देवसेना का गीत जयशंकर प्रसाद के नाटक स्कंदगुप्त से लिया गया है। काव्यांश आह! वेदना मिली विदाई! मैंने भ्रम-वश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई। छलछल थे संध्या के श्रमकण, आँसू-से गिरते थे […]
यूं तो खुशियाँ उभर रही थीं हसरत में, मगर गमों के अक्स बन गए उल्फत में। राह चाह की, आह तलक ही जाती है, अक्सर ऐसा क्यूँ होता है चाहत में। अहसासों में कब तक दर्द छुपे रहते, नज़र आ गए सभी ग़ज़ल की रंगत में। मन्नत है उनकी आँखों में बस जाएँ, इससे बढ़कर […]
हां , एक फंदा बनाया है मैने, ये मजबूत है इतना जितना उद्विग्न मैं और जितनी अल्प मेरी जिजीविषा आंसू धुली आंखों से देख रहा हूं मैं ऐसा ही एक फंदा डोरी से बना, थोड़ा छोटा मां ने अंगुली में, इसे है रख लपेटा दूजा छोर इसका मेरे झूले से है बंधा मैं […]
रात देर तक जागना और देर रात जाग जाना बड़ा भयंकर अंतर है दोनों परिस्थितियों में, पहली में जहां आप अपनी मर्ज़ी से जाग रहे हैं और वक़्त बिता रहे हैं मनपसंद कामों में किसी फ़िल्म या किताब या किसी की बातों में डूबे सुनहले भविष्य का सपना बुनते ख़ुश – ख़ुश जाग रहे होते […]
मेरे पंख रंग-बिरंगे, थोड़े बेजान जरा खुले, जरा बंद जैसे मेरा मन मेरा मन थका सा, थोड़ा टूटा कसक से ठिठकता, परतों में जैसे मेरी हँसी मेरी हँसी जग को खिलखिलाती खुद में मायूस, मगर मुसकाती जैसे मेरे नयन मेरे नयन सब कुछ देख, सब कुछ नकारते इंकार करते, कभी स्वीकारते जैसे […]
मैं जब भी व्यक्त हुआ आधा ही हुआ उसमें भी अधूरा ही समझा गया उस अधूरे में भी कुछ ऐसा होता रहा शामिल जिसमें मैं नहीं दूसरे थे जब उतरा समझ में तो वह बिल्कुल वह नहीं था जो मैंने किया था व्यक्त इस तरह मैं अब तक रहा हूँ अव्यक्त।
डर गईं अमराइयां भी आम बौराए नहीं, ख़ूब सींचा बाग हमने फूल मुस्काए नहीं। यार को है प्यार केवल जंग से, हथियार से, मुहब्बत के रंग मेरे यार को भाए नहीं। मंज़िलों के वास्ते खुदगर्जियाँ हैं इस कदर , हमसफ़र को गिराने में दोस्त शर्माए नहीं । रोज सिमटी जा रही हैं उल्फतों की चादरें […]
सूरज की आंखों में ढीठ बनकर देखते मुद्राओं की गर्मी पर बाजरे की रोटी सेकते हम चाह लेते तो दोनों पलड़े बराबर कर तुम्हारी अनंत चाहतों से अपने सारे हक तौलते सिले हुए होंठ और कटी ज़ुबान से बोलते हम चाह लेते तो पोखरे के गंदले पानी में आसमानी सितारे घोलते!
सभ्यता के दूसरे छोर पर अपने पैरों से एक गोरा दबाए बैठा है एक काले की गर्दन और काला चिल्ला रहा है- ‘आई कांट ब्रीद-आई कांट ब्रीद’ सभ्यता के इस छोर पर जन्मना स्वघोषित श्रेष्ठ कुछ इस तरह से बुने बैठे हैं मायाजाल जिसमें फंसा है अधिकतर का गला बोला भी नहीं जाता उनसे बोलें […]