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26 अगस्त 2018 …

मैं लिफ्ट के जरिये उपर चौथी मंजिल पर पहुंचा . मैंने एक फ्लैट के दरवाजे के सामने खड़े हो कर थोड़ी देर सोचा , फिर कॉलबेल पे ऊँगली रखी . तत्काल कहीं अन्दर एक मधुर घंटी की आवाज गूंजी . मेरे दिल की धड़कने अचानक पता नहीं क्यूँ तेज हो गई थी ? थोड़ी देर में दरवाजे का नॉक खुलने की आवाज आई और दरवाजा खुला . वो खुले बालों में मेरी नजरों के सामने खड़ी थी .

“मुझे मालूम था तुम जरुर आओगे .” ये कहते हुए उसके चेहरे पे मुस्कराहट थी लेकिन आंखों में उदासी .

“कैसी हो?” मैं बोला .

“अंदर आओ .” उसने मेरे सवाल का जवाब गोल कर दिया .

मैंने झिझकते हुए अंदर प्रवेश किया .

फ्लैट बहुत ही शानदार था और करीने से सजा हुआ था . मैं हॉल के एक सोफे में धस गया और चारों ओर नजरें फिराई . सामने दीवार पे एक बहुत बड़ा फ्रेम था जिसमे ढेर सारी तस्वीरें कोलाज के रूप में सजी थी . कुछ तस्वीरों में वह एक मोटे , तंदुरुस्त और कठोर शक्ल वाले व्यक्ति के साथ खड़ी थी . जरुर वह उसका पति होगा ! कुछ तस्वीरों में वह दो छोटी बच्चिओं के साथ थी . साफ़ पता चल रहा था कि तस्वीरें बहुत पुरानी है – शायद बीस साल पुरानी .

मैंने निगाहें घुमाई तो वह मुझे म्यूजिक सिस्टम में एक पेन ड्राइव लगाते झुकी दिखाई दी . फिर वो हाथ में एक रिमोट कंट्रोल पकड़े वापस मुड़ी और मेरे पास आके मेरे सामने के सोफे में बैठ गई .

“अब बोलो, क्या पूछ रहे थे तुम?” उसने अपने बालों को पीछे झटकते हुए कहा .

पूछने से पहले मैंने गौर से उसे देखा . इतने बरसों में बदन काफ़ी भर चुका था लेकिन मोटापे के कोई लक्षण नहीं थे . बालों में कहीं कहीं हल्की सी सफ़ेदी झाँक रही थी जो उसकी खूबसूरती और गरिमा को और बढ़ा रही थी .

पच्चीस साल के बाद अचानक कल वह अपनी एक सहेली के साथ मुझसे एक मॉल में टकरा गई थी और मुझे अपना एड्रेस बताया था जो मेरे दिल के पन्नों पे छप गया था और अगले ही दिन मतलब आज मैं उसके सामने बैठा था .

“कैसी हो?” दरवाजे पे पूछा सवाल मैंने फिर दोहराया .

उसने एक दीर्घ सांस ली और कहा “मैं ठीक हूँ .’

तभी एक रखरखाव से मेड दिखने वाली लड़की हमारे सामने की सेंटर टेबल पे दो पानी का गिलास रख गई . मैंने गिलास की ओर हाथ भी नहीं बढ़ाया .

कितने सवाल मेरे मन में डंक मार रहे थे ???

मसलन हसबैंड क्या करते है ? बच्चे कितने है ? मम्मी पापा कैसे है ? कॉलेज के बाद क्या हुआ ? – लेकिन मेरी पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी .

वो मेरी दुविधा समझ गई और फिर उसने बोलना शुरू किया और बोलती चली गई .

कॉलेज के बाद मम्मी पापा ने उसकी मर्जी के खिलाफ उसकी शादी पटना में तय कर दी थी . ससुराल वाले बहुत धनी थे और पति किसी सरकारी महकमे में था जहाँ हर तीन चार साल में ट्रान्सफर होता रहता था . दो बेटियां थी जो बैंगलोर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी . अभी दो साल पहले ही रांची में ट्रान्सफर हुआ था और तब से पति के साथ यहीं है . मम्मी पापा का देहांत हुए काफ़ी अरसा बीत चुका था और इकलौता भाई अपने परिवार में मस्त था .

“तुमने कोई जॉब नहीं किया?” मेरे मुंह से अकस्मात निकला .

“नॉट अलाउड! इस खानदान में बहुओं का जॉब करना शान के खिलाफ़ समझा जाता है .” वो हँसते हुए बोली .

पता नहीं क्यूँ मुझे उसकी हंसी अच्छी नहीं लगी .

“लेकिन तुम तो ऐसी दब्बू नहीं थी . पूरा कॉलेज तुम्हारे विद्रोही तेवर से घबराता था . खुद प्रिंसिपल तुम से डरता था . तुमने समझाया नहीं?”

“समझाया? हा हा हा . एक अकडू मर्द की बीवी होने का दर्द तुम क्या जानो रमेश बाबू ?” वो अचानक दीपिका के टोन में बोली . उसकी आँखों में फिर वो कॉलेज के दिनों की शरारत चमकने लगी थी .

मैं फीके ढंग से हंसा और कहा “तुम बिल्कुल नहीं बदली .”

“लेकिन तुम बहुत बदल चुके हो!”

“अरे नहीं! मैं तो वैसा ही हूँ जैसे पहले था .”

“नहीं हो! तुम तो पच्चीस साल पहले ही बदल चुके थे .” उसकी आवाज में कटाक्ष था . मैं कट कर रह गया .

“लेट मी एक्सप्लेन . उस वक़्त हालात …” लेकिन उसने मेरी बात बीच में ही काट दी .

