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अब हम थोड़ा-सा हाल तारा का लिखते हैं, जिसे इस उपन्यास के पहले ही बयान में छोड़ आये हैं। तारा बिल्कुल ही बेबस हो चुकी थी, उसे अपनी जिन्दगी की कुछ भी उम्मीद न रही थी। उसका बाप सुजनसिंह उसकी छाती पर बैठा जान लेने को तैयार था और तारा भी यह सुनकर कि उसका पति बीरसिंह अब जीता न बचेगा, मरने के लिए तैयार थी, मगर उसकी मौत अभी दूर थी। यकायक दो आदमी वहाँ जा पहुँचे, जिन्होंने पीछे से जाकर सुजनसिंह को तारा की छाती पर से खेंच लिया। सुजनसिंह लड़ने के लिए मुस्तैद हो गया और उसने वह हर्बा, जो तारा की जान लेने के लिए हाथ में लिए हुए था, एक आदमी पर चलाया।

उस आदमी ने भी हर्बे का जवाब खंजर से दिया और दोनों में लड़ाई होने लगी। इतने ही में दूसरे आदमी ने तारा को गोद में उठा लिया और लड़ते हुए अपने साथी से विचित्र भाषा में कुछ कह कर बाग के बाहर का रास्ता लिया। इस कशमकश में बेचारी तारा डर के मारे एक दफे चिल्ला कर बेहोश हो गई और उसे तनबदन की सुध न रही। जब उसकी आँख खुली, उसने अपने को एक साधारण कुटी में पाया, सामने मन्द-मन्द धूनी जल रही थी और उसके आगे सिर से पैर तक भस्म लगाये बड़ी-बड़ी जटा और लंबी दाढ़ी में गिरह लगाये एक साधु बैठा था, जो एकटक तारा की तरफ देख रहा था। उस साधु की पहली आवाज जो तारा के कान में पहुँची, यह थी, “बेटी तारा, तू डर मत, अपने को संभाल और होशहवास दुरुस्त कर।”

यह आवाज ऐसी नम और ढाढ़स देने वाली थी कि तारा का अभी तक धड़कने वाला कलेजा ठहर गया और वह अपने को संभाल कर उठ बैठी।

साधु : तारा, क्या सचमुच तेरा नाम तारा ही है या मुझे धोखा हुआ?

तारा : (हाथ जोड़कर) जी हाँ, मेरा नाम तारा ही है।

साधु ने अपनी झोंपडी के कोने में से बड़े-बड़े दो आम निकाले और तारा के हाथ में देकर कहा, “पहिले तू इन्हें खा, फिर बात-चीत होगी।”

तारा का जी बहुत ही बेचैन था, तरह-तरह के खयालों ने उसे अपने आपे से बाहर कर दिया था, और इस विचार ने कि उसके पति बीरसिंह पर जरूर कोई आफत आई होगी, उसे अधमूआ कर दिया था। वह सोच रही थी कि अगर मैं अपने बाप के हाथ से सार डाली गई होती तो अच्छा था, क्योंकि इन सब बखेड़ों से और अपने पति के बारे में बुरी खबरों के सुनने से तो बचती। तारा ने आम खाने से इन्कार किया, मगर साधु महाशय के बहुत जिद करने और समझाने से लाचार हुई और आम खाना ही पड़ा। हाथ धोने के लिए जब वह कुटी के बाहर निकली, तब उसे मालूम हुआ कि यह कुटी एक नदी के किनारे पर बनी हुई है और चारों तरफ जहाँ तक निगाह काम करती है, मैदान और सन्नाटा ही दिखाई पड़ता है। समय दोपहर का था, बल्कि धूप कुछ ढल चुकी थी जब तारा हाथ-मुँह धोकर बैठी और यों बात-चीत होने लगी :

साधु : हाँ तारा, अब मैं उम्मीद करता हूँ कि तू अपना सच्चा-सच्चा हाल मुझसे कहेगी।

तारा : बेशक, मैं आपसे जो कुछ कहूँगी, सच कहूँगी, क्योंकि मुझे आपसे अपनी भलाई की बहुत-कुछ उम्मीद होती है।

साधु : मेरे सामने अग्नि जल रही है, मैं इसे साक्षी देकर कहता हूँ कि तू मुझसे सिवाय भलाई के बुराई की उम्मीद जरा भी मत रख। हाँ, अब कह, तू कौन है और तुझ पर क्या आफत आई है?

