हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे […]
सेन साहब की नई मोटरकार बँगले के सामने बरसाती में खड़ी है—काली चमकती हुई, स्ट्रीमल इंड; जैसे कोयल घोंसले में कि कब उड़ जाए. सेन साहब को इस कार पर नाज है — बिल्कुल नई मॉडल, साढ़े सात हजार में आई है. काला रंग, चमक ऐसी कि अपना मुंह देख लो. कहीं पर एक धब्बा […]
महीनों से मन बेहद-बेहद उदास है। उदासी की कोई खास वजह नहीं, कुछ तबीयत ढीली, कुछ आसपास के तनाव और कुछ उनसे टूटने का डर, खुले आकाश के नीचे भी खुलकर साँस लेने की जगह की कमी, जिस काम में लगकर मुक्ति पाना चाहता हूँ, उस काम में हज़ार बाधाएँ; कुल ले-देकर उदासी के लिए […]
कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है। राग से यहां अभिप्राय प्रवृत्ति और निवृत्ति के मूल में रहनेवाली अंत:करणवृत्ति से है। जिस प्रकार निश्चय के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति के लिए भी कुछ विषयों का […]
हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन किया करते हैं। खेत उनकी हवनशाला है। उनके हवनकुंड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सुफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस […]
जिस प्रकार सुख या आनंद देनेवाली वस्तु के संबंध में मन की ऐसी स्थिति को जिसमें उस वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जग पड़े, लोभ कहते हैं। दूसरे की वस्तु का लोभ करके उसे लोग लेना चाहते हैं, अपनी वस्तु का लोभ करके उसे लोग देना […]
हिन्दी के आरंभिक उपन्यासों में देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता अग्रगण्य है। यह उपन्यास पहली बार 1893 में प्रकाशित हुआ था। कहते हैं, इस उपन्यास को पढ़ने के लिए बहुत से लोगों ने देवनागरी सीखी। तिलिस्मी-अय्यारी की रहस्यमय और रोमांचक दुनिया की सैर कराने वाला यह उपन्यास आज भी उतना ही लोकप्रिय है। न सिर्फ इस […]
बारह साल बीत गए. एक युग से पावागढ़ को घेरे हुए था- गुजरात का बादशाह महमूद बेगड़ा. वह परेशान और थका हुआ था. एक दिन उसने अपने सेनापति से कहा- “लगता है कि हमें वापस ही लौटना पड़ेगा. यह हमारे लिये बड़े शर्म की बात होगी,” सेनापति ने कुछ देर सोचा फिर गंभीर होकर कहा, […]
प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा की कहानी दुविधा पर हिन्दी में दो फ़िल्में बनी हैं. 1973 में मणि कौल ने दुविधा के नाम से ही पहली फिल्म बनाई ,जिसे वर्ष 1974 का Filmfare Critics Award for Best Movie भी प्राप्त हुआ. मणि कौल को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. […]