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यश खांडेकर ने महलनुमा इमारत को ध्यान से देखा। शाम के वक्त हल्की बारिश में पुराने जमाने की वह इमारत भूतिया प्रतीत हो रही थी। इमारत की सभी खिड़कियाँ बंद थी। बाहर से यह कहना असंभव था कि वह किसी पार्टी का आयोजन स्थल है।

वह वहाँ किशोरचंद राजपूत के निमंत्रण पर पहुँचा था। अपने 70वें जन्मदिन के मौके पर किशोरचंद ने कुछ बेहद खास मेहमानों को वहाँ आमंत्रित किया था। शहर के कोने और उजाड़ इलाके में बसी उस इमारत में खुद पहुंचना एक मुश्किल भरा काम था। यश के खुद वहाँ अपनी गाड़ी पर पहुंचने के आश्वासन को नकारते हुए किशोरचंद ने उसे अपनी शोफरचालित गाड़ी के जरिए बुलाया था।

अचानक बारिश तेज हो गयी। यश लगभग दौड़ते हुए इमारत के दरवाजे पर पहुँचा जो बंद था। करीब उसे एक रस्सी नजर आई। जिसे खींचने पर अंदर घंटी बजने की आवाज आई। ऐसा लगा मानों मंदिर में कोई घंटा बजा हो।

दरवाजा खुला….दरवाजा खोलने वाली एक युवती थी। सफेद, झिलमिलाती साड़ी और जगमग मुस्कुराहट के साथ उसने यश का स्वागत किया।

“ जी मैं यश खांडेकर…” यश ने अपना परिचय दिया।

“ पता है…आप हैं द मोस्ट फेमस डिटेक्टिव ऑफ मुंबई…” उसने हँसते हुए कहा।

यश शालीनता से मुस्कुराया।

“ आइये..आइये…बाकी सभी मेहमान पहुँच गये हैं।”

“ आप….” यश ने अपनी बात अधूरी छोड़ी।

“ मैं मिसेज राजपूत…अंजली राजपूत। ” मुस्कुराते हुए उसने जवाब दिया।

यश खामोश हो गया।

दोनों चलते हुए एक हॉल में पहुँचे जहाँ बाकी मेहमान मौजूद थे। करीब दसेक लोगों की मौजूदगी के बावजूद किसी भी सूरत में वह एक पार्टी नहीं लग रही थी। बीच में भले एक बड़ा सा केक रखा हुआ था, लेकिन आमतौर पर घरों में इस्तेमाल की जाने वाली सफेद लाइट की बजाय वहाँ पीली रोशनी फैली थी। दीवारों पर पुराने स्टाइल के वालपेपर लगे हुए थे। लोगों ने अपने हाथों में गिलास थामा था। लेकिन जो सबसे अजीब बात लग रही थी वह वहाँ मौजूद लोगों का गंभीर चेहरा था। सभी अलग थलग या तो अपने-अपने गिलास चुसक रहे थे या फिर सिगरेट या सिगार सुलगाए अपनी ही दुनिया में खोये हुए थे। स्पष्ट था वहाँ मौजूद लोग एक दूसरे से परिचित नहीं थे।

“ आप तब तक कोई ड्रिंक ले लीजिए, मिस्टर राजपूत बस आने ही वाले हैं।” अंजली ने कहा।

“ वो हैं कहाँ?”

“ अपने कमरे में हैं..तैयार हो रहे हैं।”

वह भी वहाँ से विदा हो गयी।

क्या पार्टी है…उसने सोचा।

– – –

बार के काउंटर पर एक ही वेटर तैनात था। जो उतने कम लोगों के लिए पर्याप्त था।

यश वहाँ पहुँचा। उसने जैक डैनियल्स का एक पैग लिया और चुसकते हुए दूसरे लोगों की तरफ बढ़ा।

न जाने उसे क्यों लगा कि उसकी ओर कोई सीधा नहीं देख रहा था। मानों सीधा देखने पर बात करने की जहमत उठानी पड़ेगी।

लेकिन इस बोझिल माहौल में वह और इजाफा नहीं करना चाहता था। लिहाजा वह अपने सबसे करीब व्यक्ति से मुखातिब हुआ।

“ हैलो..”

“ हाय..’ करीब पचास वर्षीय, संभ्रांत दिखने वाले व्यक्ति ने जवाब दिया।

“ काफी कम लोग हैं न यहाँ…शायद बारिश की वजह से कुछ लोग नहीं आये होंगे।”

“ जहाँ तक मुझे पता है, सभी आ गये हैं। लेकिन अगर मुझे पता होता कि ये पार्टी इतनी नीरस होगी तो मैं कभी न आता।” संभ्रांत व्यक्ति ने यश के मन की बात कही।

“ सेम हेयर…” यश हँसता हुआ बोला, “ पता नहीं क्यों इतनी दूर पार्टी ऑर्गनाइज करने का क्या मतलब है। शहर के बीच में करते तो सभी को आसानी होती।”

“ बिल्कुल..मुझे तो सबकुछ बेहद अजीब लग रहा है। अपने जीवन में शायद मैं पहली ऐसी पार्टी में पहुँचा हूँ जहाँ मैं मेजबान को छोड़कर और किसी को नहीं जानता। मुझे आये करीब डेढ़ घंटे हो गये हैं, न तो मिस्टर राजपूत दिखाई दिए और न ही किसी और मेहमान ने बात करने की कोशिश ही की। पता नहीं क्या चक्कर है।”

यश हँसा, फिर उसने अपने गिलास को करीब की टेबल पर रखा और अपने पर्स से अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर सौंपा, “ माईसेल्फ यश खांडेकर, प्राइवेट इनवेस्टिगेटर हूँ।”

“ अरे…आप हैं यश खांडेकर….मैंने आपके बारे में पेपर में पढ़ा था।” उसने अपना कार्ड निकालकर यश को सौंपा, “ मैं महेश शर्मा…पेशे से क्रिमिनिल लॉयर हूँ।”

“ आप मिस्टर राजपूत को कैसे जानते हैं?” यश ने पूछा।

“ करीब पाँच साल पहले उनके एक मामले को हमारी फर्म ने हैंडल किया था। फर्म की तरफ से मैं ही खड़ा हुआ था कोर्ट में। मिस्टर राजपूत से तभी से परिचय है। और आप..”

