जब तक गाड़ी नहीं चली थी, बलराज जैसे नशे में था। यह शोरगुल से भरी दुनिया उसे एक निरर्थक तमाशे के समान जान पड़ती थी। प्रकृति उस दिन उग्र रूप धारण किए हुए थी। लाहौर का स्टेशन। रात के साढ़े नौ बजे। कराँची एक्सप्रेस जिस प्लेटफार्म पर खड़ा था, वहाँ हजारों मनुष्य जमा थे। […]
तीसरी कसम ….प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने जब रेणु की इस कहानी पर फिल्म बनाने का निश्चय किया तो हीरामन की भूमिका के लिए उनकी कल्पना में राज कपूर के सिवा कोई नाम नहीं था . मैं जितनी बार यह फिल्म देखता हूँ , मुझे लगता है कि जैसे कहानी लिखते वक्त रेणु जी की कल्पना […]
डायरी या आत्मालाप शैली में लिखी ‘यही सच है’ मन्नू भंडारी की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है . यह कहानी है दीपा की या यूं कहें कि उसके अंतर्द्वंद्व की . निशीथ से निराश दीपा संजय की बाहों में सहारा ढूंढती है. उसे लगता है कि वह निशीथ को भूल गयी है , […]
“बंदी!” ”क्या है? सोने दो।” ”मुक्त होना चाहते हो?” ”अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।” ”फिर अवसर न मिलेगा।” ”बडा शीत है, कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।” ”आंधी की संभावना है। यही एक अवसर है। आज मेरे बंधन शिथिल हैं।” ”तो क्या तुम भी बंदी हो?” ”हां, धीरे बोलो, […]
वह पचास वर्ष से ऊपर था। तब भी युवकों से अधिक बलिष्ठ और दृढ़ था। चमड़े पर झुर्रियाँ नहीं पड़ी थीं। वर्षा की झड़ी में, पूस की रातों की छाया में, कड़कती हुई जेठ की धूप में, नंगे शरीर घूमने में वह सुख मानता था। उसकी चढ़ी मूँछें बिच्छू के डंक की तरह, देखनेवालों की […]
बडे-बडे शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गये हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगायें। जब बडे़-बडे़ शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना […]