साहित्य विमर्श एंड्रॉयड एप

0 0 वोट
पोस्ट को रेट करें

हमको बचपन से ही सिखाया जाता है कि कभी किसी के साथ बुरा मत करो क्योंकि ईश्वर सब देख रहा होता है और इसके अलावा हमको बचपन से ये भी सिखाया जाता है कि बुरे कर्मों के फल हमको इसी जन्म में मिलते हैं लेकिन अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर मैं ये कह सकता हूँ कि कुछ काम ऐसे भी होते हैं जहाँ किसी के भले के लिए किसी का बुरा करना भी जरूरी होता है पर मन में एक अजीब सी दुविधा उत्पन्न हो जाती है कि करूँ या न करूँ? अगर आप नासमझ हो तो इस दुविधा से पार पाना बेहद कठिन नजर आता है लेकिन यदि आपके पास थोड़ी सी भी  दुनियादारी की समझ है तो ये दुविधाएँ आपके समक्ष बस एक अनुभव बनकर रह जाती हैं जिनको आप खुद तक सीमित रख सकते हो या लिखकर सारी दुनिया के सामने पेश कर सकते हो।

ऐसी ही एक घटना का साक्षी मैं भी हूँ  जहाँ मुझ जैसा इंसान भी एक अजीब सी कशमकश में फंस गया था। खैर, मुझे आज तक नहीं पता कि मेरे द्वारा किया गया ये कृत्य पुण्य की श्रेणी में आएगा अथवा पाप की श्रेणी में?

कहानी कुछ इस प्रकार शुरू होती है…..

बात पाँच साल पहले की है। दिसम्बर के आखिरी हफ्ते की किसी रात को लगभग 8:30 बजे मैं अपनी बाइक पर सवार होकर बाज़ार में किसी काम से निकला था और काम पूरा करके अपने घर लौट रहा था। इधर सर्दी अपने पूरे शवाब पर थी और मंथर गति से चलती हुयी हवा जिस्म में नश्तरों की भांति चुभ रही थी और उधर वातावरण मैं फैली धुंध इशारा कर रही थी कि कोहरा किसी भी पल आकर रात को अपनी आगोश में बस कैद कर लेने ही वाला था। सर्दी एवं आने वाले कोहरे के मद्देनजर अधिकांश दुकानें या तो बंद हो चुकी थीं या बंद होने की कगार पर थीं। फ़क़त यही वजह थी कि बाज़ार में चहल-पहल भी अपेक्षाकृत कम थी और उसी समय अचानक सासनी गेट चौराहे से गुजरते समय मुझे किसी ने आवाज लगाकर पुकारा। चलती बाइक को मैंने ब्रेक लगाकर देखा तो पाया कि आवाज लगाने वाले हमारे शर्माजी थे।

शर्माजी विद्यालय में मेरे साथी अध्यापक थे, उम्र में मुझसे काफी बड़े थे परंतु मेरे ख़ास मित्र थे और बेहद दिलचस्प आदमी थे। दिलचस्प इस मामले में थे कि बेचारे हर समय समस्याओं से घिरे रहते थे और समस्याएँ भी ऐसी जो कभी किसी ने सुनी तक न हो। मसलन जहाँ दूसरों की पत्नी झगड़ कर मायके जाती है वहाँ इनकी पत्नी ने झगडा किया और अपने मायके वालों को बुला लिया और लगातार छः दिन तक वो लोग इनके घर पर डेरा जमाये रहे वो भी इतनी महंगाई के ज़माने में। दूसरों की मोटरसाइकिल चोरी हो जाती है लेकिन शर्माजी के घर के बाहर कोई चोरी की मोटरसाइकिल छोड़ गया और शर्माजी का चैन अपने साथ ले गया। पूरे दो दिन बाद शर्माजी का मोटरसाइकिल और पुलिस से पीछा छूटा था। ऐसी कई समस्याएँ और भी हैं लेकिन जिस समस्या के बारे में मैं आपको बताने जा रहा हूँ वो कुछ अलग सी है।

शर्माजी की आवाज सुनकर मैंने तुरंत बाइक मोड़ी और शर्माजी के पास ले जाकर रोकी। बाइक से उतरकर मैंने उनपर औचक सवाल दागा, “क्या बात है शर्मा जी, इतनी सर्दी में यहाँ क्या कर रहे हो?”

