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ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया,
ढीली अपनी कोमल काया,
नील नयन से ढुलकाती हो-
ताराओं की पाँति घनी रे ।

जिस गम्भीर मधुर छाया में,
विश्वचित्र-पट चल माया में,
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई-
दुख-सुख बाली सत्य बनी रे ।
श्रम-विश्राम क्षितिज-वेला से
जहाँ सृजन करते मेला से,
अमर जागरण उषा नयन से-
बिखराती हो ज्योति घनी रे !

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जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद

जन्म:30 जनवरी 1889, वाराणसी, मृत्यु: नवम्बर 15, 1937 काव्य: कामायनी, लहर, झरना, आँसू उपन्यास: कंकाल, तितली कहानी: इंद्रजाल, प्रतिध्वनि नाटक: चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त
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