“ सेम हेयर..मैंने भी उनका एक केस हैंडल किया था।”

“ इफ यू डोंट माइंड, आप बता सकते हैं कैसा केस था।”

“ नॉट श्योर मिस्टर शर्मा…आशा है आप मेरी मजबूरी समझ सकते हैं।”

“ श्योर..श्योर..हमलोग भी अपने अदालती मामले के बारे में दूसरों से बात नहीं कर सकते। लेकिन मैं जरा गॉसिप पसंद हूँ।”

दोनों एकसाथ हँसे।

“ मिस्टर शर्मा..यहां बहुत शांति है…क्यों न दूसरों से भी बात किया जाये। जरा रौनक बढ़ेगी।”

दोनों के कदम एक खूबसूरत महिला की ओर बढ़ें।

– – –

यश और महेश सामने मौजूद खूबसूरत महिला से कोई बात करते इससे पहले उन्होंने अपने पीछे हलचल सी महसूस की। दोनों ने घूम कर देखा तो किशोरचंद राजपूत अपनी बीवी के साथ ग्रैंड एंट्री कर रहा था। उसने सफेद कोट, सफेद पैंट और जूते भी सफेद पहने थे। गले में लाल और सफेद धारियों का मफलर लिपटा हुआ था। सिर के बाल पूरे सफेद थे लेकिन भरे हुए थे। चेहरे से उसके मानों रोशनी निकल रही थी। एकाएक कोई देखे तो उसे सत्तर वर्षीय बताना नामुमकिन था।

पता नहीं किशोरचंद के व्यक्तित्व में ऐसा क्या था कि सभी तालियां बजाने लगे। यश ने देखा सबके चेहरे किशोरचंद को देखकर खिल उठे थे। लंबे इंतजार की नाराजगी गायब हो गयी थी।

“ सबसे पहले तो मैं इस मौसम में भी आप सभी के आने पर दिल से आभार जताता हूँ..” हाथों में स्कॉच का गिलास थामे बुलंद आवाज में किशोरचंद ने कहा, “ और देर से आने के लिए आप सबसे माफी का तलबगार हूँ। दरअसल तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी। होप मेरी गैरहाजिरी में आपको किसी किस्म की तकलीफ नहीं हुई होगी।”

लोगों ने मुस्कुराते चेहरे के साथ किशोरचंद को आश्वस्त किया।

“ आप सभी का यहाँ आना एक खास मकसद के लिए है। उसे मैं थोड़ी देर में बताऊंगा लेकिन सबसे पहले औपचारिकताएँ पूरी कर ली जायें…”

किशोरचंद विशाल केक की तरफ बढ़ा। एक नौकर ने आकर उसपर एक मोमबत्ती जला दी थी।

किशोरचंद ने केक काटा, अपनी बीवी को खिलाया। लेकिन कुछ केक उसके चेहरे और कुछ आँखों में भी लगा दिया।

अंजली चेहरा धोने के लिए निकल गयी।

लोगबाग, हैप्पी बर्थडे, बुदबुदाने लगे।

यश ने गौर किया किशोरचंद के चेहरे पर एक दृढ़ता सी थी।

दो वेटर, केक सर्व करने लगे। किशोरचंद सभी से एक-एक करके हाथ मिलाने लगा। वो यश के करीब पहुँचा, “ जासूस साहब..आज की पार्टी की शान आप हो सकते हैं..” उसने कहा।

यश कुछ समझा नहीं, बावजूद इसके वो मुस्कुराया।

किशोरचंद आगे बढ़ गया।

मेल-मिलाप के बाद किशोरचंद ने नौकरों को वहाँ से रुखसत किया। फिर वह हॉल के बीच में आया और एक कुर्सी पर बैठ गया।

“ प्लीज बी सीटेड..” उसने कहा।

हॉल में मौजूद कुर्सियों पर मेहमान बैठ गये। अंजली भी चेहरा धोकर आ गयी थी।

सबके बैठने के बाद वहाँ एक सन्नाटा सा छा गया। किशोरचंद मानों कुछ सोच रहा था। शायद अपनी बात कैसे शुरू करे।

“ आज मेरा जन्मदिन है। सत्तरवाँ जन्मदिन। आप सभी को यहाँ दावत केवल मेरे जन्मदिन की पार्टी में शरीक होने के लिए नहीं दी गयी है बल्कि कारण एक और है…और वो कारण है..मेरी मौत…”

किशोरचंद की बात ने मानों वहाँ धमाका सा किया।

यश ने गौर किया, बावजूद इसके किशोरचंद मुस्कुरा रहा था।

क्या है वृद्ध के जेहन में… उसने सोचा।

“ जनाब मैंने जीवन में कई रंग देखे हैं। ऐसा कोई सुख नहीं जो मैंने नहीं भोगा। लेकिन फिर भी मैं मरना नहीं चाहता। जितनी देर हो सके मैं अपनी मौत को टालना चाहता हूँ…मेरे ख्याल से ये ख्यालात हर किसी के होंगे। लेकिन कोई एक शख्स है जो मुझे इस दुनिया से अभी, इसी वक्त विदा करना चाहता है..और उस शख्स की गारंटी है कि मैं कल का सूरज नहीं देख सकूंगा।”

वहाँ खलबली सी मच गयी। अब तक एक दूसरे का चेहरा न देख रहे मेहमान एक दूसरे से खुसुर-पुसुर करने लगे।

किशोरचंद आगे बढ़ा, “ मुझे मारने के तमन्नाई शख्स ने मुझे एक चिट्ठी लिखी थी। जिसमें आज की तारीख यानी 26 दिसंबर का जिक्र है। उसका दावा है कि वह मुझे आज मार देगा। मेरी हत्या होकर रहेगी और दुनिया की कोई ताकत मुझे बचा नहीं सकती..मैं 27 दिसंबर का सूरज नहीं देख सकूंगा।”

यश ने गौर किया अंजली राजपूत विचलित नजर आ रही थी।

“ आप सभी की यहाँ मौजूदगी का एक खास कारण है…आप सभी अपने-अपने क्षेत्र के माहिर लोग हैं। कोई क्रिमिनल लॉयर है, कोई जासूस, कोई मिस्ट्री लेखिका, कोई जज तो कोई पुलिस इंस्पेक्टर है तो कोई और कुछ। यहाँ मेरे बचपन का दोस्त जगदीशलाल भी मौजूद है। जो पेशे से लॉयर है। जनाब आप सभी कल सुबह तक के लिए मेरे मेहमान हैं। ऐसा नहीं है कि मैं जबरन आप सभी को रोक के रखना चाहता हूँ लेकिन आपसे गुजारिश है कि मुझे एक दिन की मेहमाननवाजी का मौका दें। अगर फिर भी किसी को आपत्ति है तो वो जा सकता है। उसके जाने के प्रबंध मैं कर दूंगा। नहीं तो आप सभी एक रात यहाँ गुजारिये। कल सुबह आप सभी को घर पहुँचा दिया जायेगा।”

एक क्षण के लिए वह अपने वक्तव्य का प्रभाव देखने के लिए ठिठका, सभी मंत्रमुग्ध होकर उसकी बात सुन रहे थे, “ इस बीच आप सभी के लिए भी एक चैलेंज रहेगा। हो सकता है और नहीं भी हो सकता कि मेरी हत्या करने का तमन्नाई इस वक्त यहाँ मौजूद हो। अगर उसे कोई ढूंढ लेता है तो उसे मैं 10 लाख रुपये दूंगा। अगर हत्यारा कामयाब हो जाता है और मैं मारा जाता हूँ, तो भी हत्यारे को ढूंढ निकालने की सूरत में आपको 10 लाख रुपये मिल जायेंगे। मेरा दोस्त जगदीशलाल इसे सुनिश्चित करेगा।”

यश ने किशोरचंद की निगाहों का पीछा किया तो एक ठिगना सा शख्स दिखा। शायद वही जगदीशलाल था लेकिन उसके चेहरे से भी स्पष्ट था कि उसे भी इन सबकी जानकारी, अभी-अभी मिली है।

“ आपलोगों को कुछ पूछना है?”

