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कहानियाँ मनोविश्लेषणवाद

प्लैनचेट -इलाचन्द्र जोशी

अनुमानित समय : 13 मिनट-

लाला शंकरदयाल अपने शहर के प्रसिद्ध वकील थे। उनकी पत्नी ब्रजेश्वरी की मृत्यु प्रायः चार मास पहले हुई थी। तब से वकील साहब के मन की दशा शोचनीय हो उठी थी। वह सब समय चिंताग्रस्त दिखाई देते थे और लोगों से मिलना-जुलना उन्होंने प्रायः छोड़ दिया था। जो कोई भी मुवक्किल उनके पास आता था, उसे वे टरका देते थे। अपने मित्रों के आगे भी उन्होंने ऐसी उदासीनता का रुख अख्तियार कर लिया था कि वे भी धीरे-धीरे उनसे दूर रहने की बात सोचने लगे थे। वह दिन-भर अपने मकान में बंद पड़े रहते और शाम को जब अच्छी तरह अँधेरा हो जाता तब एक-आध घंटे के लिए अकेले किसी निर्जन स्थान में टहलने के लिए बाहर निकलते। सब समय ज्ञात में या अज्ञात में वह केवल अपनी मृत पत्नी की ही बात सोचते रहते। सोचते-सोचते कभी-कभी वह ऐसे भाव-विह्वल हो उठते कि उनकी आँखों से बरबस टपाटप आँसू टपकने लगते। लाख कोशिश करने पर भी वह उन आँसुओं को रोक नहीं पाते। ऐसी मानसिक दशा में वह प्रायः दस-पंद्रह मिनट तक आँसू गिराते रहते। जब वह भावावेश अपने-आप समाप्त हो जाता तब उन्हें कुछ समय के लिए बहुत चैन मिलता।

       ऐसी बात नहीं थी कि वह अपने मन की उस असाधारण दशा के खतरों से परिचित न हों। वह भली-भांति जानते थे कि यदि उनके मन की वह एकांतप्रिय भावमग्न दशा कुछ समय तक और रही तो वह पागल तक हो सकते हैं, पर उस असाधारण मानसिक अवस्था से, आप चाहे उसे मोहाच्छन्नता कहें, चाहे भावमग्नता, छुटकारा पाने में वह अपने को एकदम असमर्थ पाते थे।

       आश्चर्य की बात सबसे अधिक यह थी कि जब तक उनकी पत्नी जीवित रही, तब तक कभी वह उसके संबंध की किसी भी बात को लेकर विशेष चिंतित नहीं रहे और उसके अस्तित्व के संबंध में भी एक प्रकार से उदासीन ही रहे। ब्रजेश्वरी की मृत्यु के पूर्व कुछ महीनों से वह उसका इलाज डॉक्टरों से करवा रहे थे। पर उन्हें यह विश्वास हो गया था कि कैंसर के जिस असाध्य रोग ने उसे पकड़ लिया है, उससे वह बच नहीं सकती और जल्दी ही ऐसा दिन आने वाला है, जब वह इस संसार के समस्त बंधनों से संबंध तोड़ कर किसी अदृश्य लोक में चली जाएगी। यह सब जानने पर भी उनके मन में इस बात को लेकर कोई आतंकजनक प्रतिक्रिया नहीं हुई।

      पर पत्नी की मृत्यु के बाद वकील साहब को जैसे अकस्मात् उसकी प्रेतात्मा ने धर दबाया हो! वह प्रेतात्मा सब समय जैसे उनके पीछे-पीछे चलती-फिरती, जब वह साँस लेते थे तब जैसे उनके साथ वह भी साँस लेती थी, वह बैठते थे तो वह भी बैठती थी, वह उठते थे तो वह भी उठती थी, और वह सोते थे तो वह भी जैसे उनके सिरहाने पर बैठकर रात-भर सर्द आहें भरती हुई जागती रहती थी।