तारा : मैं राजा करनसिंह के खजांची सुजनसिंह की लड़की हूँ।

साधु : वही लड़की जिसकी शादी बीरसिंह के साथ हुई है?

तारा : जी हाँ।

साधु : तेरा बाप है तो क्या हुआ मगर मैं यह कहने से बाज न आऊँगा कि सुजनसिंह बड़ा ही बेईमान नमकहराम और खुदगर्ज आदमी है। साथ ही इससे बीरसिंह की वीरता, लायकी और रिआया-पर्वरी मुझसे अपनी तारीफ कराये बिना नहीं रहती। बीरसिंह बड़ा ही धर्मात्मा और साहसी है। हाँ तारा, जब तू सुजनसिंह की लड़की है, तो जरूर राजा के यहाँ भी आती-जाती होगी?

तारा : जी हाँ, पहिले तो मैं महीनों राजा ही के यहाँ रहा करती थी, मगर अब नहीं। अब तो राजा और पिता दोनों ही के यहाँ का आना-जाना बन्द हो गया।

साधु : सो क्यों?

तारा : क्योंकि दोनों मेरी जान के ग्राहक हो गए!

साधु : खैर, दोनों जगह का आना-जाता बन्द होने का सबब पीछे सुनूँगा, पहिले बता कि तेरा पिता सुजनसिंह ‘कटोरा भर खून’ के नाम से क्यों डरता और काँपता है ? इसमें क्या भेद है?

तारा : (काँप कर) ओफ्! याद करके कलेजा काँपता है, वह बड़ा ही भयानक दृश्य था ! खैर, मैं कहूँगी, मगर यह बड़ी ही नाजुक बात है।

साधु : मैं कसम खाकर कह चुका कि तू मुझसे सिवाय भलाई के बुराई की उम्मीद कभी मत रख, फिर क्या डरती है?

तारा : मैं कहूँगी ओर जरूर कहूँगी, मेरा दिल गवाही देता है कि आप मेरे खैरख्वाह हैं, न-मालूम क्यों मुझे आपके चरणों में मुहब्बत होती है।

तारा के ऐसा कहने से साधु की आँखें डबडबा आईं, उसने धूनी में से थोड़ी-सी राख उठा कर अपनी आँखों पर मली और इस तरकीब से आँसू सुखा कर बोला :

साधु : खैर, तारा, यह तो ईश्वर की कृपा है। हाँ, तू वह भेद कह, मेरा जी उसे सुनने के लिए बेचैन है।

तारा : मगर इसके साथ मुझे अपना भी बहुत-सा किस्सा कहना पड़ेगा!

साधु : कोई हर्ज नहीं, मैं सब-कुछ सुनने के लिए तैयार हूँ।

तारा : अच्छा तो मैं कहती हूँ, सुनिए। मैं लड़कपन से राजा के यहाँ आती-जाती थी और कई-कई दिनों तक वहाँ रहा करती थी। महल में एक और लड़की भी रहा करती, जिसका नाम अहिल्या था। उसकी उम्र मुझसे बहुत ज्यादा थी, मगर तो भी मैं उससे मुहब्बत करती थी और वह भी मुझे दिल से चाहती और प्यार करती थीं। मुझे यह न मालूम हुआ कि अहिल्या के माता-पिता कौन और कहाँ हैं और उसका कोई रिश्तेदार है या नहीं। मैंने कई दफे अहिल्या से पूछा कि तेरे माता-पिता कौन और कहाँ हैं, मगर इसके जवाब में उसने केवल आँसू गिरा दिया और मुँह से कुछ न कहा। मेरी और बीरसिंह की जान-पहचान लड़कपन ही से थी। वह महल में बराबर राजा के साथ आया करते थे, अक्सर अहिल्या के पास भी जाकर कुछ देर बैठा करते थे और वह उन्हें भाई के समान मानती थी। मैं अहिल्या को बीबी कह कर पुकारती थी। अहिल्या और बीरसिंह दोनों ही को राजा माना करते थे, बल्कि अहिल्या ही के कहने से मेरी शादी बीरसिंह के साथ हुई।

साधु : अहिल्या का नाम अहिल्या ही था या कोई और नाम भी उसका था?

