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यह उन कुछ दु:स्वप्नों में एक था जो हमें हमेशा डर था कि किसी दिन सच हो जायेंगे ।

इरफान नहीं हैं, यह एक सच है जो दिमाग जान चुका है लेकिन दिल बदमाशी पर आमादा है।

कहता है, “हट, इरफान भी कभी मरा करते हैं। रात रात भर जागेगा तो ऊँघेगा और जब ऊँघेगा तो यही ऊलजलूल देखेगा। पागल, आँखें खोल। देख, बाहर पानी बरस रहा है। यू ट्यूब पर लगाओ अपना सबसे पसंदीदा गाना और देखो इरफान भाई को, जीता जागता। अब तो आज कल में वे वापस आने वाले हैं।”

और मैं फिर से देखता, सुनता “मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही।”

समय था बीसवीं सदी के अंत का।

हमारे सारे यार दोस्त गर्लफ्रेंड-गर्लफ्रेंड खेल रहे थे, लल्लू जगधर से ले कर सिंहानिया, राजपाल तक, तब हम दो शौक यूँ पूरे कर रहे थे कि इक्कीसवीं सदी तो आने वाली है नहीं। महीने में आठ-दस फिल्में और पंद्रह-बीस-पचीस किताबें!

तो फिजूल फिल्में भी देख लेते थे तो एक ऐसी ही फिल्म थी, आफताब शिवदासानी और लिजा रे की  कसूर। नायिका के विपक्षी वकील की भूमिका में कोई नया कलाकार था। भेदक आँखों, गंभीर आवाज और अनूठे अंदाज की संवाद अदायगी। फिर उसे देखा, गुनाह में।

फिल्म का टाइटल दोहराया हुआ था, पेपर थिन स्टोरी प्लाट था। डिनो मॉरिया सतत कंफ्यूजन में थे कि वे रेमंड के एड में हैं या एक फीचर फिल्म में। बिपाशा ने इतना शानदार अभिनय किया था कि समझ ही नहीं आया कि वह अभिनय कर भी रही हैं। वे निर्विकार थीं, दृश्य हँसने का हो या हो रोने का। वे अपनी परफार्मेंस में कान्स्टैन्ट थीं, हमेशा एक से भाव। आशुतोष राणा पीठ पर पड़े कछुये की तरह असहाय दिख रहे थे।

आम तौर से फिल्म की कथा में चार-पाँच गाने पिरोने का चलन है। यहाँ किस्सा उल्टा था। गानों में कहानी को पिरो दिया गया था। संवादों की स्थिति यह थी कि महेश भट्ट ने पूरी बेशर्मी से मय संवादों के एक पूरा-पूरा दृश्य अपनी फिल्म ‘ सर ‘ से उठा कर चेंप दिया था। छोटी सी कमी यह थी कि सर में ये संवाद नसीर बोलने वाले थे और परेश रावल सुनने वाले थे और यहाँ बिपाशा (eww) बोलने वालीं और डिनो (sigh) सुनने वाले।

फिल्म के नाम पर बने इस प्रचंड *तियापे के टाइटैनिकीय बोझ को अकेले अपने कंधों पर उठाया था, फिल्म के नवोदित खलनायक ने। दर्शकों को ऐसा अभिनय पहली बार देखने को मिला था। यह कोई फिल्मी पुलिसिया नहीं था। यह लंपट, शराबी, रिश्वतखोर डी एस पी, दिग्विजय पांडे, तो जैसे पास के किसी थाने से निकला था।

उस अभिनेता का नाम था, इरफान खान !

इरफान पहले टी वी सीरियल्स में आये। चाणक्य, भारत एक खोज, बनेगी अपनी बात आदि। उनकी पहली फीचर फिल्म थी सलाम बांबे। वे नोटिस किये गये, राजा बुन्देला निर्देशित प्रथा से।

फिर उनके दोस्त, तिग्मांशु धूलिया निर्देशित “हासिल”। बीतते समय के साथ इस फिल्म ने एक कल्ट फिल्म का रुतबा हासिल किया। समय के दो बेहतरीन अभिनेता इस फिल्म में अपने क्राफ्ट के शिखर पर थे। फिल्म विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के बैकड्राप में एक मध्यमवर्गीय प्रेम कहानी थी।

रिक्शे पर कालेज से घर जा रही लड़की, उसके पीछे साइकल पर आता लड़का। यह यश चोपड़ा या करण जौहर की सिंघाल/ मुंजाल/ राजपाल ब्रांड बीस फुट लंबी कारों, पीतवर्णीय फूलों के मील लंबे बागों, शिफान और स्विट्जरलैंड में पली-पुसी प्रेम कहानी नहीं थी। यहाँ प्रेमी को प्रेमिका से मिलने के लिये कामन फ्रेंड के घर होते उत्सव का सहारा लेना पड़ता है।

प्रेमी अपने साहस के शिखर पर हिचकिचाते हिचकिचाते, लजाती प्रेमिका के गाल चूम लेता है तो उसके लिये भी सॉरी कहना जरूरी समझता है।

सवर्ण छात्र नेता की भूमिका में आशुतोष राणा और दलितों के ठाकुर नेता रणविजय सिंह की भूमिका में इरफान ने फिल्म को अपने कंधों पर उठाया था। कमाल किया इरफान ने इस भूमिका में। उन्हें फिल्म का खलनायक कहना एक पिटा मुहावरा इस्तेमाल करना है।

उस भूमिका को इरफान ने अपने बहुरंगी अभिनय से इतने शेड दिये थे कि हमारी हकीर राय में फिल्म ही उनकी बन कर रह गयी। एक महत्वाकांक्षी नेता, एक सम्मोहक लीडर, एक दुर्दान्त हत्यारा और सबसे बढ कर एक दीवाना आशिक।

भरत मुनि ने अभिनय पर मानक माने जाने वाले अपने ग्रंथ, “नाट्यशास्त्र” में कहा है कि संवादों के स्थान पर आँखों से किया अभिनय श्रेष्ठतर होता है। इस कसौटी पर इरफान ने हासिल में सौ में सौ अंक प्राप्त किये हैं। आँखें कैसे बोलती हैं, देखना चाहें तॅ सरकार, हासिल देख डालिये।

मकबूल, चरस, डी डे, और पानसिंह तोमर देख डालिये और देखिये अल्पचर्चित रोग, जिसका गीत “मैंने दिल से कहा” हमारे लिये जिंदगी का फलसफा है।

इरफान ने वारियर, अमेजिंग स्पाइडरमैन, स्लमडॉग मिलिनेयर और लाइफ आफ पाइ में अभिनय कर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी कमाई ।

विदा, इरफान भाई, अलविदा कहने की हिम्मत नहीं होती।

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