“स्टॉप इट . मैंने तुमसे कोई सफाई नहीं मांगी है . तुम मर्दों की यहीं प्रॉब्लम होती है . अपनी कमजोरी, अपनी बुजदिली, अपने भगोड़ेपन को कुबूल करते हुए कलेजा फटता है न!” – अचानक उसकी आवाज में एक तीखापन आ गया – “मेरा एड्रेस पाते ही भागे चले आये . आज पच्चीस साल बाद आये तो भी किसलिए ? हमारे इश्क़ की बरसों पुरानी बुझी हुई राख में चिंगारी ढूँढ के उसे फिर से शोला बनाने . मेरे पहलू में लेट कर अपने रोमांटिक फ़्लैशबैक को ताजा करने या फिर ये जानने के लिए कि मेरे दिल के कोने में कोई जगह तो बची नहीं है तुम्हारे लिए या फिर यह देखने कि कहीं तुम्हारी ये बेचारी राधा आज भी अपने कृष्ण कन्हैया की विरह की अग्नि में जल तो नहीं रही है !” आखिरी वाक्य कहते कहते उसका चेहरा तमतमा उठा था .

मैं बुरी तरह तिलमिलाया . मेरे पास कहने को कुछ न था लेकिन कुछ न कुछ कहना जरुरी था इसलिए मैंने किसी तरह हिम्मत बटोरी और कहा…”वाकई तुम बिल्कुल नहीं बदली . आज भी वो ही तेवर , वो ही विद्रोह , वो ही जिद तुममें बरकरार है लेकिन हैरानी तो मुझे इस बात की है कि ये तेवर तुमने अपने माँ बाप को न दिखाया , अपने भाई या अपने पति को न दिखाया . पच्चीस साल से इस तेवर को तुमने अपने अंदर जहर की तरह पाल रखा था इस इंतेजार में कि जिस दिन मौका मिलेगा – उस दिन ये सारा जहर अपने कॉलेज के धोखेबाज प्रेमी के उपर उड़ेल दोगी और इत्तेफाक से आज तुम्हें वो मौका मिल गया न . अब तो जहर निकल गया न …अब कलेजे को बहुत सूकून महसूस हो रहा होगा न !” आखिरी वाक्य कहते कहते मैं भी ताव में आ गया था .

“मुझे मालूम है तुम्हारे अहम् को ठेस पहुंची है . आखिर हो तो मर्द ही न! सच्ची , मैन विल आलवेज बी ए मैन !”

“थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट . आई थिंक आई शुड लीव नाऊ!” इतना कह के मैं गुस्से से सोफे से उठ खड़ा हुआ .

पानी का गिलास अभी तक अनछुआ पड़ा था टेबल पर .

“बैठ जाओ परम . अब इतनी मुद्दत के बाद मिले है तो क्यूँ न आज ही सारे गिले शिकवे दूर कर लेते है . पता नहीं फिर कब मिलना हो?” इस बार उसने बिल्कुल शांत और धीमे स्वर में ये बात कही मेरा गुस्सा तुरंत काफूर हो गया . मैं चुपचाप वापस सोफे में धस गया .

थोड़ी देर कमरे में खामोशी रही . मैं कुछ कहने के लिए लफ़्ज ढूंढने लगा.

“क्या कमी है तुम्हारे पास?” – मैंने किसी तरह खुद को सयंत करते हुए गंभीर आवाज में कहा – “सब कुछ तो ईश्वर ने दिया है तुम्हे? पैसे की कोई कमी नहीं , ससुराल भी मालामाल , पति भी ऑफिसर रैंक का और दो जवान जहीन बेटियां भी . और क्या चाहिए जिंदगी में ? तुम्हे तो शुक्रगुजार होना चाहिए अपने मिडिल क्लास माता पिता का जिन्होंने तुम्हारे प्रेजेंट के साथ साथ तुम्हारा फ्यूचर भी सेफ एंड सिक्योर कर दिया मैडम जी . अगली तीन पुश्तें तुम्हारी आराम से , चैन से जिंदगी बसर करेगी …फिर किस बात का मलाल ?”

“हाँ, सब कुछ है मेरे पास . कभी किसी चीज की जरुरत हो तो हिचकिचाना मत . मांग लेना और हाँ यकीन करो कभी इंकार नहीं करुँगी .”- वो धीमे स्वर में कहती गई – “लेकिन एक औरत क्या चाहती है, इसका तो तुम्हें गुमान भी नहीं होगा . आखिर हो तो तुम मर्द ही न! जानते हो तुम्हे मॉल में देखते ही मेरे सारे जख्म हरे हो गये . मुझे यकीन नहीं होता था कि जिसे मैंने अपने मन मंदिर में देवता की तरह बिठा रखा था – वो छलिया निकलेगा .” उसकी आवाज में बला की दर्द उभर आई थी .

मैं निशब्द हो गया .

काफी देर उस हॉल में चुप्पी छाई रही . हम दोनों सर झुकाए चुपचाप बैठे रहे . फिर मैंने ही ख़ामोशी भंग की .

“तुम मुझे छलिया, धोखेबाज, बहरूपिया, कायर जो भी कह लो – मुझे मंजूर – तुम्हारा हर इल्ज़ाम मुझे मंजूर … लेकिन पच्चीस साल पहले हालात जुदा थे . मेरे डैडी का बिज़नेस फेल हो गया था . हम सड़क पर आ गए थे . बावजूद इसके मैं अड़ सकता था, तुम्हे भगा के ले जा सकता था लेकिन मैं नहीं चाहता था कि तुम हमारे साथ ग़ुरबत की चिथड़ो में जिओ इसलिए मैं तुम्हारी जिंदगी से दूर – बहुत दूर निकल गया …मैं तुम्हें बता नहीं सका कि ………….”

पता नहीं कितनी देर तक मैं नॉनस्टॉप बोलता रहा और वो चुपचाप सुनती रही . मेरी आवाज की बेचारगी और मजबूरी को शायद उसने महसूस किया .

