझे क्या करना है?”

“करना क्या है राजा; तुम्हें जाना है, मुझे भेजना है।”

“कहाँ जाना है? दक्षिणी ध्रुव?”

“हाँ, नहीं तो उत्तर के बाद कहीं तुम दक्षिण के लिए शेष न रहो।”

“दक्षिण के बाद फिर किसी के लिये शेष बचने की बात नहीं रह जायेगी न?”

“दिशाओं के द्वारा दिगंत में हम खो जाएँ। शेष यहाँ किस को रहना है?”

“छोड़ो, मैं तुम्हें नहीं समझता, तुम्हारी संस्कृत नहीं समझता। सीधे बताओ, मुझे कब जाना है?”

“जब हवाई जहाज़ मिल जाए।”

“तो लो, तुम्हारे सामने फ़ोन से तय किये लेता हूँ।”

फ़ोन पर भी बात करते समय टकटकी बाँध कर उर्मिला रिपु को देखती रही। अनंतर पृछा– “तो परसों शटलैण्ड द्वीप के लिये पूरा जहाज़ हो गया?”

“हाँ, हो गया।”

“लेकिन परसों कैसे जाओगे, दल जुटाना नहीं है?”

“तुम्हारा मन रखूँगा! दल के लिये नहीं ठहरूँगा।”

“लेकिन उसके बिना क्या होगा? नहीं, परसों तुम नहीं जाओगे।”

“और न सताओ उर्मिला, जाऊँगा। अमरीका फ़ोन किये देता हूँ। दक्षिण से कुछेक साथी हो जायेंगे।”

“नहीं राजा, परसों नहीं जाओगे।”

“मैं स्त्री की बात नहीं सुनूँगा। मुझे प्रेमिका के मन्त्र का वरदान है।”

आँखों में आँसू लाकर उर्मिला ने रिपु के दोनों हाथ पकड़ कर कहा- “परसों नहीं जाओगे तो कुछ हरज है? यह तो बहुत जल्दी है?”

रिपु हाथ झटक कर खड़ा हो गया, बोला- “मेरे लिये रुकना नहीं है। परसों तक इसी प्रायश्चित्त में रहना है कि तब तक क्यों रुक रहा हूँ।”

उर्मिला के फैले हुए हाथ खाली रहे! और वह कहती रह गयी, “राजा, ओ मेरे राजा!”

7

दुनिया के अख़बारों में धूम मच गयी। लोगों की उत्कण्ठा का ठिकाना न था। योरुप, अमरीका, रूस आदि देशों के टेलीफ़ोन जैसे इसी काम के हो गये। ध्रुव-यात्रा-योजना की बारीकियाँ पाने के बारे में सम्वाददाताओं में होड़ मच उठी। रिपुदमन उन्हें कुछ न बता सका, यह उसकी दक्षता का प्रमाण बना। हवाई जहाज़ जो शटलैंड के लिये चार्टर हुआ था, उसकी भिन्न-भिन्न कोनों से ली गई असंख्य तस्वीरें छपीं।

उर्मिला अख़बार लेती, पढ़ती और रख देती। अनन्तर शून्य में देखती रह जाती। नहीं तो अपने बच्चे में डूबती।

एक दिन, दो दिन। वह कहीं बाहर नहीं गई। टेलोफ़ोन पास रख छोड़ा। पर कोई नहीं, कुछ नहीं। अख़बार के पन्नों से आगे और कोई बात उस तक नहीं आई।

आज अन्तिम सन्ध्या है। राष्ट्रपति की ओर से दिया गया भोज हो रहा होगा। सब राष्ट्र-दूत होंगे, सब नायक, सब दलपति। गयी रात तक वह इन कल्पनाओं में रही।

तीसरा दिन। उर्मिला ने अख़बार उठाया। सुर्ख़ी है और बॉक्स में ख़बर है। राजा रिपुदमन सवेरे ख़ून में भरे पाये गये।। गोली का कनपटी के आरपार निशान है।

ख़बर छोटी थी, जल्दी पढ़ ली गयी। लेकिन पूरे अख़बार में विवरण और विस्तार के साथ दूसरी सूचनाएँ थीं, जिन्हें उर्मिला पढ़ती ही चली गई, पढ़ती ही चली गई। पिछली सन्ध्या को जगह-जगह राजा रिपुदमन के सम्मान में सभाएँ हुई थीं। उनकी चर्चा था। ख़ास कर राष्ट्रपति के उस भोज का पूरा विवरण था, जिसे दुनिया का एक महत्त्वपूर्ण समारोह कहा गया था।

उर्मिला रस की एक बूंद नहीं छोड़ सकी। उसने अक्षर-अक्षर सब पढ़ा।

दोपहर बीत गई, तब नौकरानी ने चेताया कि खाना तैयार है। इस समय उसने भी तत्परता से कहा- “मैं भी तैयार हूँ। यहीं ले आओ। प्लेट्स इसी अख़बार पर रख दो।”

परिशिष्ट

उसी दिन अख़बारों ने अपने खास अंक में मृत व्यक्ति का तकिये के नीचे से मिला जो पत्र छापा था, वह भी नीचे जाता है।

“सब के प्रति—

बन्धुओं,

मैं दक्षिणी ध्रुव जा रहा था, सब तैयारियाँ थीं। ध्रुव में मुझे महत्व नहीं है, फिर भी मैं जाना चाहता था। कारण, इस बार मुझे वापस आना नहीं था। ध्रुव के एकान्त में मृत्यु सुखकर होती। ध्रुव-यात्रा मेरी व्यक्तिगत बात थी, उसी को सार्वजनिक महत्व दिया गया। यह अन्याय है। इसी शाम राष्ट्रपति और राष्ट्रदूतों ने मुझे बधाइयाँ दीं। मेरे पराक्रम को सराहा, पर उन्हें छल हुआ है। मैं वह श्रेय नहीं ले सकता। वह चोरी होगी। उस भ्रम में लोगों को रखना मेरे लिये गुनाह है।

क्या अच्छा होता कि ध्रुव मैं जा सकता, लेकिन लोगों ने सार्वजनिक रूप से जो श्रेय मुझ पर डाला, उसका स्वल्पांश भी किसी तरह अपने साथ लेकर मैं नहीं बढ़ सकता हूँ। यात्रा एकदम निजी कारणों से थी। मुझे बहुत खेद है कि मैं किसी से मिले आदेश और उसे दिये अपने वचन को पूरा नहीं कर पा रहा हूँ। लेकिन ध्रुव पर भी मुझे बचना था नहीं। इसलिये बचना अब भी नहीं है। मुझे संतोष है कि किसी की परिपूर्णता में मैं काम आ रहा हूँ। मैं पूरे होश-हवास में अपना काम तमाम कर रहा हूँ। भगवान् मेरे प्रिय के अर्थ मेरी आत्मा की रक्षा करें।”

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Jainendra_kumar

जैनेन्द्र

जन्म: 2 जनवरी 1905, मृत्यु: 24 दिसंबर 1988 उपन्यासः परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, विवर्त, सुखदा, व्यतीत, जयवर्धन कहानी संग्रहः फाँसी, वातायन, नीलम देश की राजकन्या, एक रात, दो चिड़ियाँ, पाजेब, जयसंधि

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