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प्रथम स्मगलर (रामकथा क्षेपक)- हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 2 मिनट-

लक्ष्मण मेघनाद की शक्ति से घायल पड़े थे। हनुमान उनकी प्राण-रक्षा के लिए हिमाचल प्रदेश से “संजीवनी” नाम की दवा ले कर लौट रहे थे कि अयोध्या के नाके पर पकड़ लिए गए। पकड़ने वाले नाकेदार को पीटकर हनुमान ने लेटा दिया। राजधानी में हल्ला हो गया कि बड़ा “बलशाली” स्मगलर आया हुआ है। पूरा फ़ोर्स भी उसका मुकाबला नहीं कर पा रहा है।
आखिर भरत और शत्रुघ्न आए। अपने आराध्य रामचन्द्र के भाइयों को देखकर हनुमान दब गए।
शत्रुघ्न ने कहा – इन स्मगलरों के मारे हमारी नाक में दम है, भैया। आप तो सन्यास ले कर बैठ गए। मुझे भुगतना पड़ता है।
भरत ने हनुमान से कहा – कहाँ से आ रहे हो?
हनुमान – हिमाचल प्रदेश से
-क्या है तुम्हारे पास? सोने के बिस्किट, गांजा, अफीम?
-दवा है।
शत्रुघ्न ने कहा – अच्छा, दवाइयों की स्मगलिंग चल रही है। निकालो कहाँ है?
हनुमान ने संजीवनी निकालकर रख दी। कहा – मुझे आपके बड़े भाई रामचंद्र ने इस दवा को लेने भेजा है।
शत्रुघ्न ने भरत की तरफ देखा। बोले – बड़े भैया यह क्या करने लगे हैं। स्मगलिंग में लग गए हैं। पैसे की तंगी थी तो हमसे मंगा लेते। स्मगल के धंधे में क्यों फंसते हैं। बड़ी बदनामी होती है।
भरत ने हनुमान से पूछा- यह दवा कहाँ ले जा रहे थे? कहाँ बेचोगे इसे?
हनुमान ने कहा – लंका ले जा रहा था।
भरत ने कहा – अच्छा, उधर उत्तर भारत से स्मगल किया हुआ माल बिकता है। कौन खरीदते हैं? रावण के लोग?
हनुमान ने कहा – यह दवा तो मैं राम के लिए ही ले जा रहा था। बात यह है कि आपके भाईलक्ष्मण घायल पड़े हैं। वे मरणासन्न हैं। इस दवा के बिना वे नही बच सकते।
भरत और शत्रुघ्न ने एक दूसरे की तरफ देखा। तब तक रजिस्टर में स्मगलिंग का मामला दर्ज हो चुका था।
शत्रुघ्न ने कहा – भरत भैया, आप ज्ञानी हैं। इस मामले में नीति क्या कहती है? शासन का क्या कर्तव्य है?
भरत ने कहा – स्मगलिंग यों अनैतिक है। पर स्मगल किये हुए सामान से अपना या अपने भाई भतीजों का फायदा होता हो, तो यह काम नैतिक हो जाता है। जाओ हनुमान, ले जाओ दवा!
मुंशी से कहा – रजिस्टर का यह पन्ना फाड़ दो।

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बरात की वापसी-हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 8 मिनट-

बरात में जाना कई कारणों से टालता हूँ. मंगल कार्यों  में हम जैसे चढ़ी उम्र के कुँवारों का जाना अपशकुन है. महेश बाबू का कहना है, हमें मंगल कार्यों से विधवाओं की तरह ही दूर रहना चाहिए. किसी का अमंगल अपने कारण क्यों हो ! उन्हें पछतावा है कि तीन साल पहले जिनकी शादी में वह गए थे, उनकी तलाक की स्थिति पैदा हो गयी है. उनका यह शोध है कि महाभारत युद्ध न होता, अगर भीष्म की शादी हो गयी होती. और अगर कृष्ण मेनन की शादी हो गयी होती, तो चीन हमला न करता.

          सारे युद्ध प्रौढ़ कुँवारों के अहं की तुष्टि के लिए होते हैं. 1948 में तेलंगाना में किसानो का सशस्त्र विद्रोह देश के वरिष्ठ कुँवारे विनोबा भावे के अहं की तुष्टि के लिए हुआ था. उनका अहं भूदान के रूप में तुष्ट हुआ.

     अपने पुत्र की सफल बारात से प्रसन्न मायाराम के मन में उस दिन नागपुर में बड़ा मौलिक विचार जागा था. कहने लगे- बस, अब तुमलोगों की बारात में जाने की इच्छा है. हम लोगों ने कहा- अब किशोरों जैसी बचकाना बरात तो होगी नहीं. अब तो बरात ऐसी होगी कि किसी को भागकर लाने के कारण हथकड़ी पहने हम होंगे और पीछे चलोगे तुमलोग, जमानत देनेवाले. ऐसी बरात होगी. चाहो तो बैंड भी बजवा सकते हो.

     विवाह का दृश्य बड़ा दारुण होता है. विदा के वक्त औरतों के साथ मिलकर रोने को जी करता है. लड़की के बिछुड़ने के कारण नहीं, उसके बाप की हालत देखकर लगता है, इस कौम की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है. पाव ताकत छिपाने में जा रही है- शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में घूस लेकर छिपाने में- बची हुई पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है- तो जितना हू रहा है, बहुत हो रहा है. आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा.

     यह बात मैंने उस दिन एकक विश्वविद्यालय के छात्र संघ के वार्षिकोत्सव में कही थी. कहा था- तुम लोग क्रांतिकारी तरुण-तरुणियाँ बनते हो. तुम इस देश  की आधी ताकत को बचा सकते हो. ऐसा करो, जितनी लडकियाँ विश्वविद्यालय में हैं, उनसे विवाह कर डालो. अपने बाप को मत बताना. वह दहेज़ मांगने लगेगा. इसके बाद जितने लड़के बचें, वे एक दूसरे की बहन से शादी कर लें. ऐसा बुनियादी क्रांतिकारी काम कर डालो. और फिर जिस सिगड़ी को ज़मीन पर रखकर तुम्हारी माँ रोटी बनाती है, उसे टेबिल पर रख दो, जिससे तुम्हारी पत्नी सीधी खड़ी होकर रोटी बना सके. 20-22 सालों में सिगड़ी ऊपर नहीं रखी जा सकी और न झाडू में चार फुट का डंडा बाँधा जा सका. अब तक तुमलोगों ने क्या ख़ाक क्रांति की है.

     छात्र थोड़ा चौंके. कुछ ही-ही करते भी पाए गए. मगर हुआ कुछ नहीं.

     एक तरुण के साथ सालों मेहनत करके उसके खयालात मैंने सँवारे थे. वह शादी के मंडप में बैठा तो ससुर से बच्चों की तरह मचलकर बोला- बाबूजी, हम तो वेस्पा लेंगे. वेस्पा के बिना कौर नहीं उठाएंगे. लड़की के बाप बाप का चेहरा फ़क् ! जी हुआ, जूता उतारकर पांच इस लड़के को मारूँ और 25 खुद अपने को. समस्या यों सुलझी कि लड़की के बाप ने साल-भर में वेस्पा देने का वादा किया, नेग के लिए बाज़ार से वेस्पा का खिलौना मँगाकर थाली में रखा, फिर सवा रुपया रखा और दामाद को भेंट किया. सवा रुपया तो मरते वक्त गोदान के निमित्त दिया जाता है न ! हाँ मेरे उस तरुण दोस्त की प्रगतिशीलता का गोदान हो रहा था.