कमरे में फिर चुप्पी छा गई .

पानी का गिलास अभी भी टेबल पर ज्यों का त्यों पड़ा था . न उसने छुआ था न मैंने .

मैंने भी सोचा कि अब चलना चाहिए . आखिर काफी लानत मलानत हो चुकी थी मेरी . मैं सोफे से उठने को तत्पर हुआ .

तभी अचानक उसने हाथ बढ़ा कर टेबल से रिमोट कंट्रोल उठाया और कोई बटन दबाया . तत्काल कमरे में म्यूजिक सिस्टम की मधुर संगीत लहरी गूँज उठी और धीमे स्वर में गाना बज उठा .

…चुरा के दिल मेरा , गोरिया चली …उड़ा के निंदिया कहाँ तू चली…

पागल हुआ , दीवाना हुआ …तेरी गली मैं चली…

मैंने चौंक कर उसकी ओर देखा तो वो मुस्कुरा रही थी . मेरे चेहरे पे भी मुस्कराहट आ गई . “मैं खिलाडी तू अनाड़ी” मूवी का सुपरहिट गीत बज रहा था .

“तुम्हें याद है ये गीत .” मैं पूछे बिना न रह सका .

“मुझे वो हर गीत याद है जो तुमने मुझे कॉलेज टाइम में ऑडियो कैसेट में भर के भेजा था . वो कैसेट तो पता नहीं कहाँ खो गया लेकिन वो सारे गीत इस दिल में ही रह गए थे . कल ही उन सारे गीतों को पेन ड्राइव में डाउनलोड किया है माय डिअर एक्स बॉयफ्रेंड जी .” वो मस्ती भरे लहजे में बोली .

“मतलब तुम्हें मालूम था कि मैं आऊंगा .”

“यस . आई वाज हंड्रेड परसेंट स्योर कि तुम आज ही आओगे .” उसकी आवाज में फिर वो शरारत जाग उठी थी .

मैं हैरान हो उठा कि ये हो क्या रहा है ? मैडम जी तो कभी ढील दे रही थी तो कभी ढील कस रही थी .

मैं हैरानगी के भंवर में उपर नीचे डोल रहा था कि अचानक कॉलबेल की मधुर संगीत कमरे में गूंज उठी . मैं बुरी तरह सकपकाया .

मैंने उसकी ओर देखा और कहा “लगता है तुम्हारे पति परमेश्वर घर वापस आ गये है ?”

“डोंट वरी, उन्हें तुम्हारे बारे में सब पता है – सब कुछ – ए टू जेड .” वो बड़े इत्मीनान से बोली और मुस्कुराई .

सब कुछ … ए टू जेड ! मेरे क़दमों तले जमीन खिसक गई .

हे भगवान ! ये हो क्या रहा है और आगे क्या होने वाला है ?

मैडम आराम से खड़ी हुई और नपे तुले कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ी .

मेरी नजरें कमरे से निकल भागने के लिए कोई चोर दरवाजा ढूँढने लगी . बालकनी से कूदने का सवाल ही नहीं था क्यूंकि चौथी मंजिल से कूदने से मेरे हाथ पाँव टूटने के पूरे आसार थे .

कमरे में गीत के बोल गूँज रहे थे …

… वफायें तो मुझसे बहुत तुमने की है, मगर इस जहाँ में हंसी और भी है ,

कसम मेरी खाकर बस इतना बता दो , किसी और से दिल लगा तो न लोगे ….

तभी मैडम ने दरवाजा पूरा खोल दिया . दरवाजे पे निगाह पड़ते ही मेरे होश फ़ना हो गये . वहां पे एक लंबा चौड़ा इंसान पुलिस की वर्दी में खड़ा था और जिसके चेहरे पे गुस्से के भाव थे और उसकी कमर के पास लटके होल्स्टर में से रिवाल्वर बाहर झाँक रहा था .

मुझे काटो तो खून नहीं वाली मेरी हालत थी . उस वक़्त मुझे उस कहावत का मतलब समझ आया कि आशिक़ का दिल चोर का होता है . खतरे की आशंका होते ही दब्बू आशिक़ सबसे पहले दुम दबा के पतली गली से निकल लेता है . अगर किसी पाठक ने कभी इश्क किया हो तो वो मेरी उस हालत का अंदाजा अच्छी तरह से लगा सकता है .

मेरी नजरे दरवाजे पे ही टिकी थी . मैडम और पुलिस वाले के बीच कुछ बातचीत हुई जिसे मैं सुन न सका हालाकिं उस घड़ी कान मेरे किसी शिकारी कुत्ते की तरह खड़े थे और यदि भागने का मौका लगता तो मैं ऐसी रेस लगाता कि उसैन बोल्ट भी शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब मरता .

फाइनली दोनों की गुफ्तगूँ ख़त्म हुई और पुलिस वाले ने कमरे के अंदर कदम रखा . मुझे ऐसा लगा जैसे किसी जल्लाद ने मुझे रौंदने के लिए कदम बढ़ाये हो . मैं घबरा के सोफे से उठ खड़ा हुआ . मेरे दिल की धड़कने उस वक़्त किसी नगाड़े की तरह धाड़ धाड़ बज रही थी . पुलिस वाला अंदर आके मेरे सामने सोफे पर बैठा और मुझे गौर से देखा . मैं अपने आप में सिकुड़ के रह गया .

फिर उसने सवालिया निगाहों से मैडम जी को देखा जैसे पूछ रहा हो कि ये लल्लू कौन है ?

मैडम तुरंत इशारा समझ गई और मुस्कुराते हुए बोली “ये मेरे कॉलेज फ्रेंड है . आज बरसों बाद मिले है इसलिए अपने पुराने दिनों की यादों को ताजा कर रहे है .”