“अपनी किस्मत पर रो रहा हूँ। खैर ये बता कि तुझ पर कुछ रूपये पड़े हैं?” शर्माजी ने मायूसी भरे स्वर में पूछा।

“क्यों ऐसा क्या हो गया अब? रूपये घर भूल आये हो क्या?” जवाब में मैंने भी उनसे पृश्न पूछा।

“अरे नहीं यार! 500 का नोट लेकर आया था लेकिन नोट नकली है। मेरी तो किस्मत ही ख़राब है, अब देख आखिरी हफ्ता है और ले देकर एक ये ही 500 का नोट बचा था और वो भी नकली निकल आया। एक काम कर मुझे 500 रूपये उधार दे दे।”

कहते समय समय शर्माजी परेशान लग रहे थे और उनकी परेशानी जायज भी थी। एक तो प्राइवेट स्कूल में अध्यापक मतलब कम तनख्वाह, दूसरी बढती महंगाई, तीसरी पूरे परिवार की जिम्मेवारी और इस पर अगर 500 रूपये का एक नोट, वो भी आखिरी वाला, नकली निकल आये और कहीं चल भी न पाए तो जनाब परेशान होना लाजिमी है। खैर मदद तो मुझे करनी ही थी। लेकिन कैसे? मेरा दिमाग समस्या के सारे संभावित समाधानों को सोचने में लग चुका था।

मैंने कुछ सोचा और शर्माजी से कहा, “शर्माजी, जरा नोट मेरे हवाले करना, मैंने आजतक जिन्दगी में नकली नोट नहीं देखा।”

मेरे इतना कहते ही शर्मा जी ने अपनी जैकेट की जेब से 500 का वो जाली नोट निकालकर मुझे सौंप दिया। जैसा कि हर हिन्दुस्तानी 500 के नोट और एक्स-रे की फिल्म को हाथ में थामकर रोशनी की तरफ देखता है। चाहे वो उसके बारे में जानता कुछ भी न हो, वही हरकत मैंने भी की और नोट को वहीँ जलते बल्ब की रोशनी की ओर घुमाया। मुझे पता ही नहीं चला कि वो नोट नकली क्यों था। खैर, मैंने शर्माजी का नोट उनको थमाया और अपने पर्स को जेब से बाहर निकाला और उसमें से अपना आखिरी वाला 500 का नोट निकाला। मेरी जेब भी अब खाली हो चुकी थी और पूरा हफ्ता गुजर-बसर तो मुझे भी करनी थी। नोट निकालते समय शर्माजी के मायूस चेहरे पर प्रसन्नता का भाव देखकर मेरी उनको नोट देने की इच्छा तो कर रही थी लेकिन फिर मुझे अपनी खाली जेब और आने वाले पूरे हफ्ते का भी ख्याल आया। इधर मन अजीब दुविधा में फँसा हुआ था उधर रात की सर्द हवा और धुंध बढती जा रही थी।

खैर मैंने दोनों नोटों को रोशनी में देखा तो मुझे उनमें एक दो अंतर साफ़ नजर आ रहे थे। शर्माजी का नोट मैंने उन्हें सौंप दिया, अपने नोट को थामकर शर्माजी मुझे बिना कुछ कहे देखे जा रहे थे शायद वो मेरी मनोस्थिति को भांप चुके थे। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मौजूदा हालात से कैसे निबटा जाए, यदि मैं उनको अपना आखिरी वाला 500 का नोट दूं तो पूरे हफ्ते मेरे लिए दिक्कत और अगर न दूं तो शर्माजी को दिक्कत। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था, ऐसी स्थिति में मेरा दिमाग अक्सर तेजी से काम करता है और उस दिन भी कर रहा था। मेरे दिमाग में तुरंत ही एक योजना पनपी।

मैंने शर्माजी से कहा, “शर्माजी, तुम अपने इस नकली नोट का क्या करोगे?”

