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मैं हतप्रभ हूँ. उन आँखों की सदाबहार चमक, आंसुओं से धुंधला गयी है. वे जुझारू तेवर, वे हौसले, पहली बार पस्त पड़ गये हैं. मेरी परिचिता, प्रबुद्ध, जीनियस स्त्री कही जा सकती है. उसने कई बार, खुद को साबित किया है. जीवन – दर्शन को लेकर, वह संजीदा हो उठती है; वक्ता बनकर, श्रोता पर, हावी हो जाना चाहती है. उपदेश देना उसका प्रिय शगल है. नित नये जुमले उछालती है…बतरस उसकी वाणी से, छलक-छलक जाता है. किन्तु आज, उन्हीं शब्दों का कसैलापन, बेसुरे राग सा कचोट रहा है, “इस आदमी के साथ जीवन काटना, तलवार की धार पर चलने जैसा है…सुबह सुबह उठकर इसका मुंह देखना पड़ता है. बातचीत आमतौर पर बंद रहती है…अब तक तो किसी तरह निभ रही थी; लेकिन और नहीं!” मेरी आँखों का प्रश्न पढ़कर, वह पुनः बोलना शुरू करती है, “जिस परिवार में मेरा विवाह हुआ, वह हद दर्जे का रूढ़िवादी था. औरतों को जूती में रखने की फितरत थी उसकी. घर की औरतें दिन भर कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहें और घड़ी भर को आँख लग जाए तो उन्हें झिंझोड़कर जगा दिया जाता है…ऐसे पत्थरदिल हैं लोग!” “तुम्हारी सासू मां भी तो उन अनुभवों से गुजरी होंगी, उनसे शिकायत क्यों नहीं करतीं?” “वे तो और भी असहाय हो गयीं हैं…बूढ़ी हैं…अपनी मदद ही नहीं कर पातीं, मेरी क्या करेंगी” “और तुम्हारी मां?”

“मां की तो पूछो मत…वह बिलकुल होपलेस हैं…उन्हें हमसे कोई लेना देना नहीं; बस कछुए की तरह, अपने खोल में घुसी रहती हैं. झक्की भी हैं एक नम्बर की! उनकी किसी से नहीं पटती. मेरी सभी बहनें वहीं जयपुर में हैं, लेकिन कोई उनको रखना नहीं चाहता. यहाँ भी आती हैं तो घर में कलह मचा देती हैं.” वह कहती गयी और मैं चकित होकर सुनती रही. उसे झूठी तसल्ली भी तो नहीं दे सकती थी! पहले भी वह दबी जबान में, अपने पति की निंदा कर चुकी थी; किन्तु निंदा रस की हल्की- फुल्की फुहारें छोड़ने के बाद, वह बिलकुल सामान्य हो जाती थी- मानों कुछ हुआ ही न हो…बल्कि इधर उधर की चर्चा करते हुए, हास्य का पुट जोड़ना न भूलती! लेकिन आज तो माजरा कुछ और ही था. उसके मन का सुषुप्त ज्वालामुखी, फटने की कगार पर था. इसी बीच पतिदेव ऑफिस से वापस आ गये और हमारी बातचीत पर वहीं विराम लग गया.