पुलिस जी ने कुछ न कह के अपना सर अनुमोदन में हिलाया और फिर सेंटर टेबल पे पड़े पानी के गिलास को देखा . उसने पहला गिलास उठा के पानी पिया और फिर दूसरा .

फिर अचानक वो उठा और मैडम को थैंक्यू बोलता हुआ दरवाजे के बाहर निकल गया . आटोमेटिक डोर लॉक की वजह से दरवाजा खुद ब खुद बंद हो गया . अब तक मैं इस तमाशे को देख कर हक्का बक्का था . लेकिन पुलिस वाले के बाहर निकलते ही मेरी जान में जान आई .

अचानक मैडम जोर से हंसी . मुझे कुछ समझ न आया .

“तुम पच्चीस सालों में बिल्कुल नहीं बदले परम . आज भी बिल्कुल वैसे ही हो – डरपोक, कायर, दब्बू . शक्ल देखो अपनी… ऐसा लग रहा है जैसे सारा खून निचोड़ लिया हो किसी ने . हा हा हा .” उसने फिर एक कह्कहा लगाया .

मैं शर्म और गुस्से से लाल हो गया .

फिर उसने बताया कि वो पुलिस वाला पास के थाने में पोस्टेड था और उसके बगल वाली फ्लैट में रहता था . उसकी पत्नी फ्लैट को ताला मार के कहीं शॉपिंग के लिए निकल गई थी जिसकी वजह से पुलिस वाले का पारा गर्म था . वो ये पूछने आया था कि शायद उसकी पत्नी फ्लैट की चाबी मैडम को दे कर गई हो .

“बेचारा थका हारा घर आया था इसलिए मैंने पानी पीने के लिए अंदर बुला लिया था .” मैडम ने सफाई दी .

“तुमने जानबूझ के मुझे दिखा के उससे दरवाजे पे खुसर पुसर की थी और उसे पानी पीने के लिए अंदर बुलाया था ताकि मेरी सूरतेहाल देख के मजा ले सको . है ना?” मैं अंदर ही अंदर उबलता हुआ बोला .

“बिल्कुल . आपने बिल्कुल सही फ़रमाया जनाब .” – वो सर झुका के आदाब के पोज में झुक के हंसती हुई बोली – “और आप खड़े क्यूँ है जनाब . तशरीफ़ रखिये .”

“तुम्हे पता है मैं बालकनी से कूदने की सोच रहा था .”

ये सुनते ही उसे हंसी का दौरा पड़ गया .

मैं कुछ पल उसे तीखी नजरों से घूरता रहा फिर बैठते हुए खिसियानी आवाज में बोला – “बड़ा मजा आ रहा है न तुम्हे ?”

वो फिर बड़े जोर से हंसी और मेरे सामने सोफे पे बैठ गई .

“वाकई बड़ा मजा आया यार .” – फिर अचानक वो संजीदा हुई और कहा… “आज बरसों बाद खुल के हंसी हूँ परम . तुम अंदाजा नहीं लगा सकते कि ऐसी हंसी के लिए मैं कितना तरसी हूँ .” हँसते हँसते ही अचानक उसकी आँखें नम हुई और दो बूँद आंसू छलक पड़े .

मैं स्तब्ध रह गया . मुझे कुछ समझ नहीं आया कि मैं क्या कहू . मेरा जी चाहा कि मैं उसी वक़्त उठ कर उसे अपनी बाहों में भर लू लेकिन मेरे कदम जरा भी न हिले . मैं चुपचाप बैठा उसे हिचकियाँ लेते देखते रहा .

म्यूजिक सिस्टम में अब कोई दूसरा गीत बज रहा था . बरसों पहले मुझे कैसेट में भेजा हुआ उसका पसंदीदा गीत…

…. दूरी न रहे कोई , आज इतने करीब आओ ,
मैं तुम में समां जाऊ , तुम मुझमे समां जाओ .

पता नहीं कौन सी फिल्म का गीत था लेकिन उसे हमेशा से ओल्ड हिंदी गाने पसंद थे जबकि मुझे लेटेस्ट हिंदी गाने .

हम चुपचाप सर झुकाए बैठे रहे . फिर मैं गला खंखारता हुआ बोला … “आई एम सॉरी …मेरा गुनाह शायद माफ़ी लायक नहीं है लेकिन फिर भी आई एम वेरी वेरी सॉरी . मुझे अंदाजा भी नहीं था कि जो कदम मैंने तुम्हारी भलाई के लिए उठाया था…वो कदम तुम्हारे लिए नासूर बन जायेगा .”

शायद वो मेरे मुंह से यही सुनना चाहती थी – ” सॉरी” क्यूंकि वो धीरे धीरे नार्मल होती चली गई .

“कसम से उस वक़्त तुम मुझे कहीं मिल गए होते तो मैंने तुम्हारा खून कर देना था भले ही मुझे फांसी हो जाती लेकिन तुम अपने परिवार के साथ दिल्ली चले गए थे . बहुत कोशिश की तुम्हारा पता ढूँढने की लेकिन सब नाकाम .” इस बार उसकी आवाज में मायूसी थी .

“मैं जानता हूँ … मैं मिल जाता तो जरुर तुम मेरा खून कर देती और फांसी चढ़ जाती . इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं . वो हमारे दौर का इश्क ही कुछ अलग मिजाज का था . तब या तो साथ जीना था या साथ मरना था . आज के ज़माने का वो इश्क नहीं था कि “तू न सही, और सही और नहीं तो और सही .” मैं संजीदा स्वर में बोला .