अबतक खामोश रहे मेहमानों को एक पल के लिए तो कुछ न सूझा लेकिन फिर मानों प्रश्नों की बाढ़ आ गयी। सभी एक साथ बोलने लगे।

यश खामोश था।

“ आपको किसी पर शक है?” एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति ने पूछा।

शायद वो पुलिस इंस्पेक्टर है…यश ने सोचा।

“ जी शक तो है..लेकिन मैं वो अपने तक ही रखना चाहता हूँ। मैं नहीं चाहता कि मेरा हत्यारा यह समझ जाये कि मेरा शक उसपर ही है।”

“ आपने पुलिस सुरक्षा क्यों नहीं ली?” किसी ने सवाल किया।

“ ये मेरा घर है..यहाँ मैं महफूज हूँ। इसके अलावा आप सब तो हैं ही..” किशोरचंद ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

“ आप अपने आपको कमरे में बंद करके भी रख सकते थे।” किसी और ने कहा।

“ रख तो सकता था, लेकिन आज तक मैंने पीठ नहीं दिखाई अब, गॉड फॉरबिड, आखिरी वक्त में क्यों ऐसा करना?”

सवालों का सिलसिला करीब 10 मिनट तक चला। फिर सबके सवाल मानों खत्म हो चले।

“ क्या मैं वो चिट्ठी देख सकता हूँ?” यश ने कहा।

किशोरचंद ने अपनी जेब से निकाली और यश की ओर बढ़ायी, “ मेरी गुजारिश है कि आप इसे सबके सामने जोर से पढ़ें ताकि सभी इसका कंटेंट जान सकें।”

यश ने चिट्ठी को देखा। वो एक अच्छी क्वालिटी वाले बॉन्डेड पेपर था जिसपर हिंदी में कंप्यूटर से टाइप करके प्रिंट निकाला गया था।

“ चिट्ठी पढ़ने से पहले मैं जानना चाहता हूँ कि आपको यह पत्र कहाँ से मिला..” यश ने फिर पूछा।

“ये कोई मेरे डाक में डाल गया था। एक आम सादे लिफाफे में था जिसे मैं फेंक चुका हूँ।”

“ कब आई थी चिट्ठी?”

“ एक हफ्ते पहले..”

“ लिफाफे पर क्या लिखा था?”

“ केवल मेरा नाम?”

“ प्रिंटेड या हाथ से?”

“ हाथ से..पेन से..बॉल पॉयंट पेन से लिखा हुआ था।”

“ आपको लिफाफा फेंकना नहीं चाहिए था।”

“ दरअसल मेरा नाम जरूर लिखा था लेकिन ऐसा लग रहा था किसी ने अपनी हैंडराइटिंग को बिगाड़ कर लिखा है…शायद उल्टे हाथ से लिखा था। वो किसी काम का न लगा मुझे।”

“ फिर भी वो एक इम्पॉर्टेंट क्लू है..उसे फेंकना नहीं चाहिए था।”

“ अब क्या हो सकता है..मैंने तो उसे अपने फायर प्लेस में फेंक दिया।”

यश अवाक हो गया।

फिर उसने चिट्ठी पढ़नी शुरू की।

सेठ किशोरचंद राजपूत…तुम्हारी जिंदगी के दिन अब पूरे हो गये हैं। तु्म्हारे पाप का घड़ा अब भर चुका है। आज से सात दिन बाद तुम्हारे जन्मदिन के दिन तुम्हारी हत्या हो जायेगी। चाहें लाख पहरे बैठा लो..चाहें कोई भी इंतजाम कर लो..तुम्हारी जान जाकर रहेगी। तुम 27 जनवरी की सुबह नहीं देख सकोगे।

यश ने चिट्ठी किशोरचंद को लौटा दी।

“ एक बात बताइये..आपने इस चिट्ठी को सीरियसली क्यों लिया? हो सकता है कि कोई आपसे मजाक कर रहा हो?” यश ने पूछा।

“ मुझे चिट्ठी पर पूरा भरोसा है। सबसे पहले तो मेरे लगभग 15-20 करीबी लोगों को छोड़कर मेरे जन्मदिन की तारीख भी किसी को नहीं मालूम। मैंने आज से पहले कभी अपने जन्मदिन की पार्टी भी नहीं दी। संभावित हत्यारे को इसकी जानकारी होना ये साबित करता है कि वो कोई करीबी है। वो कोई प्रैंक नहीं कर रहा। अगर ये मजाक है तो मजाक सही। आप सभी बस एक रात मेरी मेहमाननवाजी का लुत्फ लीजिये और फिर कल खुशी-खुशी अपने घर जाइये।”

सभी किशोरचंद को देख रहे थे। न जाने यश को क्यों ऐसा फील हो रहा था कि सब बलि दिए जाने से पहले बकरे को निहार रहे थे।

“ आप सभी इंजॉय कीजिए। मैं चेंज करके आता हूँ फिर आप सभी के साथ बैठता हूँ।”

किशोरचंद अकेला वहाँ से रुखसत हुआ।

क्या वो जीवित लौटेगा….कइयों मन में सवाल था।

– – –

किशोरचंद के वहाँ से हटते ही वहाँ हलचल सी मच गयी। सभी एक दूसरे से बात करने लगे। यश ने देखा अंजली राजपुत चुपचाप बैठी हुई है। वह उसके करीब पहुँचा।

“ हैल्लो..” उसने कहा

“ हाय…आइये बैठिए।” अंजली ने जवाब दिया।

“ आपको चिट्ठी के बारे में पता था?” यश ने पूछा

“ नहीं…सबके साथ मुझे भी पता चला।”

“ कौन भेज सकता है चिट्ठी?”

“ भेजने वाला इनका कोई भला चाहने वाला तो हरगिज नहीं हो सकता।”

“ आपको किसी पर शक है?”

“ नहीं…जहाँ तक मुझे पता है बिजनेस में वह बेहद ईमानदार रहे हैं। कर्जे-वर्जे की भी कोई समस्या नहीं। न ही किसी एंटी सोशल एलिमेंट्स के साथ उनके किसी मेल-मिलाप की मुझे कोई खबर है।”

“ आपने शायद गौर नहीं किया…चिट्ठी में लिखा था पाप का घड़ा भर चुका है। इसका क्या मतलब हुआ? उनकी निजी जिंदगी कैसी थी। आई मीन प्राइवेट लाइफ?”

अंजली हिचकिचाने लगी..

