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अध्याय १४ : पातालपुरी

हीरा सिंह जब ठाकुर जी की आरती लेकर लौटा तबतक एक पहर दिन चढ़ गया था। अभी तक भोला राय वहीँ पर उसी तरह बैठा था। हीरा सिंह ने सोचा कि भोला का ढंग अच्छा नहीं है, इस समय उसको हाथ में न रखने से पीछे आफत आवेगी।

यह सोचकर उसने भोला के पास जाकर उसका हाथ पकड़ा और कहा – “क्या करते हो राय जी। आओ चलो कुछ बातें करनी हैं।’

भोला चुपचाप उनके साथ चला। हीरा सिंह उसको साथ लेकर पहले कहे हुए पातालपुरी में गया, वहां उसके शरीर पर हाथ फेरकर प्रेमपूर्वक बोला – “क्या भोला राय। पहले तुम भी मुझे नहीं जानते थे और मैं भी तुम्हें नहीं जानता था परन्तु इन बारह वर्षों में हम एक दुसरे में इतना प्रेम हो गया है कि जितना शायद बाप-बेटे में भी नहीं होता। परन्तु एक समय मुझे भी तुम भूल जाओगे। तब दुसरे से तुम्हारा प्रेम होगा, तुम उसको अपना समझोगे। संसार का यही नियम है। इसीलिए गूजरी के लिए तुम इतना क्यों हाय-हाय करते हो? गूजरी तुम्हारी कौन थी? उससे तुम्हारा क्या सम्बन्ध था? रुपया से सुख है।”

भोला – “तू राक्षस है, पशु है, मेरा दुःख तू क्या समझेगा? रूपये में सुख होता तो मैं सुखी रहता। रूपये से मैं एक दिन भी सुखी नहीं हुआ, रूपये से मुझे सुख नहीं होगा, मुझे रुपया नहीं चाहिए। मैं सिर्फ उसी गूजरी को चाहता हूँ।”

हीरासिंह – “ तुम्हारी तो स्त्री मौजूद है, उसे लाकर अपने पास रखो। वह अब युवती हो गयी है, अब शायद वह तुम्हें पसंद आ जायेगी।”

यह कहकर हीरा सिंह भोला को पातालपुरी में बैठाकर आप अपने दफ्तर आया। वहां दरोगा फ़तेहउल्ला के नाम एक चिट्ठी लिख भेजी। चिट्ठी पाने के साहत ही दरोगा साहब ने दल-बल जाकर हरप्रकाश लाल का मकान घेर लिया।

अध्याय १३ : ठाकुरबाड़ी

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भोजपुर की ठगी : अध्याय १४ : पातालपुरी

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