“सच्ची, वो इश्क का दौर कभी कभी अक्सर याद आता है . वो दौर वाकई कितना हंसी था . सब कुछ ढका ढका लेकिन कितना दिलकश था . आज तो सब कुछ खुला खुला सा है . आज अपनी जवान कान्वेंट एजुकेटेड बेटिओं के बॉयफ्रेंडस को देखती हूँ तो कुढ़न होती है . दोनों मेरी लाडली बिटिया अब तक तीन चार बॉयफ्रेंड्स को धोखा दे चुकी या धोखा खा चुकी …पता ही नहीं चलता? और ये जिस्मानी चाहत का सिलसिला जिसे ये इश्क कहते है…कहाँ और कब ख़त्म होगा …कुछ पता नहीं .” वो हँसते हुए बोली .

इस बार मैं जोर से हंसा .

पता नहीं कितनी देर तक हम यूँ ही गिले शिकवे करते रहे कि अचानक मेरी निगाह अपनी घड़ी पे पड़ी तो मैं चौक गया . काफी देर हो चुकी थी .

“अच्छा अब मैं चलता हूँ . काफी देर हो चुकी है और मुझे कुछ जरुरी काम भी है .” मैं उठते हुए बोला हालाकि जाना तो मैं बिल्कुल भी नहीं चाहता था .

“ओके .” उसने भी मुझे रुकने के लिए जिद न की.

मैं मायूस हो के दरवाजे की ओर बढ़ा .

“मैं बताऊ तुम्हे क्या जरुरी काम है?” अचानक पीछे से उसकी आवाज आई .

मैं ठिठका और पीछे मुड़ा .

“बताओ .” मेरी आवाज में चैलेंज था .

“अपनी पत्नी के लिए गिफ्ट खरीदने जाना है न तुम्हें . आज तुम्हारी मैरिज एनिवर्सरी है न . शादी की सालगिरह . क्यूँ, आई एम राईट?”

मैं बुरी तरह चौका .

“तुम्हे कैसे पता? तुम्हे किसने बताया ? तुम मेरी पत्नी को जानती हो ?” – एक साथ ढेर सारे सवाल मेरे मुंह से निकले .

“अच्छी तरह से जानती हूँ तुम्हारी पत्नी को माय डिअर टू बी एक्स हसबैंड जी . कहों तो अभी यहीं मिलवा दू तुम्हें तुम्हारी हसीन और जान से प्यारी पत्नी से जिसका इतनी देर में एक बार भी जिक्र नहीं किया तुमने .” अब उसकी आवाज में एक चैलेंज था .

मैं हक्का बक्का मुंह फाड़े उसकी शक्ल देखता रह गया जहाँ एक रहस्यमयी मुस्कान तैर रही थी .

अब ये क्या नई साजिश थी ?

उधर म्यूजिक सिस्टम में दूसरा गीत बज रहा था …मेरा भेजा हुआ फिल्म “फूल और अंगार” का गीत …

…चोरी चोरी दिल तेरा चुरायेंगे, अपना तुझे हम बनायेंगे
धीरे धीरे पास तेरे आयेंगे…आके दूर फिर न जायेंगे …

मैंने मैडम जी को घूर कर देखा .

“तुम मजाक कर रही हो .”

“आई एम सीरियस . कहो तो बुला दू आपकी मोहतरमा को?” उसने मेरे घूरने की जरा भी परवाह न की और मुझे जैसे चैलैंज किया .

“वो यहाँ है . इस फ्लैट में?”

उसने मुंह बिचकाया .

मैंने तुरंत जेब से मोबाइल निकाला और श्रीमती जी को कॉल लगाने लगा .

“तुम क्यूँ जहमत कर रहे है? कॉल मैं ही लगा देती हूँ .”

मैंने मोबाइल से निगाह हटा के उसे देखा . वो अपने मोबाइल पर कोई कॉल लगा रही थी .

मैं झपट के उसके पास पहुंचा और उसके मोबाइल की स्क्रीन पे झांका . श्रीमती जी का नंबर फ़्लैश हो रहा था . मैंने तुरंत कॉल एंड किया .

“देखो, मेरे साथ ये लुक्का छिप्पी वाला खेल मत खेलो . मुझे बताओ ये हो क्या रहा है मेरे साथ . प्लीज, मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ .” ये कहते हुए मैंने सचमुच उसके आगे हाथ जोड़ दिए .

“सिर्फ हाथ जोड़ने से काम नहीं चलेगा . पाँव पड़ो तो मैं कुछ सोचूंगी .”

मैंने उसकी ओर देखा . उसके चेहरे पे एक कुटिल मुस्कान थी . फिर उसने अपने मोबाइल फोन की गैलरी खोली और मुझे एक तस्वीर दिखाया . तस्वीर में वो और श्रीमती जी साथ साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे .

मैं तुरंत उसके क़दमों में गिर पड़ा .

उसने तुरंत अपने पाँव पीछे कर लिए और मेरे कन्धों को पकड़ कर रोक लिया .

“इतना बड़ा पाप मैं नहीं करवा पाऊँगी परम . मुझसे नहीं होगा ये . आओ बैठो यहाँ ” उसकी आवाज में अफ़सोस भी था और दर्द भी .

मैं वापस सोफे पे बैठ गया .

“तुम्हे कुछ पूछने की जरुरत नहीं…मैं ही तुम्हारे सारे सवालों के जवाब दे देती हूँ . तुम्हारे बारे में बहुत कुछ इसलिए जानती हूँ क्यूंकि तुम फेसबुक पे हमेशा कुछ न कुछ पोस्ट करते रहते हो . लेकिन तुम अपना नाम बदल कर फेसबुक पे हो परमाणु जी इसलिए तुम्हे ढूँढने में बहुत वक़्त लग गया . वहां से मुझे तुम्हारे प्रोफाइल में तुम्हारी पत्नी और बच्चो के बारे में पता चला . ये भी मालूम चल गया की जनाब किसी स्कूल में टीचर और बीवी भी किसी दुसरे स्कूल में टीचर है . बहुत पोस्ट भी लिखने लगे हो आज कल और बहुत पसंद भी किये जा रहे हो . फेसबुक से ही तुम्हारी पत्नी की आई डी भी मिल गई फ़ोन नंबर भी और स्कूल का नाम और पता भी . अब स्कूल में जाके तुम्हारी पत्नी से मिलना कौन सी बड़ी बात थी . वैसे भी मैं सारा दिन घर में बैठे बोर होती रहती हूँ और वाहियात सिरीयल्स देख के टाइम पास करती हूँ .” वो नॉनस्टॉप बोलती गई और मेरे चेहरे का रंग उड़ता गया .