     बरात की यात्रा से मैं बहुत घबराता हूँ, खास कर लौटते वक्त जब बराती बेकार बोझ हो जाता है. अगर जी भरकर दहेज़ न मिले, तो वर का बाप बरातियों को दुश्मन समझता है. मैं सावधानी बरतता हूँ कि बरात की विदा के पहले ही कुछ बहाना करके किराया लेकर लौट पड़ता हूँ.

        एक बरात से वापसी मुझे याद है.

        हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें।पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घण्टे भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है।सुबह घर पहुँच जाएँगे।हम में से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था इसीलिए वापसी का यही रास्ता अपनाना जरूरी था।लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते।क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं?नहीं,बस डाकिन है।

बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी।खूब वयोवृद्ध थी।सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी।लोग इसलिए इससे सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा।यह बस पूजा के योग्य थी।उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!

बस-कंपनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे।हमने उनसे पूछा-“यह बस चलती भी है?” वह बोले-“चलती क्यों नहीं है जी!अभी चलेगी।”  हमने कहा-“वही तो हम देखना चाहते हैं।अपने आप चलती है यह? हाँ जी, और कैसे चलेगी?”

    गज़ब हो गया।ऐसी बस अपने आप चलती है।

हम आगा-पीछा करने लगे।डॉक्टर मित्र ने कहा-“डरो मत,चलो!बस अनुभवी है।नयी-नवेली बसों से ज्यादा विश्वसनीय है।हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी।”

   हम बैठ गए।जो छोड़ने आये थे,वे इस तरह देख रहे थे जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं।उनकी आँखें कह रही थीं-“आना-जाना तो लगा ही रहता है।आया है,सो जाएगा-राजा,रंक, फकीर।आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।”

  इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया।ऐसा,जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं।काँच बहुत कम बचे थे।जो बचे थे,उनसे हमें बचना था।हम फ़ौरन खिड़की से दूर सरक गए।इंजन चल रहा था।हमें लग रहा था कि हमारी सीट के नीचे इंजन है।

बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गाँधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी।उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी।हर हिस्सा दूसरे से असहयोग कर रहा था।पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुज़र रही थी।सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था।कभी लगता सीट बॉडी को छोड़कर आगे निकल गयी है।कभी लगता कि सीट को छोड़कर बॉडी आगे भागी जा रही है।आठ-दस मील चलने पर सारे भेदभाव मिट गए।यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हम पर बैठी है।

    एकाएक बस रुक गई।मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है।ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकालकर उसे बगल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा।अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस-कंपनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएँगे, जैसे माँ बच्चे के मुँह में दूध की शीशी लगाती है।

     बस की रफ़्तार अब पंद्रह-बीस मील हो गयी थी।मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था।ब्रेक फेल हो सकता है,स्टीयरिंग टूट सकता है।प्रकृति के दृश्य बहुत लुहावने थे।दोनों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे जिन पर पक्षी बैठे थे।मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था।जो भी पेड़ आता,डर लगता कि इससे बस टकराएगी।वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इंतज़ार करता।झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।

    एकाएक फिर बस रुकी।ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें कीं पर वह चली नहीं।सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया था,कंपनी के हिस्सेदार कह रहे थे-“बस तो फर्स्ट क्लास है जी!यह तो इत्तफ़ाक की बात है।”

 क्षीण चाँदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी।लगता,जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गयी हो।हमें ग्लानि हो रही थी कि बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं।अगर इसका प्राणांत हो गया तो हमें इसकी अंत्येष्टि करनी पड़ेगी।

हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा।बस आगे चली।उसकी चाल और कम हो गई थी।

   धीरे-धीरे वृद्धा की आँखों की ज्योति जाने लगीं।चाँदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी।आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती-“निकल जाओ,बेटी!अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।”

   एक पुलिया के ऊपर पहुँचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया।वह बहुत ज़ोर से हिलाकर थम गई।अगर स्पीड में होती तो उछलकर नाले में गिर जाती।मैंने उस कंपनी की हिस्सेदार की तरफ़ पहली बार श्रद्धाभाव से देखा।वह टायरों की हालत जानते हैं फिर भी जान हथेली पर लेकर इसी बस से सफ़र कर रहे हैं।उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है।सोचा,इस आदमी के साहस और बलिदान भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है।इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए।अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते तो देवता बाँह पसारे उसका इंतज़ार करते।कहते-“वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए।मर गया,पर टायर नहीं बदला।”

     दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली।अब हमने वक्त पर पन्ना पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी।पन्ना कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी।पन्ना क्या,कहीं भी,कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी।लगता था,ज़िंदगी इसी बस में गुजारनी है और इससे सीधे उस लोक को प्रयाण कर जाना है।इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंज़िल नहीं है।हमारी बेताबी,तनाव खत्म हो गए।हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गए।चिंता जाती रही।हँसी-मजाक चालू हो गया।

      ठंड बढ़ रही थी. खिड़कियाँ खुली थी हीं. डाक्टर ने कहा- गलती हो गई. ‘कुछ’ पीने को ले आते तो ठीक रहता.

      ठंड बढ़ रही थी. एक गाँव पर बस रुकी तो डाक्टर फ़ौरन उतरा. ड्राईवर से बोला- ज़रा रोकना ! नारियल ले आऊँ. आगे मढ़िया पर फोड़ना है.

      डाक्टर झोपड़ियों के पीछे गया और देशी शराब की बोतल ले आया. छागलों में भरकर हमलोगों ने पीना शुरू किया.

      इसके बाद किसी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ. पन्ना से पहले ही सब मुसाफिर उतर चुके थे. बस-कंपनी के हिस्सेदार शहर के बाहर ही अपने घर पर उतर गए. बस शहर में अपने ठिकाने पर रुकी. कंपनी के दो मालिक रजाइयों में दुबके बैठे थे. रात का एक बजा था. हम पाँचों उतरे. मैं सड़क के किनारे खड़ा रहा. डाक्टर भी मेरे पास खड़ा होकर बोतल से अंतिम घूँट लेने लगा. बाकी तीन मित्र बस-मालिकों पर झपटे. उनकी गर्म डांट हम सुन रहे थे. पर वे निराश लौटे. बस-मालिकों ने कह दिया- सतना की बस तो चार-पाँच घंटे पहले जा चुकी. अब लौटती होगी. अब तो बस सवेरे ही मिलेगी.

      आसपास देखा, सारी दुकाने-होटलें बंद. ठंड कड़ाके की. भूख भी खूब लग रही थी. तभी डाक्टर बस-मालिकों के पास गया. पाँचेक मिनट में उनके साथ लौटा तो बदला हुआ था. बड़े अदब से मुझसे कहने लगा- सर, नाराज़ मत होइए. सरदारजी कुछ इंतज़ाम करेंगे. सर,…सर ! उन्हें अफ़सोस है कि आपको तकलीफ हुई.