      वकील साहब आध्यात्मिक विषयों पर श्रद्धा रखते थे। वर्षों से वह प्राच्य और पाश्चात्य दर्शन से संबंध रखनेवाले ग्रंथों का अध्ययन बड़ी दिलचस्पी से करते आ रहे थे। वकालत से अवकाश आने पर यदि किसी विषय की चर्चा उन्हें प्रिय लगती थी तो वह था दर्शन और अध्यात्म तत्व। पर जब से ब्रजेश्वरी उनसे सदा के लिए बिछुड़ गई तब से उनकी दिलचस्पी प्रेतात्म विद्या की ओर बढ़ने लगी। वह दर्शन-वरशन सब भूल गए और इस बात में भी उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं रही कि जीवात्मा का परमात्मा से क्या संबंध है। अब वह एकमात्र इस चिंता में मग्न रहने लगे कि परलोकगत आत्माओं से वार्तालाप किस उपाय से किया जा सकता है। इस बात पर उनका विश्वास दिन-प्रतिदिन दृढ़ से दृढ़तर होता जाता था कि यदि किसी व्यक्ति में सच्ची धुन और पक्की लगन हो तो वह निश्चय ही किसी भी परलोकगत आत्मा को अपने पास बुला सकता है और उसके साथ जी खोलकर बातें कर सकता है। इधर कुछ समय से वाह रात-दिन प्रेतात्मा विद्या संबंधी पुस्तकों के अध्ययन में रत रहते थे और साथ ही विदेशों के प्रमुख प्रेतात्मवादियों से लिखापढ़ी करके इस विषय से संबंधित बहुत-सी गूढ़ और महत्वपूर्ण बातें जानने की चेष्टा में रहते थे।

      धीरे-धीरे इस विषय का ज्ञान उन्होंने इस हद तक बढ़ा लिया कि स्वयं अपने हाथ से स्मरण-शक्ति के आधार पर एक बिलकुल नए ढंग का ‘प्लैनचैट’ तैयार करने के काम में जुट गए। वकालत पास करने के पहले उन्होंने विश्वविद्यालय में विज्ञान बड़े मनोयोग से पढ़ा था और उसमें प्रथम श्रेणी में उतीर्ण हुए थे। प्लैनचैट को उन्होंने ऐसे तीव्र अनुभूतिशील वैद्युतिक और चुम्बकार्षणयुक्त पदार्थों से निर्मित किया जो सूक्ष्म से सूक्ष्म और हल्के से हल्के तड़ित-प्रवाह को आसानी से पकड़ सकते थे। कम से कम वकील साहब को ऐसा ही विश्वास था कि वह प्लैनचैट निश्चय ही अदृश्य प्रेतात्माओं के अति सूक्ष्म स्पंदनों को भी बहुत दूर से खींचकर अपने भीतर बाँध लेगा।

      वह उस प्लैनचैट को नित्य रात में सोने के समय अपने सिरहाने के पास तैयार अवस्था में रख देते थे। उन्हें यह विश्वास था कि उनकी पत्नी की जो परलोकगत आत्मा अदृश्य छायामय रूप में नित्य उनके पीछे-पीछे विचरण करती फिरती है, वह प्लैनचैट द्वारा निश्चय ही एक न एक दिन अपने परलोक प्रवास के जीवन पर प्रकाश डालेगी। दूसरे प्रकार के प्लैनचैट में परलोकगत आत्माओं को बुलाने के लिए जिस प्रकार सामूहिक रूप से टेबिल के ऊपर हाथ रखने की आवश्यकता पड़ती है, लाला शंकरदयाल के मत में उनके अपने हाथ से तैयार किये हुए उस विशेष प्लैनचैट में उस बात की कोई आवश्यकता न थी। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि उसे विद्युत और चुंबक तत्वों से इतना अधिक संवेदनशील, सतेज और प्राणवाही बना दिया गया था कि वह अपने आप बिना किसी हाथ की सहायता के प्रेतात्माओं को ग्रहण करके लिपिबद्ध कर लेगा, ऐसी वकील साहब की धारणा थी।