तारा : उसका कोई दूसरा नाम कभी सुनने में नहीं आया, मगर एक दिन एक भयानक घटता के समय मुझे मालूम हो गया कि उसका एक दूसरा नाम भी है।

साधु : वह क्या नाम है?

तारा : सो मैं आगे चल कर कहूँगी, अभी आप सुनते जाइये।

साधु : अच्छा, कहो।

तारा : महारानी ने राजा से कई दफे कहा कि अहिल्या बहुत बड़ी हो गई है, इसकी शादी कहीं कर देनी चाहिए, मगर राजा ने यह बात मंजूर न की। थोड़े दिन बाद राजा के बर्ताव से महारानी तथा और कई औरतों को मालूम हो गया कि अहिल्या के ऊपर राजा की बुरी निगाह पड़ती है और इसी सबब से वे उसकी शादी नहीं करते।

साधु : हरामजादा, पाजी, बेईमान कहीं का! हाँ तब क्या हुआ?

तारा : यह बात रानी को बहुत बुरी लगी और इसके सबब कई दफे राजा से झगड़ा भी हुआ, आखिर एक दिन राजा ने खुल्लमखुल्ला कह दिया कि अहिल्या की शादी कभी न की जायेगी।

साधु : अच्छा, तब क्या हुआ?

तारा : यह बात रानी को तीर के समान लगी और अहिल्या का चेहरा भी सूख गया और उसने डर के मारे राजा के सामने जाना बन्द कर दिया। तीन-चार दिन के बाद अहिल्या यकायक महल से गायब हो गई। राजा ने बहुत उधम मचाया, कई लौंडियों को मारा-पीटा, कितनों ही को महल से निकाल दिया, रानी से भी बोलना छोड़ दिया, मगर अहिल्या का पता न लगा।

साधु : क्या अभी तक अहिल्या का पता नहीं है?

तारा : आप सुने चलिये, मैं सब कुछ कहती हूँ। कई वर्ष के बाद एक दिन किसी लौंडी से चुपके-चुपके रानी को यह कहते मैंने सुन लिया कि ‘अब तो अहिल्या को दूसरा लड़का भी हुआ, पहिली लड़की तीन वर्ष की हो चुकी, ईश्वर करे उसका पति जीता रहे। सुनते हैं, बड़ा ही लायक है और अहिल्या को बहुत चाहता है।’

अहिल्या के सामने ही मेरी शादी बीरसिंह से हो चुकी थी और मैं अपने ससुराल में रहने लग गई थी। अहिल्या के गायब होने का रंज मुझे और बीरसिंह को भी हुआ था और इसी से मैंने महल में आना-जाना बहुत कम कर दिया था, मगर जिस दिन रानी की जुबानी ऊपर वाली बात सुनी, मुझे एक तरह की खुशी हुई। मैंने यह हाल बीरसिंह से कहा, वह भी सुनकर बहुत खुश हुए और समझ गये कि रानी ने उसे कहीं भेजवा कर उसकी शादी करा दी थी। उसके बाद यह भेद भी खुल गया कि रानी ने उसे अपने नैहर भेज दिया था।

साधु : तुम्हारे ससुराल में कौन-कौन है?

तारा : नाम ही को ससुराल है, असल में मेरा सच्चा रिश्तेदार वहाँ कोई भी नहीं, हाँ, पाँच-सात मर्द और औरतें हैं, हमारे पति उनमें से किसी को चाचा, किसी को मौसा, किसी को चाची इत्यादि कह के पुकारा करते हैं। असल में उनका कोई भी नहीं है। उनके माँ-बाप उनके लड़कपन ही में मर गए थे और राजा ने उन्हें पाला था। राजा उन्हें बहुत मानते थे, मगर फिर भी वे कहा करते थे कि राजा बड़ा ही बेईमान है, एक-न-एक दिन हमसे और उससे बेतरह बिगड़ेगी।

साधु : खैर, तब क्या हुआ?