मैं अनमनी, यंत्रवत सी उनकी ड्यूटी बजाने लगी. चाय – नाश्ते के दौरान, सोहम की आँखें न्यूज़ चैनल्स को खंगाल रही थीं; इसी से वे मेरी व्यग्रता को पढ़ नहीं पाए. दूसरा कोई दिन होता तो आते ही शुरू हो जाते, “और यामिनी क्या चल रहा है…कोई नया समाचार?” जवाब में मैं कहती, “नया क्या हो सकता है…जहाँ आप वहीँ मैं!” एक ‘टिपिकल’ पति की तरह उनकी प्रतिक्रिया होती, “आपकी सहेलियां न्यूज़ चैनेल से कम हैं क्या?! परपंच से तो दसियों समाचार गढ़े जा सकते हैं.” किन्तु आज वे कहीं और खोये हुए हैं. उनकी चुप्पी, मुझे अपने साथ, अकेला छोड़ देती है. मैं विचारमग्न हूँ. कुछ ही वर्षों में, कितना कुछ बदल गया. मैं और मेरी वह पुरानी सखी, कहाँ से कहाँ पंहुच गये! अजब सी उलझन है. मन में कुछ उफन रहा है, एक अनकही बेचैनी जो मौन के तटबंध तोड़, बह जाना चाहती है, जंगली झरने सी छलछलाना चाहती है…वीणा के तारों में झनकना चाहती है. चुलबुला सा एक चेहरा, यादों में कौंध गया है. वह जीवनी ऊर्जा से छलकती, किसी नदी सी थी. नदी जो अभी अभी पर्वत से उतरी हो… जो अपनी तरंगों में चिड़िया के नन्हे बच्चों का सा, कलरव लिए चल रही हो, जिसका अंचल सूर्य की नवजात किरणों से जगमगा उठा हो… जिसकी बूँद बूँद में सोना खिल रहा हो- हंस रही हों सुनहरी उर्मियाँ! उसके पास एक से एक बातों का खजाना था- मायके की मीठी स्मृतियाँ… पिता का मन्दिर- उत्सवों में शास्त्रीय गायन, छोटी बहनों की शरारतें, ट्रॉफी जीतकर, उसका स्पोर्ट्स चैंपियन बन जाना…गणित जैसे विषय में टॉप रैंक पा लेना आदि आदि. उस चुम्बकीय व्यक्तित्व की महिमा के आगे, मैं नतमस्तक हो जाती थी.

वह रोज अपना काम निपटाकर, मुझे गृहस्थी के गुर सिखलाने चली आती. अनजान शहर में, बेगाने लोगों का बेगानापन, यांत्रिक औपचारिकता को ढोते हुए रिश्ते… और इस सबमें, उसके सान्निध्य से मिली, आत्मीयता की गुनगुनी आंच! विवाह के बाद, अपनी जड़ों से अलग होकर, एक नई दुनियां रचनी थी; वजूद को अपनी जड़ें पसारनी थीं- सपनों की नई जमीन पर. शुरू शुरू में यह अच्छा लगा- उसका मुझ पर अधिकार जताना और जब तब मीठी झिड़की दे डालना. लेकिन धीरे धीरे वह अधिकार भावना, कुछ अधिक ही प्रबल होती गयी. उसमें मुझे एक तानाशाह की झलक मिलने लगी. वह मेरे घर की सज्जा, रात्रि भोज के मेनू आदि को, बदल देना चाहती थी. मैं एक बार को मान भी जाती, किन्तु पति और बच्चों का क्या करती? उनकी रुचियों को नकारकर, रम्या की बात कैसे रख सकती थी?!

कॉलोनी की दूसरी महिलाओं से भी, उसके स्वेच्छाचारी रवैय्ये पर बातचीत हुई. तेलगूभाषी मीनल कह रही थी, “इस बार मैंने रम्या को ‘वरलक्ष्मी’ पूजन में नहीं बुलाया” “क्यों भला?” वाई- ब्लाक वाली शगुन, आदतन, मामले को खोदने लगी. “अरे भई… यह पूजा पतिव्रता स्त्रियों के लिए है और इन महारानी जी का काम तो…” “तो…” उत्कंठा पतीली में भरे चावलों सी, खदबदाने लगी थी. ”तो क्या…! कहती थी, ‘हर समय पति को झेलते हुए, ज़िन्दगी बेमज़ा हो जाती है. लाइफ में थ्रिल के लिए, दूसरा भी कोई होना चाहिये… आमतौर पर, विवाह नाम की ‘घटना’ के पहले, कोई न कोई रूमानी अनुभव तो हो ही चुका होता है’ इसकी बातों से लगता है, इसका कोई मिस्टर ‘एक्स’ जरूर है” मैं सोच में पड़ गयी. जब रम्या ये सब ‘बक’ रही थी तो इसी मीनल ने हंसकर, उसकी हाँ में हाँ मिलाई थी. मजाक- मजाक में वह बात, आई- गई हो गयी. अब सहसा गड़े मुर्दे उखाड़ने से लाभ? फिर भी, मीनल ने मुझे उकसा दिया था, रम्या के खिलाफ.