“ देखिए..” यश ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, “ यहाँ मामला जीवन-मरण का है। प्लीज आप बेहिचक कह सकती हैं। आप जो भी कहेंगी मेरे बाहर वो नहीं जायेगा।”

अंजली ने कुछ क्षण सोचा, “ मिस्टर राजपूत, कम से कम शादी के पहले वुमेनाइजर रहे हैं। मुंबई की हाई सोसाइटी में उन्हें एवरग्रीन कैसेनोवा कहा जाता है। उम्र के बावजूद न तो महिलाओं में उनकी दिलचस्पी कम हुई थी और न ही महिलाओं की उनमें। सुना तो मैंने ये तक है कि उन्हें कोई पसंद आ जाये तो उसे हासिल करने का कोई तरीका वो बाकी नहीं रखते।”

“ क्या शादी के बाद भी वो ऐसे ही हैं।”

अंजली उदास हो गयी, “ देखिए मेरे पास कोई कॉन्क्रीट प्रूफ तो नहीं लेकिन ऐसा अगर हो तो मुझे कोई बहुत आश्चर्य नहीं होगा।”

यश ने इस मुद्दे को अधिक छेड़ना उचित नहीं समझा। तभी उसने देखा महेश शर्मा हाथों में गिलास थामे उसे इशारे से अपने पास बुला रहा था।

“ मैं आता हूँ थोड़ी देर में।” यश ने कहा।

अंजली ने सहमति में गर्दन हिलायी।

वो महेश शर्मा के करीब पहुँचा।

“यार ये बोझिल पार्टी तो रौनक वाली बन गयी।” वो चहकते हुए बोला। स्पष्ट था उसे नशा हो रहा था।

“ बाकी सब मेहमानों का क्या कहना है।” यश ने पूछा।

“ कह तो नहीं रहा कोई लेकिन लगता तो है उन्हें भी मजा आ रहा है..एक्साइटिंग यू नो।”

“ अरे मैं पूछ रहा हूँ ये हत्या वाली चिट्ठी के संबंध में उनकी क्या राय है?”

“ ओह्ह…वो…सभी की अपनी-अपनी थ्योरी है…आओ देखते हैं सब क्या कह रहे हैं।”

बाकी सभी मेहमान अपनी कुर्सियों घुमा कर घुट-घुटकर बात कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानों कोई राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस चल रही थी।

“ मैंने थाने में कॉल करने की कोशिश की थी लेकिन यहाँ मोबाइल का नेटवर्क काम नहीं कर रहा है। शायद खराब मौसम की वजह से ऐसा हो रहा है। यहाँ मैं किसी किस्म की वारदात होना अफोर्ड नहीं कर सकता।” हट्टे-कट्टे व्यक्ति ने कहा।

“ वो पुलिस इंस्पेक्टर है…नाम है जागीर सिंह…” महेश फुसफुसाया।

“ मुझे लगता है ये कोई प्रैंक हो सकता है। हम नाहक परेशान हो रहे हैं। लेकिन ये माहौल…ये सिचुएशन..मेरी अगली किताब की कहानी बनने वाले हैं।” मुस्कुराते हुए उसी महिला ने कहा जिससे यश व महेश ने पहले बात करने की कोशिश की थी।

“ एक्सक्यूज मी..” यश ने उच्च स्वर में कहा।

सभी उसकी ओर घूमे..

“ देखिए इस अजीबोगरीब हालात में हम सब इकट्ठा हो गये हैं। किसी तरह के ईनाम में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं लेकिन इस रहस्य से पर्दा मैं जरूर उठाना चाहूंगा। तो क्यों न हम इकट्ठे काम करें। शायद किसी की जान जाने से बच जाए..”

सब भावहीन चेहरे के साथ उसे देखे जा रहे थे।

यश आगे बढ़ा, “ इसके लिए हम सिस्टेमैटिक ढंग से काम करना होगा। सबसे पहले तो एक दूसरे का परिचय हासिल कर लें..और सभी अपनी थ्योरी सामने रखें कि क्या हो सकता है। इसमें मैं मिसेज राजपूत को भी शामिल करना चाहूंगा।”

“ ओके..ठीक है…” बाकी सब मेहमान बुदबुदायें..

अंजली को बुलाया गया। वो भी एक कुर्सी पर बैठ गयी।

“ सबसे पहले तो मैं अपना परिचय दे दूं। मैं यश खांडेकर…पेशे से प्राइवेट इनवेस्टिगेटर..”

“ मैं सीमा देशभक्त चौहान…मैं एक लेखिका हूँ।” खूबसूरत महिला ने कहा।

“ देशभक्त…? ये सचमुच आपके नाम में शामिल है?” चेहरे से ड्रग एडिक्ट लगने वाले एक शख्स ने कहा।

“ हाँ…सचमुच शामिल है…आपको कोई तकलीफ है?”

“ नहीं मुझे क्या तकलीफ हो सकती है..” वो हड़बड़ाया, “ वैसे मैं चार्ली बस्टर…पेशे से कार्ड आर्टिस्ट हूँ।”

“ कार्ड आर्टिस्ट? आप पत्ते लगाते हैं क्या?” सीमा ने व्यंग्य किया।

“ भले ही आप व्यंग्य कर रही हैं लेकिन यह सही है..कार्ड्स के साथ मैं कुछ भी कर सकता हूँ। वर्षों की मेहनत के साथ ये पॉसिबल हो पाता है। इट्स ऐन आर्ट..”

“ मैं विश्वनाथ वर्मा…मैं रिटायर्ड जज हूँ।” बुद्धिमता की छाप लिए एक वृद्ध ने बताया।

“ मैं महेश शर्मा..क्रिमिनल लॉयर..”

“ जागीर सिंह..पुलिस इंस्पेक्टर।”

“ जगदीशलाल…लॉयर..”

“ चंदेश्वर प्रसाद..डॉक्टर..”

“ रमनलाल नोपानी…फिल्म डायरेक्टर..”

“ मेरा ख्याल हम सभी मिसेज अंजली राजपूत को जानते हैं। तो आगे बढ़ते हैं। आप सभी अपने दिमाग का इस्तेमाल करें और इस पूरी घटना पर आपकी विशिष्ट राय क्या है वो पेश करें तो शायद हमें आसानी हो..जहाँ तक मुझे लगता है यहाँ मौजूद कोई भी केवल पैसे कमाने के लिए अपनी थ्योरी को गुप्त नहीं रखना चाहता होगा।”

सबके सिर एक साथ इन्कार में हिले।

पुलिस इंस्पेक्टर जागीर सिंह ने पहल की, “ मुझे लगता है कि प्रैंक नहीं है। कोई सचमुच नफरत करता है मिस्टर राजपूत से। लेकिन मुझे नहीं लगता कि वो यहाँ आ सकता है या फिर हममें से कोई है। हम सबकी मौजूदगी में उसका कुछ कर गुजरना भी मुझे यकीन के काबिल नहीं लगता। बावजूद इसके जरूरी है कि हम एहतियात बरतें और मिस्टर राजपूत को कम से कम आज की रात अपनी आँखों से ओझल न होने दें।”

“ एक मिनट…” लेखिका सीमा देशभक्त चौहान ने कहा, “ मुझे ये किसी की शरारत लगती है। किसी ने जानबूझ कर मिस्टर राजपूत को परेशान करने के लिए ऐसी चिट्ठी डाली है। ये एक प्रैंक हो सकता है।”

“ मैडम आप भले लेखिका हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि आपको सचमुच के क्राइम डिटेक्शन का कोई तजुर्बा है..” कार्ड आर्टिस्ट चार्ली का कहना था। स्पष्ट था वो लेखिका से खार खाये बैठा था। उसने आगे कहा, “ अव्वल तो प्रैंक करने वाले को मिस्टर राजपूत की बर्थडे का पता होना चाहिए जो कि उन्होंने पहले ही कहा कि बहुत कम लोगों को, केवल करीबियों को ही, इसके बारे में पता है। दूसरा प्रैंक करने के लिए कोई इतनी तकलीफ क्यों करेगा। इतनी दूर, उजाड़ जगह पर आना और इमारत की डाक में उसे डाल देना आसान नहीं। उसने ये सबकुछ किया सभी किस्म का खतरा मोल लेकर। इसके अलावा चिट्ठी डालते समय किसी के द्वारा देख लिए जाने का खतरा भी उसके सामने जरूर मौजूद होगा। फिर भी उसने ऐसा किया।”