      वह नित्य उससे प्रयोग करते जाते थे। प्रतिदिन उसे अधिकाधिक अनुभूतिशील बनाने की चेष्टा में रहते थे और प्रतिदिन उसे अपने सिर के पास रखकर इस प्रत्याशा में सोने की तैयारी करते कि संभवतः उनकी पत्नी की प्रेतात्मा उसके माध्यम से अपना कुछ हाल उन्हें बता जाए। उनका यह खयाल था कि प्रेतात्माएँ व्यक्तियों के सोने के समय ही विशेष रूप से अपने को प्रकट करना पसंद करती हैं।

      वकील साहब बहुत दिनों तक बड़े अधैर्य से रात-रात-भर अर्द्धनिद्रावस्था में अपनी पत्नी की प्रेतात्मा का कोई संकेत पाने की प्रतीक्षा करते रहे, पर उनकी आशा पूरी नहीं हुई। अंत में एक दिन वह बड़ी निराश अवस्था में प्रायः बारह बजे रात के समय अपने पलंग पर सोने के इरादे से लेटे। उनकी आँखें कुछ झपने लगी थीं कि इतने में पास ही कहीं से सहसा किसी ने हारमोनियम बजाकर अपने मोठे गले से आलापबाजी शुरू कर दी, साथ ही पास ही कहीं से कीर्तन का एक सम्मिलित स्वर आकाश में गूँज उठा। उससे उनकी नींद उचट गई। वह तरह-तरह की चिंताओं में मग्न होकर लेटे ही थे कि कुछ समय बाद अचानक उन्हें सिरहाने पर रखे हुए प्लैनचैट में खसर-खसर-सी आवाज सुनाई दी। वह बड़े जोर से कान लगाकर सुनने लगे। यह आवाज स्पष्ट से स्पष्टतर होती जाती थी और उसका काम एक नियमित गति से चल रहा था। उनकी निगाह प्लैनचैट की ओर गई। अँधेरे में उन्होंने देखा कि सफेद चादर ओढ़े हुए एक छायामूर्ति, जो एक विचित्र प्रभामण्डल से आवृत थी और कद में उनकी स्वर्गीय पत्नी ब्रजेश्वरी के ही बराबर मालूम होती थी, वहाँ पर खड़ी प्लैनचैट के नीचे रखे हुए कागजों पर जल्दी-जल्दी कुछ लिख रही थी। वकील साहब के हर्ष का कुछ ठिकाना नहीं रहा। उनकी बहुत दिनों की आशा आज चरितार्थ होने जा रही थी। वह चुपचाप इस बात की प्रतीक्षा में लेटे रहे कि छायामूर्ति लिख चुकने के बाद वहाँ से हटे तो जाकर पढ़ें कि उसने क्या लिखा है।

        उन्हें ऐसा लगा कि काफी देर बाद वह छायामूर्ति वहाँ से विलीन हो गई। उसके अन्तर्धान होते ही वकील साहब पलंग पर से उठ खड़े हुए और प्लैनचैट के नीचे जो बहुत से कागज उन्होंने दबाकर रख छोड़े थे, उनमें प्रेतात्मा ने वास्तव में कुछ लिखा है या नहीं और अगर लिखा है तो क्या लिखा है, यह जानने के लिए वह बत्ती जलाने के उद्देश्य से दियासलाई खोजने लगे। वह दियासलाई खोज ही रहे थे कि अचानक उन्हें प्लैनचैट के नीचे के कागज की लिखावट उस अंधकार में रेडियम की घड़ी के अंकों की तरह स्वतः प्रकाश से जगमगाती हुई मालूम हुई। वह लपककर प्लैनचैट के पास गए और कागज के जिन टुकड़ों पर प्रेतात्मा ने अपना वक्तव्य लिखा था, उन्हें उठाकर बड़ी अधीरता से खड़े-खड़े पढ़ने लगे। प्रेतात्मा ने लिखा था:

       “मेरे मर्त्यलोक के भूतपूर्व पति महाशय, मुझे मालूम हो गया है कि आप मेरे मरने के बाद मेरे लिए किस कदर बेचैन हैं और मेरी चिंता में दिन पर दिन घुलते चले जाते हैं। आपकी बेचैनी मुझे बरबस प्रेतलोक से खींचकर आपके पास ले आई है। आप यह जानने के लिए स्वभावतः उत्सुक हैं कि मरने के बाद मैं किस लोक में हूँ और किस समाज के बीच में कैसा जीवन बिता रही हूँ।“

       “महाशय! हम लोगों का जीवन ही क्या हो सकता है, हम तो केवल अशरीरी छायाएँ हैं, किसी विगत जीवन की अनुभूतियों की स्मृतियों के सूक्ष्म संकेत-चिह्नों के अतिरिक्त हम और कुछ भी नहीं हैं। इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान में भी मृत्युलोक के भूतपूर्व निकट संबंधियों की तीव्र अनुभूतियों के विद्युत स्पंदन हम लोगों की अति-चेतना से आकर कभी-कभी टकरा जाते हैं, पर उनसे हमें न कोई विशेष सुख होता है न दुःख। कारण यह है कि अनुभूतियों की सुख-दुःखमयी चेतन शरीर के माध्यम से ही हो पाती है और हम हैं कोरी छाया-केवल छाया। पर विगत स्मृतियों की चेतना हमारे छाया-प्राणों में अभी तक कुछ-न-कुछ दोलन पैदा करती ही रहती है। इसलिए आज आपके आगे इस प्लैनचैट के माध्यम से मैं अपने मर्त्यलोक के जीवन की कुछ ऐसी स्मृतियों का उद्घाटन करना चाहती हूँ, जिन्हें मैंने मरते दम तक आपके आगे एकदम गुप्त रखा था और जिनका क्षीणतम आभास भी आपके सम्मुख प्रकट नहीं होने दिया था।“

       “आपके मन में मेरे मरने के बाद यह भ्रांत धारणा घर कर गई है कि आप मुझे आजीवन बहुत चाहते रहे हैं। पर वर्तमान की भ्रांति को झाड़कर यदि आप अपनी स्मृति को एक बार अच्छी तरह टटोलें और हम दोनों के विगत जीवन पर एक बार ध्यानपूर्वक विचार करें तो आपको याद आवेगा कि आप मेरे अत्यंत निकट रहने पर भी मुझसे कितनी दूर रहते थे ! पहले तो आपको कोर्ट के कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी और जो थोड़ा-बाहुत अवकाश मिलता भी था, उसे आप या तो अपने मित्रों के संग राजनीतिक या दार्शनिक चर्चा में बिता दिया करते थे या बड़े-बड़े ग्रंथों के अध्ययन में। मेरे साथ सुख-दुःख की बातें करने, मेरी अंतराकांक्षाओं से परिचित होने या मुझे किसी भी रूप में अपने जीवन की संगिनी के बतौर मानने की चिंता आपके मन में कभी उत्पन्न नहीं हुई। रात के समय कभी-कभी आप मुझसे मिल लेते थे, संदेह नहीं, पर आपका वह मिलन अपनी सहधर्मिणी, अपनी अर्द्धांगिनी, अपनी सहचरी के साथ न होकर अपनी अनुचरी, अपनी रखेली, अपनी भोगेच्छापूर्ति की साधन-रूपिणी एक काल्पनिक स्त्री के साथ होता था।“

