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अध्याय १ : गंगा जी की धारा

अगर आकाश की शोभा देखना चाहते हो तो शरद ऋतु में देखो, अगर चन्द्रमा की शोभा देखना चाहते हो तो शरद ऋतु में देखो, अगर खेतों की शोभा देखना चाहते हो तो शरद ऋतु में देखो, अगर सब शोभा एक साथ देखना चाहते हो तो शरद ऋतु में देखो। आकाश में चन्द्रमा की खिलखिलाहट, तालाब में कमल की खिलखिलाहट, खेतों में धान की हरियाली, घर में नवरात्र की धूम, शरद ऋतु में सभी सुन्दर, सभी मनोहर हैं। इसी मनोहर समय दुर्गा पूजा की छुट्टी पाकर मुंशी हरप्रकाश लाल नाव से घर आ रहे थे। वे दानापुर के एक जमींदार के मुलाजिम थे। सूर्य डूब गया है, नीले आकाश में जहाँ-तहां दो-एक बड़े-बड़े बादल सुमेरु पर्वत की तरह खड़े हैं। चौथ के चन्द्रमा दिखाई दे रहे हैं परन्तु अभी तक उनकी चांदनी नहीं खिली है, इसी समय मल्लाहों ने डांड़ हाथ में लिए। गंगा की उलटी धार में नाव धीरे-धीरे चलने लगी। मुंशी हरप्रकाश लाल, उनके बहनोई हरिहर प्रसाद, मित्र लक्ष्मी प्रसाद और पुजारी खेलावन पांडे नाव में भीतर बैठकर ताश खेल रहे थे। कौन जीता और कौन हारा सो मालूम नहीं। शाम होने पर उन्होंने खेल उठा दिया। खेलावन पांडे और लक्ष्मी प्रसाद बाहर आकर नाव के किनारे बैठकर गंगाजल से संध्या करने लगे। हरिहर ने सुमिरनी की झोली में हाथ डाली और मुंशी जी एक भजन गाने लगे –

‘रे मन, हरी भज, हरी भज!’

जगत जाल में भूल न फंसना, कपट मोह माया मद छलताज।

दृढ विश्वास आस हरी पद कर, दयाशील संतोष साज सज।।

जा पड़ राज सो तरी अहल्या, ह्रदय तिलक धारण कर सो राज।

नाव धीरे-धीरे भागीरथी के दक्षिण किनारे पर एक गाँव के पास पहुंची तो मुंशी जी ने गीत बंद किया। उनका सुख-स्वप्न टूट गया, उन्होंने पूछा – “यह कौन गाँव है मांझी?”

मांझी –“जी सरकार, ए गाँव के नाव भोजपुर बोलेला।”

मुंशी जी – “ठोरा यहाँ से कितनी दूर है?”

“जी सरकार। नियरे”- यह कहकर पतवार मोड़ते हुए कर्णधार ने डाँड़ खेनेवालों से कहा – “वाह रे भाई। अब पहुंचे और दो हाथ कसके।”

एक डाँड़ी ने बिगड़कर कहा – “हूँ हमरे के सरकार का सिखावतानी। खेवत-खेवत जीव जात बा अब केतना खेवल जाला।”

सरदार – ‘अरे भैया नाराज मति हो। इ भोजपुर बलियाक सीधान ना होइत त काहे के कहतीं।”

इस बात से हरिहर प्रसाद चौंक पड़े, झोली-झ्क्कर भूल गए। झूठ-मुठ खांसकर बोले – “क्यों रे। यह क्या बात कहता है? यहाँ कुछ डर है क्या?”

सरदार के जवाब देने से पहले ही दूसरा डाँड़ी बोल उठा – “डर नाहीं? नीके-नीके एहिजा से निबहि जाइत तो तिनकौड़ीया पीर के सिरनी चढ़ाइब।”

मुंशी –“ठोरा पर नाव जरूर लगानी होगी।”

सरदार –“अरे बाप रे। सरकार का कहला?”

इतने में दोनों डाँड़ी चिल्ला उठे –“हमनी से इ ना सपरी, सरकार साहब का खातिर हमनी का जान देई?”

मुंशी जी –“तुम क्या कहते हो? मुझे यहाँ बहुत जरूरी काम है, ठोरा पर उतरना ही होगा।”

हरिहर प्रसाद ने कुछ नाराजी और कुछ दिल्लगी से कहा –“अरे जोड़ू के भाई, जान बड़ी है या जनाना? आज न सही, सप्तमी को वह चाँद का मुखड़ा देख लेना। इतनी उतावली करके जान देगा?”

मुंशी जी (कुछ बिगड़कर) –“तुम क्या कहते हो? मैं उन लोगों को चिट्ठी लिख चुका हूँ। मुझे जाना ही पड़ेगा। मांझी नाव किनारे लगाओ।”

मल्लाह ने नाव किनारे लगाकर कहा –“सरकार। गरीब के बात बासी भइला पर मीठ लगेला। चेत करीं, पीछे पछताइबि।”

नाव ठोरे पर आ लगी। मुंशी जी – “ओ ओ जी दलीप सिंह” – किनारे कूद पड़े। दलीप सिंह अपनी लाठी और मुंशी जी का सन्दूकचा लेकर उनके पीछे-पीछे चले और सब सामान नाव ही पर रहा।

मुंशी जी ने किनारे उतरकर बहनोई से कहा – “लाला जी। अगर आपको बहुत ही डर लगता हो तो आज चौसा जाकर ठहरिये; कल सबेरे फिर यहाँ आकर इंतजारी कीजियेगा।”

हरि. – “हमलोग तो आवेंगे परन्तु तुम्हारे दर्शन मिलेंगे?”

मुं. –“क्या? मेरी ससुराल यहाँ से बहुत दूर नहीं है। यहाँ न मुलाक़ात हो तो वहां होगी। वहां चलिए न?”

हरि. – “यहाँ इस वक़्त हम पांच-सात आदमी पहुंचेंगे तो तुम्हारे ससुर बहुत तड़फड़ा जायेंगे और नाव का सामान किसके सुपुर्द करें, हमलोग आज चौसे में ही जाकर रहेंगे। अब तुम जाओ, भगवान् रामचंद्र तुम्हारी रक्षा करें।”

“सरकार। अब हमनी का देरी नाही करब जा।” – कहकर मल्लाह ने नाव ठेल दी। देखते-ही-देखते नाव बीच गंगा में जा पहुंची और पहले की तरह धीरे-धीरे जाने लगी। डाँड़ी जी-जान से डाँड़ खेने लगे।

(भारत में जासूसी उपन्यासों के जनक गोपाल राम गहमरी द्वारा रचित उपन्यास ‘भोजपुर की ठगी’ का पहला अध्याय, आप सभी के पठन-पाठन के लिए प्रस्तुत है| इंदौर, मध्य प्रदेश के श्री आर.एस. तिवारी जी का हम शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने हमारे साथ इस पुस्तक को साझा किया ताकि गोपाल राम गहमरी जी की इस रचना को पाठक वर्ग एवं लेखक वर्ग तक पहुंचा सकें|)

अध्याय २ : पंछी का बाग़

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भोजपुर की ठगी : अध्याय १ : गंगा जी की धारा

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