      अभी डाक्टर बेतकल्लुफी से बातें कर रहा था और अब मुझे ‘सर’ कह रहा है. बात क्या है? कहीं ठर्रा ज़्यादा तो असर नहीं कर गया ! मैंने कहा- यह तुमने क्या सर-सर लगा रखी है?

      उसने फिर वैसे ही झुककर कहा- सर, नाराज़ मत होइए. सर, कुछ इंतज़ाम हुआ जाता है.

      मुझे तब भी कुछ समझ में नहीं आया. डाक्टर भी परेशान था कि मैं समझ क्यों नहीं रहा हूँ. वह मुझे अलग ले गया और समझाया- मैंने इन लोगों से कहा है कि तुम संसद-सदस्य हो. इधर जाँच करने आये हो. मैं एक क्लर्क हूँ, जिसे साहब ने एम.पी. को सतना पहुँचाने के लिए भेजा है. मैंने इनसे कहा कि सरदारजी, मुझ गरीब की तो गर्दन कटेगी ही, आपकी भी लेवा-देई हो जायेगी. वह स्पेशल बस से सतना भेजने का इंतज़ाम कर देगा. ज़रा थोड़ा एम पी-पन तो दिखाओ. उल्लू की तरह क्यों पेश आ रहे हो?

       मैं समझ गया कि मेरी काली शेरवानी काम आ गई. यह काली शेरवानी और ये बड़े बाल मुझे कई रूप देते हैं. नेता भी दिखता हूँ, शायर भी और अगर बाल सूखे-बिखरे हों तो जुम्मन शहनाईवाले का भी धोखा हो जाता है.

       मैंने मिथ्याचार का आत्मबल बटोरा और लौटा, तो ठीक संसद-सदस्य की तरह. आते ही सरदारजी से रोब से पूछा- सरदारजी, आर.टी.ओ. से कब तक इस बस को चलाने का सौदा हो गया है?

        सरदारजी घबरा उठे. डाक्टर खुश कि मैंने फर्स्ट क्लास रोल किया है.

         रोबदार संसद-सदस्य का एक वाक्य काफी है, यह सोचकर मैं दूर खड़े होकर सिगरेट पीने लगा. सरदारजी ने वहीँ मेरे लिए कुर्सी बुलवा दी. वह डरे हुए थे और डरा हुआ मैं भी था. मेरा डर यह था कि कहीं पूछताछ होने लगी कि मैं कौन संसद-सदस्य हूँ तो क्या कहूँगा ! याद आया कि अपने मित्र महेशदत्त मिश्र का नाम धारण कर लूँगा. गाँधीवादी होने के नाते वह थोड़ा झूठ बोलकर मुझे बचा ही लेंगे.

         अब मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया. झूठ अगर जम जाए तो सत्य से ज्यादा अभय देता है.

         मैं वहीँ बैठे-बैठे डाक्टर से चीखकर बोला- बाबू, यहाँ क्या कयामत तक बैठे रहना पड़ेगा? इधर कहीं फोन हो तो ज़रा कलेक्टर को इत्तला कर दो. वह गाड़ी का इंतज़ाम कर देंगे.

         डाक्टर वहीँ से बोला- सर, बस एक मिनट ! जस्ट ए मिनट, सर !

         थोड़ी देर बाद सरदारजी ने एक नई बस निकलवाई. मुझे सादर बैठाया. बस चल पड़ी.

         मुझे एम. पी.-पन काफी भारी पड़ रहा था. मैं दोस्तों के बीच अजनबी की तरह अकड़ा बैठा था. डाक्टर बार-बार ‘सर’ कहता रहा और बस का मालिक ‘हुज़ूर’.

         सतना में जब रेलवे के मुसाफिरखाने में पहुँचे तब डाक्टर ने कहा- अब तीन घंटे लगातार तुम मुझे ‘सर’ कहो. मेरी बहुत तौहीन हो चुकी है.

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मुंडन – हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 3 मिनट-

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची. हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुंडन हो गया था. कल तक उनके सिर पर लंबे घुँघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुंडन हो गया था.

सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है. अटकलें लगने लगीं. किसी ने कहा – शायद सिर में जूँ हो गई हों. दूसरे ने कहा – शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो. किसी और ने कहा – शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गई. पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे.

आखिर एक सदस्य ने पूछा – अध्यक्ष महोदय! क्या मैं जान सकता हूँ कि माननीय मंत्री महोदय के परिवार में क्या किसी की मृत्यु हो गई है?

मंत्री ने जवाब दिया – नहीं.

सदस्यों ने अटकल लगाई कि कहीं उन लोगों ने ही तो मंत्री का मुंडन नहीं कर दिया, जिनके खिलाफ वे बिल पेश करने का इरादा कर रहे थे.

एक सदस्य ने पूछा – अध्यक्ष महोदय! क्या माननीय मंत्री को मालूम है कि उनका मुंडन हो गया है? यदि हाँ, तो क्या वे बताएँगे कि उनका मुंडन किसने कर दिया है?

मंत्री ने संजीदगी से जवाब दिया – मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुंडन हुआ है या नहीं!

कई सदस्य चिल्लाए – हुआ है! सबको दिख रहा है.

मंत्री ने कहा – सबको दिखने से कुछ नहीं होता. सरकार को दिखना चाहिए. सरकार इस बात की जाँच करेगी कि मेरा मुंडन हुआ है या नहीं.

एक सदस्य ने कहा – इसकी जाँच अभी हो सकती है. मंत्री महोदय अपना हाथ सिर पर फेरकर देख लें.

मंत्री ने जवाब दिया – मैं अपना हाथ सिर पर फेरकर हर्गिज नहीं देखूँगा. सरकार इस मामले में जल्दबाजी नहीं करती. मगर मैं वायदा करता हूँ कि मेरी सरकार इस बात की विस्तृत जाँच करवाकर सारे तथ्य सदन के सामने पेश करेगी.

सदस्य चिल्लाए – इसकी जाँच की क्या जरूरत है? सिर आपका है और हाथ भी आपके हैं. अपने ही हाथ को सिर पर फेरने में मंत्री महोदय को क्या आपत्ति है?

मंत्री बोले – मैं सदस्यों से सहमत हूँ कि सिर मेरा है और हाथ भी मेरे हैं. मगर हमारे हाथ परंपराओं और नीतियों से बँधे हैं. मैं अपने सिर पर हाथ फेरने के लिए स्वतंत्र नहीं हूँ. सरकार की एक नियमित कार्यप्रणाली होती है. विरोधी सदस्यों के दबाव में आकर मैं उस प्रणाली को भंग नहीं कर सकता. मैं सदन में इस संबंध में एक वक्तव्य दूँगा.

शाम को मंत्री महोदय ने सदन में वक्तव्य दिया – अध्यक्ष महोदय! सदन में ये प्रश्न उठाया गया कि मेरा मुंडन हुआ है या नहीं? यदि हुआ है तो किसने किया है? ये प्रश्न बहुत जटिल हैं. और इस पर सरकार जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं दे सकती. मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुंडन हुआ है या नहीं. जब तक जाँच पूरी न हो जाए, सरकार इस संबंध में कुछ नहीं कह सकती. हमारी सरकार तीन व्यक्तियों की एक जाँच समिति नियुक्त करती है, जो इस बात की जाँच करेगी. जाँच समिति की रिपोर्ट मैं सदन में पेश करूँगा.