       “मैं मानती हूँ, आप इस बात के लिए सदा प्रयत्नशील रहते थे कि मेरे लिए रुपये-पैसे, गहने-कपड़े, खान-पान आदि सुख-साधनों की कोई कमी न रहने पावे। पर क्या नारी की आत्मा के रीते कोठे को इन पार्थिव उपायों से तृप्त किया जा सकता है? मेरे मरते दम तक यह बात आपकी समझ में न आई कि आपके साथ मैं दुकेली होते हुए भी अकेली ही थी, सधवा होते हुए भी विधवा थी। आश्चर्य है, दुनिया भर के अच्छे-बुरे सभी प्रकार के लोगों की तरफ से आप वकालत करते थे, पर मेरी तरफ से अपने ही आगे वकालत करने की फुर्सत आपको कभी नहीं मिल पाई।“

       “आपको मालूम है, हमारे पड़ोस में एक कीर्तन-मंडली थी। घर में दिन-भर अकेलेपन के हाहाकार से घबराकर मैं प्रायः प्रतिदिन दोपहर के समय वहाँ जाया करती थी। वहाँ भक्त नारी-मंडली के साथ मैंने भगवान के चरणों में लौ लगानी शुरू कर दी। जिन भगवान ने अपनी किशोरलीला के अनगिनत रूप दिखा कर ब्रज में प्रेम की बाढ़ ला दी थी, उनकी आराधना में अपने सारे मन को, सारी आत्मा को डुबा देने की पूरी चेष्टा में मैं लग गई। आरंभ में कुछ समय तक मुझे ऐसा लगा कि मैं विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम के लोक में पहुँचकर भगवान के अत्यंत निकट जा पहुँची हूँ। लौकिक प्रेम के अभाव की पूर्ति अलौकिक प्रेम से होते देखकर भीतर ही भीतर मैं एक समुन्नत गर्व की भावना से फूली नहीं समाती थी। पर मेरे उस गर्व को चूर करने के लिए शीघ्र ही एक विघ्न आ खड़ा हुआ। ऊपरी नियम और संयम के नीचे मेरे भीतर जो दुर्बलता दबी पड़ी थी, उसके उधड़ने की नौबत आ गई।“

       “उस कीर्तन-मंडली के साथ एक संगीत-शाला जुड़ी हुई थी। वह भी दो भागों में बँटी हुई थी: गायिका समाज और दूसरा गायक समाज। साधारण अवसरों पर गायिका समाज की संगीत-शिक्षा दिन में होती थी और पुरुष-समाज की रात में। पर कुछ विशेष धार्मिक तिथि-त्योहारों के अवसरों पर पुरुष-स्त्रियाँ दोनों संगीत-शाला में साथ ही भाग लेते थे। दोनों के बीच में केवल पतली चिक का एक झीना-सा व्यवधान रहता था। जो महाशय पुरुष गायक-समाज के मुखिया थे, वह अधेड़ अवस्था के एक सीधे-सादे व्यक्तित्वहीन व्यक्ति थे। उन्होंने अकस्मात् किसी कारण से आना बंद कर दिया या वह बीमार पड़ गए थे, या शहर छोड़कर किसी दूसरे स्थान में चले गए थे। जो भी हो, उनके स्थान पर जिन नए महाशय ने पुरुष-मंडली का नेतृत्व ग्रहण किया, उनकी अवस्था तीस वर्ष से अधिक न रही होगी। वह देखने में अत्यंत स्वस्थ और सुंदर लगते थे और उनका व्यक्तित्व विशेष आकर्षणशील था। वह जाती के ब्राह्मण थे और उनका नाम राधामोहन शर्मा था। जब वह भावमग्न होकर अधमुँदी आँखों में मोहकता झलकाते हुए गाते थे तो देखने और सुननेवालों पर बड़ा असर पड़ने लगता। मैं भरसक उस आकर्षण का प्रतिरोध करने लगी और उनके व्यक्तित्व के प्रति उदासीन रहने का पूरा प्रयत्न करने लगी। पर मेरे सब प्रयत्नों का परिहास करते हुए उनकी मोहकता जैसे बरबस भूत की तरह दबाती चली जाती थी।“