यश को उसकी बात जंची।

“ आप क्या कहते हैं जासूस साहब?” सीमा ने पूछा।

“ मुझे मिस्टर चार्ली की बात ठीक लगती है। लेकिन जो विशिष्ट बात मुझे चिट्ठी में स्ट्राइक कर रही है वो ये कि लिखने वाला कोई भी हो सकता है। मर्द या फिर औरत..कोई भी। चिट्ठी से लिखने वाले के लिंग का पता नहीं चलता।”

यश की बात सुनकर वहाँ सन्नाटा छा गया।

चुप्पी लेखिका ने ही तोड़ी। जाहिर था वाचाल प्रवृत्ति की थी, “ और क्या स्ट्राइक कर रहा है आपको?”

यश ने कुछ क्षण सोचा, “ चिट्ठी लिखने वाले को हिंदी टाइपिंग आती है। उसके पास गाड़ी है जिससे वो इस उजाड़ स्थान पर आकर चिट्ठी डाल सके। वो मिस्टर राजपूत को करीब से जानता है..उनका बर्थडे उनकी निजी आदत सबकुछ। संभावित हत्यारे ने काफी रिसर्च किया है या फिर उसे किसी और तरीके से मालूम है।”

“ मैं कुछ कहना चाहूंगा..” डॉक्टर चंदेश्वर प्रसाद ने कहा।

“ जी…प्लीज…” लेखिका ने उसे बढ़ावा दिया।

“ मुझे जासूस साहब की बात से पूरा इत्तफाक नहीं है। जरूरी नहीं कि उसके पास कोई गाड़ी हो..हो सकता है कि उसका कोई साथी है जिसने अपनी कार से यहाँ आकर चिट्ठी डाली रिसर्च की कोई बात नहीं क्योंकि मिस्टर राजपूत ने खुद कहा है कि 15-20 लोग उसके बर्थडे के बारे में जानते हैं, तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उन 15-20 लोगों ने आगे ये बात किसी को कही हो और जिसे कही हो वो आगे और भी किसी को कह सकता है….और जहाँ तक हिंदी टाइपिंग की बात है आजकल तो ऐसे ऐप्प आ गये हैं कि आप बोलेंगे और अपने आप टाइप हो जायेगा।” डॉक्टर ने मार्के की बात कही।

“ जी बिल्कुल..ऐसा हो सकता है। लेकिन टाइपिंग करना ज्यादा फीजिबल लगता है। ऐसा नहीं है कि मिस्टर राजपूत अंग्रेजी नहीं पढ़ सकते लेकिन उन्हें पत्र हिंदी में लिखा गया…और कोई हत्या करना चाहे तो इसके चांसेज कम ही होते हैं कि कोई अपना राजदार किसी दूसरे को बनाये। इसलिए मैंने कहा कि हत्यारे की खुद की गाड़ी हो सकती है।”

“ पाप का घड़ा भर चुका होने से क्या मतलब है…?” अचानक फिल्म डायरेक्टर रमनलाल नोपानी ने कहा।

कुछ क्षण के लिए खामोशी छा गयी।

“ इसका यही मतलब है..” लेखिका ने कहा, “ कि किसी की नजर में मिस्टर राजपूत ने कई गुनाह किए हैं।”

“ कैसे गुनाह…” फिल्म डायरेक्टर ने पूछा।

“ वो गुनाह कुछ भी हो सकते हैं…” यश ने सावधानी बरतते हुए कहा।

“ मेरा ख्याल है कि हमें इस एंगल पर सोचना चाहिए। हो सके तो मिसेज राजपूत ही बतायें इस बारे में।” फिल्म डायरेक्टर यश की लाइन पर ही चल रहा था।

सबकी नजरें मिसेज राजपूत की ओर उठी। यश ने देखा अंजली के करीब बैठा डॉक्टर थोड़ा परे सरक गया और वो भी अंजली की ओर देखने लगा।

वो कुछ कहती इससे हॉल में किशोरचंद राजपूत ने कदम रखा।

अभी तक तो मरा नहीं…कइयों के जेहन में विचार कौंधा..

– – –

“ अरे आपलोग खामोश क्यों हो गये…भई पार्टी है इन्जॉय कीजिए…” किशोरचंद की बुलंद आवाज गूंजी।

देखते ही देखते वहाँ दो वेटर प्रकट हुए। गोलाकार बैठे मेहमानों के बीच में टेबल लग गई। उसपर जाम भी सज गये। सभी टेबल के करीब सरक आयें।

किशोरचंद आकर अंजली के करीब की कुर्सी पर बैठ गया।

सबने अपने सामने रखे गिलासों को थामा। अंजली ने भी।

“ ये जाम है…” गिलास को टेबल पर ही थामे किशोरचंद ने कहा, “ लाइफ के नाम…” सभी टेबल पर ही किशोरचंद की भांति गिलास को थामे रहे, “ वो लाइफ जो हर पल हसीन है…इस लाइफ का हर पल मजा लेना ही जीवन है…चीयर्स…”

सभी ने एकसाथ गिलास को टकराया…

फिर सबने घूंट भरा।

उम्दा स्कॉच थी…यश ने महसूस किया। अब पाप का घड़ा भर चुका है के संबंध में ठीक से किशोरचंद ही कुछ कहे तो बात बने…उसने सोचा।

“ मिस्टर राजपूत..” यश ने कहा।

‘यस..”

“ यहाँ हम सब बात कर रहे थे…चिट्ठी लिखने वाले ने पाप का घड़ा भरने की बात कही…क्या आपने किसी किस्म का गुनाह किया है?”

“ नेवर…मैंने आज तक किसी का हक नहीं मारा..मैंने हमेशा लोगों को इज्जत ही दी है। ये सही है कि कभी खूबसूरत औरतों को मैं कुछ ज्यादा ही पसंद करता था या फिर ताश के शौक जैसे छोटे-मोटे ऐब हैं मुझमें लेकिन मेरी जानकारी में मैंने कोई ऐसा गुनाह कभी न किया जिसकी वजह से कोई मेरी जान लेना चाहे।”

झूठ बोल रहा है…यश ने सोचा…लड़कियों के पीछे उसने कई ऐसे काम किये हैं जिससे वह फंसा है। एक बार तो खुद उसने उसे बचाया था।

“ खैर हम किस बदमजा टॉपिक को लेकर बैठे हैं। हमें इन्जॉय करना चाहिए। मौत आयेगी तो आयेगी। लेकिन जब तक जिंदगी है उसका मजा लेना चाहिए। है कि नहीं…” उसने यश से मुस्कुराते हुए पूछा।

फिर एकाएक किशोरचंद ने अपना ग्लास टेबल पर रखा। उठ खड़ा हुआ और अपने शर्ट को दोनों हाथों से थाम कर फाड़ने सा लगा। शर्ट के दो बटन टूट गये।