सदस्यों ने कहा – यह मामला कुतुब मीनार का नहीं जो सदियों जाँच के लिए खड़ी रहेगी. यह आपके बालों का मामला है, जो बढ़ते और कटने रहते हैं. इसका निर्णय तुरंत होना चाहिए.

मंत्री ने जवाब दिया – कुतुब मीनार से हमारे बालों की तुलना करके उनका अपमान करने का अधिकार सदस्यों को नहीं है. जहाँ तक मूल समस्या का संबंध है, सरकार जाँच के पहले कुछ नहीं कह सकती.

जाँच समिति सालों जाँच करती रही. इधर मंत्री के सिर पर बाल बढ़ते रहे.

एक दिन मंत्री ने जाँच समिति की रिपोर्ट सदन के सामने रख दी.

जाँच समिति का निर्णय था कि मंत्री का मुंडन नहीं हुआ था.

सत्ताधारी दल के सदस्यों ने इसका स्वागत हर्ष-ध्वनि से किया.

सदन के दूसरे भाग से ‘शर्म-शर्म’ की आवाजें उठीं. एतराज उठे – यह एकदम झूठ है. मंत्री का मुंडन हुआ था.

मंत्री मुस्कुराते हुए उठे और बोले – यह आपका ख्याल हो सकता है. मगर प्रमाण तो चाहिए. आज भी अगर आप प्रमाण दे दें तो मैं आपकी बात मान लेता हूँ.

ऐसा कहकर उन्होंने अपने घुँघराले बालों पर हाथ फेरा और सदन दूसरे मसले सुलझाने में व्यस्त हो गया.

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भोलाराम का जीव- हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 6 मिनट-

धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग और नरक में निवास-स्थान अलाट करते आ रहे थे.पर ऐसा कभी नहीं हुआ था.

सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे.गलती पकड में ही नहीं आ रही थी. आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतनी ज़ोरों से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई . उसे निकालते हुए वे बोले, ”महाराज, रिकार्ड सब ठीक है.भोलाराम के जीव ने पांच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना हुआ, पर अभी तक यहाँ नहीं पहुँचा.”

धर्मराज ने पूछा, ”और वह दूत कहाँ है?”

”महाराज, वह भी लापता है.”

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बड़ा बदहवास-सा वहां आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, ”अरे तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?”

यमदूत हाथ जोड़ कर बोला, ”दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊं कि क्या हो गया. आज तक मैने धोखा नहीं खाया था, पर इस बार भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया. पांच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम की देह को त्यागा, तब मैंने उसे पकडा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की. नगर के बाहर ज्योंही मैं इसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्योंही वह मेरे चंगुल से छूटकर न जाने कहां गायब हो गया .इन पांच दिनों में मैने सारा ब्रह्मांड छान डाला,पर उसका पता नहीं चला.”

धर्मराज क्रोध से बोले, ”मूर्ख, जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया, फिर एक मामूली आदमी ने चकमा दे दिया.”

दूत ने सिर झुकाकर कहा, ”महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी. मेरे अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके, पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया.”

चित्रगुप्त ने कहा, ”महाराज, आजकल पृथ्वी पर इसका व्यापार बहुत चला है. लोग दोस्तों को फल भेजते है, और वे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा देते हैं. होज़री के पार्सलों के मोज़े रेलवे आफिसर पहनते हैं. मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं. एक बात और हो रही है.राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ा कर कहीं बन्द कर देते हैं. कहीं भोलाराम के जीव को भी किसी विरोधी ने, मरने के बाद, खराबी करने के लिए नहीं उड़ा दिया?”

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा, ”तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र आ गई. भला, भोलाराम जैसे दीन आदमी को किसी से क्या लेना-देना?”

इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि वहाँ आ गए. धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले, ”क्यों धर्मराज, कैसे चिंतित बैठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?”

धर्मराज ने कहा, ”वह समस्या तो कभी की हल हो गई. नरक में पिछले सालों से बडे ग़ुणी कारीगर आ गए हैं. कई इमारतों के ठेकेदार हैं, जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाई. बडे-बडे इंजीनियर भी आ गए हैं, जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर भारत की पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया. ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मज़दूरों की हाज़री भरकर पैसा हड़पा, जो कभी काम पर गए ही नहीं. इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं. वह समस्या तो हल हो गई, पर एक विकट उलझन आ गई है.भोलाराम के नाम के आदमी की पांच दिन पहले मृत्यु हुई. उसके जीव को यमदूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया. इसने सारा ब्रह्मांड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला. अगर ऐसा होने लगा, तो पाप-पुण्य का भेद ही मिट जाएगा.”

नारद ने पूछा, ”उस पर इनकम टैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने उसे रोक लिया हो.”

चित्रगुप्त ने कहा, ”इनकम होती तो टैक्स होता.भुखमरा था.”

नारद बोले, ”मामला बडा दिलचस्प है. अच्छा,मुझे उसका नाम, पता बतलाओ. मैं पृथ्वी पर जाता हूं.”

चित्रगुप्त ने रजिस्टर देखकर बतलाया – ”भोलाराम नाम था उसका. जबलपुर शहर के घमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ क़मरे के टूटे-फूटे मकान पर वह परिवार समेत रहता था. उसकी एक स्त्री थी, दो लडक़े और एक लडक़ी. उम्र लगभग 60 वर्ष. सरकारी नौकर था. पांच साल पहले रिटायर हो गया था. मकान का उस ने एक साल से किराया नहीं दिया था, इसलिए मकान-मालिक उसे निकालना चाहता था. इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड दिया. आज पांचवां दिन है.बहुत संभव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है, तो उसने भोलाराम के मरते ही, उसके परिवार को निकाल दिया होगा. इसलिए आपको परिवार की तलाश में घूमना होगा.”

मां बेटी के सम्मिलित क्रंदन से ही नारद भोलाराम का मकान पहिचान गए.

द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज़ लगाई, ”नारायण नारायण !” लड़की ने देखकर कहा, ”आगे जाओ महाराज.”

नारद ने कहा, ”मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है.अपनी मां को ज़रा बाहर भेजो बेटी.”

भोलाराम की पत्नी बाहर आई. नारद ने कहा, ”माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?

”क्या बताऊं? गरीबी की बीमारी थी. पांच साल हो गए पेन्शन पर बैठे थे, पर पेन्शन अभी तक नहीं मिली. हर 10-15 दिन में दरख्वास्त देते थे, पर वहां से जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेन्शन के मामले पर विचार हो रहा है. इन पांच सालों में सब गहने बेचकर हम लोग खा गए. फिर बर्तन बिके. अब कुछ नहीं बचा. फाके होने लगे थे. चिन्ता मे घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया.”

नारद ने कहा, ”क्या करोगी माँ? उनकी इतनी ही उम्र थी.”

”ऐसा मत कहो, महाराज. उम्र तो बहुत थी. 50-60 रूपया महीना पेन्शन मिलती तो कुछ और काम कहीं करके गुज़ारा हो जाता. पर क्या करें? पांच साल नौकरी से बैठे हो गए और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली.”

दुख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं. वे अपने मुद्दे पर आए, ”माँ, यह बताओ कि यहाँ किसी से उनका विशेष प्रेम था, जिसमें उनका जी लगा हो?”

पत्नी बोली, ”लगाव तो महाराज, बाल-बच्चों से होता है.”

”नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है. मेरा मतलब है, कोई स्त्री?”

स्त्री ने गुर्राकर नारद की ओर देखा. बोली, ”बको मत महाराज ! साधु हो, कोई लुच्चे-लफंगे नहीं हो. जिन्दगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री को आंख उठाकर नहीं देखा.”

नारद हंस कर बोले, ”हां, तुम्हारा सोचना भी ठीक है. यही भ्रम अच्छी गृहस्थी का आधार है.अच्छा माता, मैं चला.” व्यंग्य समझने की असमर्थता ने नारद को सती के क्रोध की ज्वाला से बचा लिया.

स्त्री ने कहा, ”महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं. कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रूकी पेन्शन मिल जाय. इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए?”

नारद को दया आ गई. वे कहने लगे, ”साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं? फिर भी सरकारी दफ्तर में जाऊंगा और कोशिश करूंगा.”

वहाँ से चलकर नारद सरकारी दफ्तर में पहुंचे. वहाँ पहले कमरे में बैठे बाबू से भोलाराम के केस के बारे में बातें की. उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला, ”भोलाराम ने दरखास्तें तो भेजी थीं, पर उनपर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी.”

नारद ने कहा, ”भई, ये पेपरवेट तो रखे हैं, इन्हें क्यों नहीं रख दिया?”

बाबू हंसा, ”आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती. दरखास्तें पेपरवेट से नहीं दबती. खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए.”

नारद उस बाबू के पास गये. उसने तीसरे के पास भेजा, चौथे ने पांचवें के पास. जब नारद 25-30 बाबुओं और अफसरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा, ” महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए. आप यहाँ साल-भर भी चक्कर लगाते रहें, तो भी काम नहीं होगा. आप तो सीधा बड़े साहब से मिलिए. उन्हें खुश कर लिया, तो अभी काम हो जाएगा.”

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुंचे. बाहर चपरासी ऊंघ रहा था, इसलिए उन्हें किसी ने रोका नहीं. उन्हें एकदम विजिटिंग कार्ड के बिना आया देख साहब बड़े नाराज़ हुए. बोले,इसे कोई मन्दिर-वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आए ! चिट क्यों नहीं भेजी?”

नारद ने कहा, ”कैसे भेजता, चपरासी सो रहा है.”

”क्या काम है?” साहब ने रौब से पूछा.

नारद ने भोलाराम का पेन्शन-केस बतलाया.

साहब बोले, ”आप हैं बैरागी. दफ्तरों के रीत-रिवाज नहीं जानते. असल मे भोलाराम ने गलती की. भई, यह भी मन्दिर है. यहां भी दान-पुण्य करना पड़ता है, भेंट चढ़ानी पड़ती है. आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं.भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ रही हैं, उन पर वज़न रखिए.”

नारद ने सोचा कि फिर यहां वज़न की समस्या खड़ी हो गई. साहब बोले, ”भई, सरकारी पैसे का मामला है. पेन्शन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है. देर लग जाती है. एक ही बात को हज़ारों बार लिखना पडता है, तब पक्की होती है. हां, जल्दी भी हो सकती है, मगर ” साहब रूके.

नारद ने कहा, ”मगर क्या?”

साहब ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, ”मगर वज़न चाहिए. आप समझे नहीं. जैसे आप की यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है. मेरी लड़की गाना सीखती है. यह मैं उसे दे दूंगा.साधु-संतों की वीणा से अच्छे स्वर निकलते हैं. लड़की जल्दी संगीत सीख गई तो शादी हो जाएगी.”

नारद अपनी वीणा छिनते देख ज़रा घबराए. पर फिर संभलकर उन्होंने वीणा टेबिल पर रखकर कहा, ”लीजिए. अब ज़रा जल्दी उसकी पेन्शन का आर्डर निकाल दीजिए.”

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई. चपरासी हाजिर हुआ.

साहब ने हुक्म दिया, ”बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फाइल लाओ.”

थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की फाइल लेकर आया. उसमें पेन्शन के कागज़ भी थे.साहब ने फाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा, ”क्या नाम बताया साधुजी आपने!”

नारद समझे कि ऊंचा सुनता है. इसलिए ज़ोर से बोले, ”भोलाराम.”

सहसा फाइल में से आवाज़ आई, ”कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमैन है क्या? पेन्शन का आर्डर आ गया क्या?”

साहब डरकर कुर्सी से लुढ़क गए. नारद भी चौंके. पर दूसरे क्षण समझ गए. बोले, ”भोलाराम, तुम क्या भोलाराम के जीव हो?”

”हां.” आवाज़ आई.

नारद ने कहा, ”मैं नारद हूं. मैं तुम्हें लेने आया हूं. स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है.”

आवाज़ आई, ”मुझे नहीं जाना. मैं तो पेन्शन की दरखास्तों में अटका हूं. वहीं मेरा मन लगा है. मैं दरखास्तों को छोड़कर नहीं आ सकता.”

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इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर

अनुमानित समय : 12 मिनट-

वैज्ञानिक कहते हैं ,चाँद पर जीवन नहीं है.

        सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन (डिपार्टमेंट में एम. डी. साब) कहते हैं- वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं, वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है.

        विज्ञान ने हमेशा इन्स्पेक्टर मातादीन से मात खाई है. फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है- छुरे पर पाए गए निशान मुलजिम की अँगुलियों के नहीं हैं. पर मातादीन उसे सजा दिला ही देते हैं.

        मातादीन कहते हैं, ये वैज्ञानिक केस का पूरा इन्वेस्टीगेशन नहीं करते. उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया, वहाँ जीवन नहीं है. मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देख कर आया हूँ. वहाँ मनुष्य जाति है.

        यह बात सही है क्योंकि अँधेरे पक्ष के मातादीन माहिर माने जाते हैं.

        पूछा जाएगा, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने? नहीं, वे भारत की तरफ़ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए थे. चाँद सरकार ने भारत सरकार को लिखा था- यों हमारी सभ्यता बहुत आगे बढ़ी है. पर हमारी पुलिस में पर्याप्त सक्षमता नहीं है. वह अपराधी का पता लगाने और उसे सजा दिलाने में अक्सर सफल नहीं होती. सुना है, आपके यहाँ रामराज है. मेहरबानी करके किसी पुलिस अफसर को भेजें जो हमारी पुलिस को शिक्षित कर दे.

        गृहमंत्री ने सचिव से कहा- किसी आई. जी. को भेज दो.

        सचिव ने कहा- नहीं सर, आई. जी. नहीं भेजा जा सकता. प्रोटोकॉल का सवाल है. चाँद हमारा एक क्षुद्र उपग्रह है. आई. जी. के रैंक के आदमी को नहीं भेजेंगे. किसी सीनियर इंस्पेक्टर को भेज देता हूँ.

        तय किया गया कि हजारों मामलों के इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर सीनियर इंस्पेक्टर मातादीन को भेज दिया जाय.

        चाँद की सरकार को लिख दिया गया कि आप मातादीन को लेने के लिए पृथ्वी-यान भेज दीजिये.