“मतलब तुम श्रीमती जी से मिल चुकी हो?”

“हाँ .” बड़े भोलेपन से उसने जवाब दिया .

मैं अपना सर पकड़ के बैठ गया . सामने टेबल पे दो खाली गिलास मुझे जैसे मुंह चिढ़ा रहे थे .

कितनी देर वहां चुप्पी छाई रही .

कमरे में नया गीत गूँज रहा था …

…तू मेरा जानू है , तू मेरा दिलवर है , मेरी प्रेमकहानी का तू हीरो है…
पर प्रेमग्रंथ के पन्नो पर , अपनी तकदीर तो जीरो है …

सिचुएशन के हिसाब से इस बार गीत बिल्कुल सही बज रहा था . साली , अपनी तकदीर तो सच में जीरो हो चुकी थी उस वक़्त .

अचानक मैडम इतनी जोर से हंसी कि मैं चौंक गया . वो पागलों की तरह हंसती जा रही थी . अंदर किसी कमरे से मेड भी उसका हँसना सुन के बाहर आ गई जिसे उसने हाथ के इशारे से वापस भेज दिया .

“तो ये सिला दिया तुमने मुझे मेरी बेवफाई का . बदला लिया तुमने मुझसे न! तुम चाहती थी कि मेरे सुखी संसार में आग लगा दो और लगा दी . वो मुझे मॉल में भी तुम इत्तेफाक से नहीं मिली थी बल्कि उसमें भी कोई तुम्हारी चाल थी न .” मैं अपने दांत पीसता हुआ बोला .

“वो तो मामूली बात थी मिस्टर . ड्राईवर को तुम्हारे स्कूल भेज कर एक स्टूडेंट से तुम्हारे घर का एड्रेस लिया . और कल छुट्टी के दिन तुम्हारे पीछे लग कर मॉल पहुंची और तुम्हे अपना एड्रेस दिया न कि फोन नंबर . मैं चाहती थी कि तुम सीधे घर आओ न कि मुझे फोन करो . और देखो मेरा अंदाजा कितना सही था . मेरा बेवफ़ा आशिक़ अगले ही दिन अपनी पुरानी अधूरी मुहब्बत की प्यास बुझाने दौड़ा चला आया . रियली मेन विल ऑलवेज बी ए मेन .”

मुझे लगा कोई मेरे कान में पिघला शीशा डाल रहा था – सॉरी डाल रही थी .

“बहुत जासूसी उपन्यास पढ़ते थे न तुम! खुद को बहुत बड़ा जासूस समझते थे न ? क्यूँ निकल गई सारी जासूसी , सारी आशिक़ी …माय डिअर . अब देखना मेरे इस एक्स आशिक़ का जनाजा कितने धूमधाम से निकलता है .”

मैं अवाक उसका मुंह देख रहा था . मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करू ? जी चाह रहा था कि सामने बैठी इस शातिर औरत का गला घोंट दू या खुद के सिर के बाल नोच डालू .

“और अब असली बात तो रह ही गई माय डिअर एक्स बॉयफ्रेंड .”

उसके उस एक फिकरे ने मेरे दिमाग में घंटी बजा दी . मतलब अभी भी कुछ लानत मलानत बाकी था . मैंने सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखा और सोचा – साली क्या औरत थी ! पल में तोला , पल में माशा .

“तुम्हारी बीवी – तुम्हारी जान से ज्यादा प्यारी बीवी इस वक़्त इस फ्लैट के दरवाजे के बाहर खड़ी है .”

मुझे अपने कानों पे यकीन न हुआ . मैंने दरवाजे की ओर देखा . अचानक ही कॉलबेल की मधुर ध्वनि पूरे फ्लैट में गूँज उठी . मैं बगूले की तरह उठ कर दरवाजा की तरफ भागा और दरवाजा खोला .

दरवाजा खोलते ही मेरे मुंह से एक जोरदार चीख निकली .

दरवाजे पे श्रीमती जी नहीं बल्कि एक मोटा , काला , गंजा व्यक्ति खड़ा था और उसकी हाथों में एक चमचमाती हुई किचन नाइफ ( छुरी ) थी जिसका फल मेरी ओर तना था .

पीछे से अचानक मेरी एक्स माशूका की आवाज आई “मोहन छोड़ना मत उसे .”

म्यूजिक सिस्टम में गीत फिर चेंज हो चुका था .

भाड़ में गया गीत . यहाँ तो मौत एक कदम की दूरी पे खड़ी थी . मर्डर विद म्यूजिक . मेरी मैरिज एनिवर्सरी आज मेरी डेथ एनिवर्सरी में बदलने वाली थी !

मैंने गौर से मोहन को देखा . साला पक्का जेल से भागा हुआ कोई खूंखार कातिल दिखाई दे रहा था लेकिन सबसे अनोखी बात ये थी कि वो मुझे बड़ी हैरानी से देख रहा था .

“मोहन . अचानक पीछे से मैडम एक्स की आवाज आई – “अन्दर आओ .”

मोटे ने मुझे एक हाथ से किनारे किया और अन्दर कदम रखा .