हठात ही उसकी वह बात याद आई जो उसने बाजार से मुझे, अकेले वापस आते हुए, देखकर कही थी, “शॉपिंग गईं थीं?” “हाँ एक फॅमिली फ्रेंड के साथ…” मैं जल्दी में थी, इसलिए बात को आगे बढ़ाना मुनासिब न समझा. किन्तु वह कब छोड़ने वाली थी…झट से बोल पड़ी, “वाह बहुत अच्छे!” फिर छेड़ने वाले अंदाज़ में पूछने लगी, “ही ऑर शी??” सुनकर खीज हो आई… संस्कारपरायण मन को चोट लगी. एक समर्पित विवाहिता स्त्री, पराये इंसान के साथ घूमती फिरेगी?! किन्तु उससे बहस करना फिजूल था. प्रकट में बोली, “सोहम के दोस्त आये हैं. अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ ठहरे हैं. उनकी पत्नी को कुछ खरीदना था. इसी से…” “ओके” उसने तटस्थ होते हुए कहा. मैं भी दामन बचाकर वहां से निकल ली. उसके बाद से मैंने कसम खाई थी कि रम्या के पचड़े में नहीं पडूँगी. उसके अतीत में, कोई न कोई मिस्टर ‘एक्स’ रहा होगा…तभी तो वह ऐसी बातें…! किन्तु वह पुनः, मेरे शांत सरोवर जैसे जीवन में, कंकरी बन कूद पड़ी. उससे किनारा करना आसान कहाँ था!! मेरे फ्लैट के ऊपर वाला फ्लैट उसका था. आते जाते निगाह टकरा ही जाती. उससे बचने के लिए, मैंने टेरेस में कपड़े सुखाने ही छोड़ दिए. फिर भी ना जाने कैसे, वह मेरी आहट पा ही जाती. दूधवाले से दूध लेते हुए या कूड़े वाली के लिए कूड़ेदान बाहर रखते समय, रम्या मेरी उपस्थिति को सूंघ लेती और चालू हो जाती, “यामिनी…स्वीटी! आर यू देयर??” उसके इस स्वीटी संबोधन से मुझे खासी चिढ़ थी. स्वीटी उसकी नकचढ़ी और खब्त की हद तक नारीवादी सहेली थी. हालांकि रम्या ने विवाहोपरांत, नौकरी और आगे की पढ़ाई दोनों जारी रखे और इन क्षेत्रों में नए कीर्तिमान स्थापित किये, तथापि घर और बच्ची की जिम्मेदारी अपने पति शोभन पर सौंप दी. अब जब कुछ नहीं तो पी. एच. डी. का शौक चर्राया है. उसका स्वार्थीपना इस हद तक बढ़ चला है कि रिसर्च पेपर के आँकड़े, मुझसे डिक्टेट करवाना चाहती है ताकि उन्हें कंप्यूटर में आसानी से फीड कर सके तो कभी चाहती है कि मैं उसकी बच्ची की आयागिरी करूं.

यह जरूर था कि वह कभी कभी, मुझे कुछ अच्छा बनाकर खिला देती या फिर चाय ही पिला देती; पर इन मेहरबानियों के बदले, उसकी चाकरी तो नहीं कर सकती! पी. एच. डी. का बहाना लेकर, बिस्तर तोड़ती रहती है. बिटिया के लिए नाश्ता- खाना या तो पति बनाता है या फिर बाहर से मंगवाया जाता है. घर अस्तव्यस्त रहता है सो अलग. कामवाली से भी इन महारानी की नहीं पटती. कोई कामवाली बाई इनके घर नहीं टिक पाती. उस पर तुर्रा यह कि रोज ऊंची-ऊंची आवाज में पति से झगड़ती है. आखिरकार फ्लैट खाली करने के लिए, कॉलोनी-समिति से नोटिस मिल गयी. एक तरह से हम पड़ोसियों के लिए, यह अच्छा ही हुआ. रोज रोज के ‘ध्वनि- प्रदूषण’ से निज़ात मिली. पति- पत्नी के बीच वाक्- युद्ध तो थम गये पर शीत- युद्ध प्रारंभ हो गया, ऐसा उसने ही मुझसे कहा. यह भी बोली कि शोभन उसे, उसकी बिटिया काव्या से दूर करने का प्रयास कर रहा है.

