फणीश्वरनाथ रेणु

फणीश्वरनाथ रेणु

हिंदी साहित्य में आंचलिकता के पर्याय माने जाने वाले फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में हुआ था. स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए 'बहादुर सुराजी' की उपाधि पाई. बाद में समाजवाद और नेपाल के राजशाही विरोधी आंदोलन से भी जुड़े. 1954 में प्रकाशित रेणुजी के 'मैला आँचल' को हिंदी का पहला आँचलिक उपन्यास माना जाता है. वस्तुतः आँचलिकता का संपूर्ण विमर्श मैला आंचल के बाद ही प्रारंभ हुआ. ये और बात है कि बात में कई पूरवर्ती रचनाओं पर भी आँचलिकता की मुहर लगाई गयी. मैला आंचल के अतिरिक्त परती परिकथा, जुलूस, कितने चौराहे, पलटू बाबू रोड आदि उनके महत्वपूर्ण उपन्यास हैं. आदिम रात्रि की महक, ठेस, रसप्रिया, लाल पान की बेगम, मारे गए गुलफाम आदि उनकी कहानियाँ काफी चर्चित और प्रशंसित रही हैं. रेणु जी ने रिपोर्ताज भी खूब लिखे हैं. ऋणजल-धनजल उनके रिपोर्ताज का संकलन है.

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Gajanan raina

“रसप्रिया” कथा है प्रेम की।आज के फेसबुक या वाट्स अप वाले प्रेम की नहीं , किसी और तल के प्रेम की।क्षीणप्राय लोक कलाकार की एक चरवाहे किशोर से मुलाकात होती है।थोडी बातचीत के बाद पता चलता है कि वह किशोर उस कलाकार की युवावस्था में किन्हीं गलतफहमियों के कारण छूट गयी प्रेमिका का पुत्र है। अब यहाँ रेणु आसानी से इस किशोर को कलाकार का अंश दिखा सकते थे।लेकिन फिर यह कहानी रेणु की वगैरह वगैरह कहानियों में एक होती। कलाकार स्पष्ट देख रहा है कि किशोर के नैन नक्श जमींदार का अंश होने की चुगली खा रहे हैं। फिर… और पढ़ें »

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