सभी हैरानी से उसे देख रहे थे।

तभी यश अपनी कुर्सी से तेजी से उठा उसने किशोरचंद को थामा…उसकी आँखें उलट गई थी। भगदड़ सी मच चुकी थी।

मल्टी मिलियनेयर सेठ किशोरचंद राजपूत को फर्श पर लिटाया गया।

डॉक्टर चंदेश्वर प्रसाद तेजी से उसपर झुका…

“ ओ गॉड….” डॉक्टर ने कहा।

वो मर चुका था।

– – –

अंजली राजपूत की चीख ने सबकी तंद्रा भंग की।

वो लगातार चीखे जा रही थी।

फैमिली फ्रेंड व लॉयर जगदीशलाल ने उसे थामा और कुर्सी पर बैठाया।

वेटरों को समझ नहीं आ रहा था क्या करे।

तभी जागीर सिंह का मोबाइल बजा।

उसने हैरत से अपने मोबाइल की ओर देखा फिर उसने कॉल रिसीव की।

उसने जल्दी से सारी स्थिति बतायी और बैक अप भेजने के लिए कहा।

जाहिर था फोन उसके थाने से ही था। लगता था फोन का नेटवर्क ठीक हो गया था।

यश ने अपना फोन निकाला।

नेटवर्क था।

“ हत्यारा जुबान का खरा निकला….” लेखिका ने कहा।

“ लेकिन मौत कैसे हुई…” चार्ली ने पूछा।

“ प्रिलिमिनरी ऑब्जर्वेशन से लगता है कि जहर है…” डॉक्टर ने कहा।

“ लेकिन जहर दिया कैसे गया?” जागीर सिंह ने पूछा।

“ जाहिर है स्कॉच के ग्लास में..” लेखिका का कहना था।

“ सबकी नजरें दोनों वेटरों की ओर उठी।

दोनों थर-थर कांपने लगे।

“ मुझे नहीं लगता इसमें इनका हाथ है..” यश ने कहा।

“ क्यों?” जागीर सिंह ने पूछा।

“ वेटरों के गिलास टेबल पर रखने के बाद मिस्टर राजपूत बैठे थे। मतलब वेटर्स यह नहीं जान सकते थे कि मिस्टर राजपूत कहाँ बैठने वाले थे। ऐसे में वो जहर किस गिलास में मिलाते?”

“ हो सकता है जहर सभी गिलास में मिलायी गयी हो..” जज विश्वनाथ वर्मा ने आशंका प्रकट की।

सभी के चेहरों पर आतंक व्याप्त हो गया।

कुछ देर तक सभी अपने जिस्म में किसी किस्म के बदलाव की प्रतीक्षा करने लगे। लेकिन जब कोई गड़बड़ न हुई तो सभी ने चैन की साँस ली।

“ जहर केवल मिस्टर राजपूत के ही गिलास में था…” जज ने कहा।

“ इसका मतलब है कि मिस्टर राजपूत के बैठने के बाद गिलास में जहर मिलाया गया। वो कहाँ बैठे थे?” जागीर सिंह ने कहा।

‘‘ अपनी पत्नी के बगल में…” इसबार महेश शर्मा ने कहा।

अपना जिक्र होते सुनकर अंजली की सिसकियाँ रुकी..उसने घूमकर सबको देखा…

“ आपलोग ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं? मैं क्या अपने ही पति को मारूंगी..”

सभी खामोश हो गये।

“ मुझे सबकी तलाशी लेनी होगी..” जागीर सिंह ने कहा।

सबकी तलाशी ली गयी..कुछ आपत्तिजनक न मिला।

“ मैडम.. मुझे अब आपके कमरे की तलाशी लेनी है.” जागीर सिंह ने कहा।

“ किसलिए? मैं और मिस्टर राजपूत तो एक ही कमरे में रहते थे।”

“ उसी कमरे की लेनी है तलाशी।”

सभी एकसाथ अंजली के कमरे की ओर बढ़े।

यश ने देखा कमरा करीने से सजा हुआ था। हॉल का बोझिलपन वहाँ नदारद था। तेज लाइट और दीवारों पर ब्राइट रंग की छटा थी। बड़े रूम में विशाल बेड था, कमरे के बाहर बालकनी नजर आ रही थी। बीच में कांच का दरवाजा था। भीतर से पता चल रहा था बाहर तेज बारिश हो रही थी।

“ बेड पर आप कहाँ सोती हैं?” इंस्पेक्टर ने पूछा।

“ इधर..”

तकिये, गद्दों आदि को हटा कर देखा गया। कुछ न मिला।

“ आलमारी खोलिए..”

आलमारी खोली गयी। हालांकि आधे घंटे की मशक्कत के बाद भी कुछ आपत्तिजनक न मिला।

“ मैडम अब आपकी की भी तलाशी जरूरी है। प्लीज अपना हैंडबैग खोलिए।”

अंजली ने अपने कंधे से लटकते बैग को खोला।

सबसे ऊपर ही कांच की एक शीशी थी जिसमें सफेद रंग के टैबलेट भरे हुए थे।

“ ये मेरा नहीं है….” हैरत के साथ शीशी को देखते हुए अंजली ने कहा, पता नहीं कैसे यहाँ आ गया।”

इंस्पेक्टर ने शीशी को लिया..शीशी पर छपे लेबल को पढ़ा…

“ ये घातक जहर है..” उसने घोषणा की…

सब अवाक हो गये।

“ हालांकि इसे लैब में चेक करना भी जरूरी होगा।”

अंजली धम्म से बेड पर बैठ गयी।

– – –

सभी एक बार फिर हॉल में मौजूद थे। स्थानीय थाने से अभी तक टीम नहीं पहुँची थी। गोलाकार तरीके से सभी मेहमान फिर से बैठे थे। हालांकि इस बार उसमें अंजली शामिल नहीं थी। वो करीब ही अकेली कुर्सी पर बैठी सिसक रही थी। किशोरचंद की लाश को परे चादर से ढंक कर रखा गया था।

वेटर समझ नहीं पा रहे थे कि मेहमानों को ड्रिंक्स सर्व करें या नहीं। हालांकि जगदीशलाल के कहने पर ड्रिंक्स सर्व किए गये।

“ हैरत की बात है आखिर मिसेज राजपूत अपने ही पति का कत्ल क्यों करना चाहेंगी?” जज ने कहा।

“ पैसा..रोकड़ा..माल…दुनिया के ज्यादातर अपराध के पीछे यही कारण है..” लेखिका ने अपना ज्ञान बघारा।

“ लेकिन सवाल उठता है..” यश ने कहा, “ मिसेज राजपूत आखिर घोषणा करके क्यों कत्ल करना चाहेंगी?”