“बीबी जी, आपने बाजार से नया चाकू लाने को कहा था न सुबह में सो मैं ये ले के आया हूँ .” ये मोटे की आवाज थी .

मैं अपनी उखड़ी साँसों को ठीक करने लगा . सोफे से दरवाजे तक भाग के आने और उस मोटे के हाथ में चाकू के दर्शन ने मेरे कसबल ढीले कर दिए थे .

“ठीक है . जाओ किचन में रख दो .”

मोहन अंदर किचन की ओर चल दिया .

“इधर आओ परम .” इस बार आवाज में आदेश था – ” ये बन्दर की तरह उछलकूद बंद करो और आकर बैठ जाओ . इस उम्र में तुम्हे ये सब शोभा नहीं देता .”

उसने इतने इत्मिनान से ये बात कही कि मैं हैरान हुए बिना न रह सका .

मैं वापस आकर सोफे पे बैठ गया .

उसी वक़्त मोटा वापस लौटा और मैडम का अभिवादन करके निकल गया . मैंने सवालिया निगाहों से मैडम एक्स को देखा .

“उपर वाले फ्लैट में नौकर है . चाकू लाने भेजा था सुबह किचन के लिए . क्या ऐन मौके पे एंट्री मारी इसने!”

मेरा जी चाहा मैं अपना सिर पीट लू .

इस बार म्यूजिक सिस्टम में उसका मुझे भेजा हुआ गीत बज रहा था …

…मैं तेरे इश्क में मर न जाऊ कहीं, तू मुझे आजमाने की कोशिश न कर,
खूबसूरत है तू, तो हूँ मैं भी हसीं, मुझसे नजरे चुराने की कोशिश न कर …

मैं कलपा . साली म्यूजिकल बदला ले रही थी .

“मेरी बीवी कहाँ है?” मैं फुफकारा .

“वो अपने घर पे होगी . क्यूँ, आने से पहले उसको हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी विश नहीं किया था तुमने?” उसकी आवाज में कितनी मासूमियत थी .

मैं चिढ़ गया उसके इस अंदाज पे .

“तुमने क्या बताया है मेरी वाइफ को?” मैं उसे फिर से घूरता हुआ बोला .

“कुछ नहीं . और मैं क्यूँ बताऊ? बताओगे तो तुम मिस्टर . आज तक तुम्हारी बीवी तुम्हे पति परमेश्वर समझती है न . अब तुम खुद उसे अपने मुंह से हमारी अधूरी कहानी बताओगे .”

“मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा . समझी .” मैं उसे घूरता हुआ बोला – “और तुम्हारे पास उसकी तस्वीर कहाँ से आई?”

“ओह वो तस्वीर! वो तो मैं पैरेंट बन के तुम्हारी बीवी के स्कूल गई थी काफी पहले . तुम्हारी बीवी से मिल के अपने बच्चे की एडमिशन की झूठी कहानी सुनाई . फिर विदा होते वक़्त उसके साथ एक सेल्फी ले ली और फोन नंबर भी ले लिया . जस्ट सिंपल .” वो आराम से बोली .

कमरे में धीमी आवाज में बजता गाना फिर चेंज हो गया था और ये गाना मैंने भेजा था ….

…क्या खूब लगती हो, बड़ी सुंदर दिखती हो ….
फिर से कहो, कहते रहो, अच्छा लगता है,
जीवन का हर सपना, अब सच्चा लगता है ….

मैंने उसे गौर से देखा . वाकई खुले बालों में वह क्या खूब लग रही थी ! वो भी मेरी आँखों में आँखे डाल के खुल के मुस्कुराई .

“एक बात बताओ . यदि मैं आज नहीं आता तो तुम्हारी ये सारी नौटंकी तो टांय टांय फिश हो जाने वाली थी? फिर क्या करती यदि मैं आज या कभी भी आता ही नहीं तो ?” मैंने पूछा .

“तुमने आज ही आना था माय डिअर .” वो बड़े विश्वास से मुस्कुराते हुए बोली .

“वो कैसे?”

“वो ऐसे कि मैं किसी के हाथों भी तुम्हें अपने नाम के साथ एड्रेस भेज सकती थी लेकिन उससे शायद बात न बनती इसलिए मैं खुद तुम्हारे सामने आई” – ये कहते हुए वह अचानक खड़ी हुई और कहा – “मैं जानती थी मुझे देखते ही तुम मेरे हिस्से की कहानी जानने के लिए फ़ौरन आओगे .” ये कहते हुए उसने एक जोरदार अंगडाई ली .

मैंने अपने आप को कोसा . कैसा उल्लू का पट्ठा था मैं !

“और अब गौर से सच और सिर्फ सच सुनो . और ये मेरी बीवी , मेरे बच्चें , मेरा घर बार बार भजना बंद करो . सिर्फ तुम्हीं एक परिवार वाले नहीं हो . और इतनी ही परवाह थी बीवी की तो बता कर आते या साथ लेकर आते . मैंने तुम्हे डरपोक , कायर , दब्बू कहा तो कौन सा गलत कहा . तुम हो ही कायर .” – वो तमतमाती आवाज में बोली – “सच तो ये है कि मैंने किसी ड्राईवर को तुम्हारे एड्रेस के लिए नहीं भेजा . मेरे पास कोई ड्राईवर ही नहीं है . और सच पूछो तो मैंने तुम्हारा कोई पीछा नहीं किया . तुम इत्तेफाक से ही मिले थे मुझे मॉल में . अपने दोनों बच्चों की कसम , मैं झूठ नहीं बोल रही .”

मुझे मानना पड़ा कि वो सच कह रही थी .