        पुलिस मंत्री ने मातादीन को बुलाकर कहा- तुम भारतीय पुलिस की उज्ज्वल परंपरा के दूत की हैसियत से जा रहे हो. ऐसा काम करना कि सारे अंतरिक्ष में डिपार्टमेंट की ऐसी जय-जयकार हो कि पी.एम. (प्रधानमन्त्री) को भी सुनाई पड़ जाए.

        मातादीन की यात्रा का दिन आ गया. एक यान अंतरिक्ष अड्डे पर उतरा. मातादीन सबसे विदा लेकर यान की तरफ़ बढ़े. वे धीरे-धीरे कहते जा रहे थे, ‘प्रविसि नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखि कौसलपुर राजा.’

       यान के पास पहुँचकर मातादीन ने मुंशी अब्दुल गफूर को पुकारा- ‘मुंशी!’

       गफूर ने एड़ी मिलाकर सेल्यूट फटकारा. बोला- जी, पेक्टसा !

       एफ. आई. आर. रख दी है?

       जी , पेक्टसा.

       और रोजनामचे का नमूना?

       जी, पेक्टसा !

       वे यान में बैठने लगे. हवलदार बलभद्दर को बुलाकर कहा- हमारे घर में जचकी के बखत अपने खटला (पत्नी) को मदद के लिए भेज देना.

       बलभद्दर ने कहा- जी, पेक्टसा.

       गफूर ने कहा – आप बेफिक्र रहे पेक्टसा ! मैं अपने मकान (पत्नी) को भी भेज दूंगा खिदमत के लिए.

       मातादीन ने यान के चालक से पूछा – ड्राइविंग लाइसेंस है?

       जी, है साहब !

       और गाड़ी में बत्ती ठीक है?

       जी, ठीक है.

       मातादीन ने कहा, सब ठीकठाक होना चाहिए, वरना हरामजादे का बीच अंतरिक्ष में चालान कर दूँगा.

       चन्द्रमा से आये चालक ने कहा- हमारे यहाँ आदमी से इस तरह नहीं बोलते.

       मातादीन ने कहा- जानता हूँ बे ! तुम्हारी पुलिस कमज़ोर है. अभी मैं उसे ठीक करता हूँ.

       मातादीन यान में कदम रख ही रहे थे कि हवलदार रामसजीवन भागता हुआ आया. बोला- पेक्टसा, एस.पी. साहब के घर में से कहे हैं कि चाँद से एड़ी चमकाने का पत्थर लेते आना.

       मातादीन खुश हुए. बोले- कह देना बाई साब से, ज़रूर लेता आऊंगा.

       वे यान में बैठे और यान उड़ चला. पृथ्वी के वायुमंडल से यान बाहर निकला ही था कि मातादीन ने चालक से कहा- अबे, हॉर्न क्यों नहीं बजाता?

        चालक ने जवाब दिया- आसपास लाखों मील में कुछ नहीं है.

        मातादीन ने डांटा- मगर रूल इज रूल. हॉर्न बजाता चल.

        चालक अंतरिक्ष में हॉर्न बजाता हुआ यान को चाँद पर उतार लाया. अंतरिक्ष अड्डे पर पुलिस अधिकारी मातादीन के स्वागत के लिए खड़े थे. मातादीन रोब से उतरे और उन अफसरों के कन्धों पर नजर डाली. वहाँ किसी के स्टार नहीं थे. फीते भी किसी के नहीं लगे थे. लिहाज़ा मातादीन ने एड़ी मिलाना और हाथ उठाना ज़रूरी नहीं समझा. फिर उन्होंने सोचा, मैं यहाँ इंस्पेक्टर की हैसियत से नहीं, सलाहकार की हैसियत से आया हूँ.

         मातादीन को वे लोग लाइन में ले गए और एक अच्छे बंगले में उन्हें टिका दिया.

         एक दिन आराम करने के बाद मातादीन ने काम शुरू कर दिया. पहले उन्होंने पुलिस लाइन का मुलाहज़ा किया.

         शाम को उन्होंने आई.जी. से कहा- आपके यहाँ पुलिस लाइन में हनुमानजी का मंदिर नहीं है. हमारे रामराज में पुलिस लाइन में हनुमानजी हैं.

         आई.जी. ने कहा- हनुमान कौन थे- हम नहीं जानते.

         मातादीन ने कहा- हनुमान का दर्शन हर कर्तव्यपरायण पुलिसवाले के लिए ज़रूरी है. हनुमान सुग्रीव के यहाँ स्पेशल ब्रांच में थे. उन्होंने सीता माता का पता लगाया था.’एबडक्शन’का मामला था- दफा 362. हनुमानजी ने रावण को सजा वहीँ दे दी. उसकी प्रॉपर्टी में आग लगा दी. पुलिस को यह अधिकार होना चाहिए कि अपराधी को पकड़ा और वहीँ सज़ा दे दी. अदालत में जाने का झंझट नहीं. मगर यह सिस्टम अभी हमारे रामराज में भी चालू नहीं हुआ है. हनुमानजी के काम से भगवान राम बहुत खुश हुए. वे उन्हें अयोध्या ले आए और ‘टौन ड्यूटी’ में तैनात कर दिया. वही हनुमान हमारे अराध्य देव हैं. मैं उनकी फोटो लेता आया हूँ. उसपर से मूर्तियाँ बनवाइए और हर पुलिस लाइन में स्थापित करवाइए.

         थोड़े ही दिनों में चाँद की हर पुलिस लाइन में हनुमानजी स्थापित हो गए.

         मातादीनजी उन कारणों का अध्ययन कर रहे थे, जिनसे पुलिस लापरवाह और अलाल हो गयी है. वह अपराधों पर ध्यान नहीं देती. कोई कारण नहीं मिल रहा था. एकाएक उनकी बुद्धि में एक चमक आई.उन्होंने मुंशी से कहा- ज़रा तनखा का रजिस्टर बताओ.

         तनखा का रजिस्टर देखा, तो सब समझ गए. कारण पकड़ में आ गया.

         शाम को उन्होंने पुलिस मंत्री से कहा, मैं समझ गया कि आपकी पुलिस मुस्तैद क्यों नहीं है. आप इतनी बड़ी तनख्वाहें देते हैं इसीलिए. सिपाही को पांच सौ, थानेदार को हज़ार- ये क्या मज़ाक है. आखिर पुलिस अपराधी को क्यों पकड़े? हमारे यहाँ सिपाही को सौ और इंस्पेक्टर को दो सौ देते हैं तो वे चौबीस घंटे जुर्म की तलाश करते हैं. आप तनख्वाहें फ़ौरन घटाइए.

         पुलिस मंत्री ने कहा- मगर यह तो अन्याय होगा. अच्छा वेतन नहीं मिलेगा तो वे काम ही क्यों करेंगे?

         मातादीन ने कहा- इसमें कोई अन्याय नहीं है. आप देखेंगे कि पहली घटी हुई तनखा मिलते ही आपकी पुलिस की मनोवृति में क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाएगा.

        पुलिस मंत्री ने तनख्वाहें घटा दीं और 2-3 महीनों में सचमुच बहुत फर्क आ गया. पुलिस एकदम मुस्तैद हो गई. सोते से एकदम जाग गई. चारों तरफ़ नज़र रखने लगी. अपराधियों की दुनिया में घबड़ाहट छा गई. पुलिस मंत्री ने तमाम थानों के रिकॉर्ड बुला कर देखे. पहले से कई गुने अधिक केस रजिस्टर हुए थे. उन्होंने मातादीन से कहा- मैं आपकी सूझ की तारीफ़ करता हूँ. आपने क्रांति कर दी. पर यह हुआ किस तरह?