      “आरंभ में मैंने अपने मन की इस अवस्था को एक साधारण-सी बात् समझकर उसे कोई महत्व ही नहीं देना चाहा। पर धीरे-धीरे मेरे अनजान में-या जान में- इस बात को लेकर मेरा मन अस्थिर होता चला गया और एक अनोखी बेचैनी मेरे भीतर समा गई जो एक क्षण के लिए भी मेरा साथ नहीं छोड़ना चाहती थी। मेरा संगीत-प्रेम एक दूसरे ही मनोभाव के रूप में बदल गया। जब मैं कीर्तन के समय या घर पर एकांत ध्यानावस्था के क्षणों में कृष्ण का ध्यान करने लगती तो उनकी सांवरी-सलोनी छवि मेरे मन की आँखों के आगे राधामोहन शर्मा के रूप में बदल जाती। मैं इस भाव को भयंकर पाप समझकर कितना ही छटपटाती, अपने चंचल मन के साथ भयंकर लड़ाई लड़ती, पर मेरे सब प्रयास निष्फल जाते। राधामोहन शर्मा किसी प्रकार मेरे मन से हटते ही न थे। मुझे ऐसा जान पड़ने लगा कि मैं इस तरह पागल हो जाऊँगी और इस प्रकार की कलुषित भावना को मन में पोषित करने की अपेक्षा मैंने आत्महत्या कर लेना बेहतर समझा। पर मेरा युग-युग-व्यापी हिंदू संस्कार आत्महत्या को उससे भी भयंकर पाप समझता था, इसलिए उसके लिए भी हिम्मत नहीं पड़ती थी। मैंने कई बार सोचा कि अपने मन के उस द्वन्द्व को आपके आगे व्यक्त करके अपने जी का भार हल्का करूँ और आपसे हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करूँ कि किसी उपाय से इस घोर पाप से बचाइए। पर अपने, विशेषकर अपने मन के भावों के प्रति आपकी निपट अवज्ञा देखकर आपसे इस संबंध में कुछ भी कहने का साहस मुझे नहीं होता था।“

      “जिस प्रकार पुरुष-गायक-समाज के परिचालक वह थे, उसी प्रकार गायिका-समाज की परिचालिका मैं थी। इसलिए जब चिक के परली पार उनकी दृष्टि जाती होगी तो वह निश्चय ही मेरी प्रत्येक मुद्रा पर गौर करते होंगे। जब से मैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हुई तब से न चाहने पर भी गाते समय मेरे मन में यह ध्यान प्रतिक्षण रहता कि राधामोहन शर्मा जी चिक के उस पार से मेरी ओर देख रहे हैं और मेरा गाना सुन रहे हैं। इसलिए मैं बरबस अपने सुर को अधिक आकर्षक बनाने के प्रयत्न में दत्तचित्त रहती।“

     “एक दिन उनके घर की स्त्रियों ने, जिनमें एक उनकी पत्नी और दूसरी उनकी विधवा बहन थी, किसी पुण्य अवसर पर अपने घर में अखंड कीर्तन कराने का निश्चय किया और दूसरी स्त्रियों के साथ मुझे भी आमंत्रित किया। निमंत्रण के दिन जब मैं राधामोहन के यहाँ गई तो वह दरवाजे पर हम लोगों के स्वागत के लिए स्वयं खड़े थे। अपनी भावपूर्ण आँखों में स्निग्ध मुस्कान का संयत आभास झलकाते हुए उन्होंने मेरी ओर देखा। उनकी उस दृष्टि में मुझे एक ऐसी निराली प्रीति की अंतर्वेदना छिपी जान पड़ी, जिसने सीधे मेरे मर्म में जाकर चोट पहुँचाई। उस दिन हम दोनों ने पहली बार एक-दूसरे को आमने-सामने बिना किसी चिक के व्यवधान के देखा था। इसलिए वैद्युतिक चुंबक की सूक्ष्म-तरंगे किसी रोक-टोक के बिना एक-दूसरे की आत्मा के साथ सीधी टकराने लगीं। केवल क्षण भर के लिए उनसे मेरी आँखें चार हुई होंगी, उतने ही में किसी अज्ञात रहस्यमयी शक्ति के जादू ने एक अनंतव्यापी मोहजाल हम दोनों के आगे फैला दिया—मुझे ऐसा लगा।“

