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अध्याय 22 : पार्वती और गूजरी

सबेरे ससुर-दामाद के आरे जाने पर एक काली युवती मुंशी हरप्रकाशलाल के दरवाजे पर आई। ड्योढ़ीदार ने पूछा – “क्या चाहती है?”
युवती ने हँसकर कहा – “भीतर जाना चाहती हूँ।”
एक देहाती स्त्री के मुँह से ऐसी हिन्दी सुनकर ड्योढ़ीदार ने कुछ आश्चर्य के साथ उसके मुँह की तरफ देखा। युवती बोली-“क्या देखते हो?”
ड्योढ़ीदार ने अचकचाकर कहा – “आप भीतर जाइये। जनाने में जाइये। वह भीतर चली गई।”
यह काली युवती गूजरी है। दाई के द्वारा गूजरी बुलाये जाने पर पार्वती के पास आई और सिर से पैर तक उसको देखकर बोली- “तुम्ही मुंशीजी की बहू हो?”
पार्वती ने शरमाकर सिर नीचे कर लिया, कुछ जवाब नहीं दिया।
गूजरी – “समझ गई, तुम्ही बहूजी हो।”
पार्वती – “किसलिये आना हुआ है?”
गूजरी बोली – “मैं बड़ी दुखिया हूँ। मेरा एक छप्पर खर का था वह आग लगकर जल गया। अगर मैं भी उस में जल मरती तो मेरा सब दुःख दूर हो जाता। तुम्हारे पति ने उस आग से मुझे बचाकर कहा- ‘देखो तुम नवमी के दिन एक बार मेरे घर आना मैं घूमने के लिए तुम्हे कुछ रुपया दूँगा।’ इसीसे उनको ढूँढती  हुई आई हूँ।”
दाई – “तू त बड़ बेहया मेहरारू बुझाताडू। काल्हि राति के एघरे चोरी हो गइल ह आ तू आजू अनगुत्ते भीख माँगे अइल ह।”
पार्वती ने दाई पर जरा नाराज होकर कहा-“चोरी की बात उसे क्या मालूम! उसको उन्होंने आने के लिए कहा था इसलिये वह आई है।”
गूजरी- “मैंने सुना था कि तुम्हारे मायके में डाका पड़ा था; यहाँ भी डाका पड़ा?”
दाई- “आहिरे दादा! मुंशीजी इनका खातिर दस हज़ार रुपय्या का गहना बनवा ले आइल रहलनि हं। उ सब चोरा ले गइलन स।”
पार्वती-“क्या जाने अभी हमारे भाग्य में क्या-क्या लिखा है। मुझे बड़ा डर लगता है कि वे गये हैं उनपर कुछ आफत न आवे।”
गूजरी – “बहूजी! तुम डरो मत, मैं  कहती हूँ तुम्हारा बुरा कभी नहीं होगा।”
“मैं जानती हूँ मेरी ज़िन्दगी दुःख ही में बीतेगी, नहीं तो मुझे आठ वर्ष की छोड़कर मेरी माँ क्यों मर जाती?” यह कहकर पार्वती सिर नीचे किये सिसकने लगी।
गूजरी का गला भर आया। पार्वती का मलिन मुँह उससे देखा नहीं गया। वह अपना दुःख भूल गई और उसकी ठोड़ी धरकर मुँह उठाकर अपने आँचल से आँसू पोछती हुई भरी आवाज में बोली-“बहू! तुम लक्ष्मी हो, जिसका मुँह देखने से कलेजा ठंडा होता है वह क्या कभी दुःख पाता है? तुम रोओ मत,तुम्हारे पति का कभी अशुभ नहीं होगा, रामजी उनका भला करें। जिस दिन तुम्हारे सब गहने तुम्हारे बदन पर देखूँगी उसी दिन मेरा जीना सफल होगा। बहूजी! इस अभागिन कंगालिनी को याद रखना।”
इतना ही कहकर गूजरी चली गई; जहाँ तक नज़र गई, पार्वती अकचका कर उसकी ओर देखती रही।

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