        मातादीन ने समझाया-बात बहुत मामूली है.कम तनखा दोगे, तो मुलाज़िम की गुजर नहीं होगी. सौ रुपयों में सिपाही बच्चों को नहीं पाल सकता. दो सौ में इंस्पेक्टर ठाठ-बाट नहीं मेनटेन कर सकता. उसे ऊपरी आमदनी करनी ही पड़ेगी. और ऊपरी आमदनी तभी होगी जब वह अपराधी को पकड़ेगा. गरज़ कि वह अपराधों पर नज़र रखेगा. सचेत, कर्तव्यपरायण और मुस्तैद हो जाएगा. हमारे रामराज के स्वच्छ और सक्षम प्रशासन का यही रहस्य है.

               चंद्रलोक में इस चमत्कार की खबर फ़ैल गयी. लोग मातादीन को देखने आने लगे कि वह आदमी कैसा है जो तनखा कम करके सक्षमता ला देता है. पुलिस के लोग भी खुश थे. वे कहते- गुरु, आप इधर न पधारते तो हम सभी कोरी तनखा से ही गुजर करते रहते. सरकार भी खुश थी कि मुनाफे का बजट बनने वाला था.

        आधी समस्या हल हो गई. पुलिस अपराधी पकड़ने लगी थी. अब मामले की जाँच-विधि में सुधार करना रह गया था. अपराधी को पकड़ने के बाद उसे सजा दिलाना. मातादीन इंतज़ार कर रहे थे कि कोई बड़ा केस हो जाए तो नमूने के तौर पर उसका इन्वेस्टिगेशन कर बताएँ.

        एक दिन आपसी मारपीट में एक आदमी मारा गया. मातादीन कोतवाली में आकर बैठ गए और बोले- नमूने के लिए इस केस का ‘इन्वेस्टिगेशन’ मैं करता हूँ. आप लोग सीखिए. यह क़त्ल का केस है. क़त्ल के केस में ‘एविडेंस’ बहुत पक्का होना चाहिए.

        कोतवाल ने कहा- पहले कातिल का पता लगाया जाएगा, तभी तो एविडेंस इकठ्ठा किया जायगा.

       मातादीन ने कहा- नहीं, उलटे मत चलो. पहले एविडेंस देखो. क्या कहीं ख़ून मिला? किसी के कपड़ों पर या और कहीं?

       एक इंस्पेक्टर ने कहा- हाँ, मारनेवाले तो भाग गए थे. मृतक सड़क पर बेहोश पड़ा था. एक भला आदमी वहाँ रहता है. उसने उठाकर अस्पताल भेजा. उस भले आदमी के कपड़ों पर खून के दाग लग गए हैं.

       मातादीन ने कहा- उसे फ़ौरन गिरफ्तार करो.

       कोतवाल ने कहा- मगर उसने तो मरते हुए आदमी की मदद की थी.

       मातादीन ने कहा- वह सब ठीक है. पर तुम खून के दाग ढूँढने और कहाँ जाओगे? जो एविडेंस मिल रहा है, उसे तो कब्ज़े में करो.

       वह भला आदमी पकड़कर बुलवा लिया गया. उसने कहा- मैंने तो मरते आदमी को अस्पताल भिजवाया था. मेरा क्या कसूर है?

       चाँद की पुलिस उसकी बात से एकदम प्रभावित हुई. मातादीन प्रभावित नहीं हुए. सारा पुलिस महकमा उत्सुक था कि अब मातादीन क्या तर्क निकालते हैं.

       मातादीन ने उससे कहा- पर तुम झगडे की जगह गए क्यों?

       उसने जवाब दिया- मैं झगड़े की जगह नहीं गया. मेरा वहाँ मकान है. झगड़ा मेरे मकान के सामने हुआ.

       अब फिर मातादीन की प्रतिभा की परीक्षा थी. सारा महकमा उत्सुक देख रहा था.

       मातादीन ने कहा- मकान तो ठीक है. पर मैं पूछता हूँ, झगड़े की जगह जाना ही क्यों?

       इस तर्क का कोई ज़वाब नहीं था. वह बार-बार कहता- मैं झगड़े की जगह नहीं गया. मेरा वहीँ मकान है.

       मातादीन उसे जवाब देते- सो ठीक है, पर झगड़े की जगह जाना ही क्यों? इस तर्क-प्रणाली से पुलिस के लोग बहुत प्रभावित हुए.

       अब मातादीनजी ने इन्वेस्टिगेशन का सिद्धांत समझाया-

       देखो, आदमी मारा गया है, तो यह पक्का है किसी ने उसे ज़रूर मारा. कोई कातिल है.किसी को सज़ा होनी है. सवाल है- किसको सज़ा होनी है? पुलिस के लिए यह सवाल इतना महत्त्व नहीं रखता जितना यह सवाल कि जुर्म किस पर साबित हो सकता है या किस पर साबित होना चाहिए. क़त्ल हुआ है, तो किसी मनुष्य को सज़ा होगी ही. मारनेवाले को होती है, या बेकसूर को – यह अपने सोचने की बात नहीं है. मनुष्य-मनुष्य सब बराबर हैं. सबमें उसी परमात्मा का अंश है. हम भेदभाव नहीं करते. यह पुलिस का मानवतावाद है.

        दूसरा सवाल है, किस पर जुर्म साबित होना चाहिए. इसका निर्णय इन बातों से होगा- (1) क्या वह आदमी पुलिस के रास्ते में आता है? (2) क्या उसे सज़ा दिलाने से ऊपर के लोग खुश होंगे?

        मातादीन को बताया गया कि वह आदमी भला है, पर पुलिस अन्याय करे तो विरोध करता है. जहाँ तक ऊपर के लोगों का सवाल है- वह वर्तमान सरकार की विरोधी राजनीति वाला है.

        मातादीन ने टेबिल ठोंककर कहा- फर्स्ट क्लास केस. पक्का एविडेंस. और ऊपर का सपोर्ट.

        एक इंस्पेक्टर ने कहा- पर हमारे गले यह बात नहीं उतरती है कि एक निरपराध-भले आदमी को सजा दिलाई जाए.

        मातादीन ने समझाया- देखो, मैं समझा चुका हूँ कि सबमें उसी ईश्वर का अंश है. सज़ा इसे हो या कातिल को, फांसी पर तो ईश्वर ही चढ़ेगा न ! फिर तुम्हे कपड़ों पर खून मिल रहा है. इसे छोड़कर तुम कहाँ खून ढूंढते फिरोगे? तुम तो भरो एफ. आई. आर. .

        मातादीन जी ने एफ.आई.आर. भरवा दी. ‘बखत ज़रुरत के लिए’ जगह खाली छुड़वा दी.

        दूसरे दिन पुलिस कोतवाल ने कहा- गुरुदेव, हमारी तो बड़ी आफत है. तमाम भले आदमी आते हैं और कहते है, उस बेचारे बेक़सूर को क्यों फंसा रहे हो? ऐसा तो चंद्रलोक में कभी नहीं हुआ ! बताइये हम क्या जवाब दें? हम तो बहुत शर्मिंदा हैं.