     “अब मैं भीतर जाकर कीर्तन-मंडली के बीच में बैठी तो मेरी आत्मा का एक-एक सूक्ष्म से भी सूक्ष्म परमाणु ‘राधामोहन ! राधामोहन !’ की रट लगाने लगा। उनका ‘राधामोहन’ नाम भी जैसे किसी दैवी चक्र ने रख दिया हो, उस दिन सम्पूर्ण आत्मा से केवल उन्हीं को ध्यान में रखकर मैं कीर्तन करती रही। दिन-भर और रात-भर के अखंड कीर्तन के बाद जब दूसरे दिन मैं घर वापस जाने लगी तो वह फिर दरवाजे पर खड़े थे। मुझे देखकर उन्होंने अपनी भावविभोर आँखों में कृतज्ञता झलकाते हुए मेरी ओर हाथ जोड़े। मैं इस बार भी क्षण-भर से अधिक उनकी ओर न देख सकी। पर उतने ही समय के अंदर फिर एक बार उसी वैद्युतिक चुंबक की तरंग ने मेरी आत्मा को पूरी शक्ति से आंदोलित कर दिया। ताँगा खड़ा था। मेरे साथ की दो स्त्रियाँ पहले ही बैठ चुकी थीं। अंत में मैं पीतल का डंडा पकड़ कर ऊपर उठी। मेरे बैठने के पहले ही ताँगेवाले ने भूल से घोड़े को हाँक दिया। अचानक झटका लगने से मेरा हाथ डंडे से फिसल गया और मैं बुरी तरह गिर गयी होती, यदि ऐन मौके पर राधामोहन शर्मा, जो वहीं पर खड़े थे, मेरा हाथ न पकड़ लेते।“

     “उनके हाथ के स्पर्श से वैद्युतिक चुंबक की तरंग मेरी भीतरी परिधि से हटकर बाह्य शरीर के क्षेत्र में व्याप्त हो गई उसने ऐसी तूफ़ानी ताल से हिलोरें लेना आरंभ कर दिया जो मेरे लिए जीवन में एकदम नया अनुभव था। जब मैं घर पहुँची तो मेरे हृदय के आसपास एक अनोखे प्रकार की फड़फड़ाहट-सी होने लगी-बीच-बीच में, मेरे शरीर के भीतर किसी स्थान में एक तीखी टीस-सी उठी। उसी दिन से उस घातक रोग के आक्रमण का सूत्रपात हुआ, जिसके कारण दो वर्ष बाद मेरी मृत्यु हो गई। महाशय, उस साधारण घटना की प्रतिक्रिया ऐसे विकट रूप से मेरे भीतर होने लगी कि मैं प्रतिदिन भीतर से भी छटपटाने लगी और बाहर से भी। यदि आपने मेरे शरीर और मन के इस तूफ़ानी परिवर्तनचक्र पर समय रहते ध्यान दिया होता, तो संभव है, मैं किसी कदर बच जाती। पर आपने वास्तविकता से कतराने के कारण यथार्थ परिस्थिति को जानने की चेष्टा कभी नहीं की और केवल डॉक्टरी इलाज कराके अपना कर्तव्य पूरा हुआ समझ लिया। यह आपकी बड़ी भूल थी, जैसा कि अब आप महसूस करने लगे हैं। उसकी प्रतिक्रिया अभी काफी लंबे अर्से तक आपके भीतर चलती रहेगी।“