“ भई घोषणा तो हुई ही न?’ महेश ने कहा, “ हत्यारे ने घोषणा की और कत्ल हुआ। जिसने भी कत्ल किया उसने तो ऐसा ही किया। तो फिर ऐसा मिसेज राजपूत क्यों नहीं कर सकती?” उसकी बात में दम था।

“ मेरा मतलब है कि मिसेज राजपूत के पास कत्ल करने के कई मौके होंगे। आखिर उन्होंने वह वक्त क्यों चुना जब सभी एकसाथ हो। अगर उन्हें नहीं पता था कि चिट्ठी के बाद मिस्टर राजपूत पार्टी में कई लोगों को बुला लेंगे तो वो आज कत्ल नहीं करती। कल कर देती। कौन सा उन्होंने आज ही के दिन कत्ल करने की भीष्म प्रतिज्ञा की थी?” यश ने कहा।

“ एक सेकेंड के लिए अगर हम मान लें कि उन्होंने कत्ल नहीं किया तो संभावित हत्यारे को कैसे पता कि वह पार्टी में इनवाइटेड होगा? हो सकता है कि उसे पार्टी में बुलाया ही नहीं जाता..फिर क्या होता? कैसे करता वो कत्ल?” लेखिका ने कहा।

वाजिब सवाल था..जिसने सबकी जुबान पर ताला लगा दिया।

“ अगर मिसेज राजपूत ने कत्ल नहीं किया तो इसका एक ही मतलब निकलता है..” यश ने कहा, “ कि कातिल को यकीन था कि उसे पार्टी में बुलाया जायेगा।”

“ कैसे यकीन हो सकता है?” जज का कहना था, “ मैं अपनी बात कहूं तो करीब तीन वर्ष पहले तक मैं मिस्टर राजपूत से विभिन्न पार्टियों में मिलता रहता था, तब दोस्ती हुई। उसके बाद से कभी-कभार ही कॉन्टैक्ट होता था। अगर मैं कातिल हूँ तो मुझे कैसे पता कि मुझे इनवाइट किया जायेगा।”

“ मैं भी वर्षों बाद ही उनसे मिला हूँ।” महेश ने कहा।

“ मुझसे से तो वो महीने में दो-तीन बार मिल ही लेते थे। मैं तो फैमिली डॉक्टर हूँ।” चंदेश्वर प्रसाद ने सकपकाते हुए कहा।

“ मैं भी हफ्ते में उनसे एक बार जरूर मिलता था। मिस्टर राजपूत मेरे क्लब ताश खेलने आते थे। दो बार मैं ताश की महफिल में यहाँ भी आया था।” चार्ली ने कहा।

“ मैं उनसे एक साल पहले महज एक बार मिली थी। मेरे बुक की लॉन्चिंग थी। उसमें मिस्टर राजपूत इनवाइटेड थे। वहाँ मुझसे काफी बातचीत हुई थी।” सीमा देशभक्त चौहान ने कहा।

“ मैं तो आज से पहले उनसे कभी नहीं मिला..” जागीर सिंह ने कहा, “ मैं तो स्थानीय थाने का इंस्पेक्टर हूँ। शायद चिट्ठी की वजह से मुझे दावत दी गयी।”

“ मैं तीन साल पहले मिला था।” यश ने कहा।

“ मैं उनका फैमिली फ्रेंड और लॉयर भी हूँ। मैं महीने में दो-तीन बार मिल ही लेता हूँ। लेकिन पार्टी की जानकारी मुझे आज ही मिली थी।” जगदीशलाल ने कहा।

चुप्पी छा गयी। फिर सबकी निगाहें अंजली की ओर उठी जो अब शांत थी।

“ मैं सच कहती हूँ न तो मुझे चिट्ठी के बारे में पता था और न ही मैंने उन्हें जहर दिया है। आज पार्टी होगी इसके बारे में उन्होंने मुझे सुबह ही बताया और वह भी सभी मेहमानों को सूचना देने के बाद।” अंजली ने कहा।

कुछ देर तक सभी खामोशी से स्कॉच का घूंट लगाते रहे। यश सोच रहा था।

“ इंस्पेक्टर साहब…क्या मैं एकबार फिर से कमरे की तलाशी ले सकता हूँ।” यश ने पूछा।

“ चलिए…सब चलते हैं।”

सब एकबार फिर से कमरे में पहुँचे। यश ने तलाशी शुरू की। इस बार यश एक-एक चीज ध्यान से देख रहा था। उसकी तलाश जहर नहीं बल्कि उसकी निगाहें सब पर थी। आखिर में उसे सफलता मिली।

कागजों का एक पुलिंदा मिला।

एक लिफाफे में वसीयतनामा था। जिसमें सारी संपत्ति पत्नी को दी गयी थी।

कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स भी थी।

“ आपको इन सबके बारे में कुछ पता है?” यश ने चंदेश्वर प्रसाद से पूछा।

“ नहीं..यह सही है कि मैं उनका डॉक्टर था लेकिन पिछले छह महीने से न तो उन्होंने मुझे अपनी जांच करने दी थी न ही किसी किस्म की तकलीफ बतायी थी। हममें पेशेंट-डॉक्टर का रिश्ता नहीं था। हम दोस्त थे।”

यश ने कागजों को डॉक्टर को थमाया, “ क्या मतलब निकलता है इन रिपोर्ट्स का जरा बतायेंगे?”

डॉक्टर ने अध्ययन किया। उसके चेहरे पर भारी हैरत के भाव थे।

“ ये…ये..कैसे हो सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक मिस्टर राजपूत को दिल की गंभीर बीमारी थी। एक अन्य डॉक्टर ने इसे लाइलाज बताया है और इस रिपोर्ट के तहत तो उनकी उम्र ज्यादा नहीं बची थी।”

“ आपको ये बात पता थी?” यश ने अंजली से पूछा।

“ नहीं…” अंजली के चेहरे पर हैरानगी के भाव बता रहे थे कि वह सच कह रही है।

सब हॉल में फिर से पहुँचे।

“ दोस्तों…मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ मिसेज राजपूत अपने पति की कातिल नहीं हैं..मिस्टर राजपूत का कत्ल..” वह एक क्षण के लिए ठिठका, “ मिस्टर राजपूत ने खुद किया है। यानी उन्होंने आत्महत्या की है।”

सब स्तब्ध रह गये।

– – –

“ दरअसल मिस्टर राजपूत जो कि चंद दिनों के मेहमान थे अपनी बीवी से नाखुश थे। मैंने देखा कि किस तरह उन्होंने केक अंजली जी के चेहरे के अलावा उनकी आँखों में भी लगाया मानों एक सैडिस्ट थॉट से ग्रसित थे। दरअसल उन्हें अपनी बीवी पर शक था।” सब हैरान होकर कभी यश को कभी अंजली को देख रहे थे। जो सिर झुकाये हुए थी।