“मैं तो सिर्फ तुम्हे तुम्हारी पत्नी के फोन नंबर और तस्वीर दिखा के चिढ़ा रही थी कि तुम आपा खो बैठे और वाही तबाही बकने लगे . तुम्हारे अंदर का छुपा हुआ चोर बाहर आ गया . मैं तो तुम्हारी रोनी सूरत देख कर हंस रही थी कि तुम अचानक बेवफाई , बदला , मेरे सुखी संसार में आग और पता नहीं क्या क्या हाय तौबा बकने लगे . खुद ब खुद लाउड थिंकिंग करने लगे . मैं भी तुम्हें थोड़ा और तंग करने के लिए थोड़ी एक्टिंग और दिल्लगी करने लगी . पुलिस वाले के आने की वजह से तुम्हे सांप सूंघ गया और बालकनी से कूदने की सोचने लगे . बीवी के आने की खबर सुन के किसी बन्दर की तरह उधम मचाने लगे . रही सही कसर मोहन के अनएक्सपेक्टेड एंट्री ने पूरी कर दी .”

मैं चुपचाप बैठा था .

“एक बात तुम मुझे बताओ! क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं कि मैं तुमसे थोड़ी बहुत दिल्लगी कर सकू ? क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं कि मैं तुम्हारे फेसबुक प्रोफाइल में झाँक सकू ? क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं कि मैं उस इंसान से मिलू जिसने मेरी जगह ले ली ? क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं कि अपने वो दिल के छाले तुम्हे दिखाऊ जो कभी भर न सके ? यकीन मानो परम , मैं तुम्हारा घर कभी नहीं बर्बाद करुँगी . कभी नहीं . मैं तुम्हारी पत्नी को कभी नहीं बताउंगी कि मैं कौन थी .” ये कहते कहते वो रोने लगी .

मेरी आँखे भी नम हो गई .

अचानक वो उठी और एक कमरे में चली गई जो शायद उसका बेडरूम था .

थोड़ी देर बाद वो कमरे से निकली और मेरे सामने खड़ी हुई . उसने हाथ में पकड़ा एक पैकेट मेरी ओर बढ़ाया ये कहते हुए -“हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी माय डिअर .”

“क्या है इसमें?”

“तुम्हारे लिए कुछ नहीं है इसमें! ये एक बहन की तरफ से दूसरी बहन को तोहफा है . भगवान् करे तुम्हारी जोड़ी सदियों तक यूँ ही बनी रहे . तुम दोनों यूँ ही हँसते मुस्कुराते रहो . आमीन ! और खबरदार जो ये लेने से इनकार किया तो ये मुंह पे खीच के एक थप्पड़ माँरूंगी .” वह अपने पुराने तेवर में लौट आई थी .

मैंने बहुत कोशिश की लेकिन मेरे आंसू रुक न पाये और बहते चले गए .

मैंने वो तोहफा थाम लिया फिर किसी तरह रुंधे गले से बोला -“किसी इंसान को इतना भी अच्छा नहीं होना चाहिए कि दूसरों को अपने आप पे शर्म आने लगे .”

“ऐसा कुछ नहीं है परम . हम सब बहुत अच्छे है लेकिन उपरवाले के खेल को आज तक कौन समझ पाया है . शायद उसने मुझसे बेहतर जोडीदार तुम्हारे लिए पहले से ही चुन रखी थी . वाकई तुम्हारी पत्नी लाखों में एक है . अब घर जाओ

, तुम्हारी पत्नी तुम्हारा इंतेजार कर रही होगी .” वो बोल भी रही थी और रो भी रही थी .

मैंने भी सर सहमति में हिलाया और उठ खड़ा हुआ और दरवाजे की ओर बढ़ा .

म्यूजिक सिस्टम में उसका भेजा गीत बज रहा था …

…लग जा गले, कि फिर ये हंसी रात हो न हो …
शायद इस जनम में, मुलाकात हो न हो … लग जा गले …

मैं वापस मुड़ा और उसे देखा . वो दौड़ कर आई और मेरे से लिपट गई . मैंने भी उसे कस के भींच लिया . कितनी देर हम ऐसे ही खड़े रोते रहे .

फिर मैं जबरन उससे अलग हुआ और दरवाजा खोल कर बाहर निकला . वो मेरे पीछे आई और दरवाजा बंद करने से पहले कहा – “जाते जाते मैं तुमसे दो वचन माँगना चाहती हूँ परम . दोगे मुझे दो वचन .” उसकी आवाज में एक अजीब सी कठोरता मैंने महसूस की .

मैंने सर हिला के स्वीकृति दी .

“पहला वचन – ये जनम तो जैसे तैसे कट जायेगा लेकिन अगले जनम में तुम सिर्फ मेरे ही बन के पैदा होना, सिर्फ मेरे पति परमेश्वर और कभी भागना मत मुझे छोड़ के यू कायर .”

मैं निहाल हो गया ये सुन के .

“और दूसरा वचन – आज के बाद इस चौखट पे कदम मत रखना और मुझसे दुबारा इस जनम में मिलने की कोशिश मत करना .”

मैंने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन दरवाजा धडाम से मेरे मुंह पे बंद हुआ

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परमाणु सिंह

परमाणु सिंह

परमजीत सिंह उर्फ़ परमाणु सिंह रांची के एक प्राइवेट स्कूल में कार्यरत है ...फेसबुक पे छोटी छोटी कहानियां पोस्ट करते है अपनी व्यस्त जिंदगी से थोड़ा समय चुराकर I लिखना और पढना इनका पसंदीदा शगल I अपने लेखन का श्रेय ये SMP(प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक) को देते है जिनके नोवेल्स को कमसिन उम्र से पढ़ के ही दीवाने हो गए I 49 वर्ष के है और पहली बार लेखन के क्षेत्र में हाथ आजमा रहे है I निकट भविष्य में दो नोवेल्स प्रकाशित करवाने का इरादा है जिसपे आजकल ये कलम चला रहे है I
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