      इतना पढ़ते ही वकील साहब की नींद उचट गई। कुछ देर तक वह आँखें मलते रहे। उसके बाद इधर-उधर देखने लगे। जब कुछ न दिखाई दिया तो पलंग पर से उठकर प्लैनचैट के पास गए, यह देखने के लिए कि उसके नीचे कागज में सचमुच कुछ लिखा है या नहीं। उनकी निराश और विस्मय की सीमा न रही, जब उन्होंने देखा कि प्लैनचैट के नीचे का कागज एकदम कोरा पड़ा हुआ था, जबकि कुछ ही क्षण पहले उसमें एक-एक अक्षर साफ लिखा हुआ उन्होंने पढ़ा था।

      वह सोचने लगे, तब क्या ब्रजेश्वरी की आत्मा स्वप्न में उनके पास आई थी, जागरण अवस्था में नहीं? हाँ स्वप्न ही तो था, हालांकि वह जागरण अवस्था से भी अधिक प्रत्यक्ष सत्य मालूम होता था। पर यह कैसे मान लूँ कि चूँकि उसने स्वप्नावस्था में आकर अपना बयान लिखा इसलिए वह असत्य है। प्रेतात्माएँ जिस सूक्ष्म अवस्था में अपना जीवन बिताती हैं, उसमें यह अधिक संभव है कि वे स्वप्न की सूक्ष्म अवचेतन अवस्था में ही हम लोगों के अधिक निकट आ पाती हैं। यदि ब्रजेश्वरी की प्रेतात्मा का आना सत्य नहीं है तो उसका जो अनोखा बयान मैंने स्वप्न में पढ़ा है, उसकी बहुत-सी बातों की कल्पना ही मेरे मन में कैसे उदित हो गई, जिनके संबंध में मैंने कभी कुछ सोचा न था।

        उन्होंने निश्चय किया कि वह अपने पड़ोस की कीर्तन-समिति में जाकर इस बात का पता लगाएंगे कि वहाँ राधामोहन शर्मा नाम के कोई सज्जन हैं या नहीं। उसी दिन वह नहा-धोकर नाश्ता-वाश्ता करके पता लगाने चल पड़े। कीर्तन-समिति में जाकर पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि वहाँ राधामोहन शर्मा नाम के कोई सज्जन कभी नहीं आए। बाद में किसी ने इस तथ्य की ओर वकील साहब का ध्यान दिलाया कि पास ही एक सज्जन राधामोहन शर्मा नाम के रहते हैं, जो कीर्तन-समिति में कभी नहीं आते, पर अपने ही घर में रात-आधी रात जब मौज आई हारमोनियम बजाकर गंधर्वस्वर में निराली आलापबाजी के साथ गाने लग जाते हैं और मोहल्लेवालों की नींद खराब करते हैं। अचानक वकील साहब को याद आया कि वह इस राधामोहन को अच्छी तरह जानते हैं। वह एक्साइज़ ऑफिस में एक साधारण क्लर्क था और एक बार एक मुवक्किल को लेकर उनके पास आया था। उसकी अर्द्धरात्रि के विकट आलाप से स्वयं वकील साहब की नींद कई बार नष्ट हो चुकी थी। उन्हें याद आया कि ब्रजेश्वरी की प्रेतात्मा का स्वप्न देखने के पहले जब वह सोने की तैयारी कर रहे थे, तब वही राधामोहन शर्मा हारमोनियम बजाता हुआ गला फाड़-फाड़कर आलापबाजी कर रहा था। तब क्या उनके उस सारे स्वप्न के मूल में केवल उसी राधामोहन नाम के गधे की आलापबाजी थी? वकील साहब बहुत देर तक इसी प्रश्न पर विचार करते रहे, पता नहीं उनके अंतर्मन ने इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया।

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vicky

तो वो सब भ्र्म था ???