तारा: बहुत दिन बीत जाने पर एक दिन रानी ने मिलने के लिए मुझे महल में बुलाया। मैं गई और तीन-चार दिन तक वहाँ रही। इसी बीच में एक दिन रात को मैं महल में लेटी हुई थी, मेरा पलंग रानी की मसहरी के पास ही बिछा हुआ था, इधर-उधर कई लौंडियाँ भी सोई हुई थीं, रानी भी नींद में थीं, मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी। यकायक यह आवाज मेरे कान में पड़ी–“हाय, आखिर बेचारी अहिल्या फँस ही गई। चलो दीवानखाने के ऊपर वाले छेद से झाँक कर देखें कि किस तरह बेचारी की जान ली जाती है, फिर आकर रानी को उठावें?

इस आवाज को सुनते ही मैं चौंक पड़ी, कलेजा धकधक करने लगा। बेताबी ने मुझे किसी तरह दम न लेने दिया। मैं चारपाई पर से उठ बैठी और कुछ सोच-विचार कर ऊपर की छत पर चली गई और धीरे-धीरे उस पाटन की तरफ चली जो दीवानखाने की छत से मिली हुई थी। कमर-भर ऊँची दीवार फाँद कर वहाँ पहुँची। वहाँ छोटे-छोटे कई सूराख ऐसे थे, जिनमें से झाँक कर देखने से दीवानखाने की कुल कैफियत मालूम हो सकती थी। मेरे जाने के पहिले ही दो औरतें वहाँ पहुँची हुई थीं।

साधु: वे दोनों कौन थीं?

तारा: दोनों रानी साहिबा की लौंडियाँ थीं, मुझे देखते ही मेरे पास पहुँचीं और हाथ जोड़ कर बोलीं—“ईश्वर के वास्ते आप कोई ऐसा काम न करें, जिसमें हम लोगों की और आपकी भी जान जाये। अगर राजा जान जायेगा या किसी ने देख लिया तो बिना जान से मारे न छोड़ेगा!” इसके जवाब में मैंने कहा—“तुम खातिर जमा रक्खो, किसी को कुछ भी खबर न होगी।”

यह दीवानखाना पुराना था, जब से राजा ने अपने लिए दूसरा दीवानखाना बनवाया, तब से वर्षों हुए यह खाली ही पड़ा रहता था, इसमें कभी चिराग भी नहीं जलता था। लोगों का खयाल था कि इसमें भूत-प्रेत रहते हैं, इसलिए कोई उस तरफ जाता भी न था। मैंने सूराख में से झाँक कर देखा, सामने ही बेचारी अहिल्या सिर झुकाए बैठी आँसू गिरा रही थी, एक तरफ कोने में पाँच-चार कुदाल जमीन खोदने वाले पड़े थे। दूसरी तरफ मिट्टी के बीस-पच्चीस घड़े जल से भरे पड़े हुए थे। अहिल्या के सामने राजा खड़ा उसी की तरफ देख रहा था, राजा के पीछे मेरा बाप सुजनसिंह, रामदास और हरीसिंह राजा के मुसाहब खड़े थे। मेरे बाप की गोद में एक लड़की थी, जिसकी उम्र लगभग तीन वर्ष की होगी। हाय, उसकी सूरत याद पड़ने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं! उसकी सूरत किसी तरह भुलाये नहीं भूलती। राजा ने अहिल्या से कहा–“सुन्दरी, तू मेरी बात न मानेगी? तू मेरी होकर न रहेगी?”

साधु : क्या नाम लिया, सुन्दरी!

तारा : जी हाँ, सुन्दरी। उसी समय मुझे मालूम हुआ कि उसका नाम सुन्दरी भी है।

साधु : हाय, अच्छा तब क्या हुआ?

तारा : सुन्दरी ने सिर हिला कर इनकार किया।

साधु : तब?

तारा : राजा ने कहा, “सुन्दरी, अगर तू मेरी बात न मानेगी तो पछताएगी। मैं जबरदस्ती तुझे अपने कब्जे में करके अपनी ख्वाहिश पूरी कर सकता हूँ, मगर मैं चाहता हूँ कि एक दिन के लिए क्या हमेशा के लिए तू मेरी हो जा। अगर तेरी इच्छा है तो तेरे लिए रानी को भी मार डालने को मैं तैयार हूँ और तुझे अपनी रानी बना सकता हूँ!” इसके जवाब में सुन्दरी ने कहा, “अरे दुष्ट, तू बेहूदी बातें क्यों बकता है, अगर तू साक्षात् इन्द्र भी बन के आवे तो मेरे दिल को नहीं फेर सकता!”

