किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची. हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुंडन हो गया था. कल तक उनके सिर पर लंबे घुँघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुंडन हो गया था. सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है. अटकलें लगने लगीं. किसी ने कहा – शायद सिर में जूँ हो गई हों. दूसरे ने कहा – शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो. किसी और ने कहा – शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गई. पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे. आखिर एक सदस्य ने पूछा – अध्यक्ष महोदय! क्या मैं जान सकता हूँ कि माननीय मंत्री महोदय के परिवार में क्या किसी की मृत्यु हो गई है? मंत्री ने जवाब दिया – नहीं. सदस्यों ने […]
No Posts Found
धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग और नरक में निवास-स्थान अलाट करते आ रहे थे.पर ऐसा कभी नहीं हुआ था. सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे.गलती पकड में ही नहीं आ रही थी. आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतनी ज़ोरों से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई . उसे निकालते हुए वे बोले, ”महाराज, रिकार्ड सब ठीक है.भोलाराम के जीव ने पांच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना हुआ, पर अभी तक यहाँ नहीं पहुँचा.” धर्मराज ने पूछा, ”और वह दूत कहाँ है?” ”महाराज, वह भी लापता है.” इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बड़ा बदहवास-सा वहां आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, ”अरे तू कहाँ रहा […]
रात को बड़े जोर का अंधड़ चला. सेक्रेटेरिएट के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर पडा. सुबह जब माली ने देखा तो उसे मालूम हुआ कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है. माली दौड़ा दौड़ा चपरासी के पास गया, चपरासी दौड़ा दौड़ा क्लर्क के पास गया, क्लर्क दौड़ा दौड़ा सुपरिन्टेंडेंट के पास गया. सुपरिन्टेंडेंट दौड़ा दौड़ा बाहर लॉन में आया. मिनटों में ही गिरे हुए पेड़ के नीचे दबे आदमी के इर्द गिर्द मजमा इकट्ठा हो गया. ‘’बेचारा जामुन का पेड़ कितना फलदार था.‘’ एक क्लर्क बोला. ‘’इसके जामुन कितने रसीले होते थे.‘’ दूसरा क्लर्क बोला. ‘’मैं फलों के मौसम में झोली भरके ले जाता था. मेरे बच्चे इसके जामुन कितनी खुशी से खाते थे.‘’ तीसरे क्लर्क का यह कहते हुए गला भर आया. ‘’मगर यह आदमी?’’ माली ने पेड़ के नीचे दबे आदमी की तरफ इशारा किया. ‘’हां, यह आदमी’’ सुपरिन्टेंडेंट सोच में पड़ गया. ‘’पता […]
चौड़ी सड़क गली पतली थी दिन का समय घनी बदली थी रामदास उस दिन उदास था अंत समय आ गया पास था उसे बता, यह दिया गया था, उसकी हत्या होगी धीरे धीरे चला अकेले सोचा साथ किसी को ले ले फिर रह गया, सड़क पर सब थे सभी मौन थे, सभी निहत्थे सभी जानते थे यह, उस दिन उसकी हत्या होगी खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर दोनों हाथ पेट पर रख कर सधे कदम रख कर के आए लोग सिमट कर आँख गड़ाए लगे देखने उसको, जिसकी तय था हत्या होगी निकल गली से तब हत्यारा आया उसने नाम पुकारा हाथ तौल कर चाकू मारा छूटा लोहू का फव्वारा कहा नहीं था उसने आखिर उसकी हत्या होगी? भीड़ ठेल कर लौट गया वह मरा पड़ा है रामदास यह ‘देखो-देखो’ बार बार कह लोग निडर उस जगह खड़े रह लगे बुलाने उन्हें, जिन्हें संशय था हत्या होगी।
कितनी अफ़सोसनाक, कितनी दर्दभरी बात है कि वही औरत जो कभी हमारे पहलू में बसती थी, उसी के पहलू में चुभने के लिए हमारा तेज खंजर बेचैन हो रहा है. जिसकी आंखें हमारे लिए अमृत के छलकते हुए प्याले थीं, वही आंखें हमारे दिल में आग और तूफान पैदा करें! रूप उसी वक्त तक राहत और खुशी देता है जब तक उसके भीतर एक रूहानी नेमत होती है और जब तक उसके अन्दर औरत की वफ़ा की रूह हरकत कर रही हो, वर्ना वह एक तकलीफ़ देने चाली चीज़ है, ज़हर और बदबू से भरी हुई, इसी क़ाबिल कि वह हमारी निगाहों से दूर रहे और पंजे और नाखून का शिकार बने. एक जमाना वह था कि नईमा हैदर की आरजुओं की देवी थी, यह समझना मुश्किल था कि कौन तलबगार है और कौन उस तलब को पूरा करने वाला. एक तरफ पूरी-पूरी दिलजोई थी, दूसरी तरफ पूरी-पूरी रजा. तब […]
वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे। दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशिष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, […]
अपने जमाने से जीवनलाल का अनोखा संबंध था। जमाना उनका दोस्त और दुश्मन एक साथ था। उनका बड़े से बड़ा निंदक एक जगह पर उनकी प्रशंसा करने के लिए बाध्य था और दूसरी ओर उन पर अपनी जान निसार करनेवाला उनका बड़े से बड़ा प्रशंसक किसी ने किसी बात के लिए उनकी निंदा करने से बाज नहीं आता था, भले ही ऐसा करने में उसे दुख ही क्यों न हो। परिचित हो या अपरिचित, चाहे जीवनलाल का शत्रु ही क्यों न हो, अगर मुसीबत में है तो वह बेकहे-बुलाए आधी रात को भी तन-मन-धन से उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो जाते थे। उस समय वे अपने नफे-नुकसान की तनिक भी परवाह न करते थे। लेकिन व्यवहार में बड़ी ओछी तबीयत के थे, अपने टके के लाभ के लिए किसी की हजारों की हानि करा देने में उन्हें तनिक भी हानि न होती थी। वह स्त्री के संबंध में […]
अगर कबरी बिल्ली घर-भर में किसी से प्रेम करती थी, तो रामू की बहू से, और अगर रामू की बहू घर-भर में किसी से घृणा करती थी, तो कबरी बिल्ली से। रामू की बहू, दो महीने हुए मायके से प्रथम बार ससुराल आई थी, पति की प्यारी और सास की दुलारी, चौदह वर्ष की बालिका। भंडार-घर की चाभी उसकी करधनी में लटकने लगी, नौकरों पर उसका हुक्म चलने लगा, और रामू की बहू घर में सब कुछ। सासजी ने माला ली और पूजा-पाठ में मन लगाया। लेकिन ठहरी चौदह वर्ष की बालिका, कभी भंडार-घर खुला है, तो कभी भंडार-घर में बैठे-बैठे सो गई। कबरी बिल्ली को मौका मिला, घी-दूध पर अब वह जुट गई। रामू की बहू की जान आफत में और कबरी बिल्ली के छक्के पंजे। रामू की बहू हाँडी में घी रखते-रखते ऊँघ गई और बचा हुआ घी कबरी के पेट में। रामू की बहू दूध ढककर मिसरानी […]
नीलू की कथा उसकी माँ की कथा से इस प्रकार जुड़ी है कि एक के बिना दूसरी अपूर्ण रह जाती है. उसकी अल्सेशियन माँ, लूसी के नाम से पुकारी जाती थी. हिरणी के समान वेगवती, साँचे में ढली हुई देह, जिस पर काला आभास देने वाले भूरे-पीले रोम, बुद्धिमानी का पता देने वाली काली पर छोटी आँखें, सजग खड़े कान और सघन, रोएँदार तथा पिछले पैरों के टखने को छूने वाली पूँछ, सब कुछ उसे राजसी विशेषता देते थे. थी भी तो वह सामान्य कुत्तों से भिन्न. उत्तरायण में जो पगडंडी दो पहाड़ियों के बीच से मोटर-मार्ग तक जाती थी, उसके अंत में मोटर-स्टॉप पर एक ही दुकान थी, जिससे आवश्यक खाद्य-सामग्री प्राप्त हो सकती थी. शीतकाल में यह रास्ता बर्फ़ से ढक जाता था. तब दुकान तक पहुँचने में असमर्थ उत्तरायण के निवासी, लूसी के गले में रूपये और सामग्री की सूची के साथ एक बड़ा थैला […]
1 जनवरी, 1935 आज क्रिकेट मैच में मुझे जितनी निराशा हुई मैं उसे व्यक्त नहीं कर हार सकता। हमारी टीम दुश्मनों से कहीं ज्यादा मजबूत था मगर हमें हार हुई और वे लोग जीत का डंका बजाते हुए ट्राफी उड़ा ले गये। क्यों? सिर्फ इसलिए कि हमारे यहां नेतृत्व के लिए योग्यता शर्त नही। हम नेतृत्व के लिए धन-दौलत जरुरी समझते हैं। हिज हाइनेस कप्तान चुने गये, क्रिकेट बोर्ड का फैसला सबको मानना पड़ा। मगर कितने दिलों में आग लगी, कितने लोगों ने हुक्मे हाकिम समझकर इस फैसले को मंजूर किया, जोश कहां, संकल्प कहां, खून की आखिरी बूंद गिरा देने का उत्साह कहां। हम खेले और जाहिरा दिल लगाकर खेले। मगर यह सच्चाई के लिए जान देनेवालों की फौज न थी। खेल में किसी का दिल न था। मैं स्टेशन पर खड़ा अपना तीसरे दर्जे का टिकट लेने की फिक्र में था कि एक युवती ने जो अभी कार […]