सोहम से इसका जिक्र किया तो वे फट पड़े, “बच्ची के लिए सब कुछ बाप करता है; वह तो उसकी ही सगी होगी  … अपनी निकम्मी अम्मा को क्यों पूछेगी?! शोभन कलाकार है, एक अच्छा चित्रकार है… कलाकार दिल से कोमल होते हैं. वे क्रूर नहीं हो सकते.” शोभन और सोहम एक ही कॉलेज में पढ़े थे. वहां के सांस्कृतिक- मंडल के सदस्य थे. एक-दूजे को अच्छे से जानते थे. धीरे- धीरे मुझे भी रम्या से मोहभंग होने लगा. उस पर जो ‘गुरुमैय्या’ वाली श्रद्धा थी, वह भी तिरोहित होने लगी. इस बीच हमारी बिल्डिंग में जोर-शोर से किटी पार्टी का आगाज़ हुआ. उसी बिल्डिंग में रहने के बावजूद, रम्या को नहीं बुलाया गया. यह एक तरह का सामाजिक- बहिष्कार था. जो भी हो, पार्टी के दौरान वह चर्चा का केंद्रबिदु बनी रही.

मीनल को तो बोलना ही था, “रिवीलिंग नाइटी पहनकर हमारे घर चली आती है; यह भी नहीं सोचती कि घर में दो दो जवान लड़के हैं!” “इसके अपोजिट फ्लैट में जो कम उम्र का जोड़ा है, इससे बहुत तंग है. वह लड़का तो इसे सामने पाकर नजरें नीची कर लेता है.” “बहनजी दरवाजे के पास वाली रेलिंग पर, मैक्सी घुटनों तक चढ़ाकर बैठी रहती हैं…और क्या करेगा बेचारा??” “स्पोर्ट्स चैंपियन जो ठहरीं…लड़कों की तरह पाला गया है…वही ठसक और वही बेमुरव्वती” “यह तो खूब कही’… किसी ने चर्चा को और भी अधिक ‘उच्च स्तर’ तक पंहुचाने के लिए, व्यंग्य का अनोखा पुट जोड़ा, “आजकल क्लब- हाउस के खानसामों को लेक्चर पिलाती रहती है…जब कोई न मिला तो वे ही …!!” बात पूरी भी न हुई और अभद्र, अशिष्ट, अश्लील सी हंसी, हवा में तैरने लगी. जो भी हो, यह बात मुझे हजम नहीं हुई. रम्या लाख बुरी सही, स्वयं को खानसामों के स्तर तक गिरा नहीं सकती! वह जो संगीत, साहित्य और कलाओं में अद्भुत आस्था रखती है…वह जो शिवता और सौन्दर्य की अनूठी व्याख्या कर सकती है…वह जो बौद्धिकता के नवीन आयाम छू सकती है- बावर्चियों के संग, देहराग में लिप्त हो पाएगी?! भाषण पिला रही होगी, पाक कला के गुर सिखा रही होगी शायद… उन्हें कमअक्ल जानकर! ‘सीख देना’ भी उसके लिए व्यसन सा है…अहम् को तुष्ट करने वाली, मादक खुराक!!

माहौल की गर्मी मुझे झुलसाने लगी थी; वहां से खिसकना ही मुनासिब जान पड़ा. लौटकर आई तो पाया, रानीजी मेरे ही इन्तेजार में, पलक-पांवड़े बिछाए रेलिंग पर विराजमान थीं. मेरी आहट पाते ही, हमेशा की तरह आवाज़ लगाई, “ यामिनी… स्वीटी! आर यू देयर??” मैं कुढ़ गयी. घर में घुस भी न पाई थी; दो घड़ी सुस्ताना, चैन की साँस तक लेना  दूभर हो गया! बेमन से टेरेस का रुख किया ताकि ‘प्रकरण’ वहीं का वहीं समाप्त हो जाए. मुझे देखते ही वह चालू हो गयी, “तो आज फिर लेडीज़ मीट थी…मैं जानती हूँ कि ये सब औरतें मेरे बारे में क्या सोचती हैं! कहती हैं, ‘रम्या इतना पढ़के क्या करोगी?’…”अरे दिस इस माय लाइफ! मैं जो चाहूं इसके साथ करूं…इन्हें क्या?! बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!” वगैरह, वगैरह. इस रम्या के साथ किसी की बन नहीं सकती, मैं मन ही मन सोच रही थी. घरेलू महिलाओं को यह फालतू समझती है. राह में रोक- रोककर, ज्ञान छांटती रहती है. इसका अपना घरबार बर्बाद है, बस चले तो औरों को भी विद्रोह का झंडा थमा दे. यह क्या बात हुई कि जिम्मेदारियों को भूलकर, इनकी मिजाजपुरसी की जाये! बेतकुल्लफी की भी हद होती है!! सब चाहती हैं कि रम्या उनके यहाँ न आये.