साधु : शाबाश, अच्छा तब क्या हुआ?

तारा : राजा ने मेरे पिता की तरफ कुछ इशारा किया, उसने लड़की को जिसे वह गोद में लिए हुए था, चादर से बाँध खूँटों के साथ उलटा लटका दिया और खंजर निकाल सामने जा खड़ा हुआ। लड़की बेचारी चिल्लाने लगी और सुन्दरी की आँखों से भी आँसू की धारा बह चली। राजा ने फिर पुकार कर कहा, सुन्दरी, अब भी मान जा! नहीं तो तेरी इसी लड़की के खून से तुझे नहलाऊँगा।

“हाय, क्या मैं अपने पति के साथ दगा करूँ और उसकी होकर दूसरे की बनूँ? यह कभी नहीं हो सकता!!”

राजा ने हरीसिंह और मेरे पिता की तरफ कुछ इशारा किया। हरी सिंह ने एक कटोरा लड़की के नीचे रख दिया, मेरे पिता ने खंजर से लड़की का काम तमाम करना चाहा मगर न-मालूम कहाँ से उसके दिल में दया का संचार हुआ कि खंजर उसके हाथ से गिर पड़ा। राजा को उसकी यह अवस्था देख क्रोध चढ़ आया, तलवार खेंच कर मेरे पिता के पास जा पहुँचा और बोला, “हरामजादे! क्या मेरी बात तू नहीं सुनता! खबरदार, होशियार हो जा, इस लड़की का खून इस कटोरे में भर कर मुझे दे, मैं जबरदस्ती हरामजादी को पिलाऊँगा!!”

लाचार मेरे बाप ने फिर खंजर उठा लिया और उसका दस्ता (कब्जा) इस जोर से बेचारी चिल्लाती हुई लड़की के सर में मारा कि सर फूट की तरह फट गया और खून का तरारा बहने लगा। यह हाल देख बेचारी सुन्दरी चिल्लाई और “हाय” करके बेहोश हो गई। मेरे भी हवास जाते रहे और मैं भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी। घण्टे-भर के बाद जब मुझे होश आया, मैं उठी और उसी सूराख की राह झाँक कर देखने लगी, मगर इस वक्त दूसरा ही समाँ नजर पड़ा। उस दीवानखाने में न तो सुन्दरी थी और न वह लटकती हुई लड़की ही। उसके बदले दूसरे दो आदमियों की लाश पड़ी हुई थी। राजा और उसके साथी जो-जो बातें करते थे साफ सुनाई देती थीं। राजा ने मेरे बाप की तरफ देख कर कहा, “ये दोनों हरामजादी लौंडियाँ छत पर चढ़ कर मेरी कारवाई देख रही थीं! इन्हें अपनी जान का कुछ भी खौफ न था! (हरीसिंह की तरफ देख कर) हरी, इन दोनों की लाश ऐसी जगह पहुँचाओ कि हजारों वर्ष बीत जाने पर भी किसी को इनके हाल की खबर न हो। (मेरे बाप की तरफ देख कर) तेंने बहुत बुरा किया जो तारा को छोड़ दिया, बेशक, अब वह भाग गई होगी, लेकिन तेरी जान तभी बचेगी जब तारा का सर मेरे सामने लाकर हाजिर करेगा, वह भी ऐसे ढब से कि किसी को कानोंकान खबर न हो कि तारा कहाँ गई और क्या हुई। बेशक, तारा यह हाल बीरसिंह से भी कहेगी, मुझे लाजिम है कि जहाँ तक जल्द हो सके बीरसिंह को भी इस दुनिया से उठा दूँ!”

यह सुनते ही मेरा कलेजा काँप उठा और यह सोचती हुई कि मैं अभी जाकर अपने पति को इस हाल की खबर करूँगी, जिससे वे अपनी जान बचा सकें, वहाँ से भागी और महल से एक लौंडी को साथ ले तुरन्त अपने घर चली आई।

साधु महाशय तारा के मुँह से इस किस्से को सुन कर काँप गए और देर तक गौर में पड़े रहने के बाद बोले, “यह राजा बड़ा ही दुष्ट और दगाबाज है, लेकिन ईश्वर चाहेगा तो बहुत जल्द अपने कर्मों का फल भोगेगा!!”

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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