भीत-सी आंखों वाली उस दुर्बल, छोटी और अपने-आप ही सिमटी-सी बालिका पर दृष्टि डाल कर मैंने सामने बैठे सज्जन को, उनका भरा हुआ प्रवेशपत्र लौटाते हुए कहा- ‘आपने आयु ठीक नहीं भरी है। ठीक कर दीजिए, नहीं तो पीछे कठिनाई पड़ेगी।’ ‘नहीं, यह तो गत आषाढ़ में चौदह की हो चुकी’ सुनकर मैंने कुछ विस्मित भाव से अपनी उस भावी विद्यार्थिनी को अच्छी तरह देखा, जो नौ वर्षीय बालिका की सरल चंचलता से शून्य थी और चौदह वर्षीय किशोरी के सलज्ज उत्साह से अपरिचित। उसकी माता के संबंध में मेरी जिज्ञासा स्वगत न रहकर स्पष्ट प्रश्न ही बन गयी होगी, क्योंकि दूसरी ओर से कुछ कुंठित उत्तर मिला- ‘मेरी दूसरी पत्नी है, और आप तो जानती ही होंगी…’ और उनके वाक्य को अधसुना ही छोड़कर मेरा मन स्मृतियों की चित्रशाला में दो युगों से अधिक समय की भूल के नीचे दबे बिंदा या विन्ध्येश्वरी के धुंधले चित्र पर उँगली रखकर […]
नानी बिल्कुल अनपढ़। अस्सी के ऊपर आयु होगी, लेकिन अँग्रेजी के कुछ शब्द उसे आते हैं—जैसे कि रिफ्यूजी, जिसे वह रफूजी बोलती है। कुछ शब्द इतिहास की उपज होते हैं, जो प्रतिदिन की जिन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। ये शब्द राजा अथवा रानी की देन होते हैं। अँग्रेज़ जाते-जाते बँटवारा करा गये और विरासत में एक शब्द दे गये—रिफ्यूजी। जैसा कुछ वर्ष पहले हमारी महारानी मरी और विरासत में एक शब्द दे गयी—उग्रवादी। सारा कस्बा उसे नानी कहकर बुलाता है। शायद परिवार के सदस्यों के अलावा किसी को भी असली नाम मालूम या याद नहीं। जिस्म के सारे हिस्से जिस्म का साथ छोड़ चुके हैं सिवा आवाज़ के। फटे ढोल की तरह की आवाज़—एकदम कानफाड़ और ऊँची। बेटे तो बँटवारे की भेंट चढ़ गये, एक लडक़ी बची थी, इसलिए कि विभाजन से पहले वह जालन्धर में ब्याही गयी। अब यह भी नहीं। उसके बेटे, अपने दोहते के साथ नानी […]
खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी. दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी. शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे और ‘श्रीराम, श्रीराम’ करती पानी में हो ली. अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनीदी आंखों पर छींटे दिये और पानी से लिपट गयी! चनाब का पानी आज भी पहले-सा ही सर्द था, लहरें लहरों को चूम रही थीं. वह दूर सामने काश्मीर की पहाड़ियों से बंर्फ पिघल रही थी. उछल-उछल आते पानी के भंवरों से टकराकर कगारे गिर रहे थे, लेकिन दूर-दूर तक बिछी रेत आज न जाने क्यों खामोश लगती थी! शाहनी ने कपड़े पहने, इधर-उधर देखा, कहीं किसी की परछाई तक न थी. पर नीचे रेत में अगणित पांवों के निशान थे. वह कुछ सहम-सी उठी! आज इस प्रभात की मीठी नीरवता में न जाने क्यों कुछ भयावना-सा लग […]
गाड़ी ने लाहौर का स्टेशन छोड़ा तो एकबारगी मेरा मन काँप उठा। अब हम लोग उस ओर जा रहे थे जहाँ चौदह साल पहले आग लगी थी। जिसमें लाखों जल गये थे, और लाखों पर जलने के निशान आज तक बने हुए थे। मुझे लगा हमारी गाड़ी किसी गहरी, लम्बी अन्धकारमय गुफा में घुस रही है। और हम अपना सब-कुछ इस अन्धकार को सौंप दे रहे हैं। हम सब लगभग तीन सौ यात्री थे। स्त्रियों और बच्चों की भी संख्या काफी थी। लाहौर में हमने सभी गुरुद्वारों के दर्शन किये। वहाँ हमें जैसा स्वागत मिला,उससे आगे अब पंजासाहिब की यात्रा में किसी प्रकार का अनिष्ट घट सकता है, ऐसी सम्भावना तो नहीं थी, परन्तु मनुष्य के अन्दर का पशु कब जागकर सभी सम्भावनाओं को डकार जाएगा, कौन जानता है? यही सब सोचते-सोचते मैंने मां की ओर देखा, हथेली पर मुंह टिकाये, कोहनी को खिड़की का सहारा दिये वे निरन्तर बाहर […]
बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय। मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और दिन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी ) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दू सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…