लगातार ऊपर को देखते हुए, मेरी गर्दन अकड़ रही थी; लेकिन इसे परवाह कहाँ! मुझे अनमना पाकर, वह अकुला गई, “स्वीटी तुम सुन रही हो ना?!” मैं चौंकी और अकबकाकर कह उठी “हाँ..हाँ कहो” “कॉलोनी के पुरुषवर्ग का तो क्या कहना! सोचते हैं कि मैं आधुनिक हूँ तो आसानी से ‘उपलब्ध’ हो जाऊंगी” “गलत बात है” मैंने अचंभित होकर कहा. “और मेरे जनाब…कहते हैं ‘तुम मुझे आकर्षित नहीं करती.’ हद है! दूसरे मर्दों से पूछो, मुझे देखते ही, जिनका अंग – अंग खिल उठता है!!” भावुकता में आकर, वह नितांत व्यक्तिगत उद्गारों को, सार्वजानिक करने पर तुली थी. आता जाता कोई भी व्यक्ति उसे सुन सकता था. तभी तो कॉलोनी के ‘तथाकथित’ पुरुष उसे हलके में लेते हैं. परनिंदा से पहले… अपने ही ओछेपन पर नियन्त्रण, अभीष्ट नहीं?? सुन रही हो ना स्वीटी?!” वह झटके पर झटका दिए जा रही थी. “हूँ…” किसी भांति मैंने हुंकारा भरा.

 रम्या ने इधर उधर देखा, फिर बोली, “कोई सुन तो नहीं रहा…?!” फिर रहस्यमय ढंग से कहने लगी, “यामिनी ये आदमी बिलकुल बेकार है…ही इज़ नॉट एबल टु परफॉर्म इन बेड… इसने आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट लिया था; जिसके चलते समस्या का अस्थाई तौर पर समाधान हो गया …और मुझे मेरी बच्ची मिल गयी. नहीं तो ज़िन्दगी में रखा ही क्या था!” मैं चकरा गयी. क्या पुरुषत्व और नपुंसकता भी, अस्थायी और स्थायी हो सकते हैं?! आजकल कैसे कैसे चलताऊ टाइप विज्ञापन पत्रिकाओं में दिखाई पड़ते हैं- ‘मर्दाना कमजोरी का शर्तिया इलाज…निःसंतान हों तो मिलें’ वगैरा वगैरा. तंग गलियों में, किसी गैराज के जंग खाए शटर पर…किसी टुटहे मकान के सीलन भरे फाटक पर… बजबजाती नालियों के गिर्द खड़ी दीवारों पर- फूहड़ और बाजारू पोस्टर तो कहीं भी चिपके हो सकते हैं. ऑनलाइन रहो तो वियाग्रा और शिलाजीत का बाजार. मेरी अन्यमनस्कता को तोड़ते हुए वह बोली, यामिनी…फ्रॉम द डे वन- आई नेवर हैड अ मैरिड लाइफ.” कहते कहते उसकी आँखों में आंसू उतर आये. मैं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर देखती रही. इस स्त्री को क्या हुआ था कि घर के सामने वाले पैसेज पर, अपने अन्तरंग रहस्यों का खुलासा कर रही थी?!

यह कैसी क्रांति थी, जब खुल्लमखुल्ला एक गृहणी, पति की अक्षमता का ढिंढोरा पीटती है?? क्या वाकई कोई मिस्टर ‘एक्स’ था…जिसके मायाजाल में फंसकर, पति उसे बेकार लगने लगा था या फिर वास्तव में शोभन ही…! पौरुष का भी कोई थर्मामीटर होता है भला, जिसका पारा ऊपर-नीचे होता रहता हो!! झगड़ालू स्त्री से तो किसी का भी मन उचाट हो जाए, दैहिक सम्बन्ध तो दूर की बात… उससे बात भी करना गवारा न हो! तिस पर खोट उस बेचारे की ही!! उसके पसेसिव नेचर के कारण, मैं उसे कुछ भी समझा पाने में असमर्थ थी. विवाह के डेढ़ वर्ष बाद ही, झगड़ा कर, वह पति से अलग रहने लगी थी. सबसे कहती फिरती, “उस घर में मेरी हैसियत सिर्फ नौकरानी की थी” यह सब सोहम ने ही बताया. पुराना दोस्त और सहकर्मी होने के नाते, शोभन के बारे में उसे जानकारी रहती थी.