“क्या करूँगा? फाड़ के फेंक दूंगा और क्या करूँगा।” वो बोले।

“अच्छा! अगर मैं कहूं कि शायद मैं इस नोट को चला दूं तो?” मैंने शर्माजी से पूछा।

“चल जाएगा? मैंने चार दुकानों पर चलाने की कोशिश की है लेकिन किसी ने भी नहीं लिया। तू कैसे चला देगा भाई?” शर्माजी ने बड़े अचरज भरे शब्दों में पूछा।।

“एक आखिरी कोशिश तो कर ही सकते हैं न, बस एक काम करो, एक कलम का जुगाड़ करो कहीं से और मुझे ये बताओ कि इस मोहल्ले का सबसे चतुर दुकानदार कौन सा है जो तुमको जानता न हो।”

“यार उस पंसारी पर चला दे, वो सीधा-सादा है।”

“शर्माजी, जिन्दगी में एक बात ध्यान रखना कि किसी सीधे इंसान के सीधेपन का कभी नाजायज फायदा मत उठाना।” मैंने उनको ज्ञान दिया।

“ठीक है, नहीं उठाऊँगा, तो उस पेटीज वाले लाला पर चला दे। वो बहुत चतुर बनिया है।” शर्माजी ने उस दुकानदार की तरफ इशारा करते हुए कहा जिसकी दुकान पर पेटीज से लेकर घर की जरूरत का सारा सामान मौजूद था।

शर्माजी ने प्रश्नसूचक नजरों से मुझे देखते हुए अपनी जेब में से कलम निकालकर मेरे हवाले की और पूछा, “आखिर, कलम का करोगे क्या?”

जवाब में मैंने उनको केवल इतना कहा कि ‘तुम बस तेल देखो और तेल की धार देखो’ और उनसे कलम लेकर मैंने अपने असली वाले नोट पर पीछे की तरफ एक बड़ा सा क्रॉस बना दिया और उसको अपने पर्स में रख लिया। उनको भी मैंने उनका नकली नोट उनके पर्स में रखने का इशारा किया। शर्माजी मेरी हर हरकत को बड़ी ही हैरत से देख रहे थे, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे दिमाग में चल क्या रहा था? अपनी पूरी तैयारी करके मैंने शर्माजी को कलम वापस थमाई और कहा, “आओ शर्माजी, गुनाह करते हैं।”

मैंने अपनी बाइक को वहीँ साइड में खड़ा किया और हम दोनों सीधे उस दुकान की तरफ बढ़ गए जिसकी तरफ शर्माजी ने इशारा किया था। रास्ते में मैंने शर्माजी को समझा दिया था कि उनको केवल जरूरत पड़ने पर ही कुछ बोलना था। दुकानदार एक चालीस के लपेटे में पहुँचा हुआ आदमी था जिसकी बाहर निकली हुयी तोंद ऊनी कपड़ों में भी नहीं छुप रही थी।  वो अपनी दुकान को समेटना शुरू कर चुका था लेकिन हम दोनों को देखकर उसने सामान समेटना बंद कर दिया। जाते ही मैंने उससे पूछा, “चचा, डेरी मिल्क की 50 रूपये वाली चॉकलेट है?”

“वो तो नहीं है लाला रे, लेकिन 20 रूपये वाली है। दो 20 वाली ले जाओ और एक 10 वाली, हो गयी 50 रूपये की।” उसने तुरंत ही अपनी चतुराई का परिचय दिया।

“अरे चचा, भतीजा जिद कर गया है कि बड़ी वाली चॉकलेट ही लेगा और तुम तो जानते ही होगे कि ‘राज हठ’, ‘त्रिया-हठ’ और ‘बाल-हठ’ के आगे किसी की कहाँ चलती है। है न?”

“सही कह रहे हो लालासेन, अगर ये बात है तो अमूल की बड़ी वाली चॉकलेट ले जाओ, केवल 60 रूपये की है।” हमारी मजबूरी समझ कर उसने चॉकलेट का मूल्य तुरंत 10 रूपये बढ़ा दिया और अपने घाघ होने का सबूत पेश किया।

“वो कबसे 60 की हो गयी? वो भी तो 50 रूपये की आती है।”

“लालासेन, तुमको नहीं पता अमूल का सारा माल ब्लैक में मिल रहा है इसलिए तो अमूल के सारे प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ गए हैं।” उसने हमको तुरंत दलील दी।

“ऐसी बात है तो लाओ एक दे दो, अब लेनी तो है ही।”