“ मिस्टर राजपूत भले ऊपर से मजबूत दिखते थे लेकिन अब हम जानते थे कि उन्हें दिल की बीमारी थी। लेकिन सवाल उठता है कि इतनी गंभीर बीमारी होने और भीतर से नाजुक हालत होने पर भी उन्होंने अपने दोस्त..अपने डॉक्टर दोस्त चंदेश्वर प्रसाद को इसके बारे में क्यों न बताया? तो जवाब है कि उन्हें अपने दोस्त और अपनी बीवी के संबंध पर शक था। इसके अलावा और कोई वजह नहीं हो सकती। बीवी को भी इसी वजह से उन्होंने नहीं बताया। जैसा कि हम चर्चा कर रहे थे कि हत्यारे को कैसे पता कि उसे पार्टी में इनवाइट किया जायेगा तो जवाब है कि जब इनवाइट करने वाला ही हत्यारा हो तो यह मुमकिन हो सकता है। मिस्टर राजपूत की ख्वाहिश थी कि अपनी हत्या का वह ड्रामा स्टेज करके अपनी पत्नी को गुनहगार ठहरा दें। उनकी मौत तो यूं भी जल्द ही होने वाली थी लिहाजा वह चाहते थे कि जाते-जाते बीवी को भी फंसा कर जायें। इसलिए उन्होंने जहर या तो पहले ही खा लिया था या फिर नजर बचाकर अपने ड्रिंक में डाला। उनके लिए यह आसान था, बस बातचीत में ड्रिंक का हाथ जरा सा टेबल के नीचे करना था और दूसरे हाथ से जहर मिला देना था। जहर की शीशी भी पहले ही उन्होंने बैग में रख दी होगी। आखिर उनके बेडरूम में अंजली जी का बैग हमेशा पड़ा ही रहता होगा।”

जागीर सिंह का सिर सहमति में हिल रहा था।

“ दोस्तों…सबके सामने जहर कैसे कोई मिला सकता है। कोई जादूगर हो तो बात दूसरी है। मिस्टर राजपूत के ड्रिंक में जहर मिलाने का मौक सिर्फ उन्हें ही हासिल था। अपने घर की डाक में चिट्ठी डालने का अवसर भी उनके पास ही था। लिफाफे को बड़ी आसानी से उन्होंने नष्ट भी कर दिया। इतना वाइटल क्लू कोई फेंक नहीं देता। फिर न तो उन्होंने पुलिस को इसकी सूचना दी और न ही किसी और को। किया क्या? उन्होंने किया तो एक पार्टी दे दी और कह दिया कि आज मेरा कत्ल होगा, बचा सकते हो तो बचा लो मुझे।”

इंस्पेक्टर प्रभावित नजर आ रहा था। “ आपमें और मिसेज राजपूत में क्या कोई रिलेशन है?” उसने चंदेश्वर से पूछा।

चंदेश्वर ने सिर झुका लिया।

– – –

सुबह होने की थी। तबतक स्थानीय थाने की टीम वहाँ पहुंच गयी। शव के चित्र वगैरह लिए गये। लाश को फिर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।

“ मिसेज राजपूत..” जागीर सिंह अंजली से मुखातिब हुआ, “ प्राथमिक तौर पर आपको संदेह का लाभ दिया जा रहा है लेकिन जांच अभी जारी रहेगी। आपसे रिक्वेस्ट है कि शहर के बाहर आप जाती हैं तो मुझे बताकर जाइयेगा।”

अंजली ने सहमति में सिर हिलाया। पुलिस पार्टी विदा हुई।

मेहमानों के भी जाने का वक्त हो चला था।

“ मिस्टर राजपूत ने जो वादा किया था वो जरूर पूरा होगा..” अंजली ने यश से कहा, “ आपको 10 लाख रुपये मैं जरूर दूंगी।”

यश खामोश रहा।

सभी मेहमानों के विदा होने के बाद आखिर में जाने वाला वह था।

– – –

चार्ली बस्टर अपने क्लब में अकेला बैठा स्कॉच चुसक रहा था। उसके सामने ताश की एक गड्डी थी। उसने ताश के पत्तों को सामने बिछाया और फिर बिजली की गति से उसे वापस समेटा और शफल किया। उसने तीन पत्ते अपने सामने टेबल पर फेंके।

तीनों इक्के थे।

कितना आसान था सबकुछ…उसने सोचा। सभी उसके बिछाये जाल में आ गये। वो जासूस भी। आखिर में उसने अपनी बहन की मौत का बदला ले ही लिया….सेठ किशोरचंद राजपूत को मौत की नींद सुलाकर। अपनी जुए की लत की वजह से किशोरचंद उसके करीब आ गया था। उसने भी खूब उसकी मदद की…ताश में जीत दिलाने के जरिए। वो तो उसके बायें हाथ का खेल था। फिर चिट्ठी लिखी। डाक में डालना उसके लिए आसान था। आखिर दो बार वह खुद उसके घर गया था। आखिरी बार उसने आराम से डाक में चिट्ठी को रख दिया था। अपना सब राज बताने वाले किशोरचंद ने उसे चिट्ठी की बाबत भी उसे बताया। उसे बताना ही था। फिर खुद उसने किशोरचंद राजपूत को सुझाया कि वो कुछ खास लोगों को इनवाइट करे ताकि वह सबके सामने सेफ रहे सकेगा। इसके अलावा वह खुद भी सब पर नजर रखेगा। मार तो उसे वह पहले ही सकता था लेकिन जरूरत थी कि मौत के इंतजार में वह तड़पे। लेकिन साले ने ये नहीं बताया था कि यूं भी वो मरने वाला है। पट्ठे ने पार्टी तो बुलायी लेकिन साथ में चैलेंज और ईनाम भी जोड़ दिया। चार्ली मुस्कुराया। लेकिन लाभ क्या हुआ…बच तो नहीं सका न वो कमीना…उसकी मासूम बहन ने उस कमीने की खातिर आत्महत्या की थी। अब उसकी आत्मा को शांति मिलेगी। वो तो हवा में उड़ रहे मच्छर को नींद में पकड़ ले, स्कॉच में जहर मिलाना क्या मुश्किल काम था? पार्टी में उसे शराब पीते हुए किशोरचंद के करीब आने का मौका भर मिलने की देर थी। जहर मिलाना उसके लिए चुटकी बजाने जैसा काम था। अच्छा हुआ सबके साथ वो टेबल पर शराब के साथ बैठा और चीयर्स किया। उसे ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। लेकिन अफसोस इस बात का था कि उसे अपने से ध्यान हटाने के लिए अंजली को फंसाना पड़ा। जहर की शीशी उसके बैग में रखनी पड़ी। भला हो उस जासूस का जो उसने अंजली को बेगुनाह साबित किया।

उसने अपना ग्लास खाली किया और ताश के पत्तों को फिर से तेजी से समेट कर पैकेट में रख दिया।

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आनंद कुमार सिंह

आनंद कुमार सिंह

आनन्द कुमार सिंह प्रभात खबर अखबार में सीनियर रिपोर्टर हैं। वह कलकत्ता में रहते हैं। उन्होंने अब तक दो किताबें : 'हीरोइन की हत्या' और 'रुक जा ओ जाने वाली' लिखी हैं। जहाँ 'हीरोइन की हत्या' एक रहस्यकथा है वहीं 'रुक जा ओ जाने वाली' एक रोमांटिक लघु-उपन्यास है। वह अब अपने तीसरे उपन्यास के ऊपर काम कर रहे हैं। जब वह रिपोर्ट या उपन्यास नहीं लिख रहे होते हैं तो उन्हें किताबें पढ़ना, शतरंज खेलना, संगीत सुनना और फिल्में देखना पसंद है। वह पिछले तीन वर्षों से कलकत्ता प्रेस क्लब के चेस चैंपियन हैं। अगर आप उनसे सम्पर्क करना चाहते हैं तो उन्हें निम्न ई मेल अड्रेस पर मेल करके उनके साथ सम्पर्क कर सकते हैं: anand.singhnews@gmail.com
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