साहित्य विमर्श एंड्रॉयड एप

5 1 वोट 5 1
पोस्ट को रेट करें

तुम आयी
जैसे छीमियों में धीरे- धीरे
आता है रस
जैसे चलते-चलते एड़ी में
कांटा जाए धंस
तुम दिखी
जैसे कोई बच्चा
सुन रहा हो कहानी
तुम हंसी
जैसे तट पर बजता हो पानी
तुम हिली
जैसे हिलती है पत्ती
जैसे लालटेन के शीशे में
कांपती हो बत्ती
तुमने छुआ
जैसे धूप में धीरे-धीरे
उड़ता है भुआ

और अंत में
जैसे हवा पकाती है गेहूं के खेतों को
तुमने मुझे पकाया
और इस तरह
जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से
तुमने मुझे खुद से अलगाया.

5 1 वोट 5 1
पोस्ट को रेट करें
सबस्क्राइब करें
सूचित करें
guest
1 टिप्पणी
नवीनतम
प्राचीनतम सबसे ज्यादा वोट
इनलाइन प्रतिक्रिया
सभी टिप्पणियाँ देखें

.

तुम आयी – केदारनाथ सिंह

राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

Powered by सहज तकनीक
© 2020 साहित्य विमर्श
1
0
आपके विचार महत्वपूर्ण हैं। कृपया टिप्पणी करें। x
()
x