पिता ने भी अपनी एम. एस. सी. गोल्ड मेडलिस्ट बेटी को हाथोंहाथ लिया और दामाद को हजारों लानतें भेजीं. किन्तु ऐसा कब तक चलता? समाज का दबाव ऐसा कि सात बरस बाद, रम्या खोटे सिक्के की तरह फेर दी गयी और पति के पास उसे वापस आना पड़ा. समय की यह खाई तो उसने ही बनाई थी…पति से भावनात्मक दूरी भी. फिर देर से माँ बनने का दोष, वह उस पर कैसे थोप सकी?! समय ने ही रम्या को, उसके हर आरोप का जवाब दिया. हुआ यूँ कि एक दोपहर, मैं उसके घर बैठी चाय पी रही थी. नन्हीं काव्या चहकती हुई आई और एक फोटो एलबम हमें दिखाने लगी. बोली, “अम्मा! यामिनी आंटी! स्कूल में मेरी पेंटिंग्स की एग्जिबीशन हुई थी ना…उसकी पिक्स आ गयी हैं’. हम उन तस्वीरों को गौर से देखने लगे और काव्या के हुनर को सराहने लगे.

पेंटिग्स के साथ, कहीं कहीं शोभन और उसकी ड्राइंग टीचर मालती भी खड़े नजर आये. मालती को मैं भी जानती थी, क्योंकि मेरे बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते थे. वह कम उम्र में विधवा हो गयी थी. जब लंच टाइम में बच्चों का टिफ़िन देने, मैं स्कूल तक आती तो अक्सर शोभन और मालती, स्कूल कैंटीन के पास बतियाते हुए मिलते. मैं भी समझती  कि काव्या के चित्रों की प्रदर्शनी के लिए, उन्हें बातचीत करनी होती थी. रम्या ने पाया कि काव्या के बैग में एक मिनी एलबम और था. वह बाज की तरह झपट्टा मारकर, उसे निकालने लगी. लेकिन काव्या ने झट उसे वापस डाल दिया. “ओह नो…गलती से मालती मिस की फोटोज मैंने रख लीं. अम्मा उन्हें मत देखो! यू नो, फोटोग्राफर रमेश अंकल आये थे, मेरी आर्ट -गैलरी के लिए… पापा ने ही उन्हें बुलाया. मालती मिस को ये अलबम भी ये दिया…बोले, “योर पर्सनल फोटोग्राफ्स मिस…रमेश ने भेजे हैं” बेटी ने मना किया, पर रम्या कहाँ मानने वाली थी! उसने एक झटके में मिनी एलबम को खंगाल डाला.

क्या पिक्स थीं! शोभन और मालती की, साथ खाते- पीते, हँसते- बोलते हुए तस्वीरें!! कहीं शानदार रेस्टोरेंट की रंगीनियाँ तो कहीं रास्तों की गहमागहमी तो कहीं फूलों की क्यारियाँ. रम्या के पैर तले जमीन ही खिसक गयी. आँखें फाड़े हुए, वह दूसरे ही किसी लोक के, नजारे देख रही थी. रम्या का व्यूह अभेद्य था…उसका सादगीपसन्द पति, कब व्यूह से निकल भागा…कब विद्रोही बन गया- कुछ खबर नहीं! बिटिया तो पहले ही, पापा के खेमे में थी!! उस दिन से रम्या को आटे- दाल का पता चल गया. देर से ही सही,  उसकी आँखें खुल गयी हैं. अब लोगों के सामने, वह शोभन की तारीफ़ करते नहीं थकती. पति के जन्मदिन और अपनी एनिवर्सरी की मिठाई बांटती है. पति को नकेल डालकर, भेड़ा बनाने का प्रयास नहीं कर रही…खुद को सही और उसे गलत साबित करने के लिए, नामर्दी का झूठा इल्जाम नहीं दे रही. ‘मिस्टर एक्स’ रूपी झुनझुना, कबका, उसके हाथों से टूटकर गिरा और चकनाचूर हो गया!

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विनीता शुक्ला

विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय), पी. जी. ए. सी. (खाद्य प्रसंस्करण) 1- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य 2- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ 1- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन 2006) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित 2. एक्वेरियम की मछलियाँ काव्य संग्रह प्रकाशित

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