वो तुरंत अन्दर गया और एक अमूल की चॉकलेट निकाल के ले आया। अब मेरे प्लान की बारी थी। मैंने उसको अपने पर्स में से निकालकर अपना क्रॉस बनाया हुआ असली नोट थमाया और कहा, “चचा, मुझे किसी ने ये नकली नोट चेप दिया है इसे चला लो।”

उसने नोट पर बना क्रॉस देखा और फुर्ती से नोट को मेरी तरफ बढ़ाकर कहा, “लालासेन, क्यूँ गरीबमार कर रहे हो? मेरी तो पूरे दिन की कमाई भी इतनी नहीं होती | खुले ही दे दो या दूसरा दे दो।”

“चचा, यही एक नोट बचा है और खुले भी नहीं हैं।”

“तो इन भाईसाहब से ले लो।” उसने शर्मा जी की तरफ इशारा किया।

“ठीक है मुझसे ले ले, बाद में दे दियो।” इतना कहकर शर्मा जी ने अपने पर्स में से अपना नकली नोट निकाल कर तुरंत दुकानदार को थमाया। उस चतुर दुकानदार ने नोट के असली या नकली होने की जांच अब केवल क्रॉस देखकर की और उस पर कोई क्रॉस न पाकर उसने वो नोट अपने गल्ले में डाल दिया और 440 रूपये मुझे लौटा दिए। रूपये और चॉकलेट लेकर हम उस दुकान से बला की तेजी से वापस अपनी बाइक की तरफ लौटे। शर्मा जी को अब भी यकीन नहीं हो पा रहा था कि वो 500 का नोट चल गया और वो भी पूरे 500 में।

चॉकलेट मैंने शर्मा जी के हवाले कर दी और उनको अपनी बाइक पर बिठा कर वहीँ थोड़ा दूर स्थित उनके घर की तरफ चल पड़ा। रास्ते में उन्होंने मुझसे पूछा कि दुकानदार ने आखिर 500 का नोट ले कैसे लिया। जवाब में मैंने उनको बताया कि पहले जब असली नोट को मैंने नकली बताकर उसको दिया तो उसने केवल क्रॉस देखकर ही वो नोट मुझे वापस कर दिया, इससे उसके दिमाग में उस समय ये बात भर गयी कि जिस नोट पर क्रॉस नहीं होगा वो असली होगा और दूसरी बात कोई भी इंसान एक ही ट्रिक को, एक ही आदमी पर एक ही समय में दो बार नहीं पेलता। बादबाकी उसकी चालाकी, अतिरिक्त 10 रूपये कमाने का लालच और इतनी सर्द रात में घर जाने की जल्दी उसको ले डूबी। शर्मा जी का घर आ चुका था, उन्होंने बाइक से उतरकर मुझको अपने धन्यवादों से लाद दिया और अपने घर के अन्दर दाखिल हो गए। मैं भी अपनी राह लग चला।

अब ये सोचना आपका काम है कि मैंने गलत किया या सही। एक तरफ मैंने शर्मा जी का नकली नोट चलवाकर उनकी मदद की थी तो दूसरी तरफ मैंने दुकानदार को नकली नोट चेप दिया था। एक तरफ शर्माजी का फायदा किया था और दूसरी तरफ दुकानदार का नुकसान किया था। निर्णय देना आपके हाथ में है।

पुनश्चः – दुकानदार बहुत चतुर था और उसने वो नोट किसी और को चेप दिया होगा, फाड़कर नहीं फैंका होगा।

समाप्त।

0 0 वोट
पोस्ट को रेट करें
सबस्क्राइब करें
सूचित करें
guest
0 टिप्पणियाँ
इनलाइन प्रतिक्रिया
सभी टिप्पणियाँ देखें

.

साहित्य विमर्श

साहित्य विमर्श

हिंदी साहित्य चर्चा का मंच कथा -कहानी ,कवितायें, उपन्यास. किस्से कहानियाँ और कविताएँ, जो हमने बचपन में पढ़ी थी, उन्हें फिर से याद करना और याद दिलाना

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

Powered by सहज तकनीक
© 2020 साहित्य विमर्श
0
आपके विचार महत्वपूर्ण हैं। कृपया टिप्पणी करें। x
()
x