         मातादीन ने कोतवाल से कहा- घबड़ाओ मत. शुरू-शुरू में इस काम में आदमी को शर्म आती है. आगे तुम्हें बेक़सूर को छोड़ने में शर्म आएगी. हर चीज़ का जवाब है. अब आपके पास जो आए उससे कह दो, हम जानते हैं वह निर्दोष है, पर हम क्या करें? यह सब ऊपर से हो रहा है.

         कोतवाल ने कहा- तब वे एस.पी. के पास जाएँगे.

         मातादीन बोले- एस.पी. भी कह दें कि ऊपर से हो रहा है.

         तब वे आई.जी. के पास शिकायत करेंगे.

         आई.जी. भी कहें कि सब ऊपर से हो रहा है.

         तब वे लोग पुलिस मंत्री के पास पहुंचेंगे.

         पुलिस मंत्री भी कहेंगे- भैया, मैं क्या करूं? यह ऊपर से हो रहा है.

          तो वे प्रधानमंत्री के पास जाएंगे.

          प्रधानमंत्री भी कहें कि मैं जानता हूँ, वह निर्दोष है, पर यह ऊपर से हो रहा है.

          कोतवाल ने कहा- तब वे…

          मातादीन ने कहा- तब क्या? तब वे किसके पास जाएँगे? भगवान के पास न ? मगर भगवान से पूछकर कौन लौट सका है?

          कोतवाल चुप रह गया. वह इस महान प्रतिभा से चमत्कृत था.

          मातादीन ने कहा- एक मुहावरा ‘ऊपर से हो रहा है’ हमारे देश में पच्चीस सालों से सरकारों को बचा रहा है. तुम इसे सीख लो.

          केस की तैयारी होने लगी. मातादीन ने कहा- अब 4-6 चश्मदीद गवाह लाओ.

          कोतवाल- चश्मदीद गवाह कैसे मिलेंगे? जब किसी ने उसे मारते देखा ही नहीं, तो चश्मदीद गवाह कोई कैसे होगा?

          मातादीन ने सिर ठोंक लिया, किन बेवकूफों के बीच फंसा दिया गवर्नमेंट ने. इन्हें तो ए-बी-सी-डी भी नहीं आती.

          झल्लाकर कहा- चश्मदीद गवाह किसे कहते हैं, जानते हो? चश्मदीद गवाह वह नहीं है जो देखे- बल्कि वह है जो कहे कि मैंने देखा.

          कोतवाल ने कहा- ऐसा कोई क्यों कहेगा?

          मातादीन ने कहा- कहेगा. समझ में नहीं आता, कैसे डिपार्टमेंट चलाते हो ! अरे चश्मदीद गवाहों की लिस्ट पुलिस के पास पहले से रहती है. जहाँ ज़रुरत हुई, उन्हें चश्मदीद बना दिया. हमारे यहाँ ऐसे आदमी हैं, जो साल में 3-4 सौ वारदातों के चश्मदीद गवाह होते हैं. हमारी अदालतें भी मान लेती हैं कि इस आदमी में कोई दैवी शक्ति है जिससे जान लेता है कि अमुक जगह वारदात होने वाली है और वहाँ पहले से पहुँच जाता है. मैं तुम्हें चश्मदीद गवाह बनाकर देता हूँ. 8-10 उठाईगीरों को बुलाओ, जो चोरी, मारपीट, गुंडागर्दी करते हों. जुआ खिलाते हों या शराब उतारते हों.

          दूसरे दिन शहर के 8-10 नवरत्न कोतवाली में हाजिर थे. उन्हें देखकर मातादीन गद्गद हो गए. बहुत दिन हो गए थे ऐसे लोगों को देखे. बड़ा सूना-सूना लग रहा था.

          मातादीन का प्रेम उमड़ पड़ा. उनसे कहा- तुम लोगों ने उस आदमी को लाठी से मारते देखा था न?

          वे बोले- नहीं देखा साब ! हम वहाँ थे ही नहीं.

          मातादीन जानते थे, यह पहला मौका है. फिर उन्होंने कहा- वहाँ नहीं थे, यह मैंने माना. पर लाठी मारते देखा तो था?

           उन लोगों को लगा कि यह पागल आदमी है. तभी ऐसी उटपटांग बात कहता है. वे हँसने लगे.

           मातादीन ने कहा- हँसो मत, जवाब दो.

           वे बोले- जब थे ही नहीं, तो कैसे देखा?

           मातादीन ने गुर्राकर देखा. कहा- कैसे देखा, सो बताता हूँ. तुम लोग जो काम करते हो- सब इधर दर्ज़ है. हर एक को कम से कम दस साल जेल में डाला जा सकता है. तुम ये काम आगे भी करना चाहते हो या जेल जाना चाहते हो?

           वे घबड़ाकर बोले – साब, हम जेल नहीं जाना चाहते .

           मातादीन ने कहा- ठीक. तो तुमने उस आदमी को लाठी मारते देखा. देखा न ?

           वे बोले- देखा साब. वह आदमी घर से निकला और जो लाठी मारना शुरू किया, तो वह बेचारा बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़ा.

           मातादीन ने कहा- ठीक है. आगे भी ऐसी वारदातें देखोगे?

           वे बोले- साब , जो आप कहेंगे, सो देखेंगे.

           कोतवाल इस चमत्कार से थोड़ी देर को बेहोश हो गया. होश आया तो मातादीन के चरणों पर गिर पड़ा.

          मातादीन ने कहा- हटो. काम करने दो.

          कोतवाल पाँवों से लिपट गया. कहने लगा- मैं जीवन भर इन श्रीचरणों में पड़ा रहना चाहता हूँ.

          मातादीन ने आगे की सारी कार्यप्रणाली तय कर दी. एफ.आई.आर. बदलना, बीच में पन्ने डालना, रोजनामचा बदलना, गवाहों को तोड़ना – सब सिखा दिया.

          उस आदमी को बीस साल की सज़ा हो गई.

          चाँद की पुलिस शिक्षित हो चुकी थी. धड़ाधड़ केस बनने लगे और सज़ा होने लगी. चाँद की सरकार बहुत खुश थी. पुलिस की ऐसी मुस्तैदी भारत सरकार के सहयोग का नतीजा था. चाँद की संसद ने एक धन्यवाद का प्रस्ताव पास किया.

          एक दिन मातादीनजी का सार्वजनिक अभिनंदन किया गया. वे फूलों से लदे खुली जीप पर बैठे थे. आसपास जय-जयकार करते हजारों लोग. वे हाथ जोड़कर अपने गृहमंत्री की स्टाइल में जवाब दे रहे थे.

          ज़िंदगी में पहली बार ऐसा कर रहे थे, इसलिए थोड़ा अटपटा लग रहा था. छब्बीस साल पहले पुलिस में भरती होते वक्त किसने सोचा था कि एक दिन दूसरे लोक में उनका ऐसा अभिनंदन होगा. वे पछताए- अच्छा होता कि इस मौके के लिए कुरता, टोपी और धोती ले आते.

          भारत के पुलिस मंत्री टेलीविजन पर बैठे यह दृश्य देख रहे थे और सोच रहे थे, मेरी सद्भावना यात्रा के लिए वातावरण बन गया.

          कुछ महीने निकल गए.

          एक दिन चाँद की संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया. बहुत तूफ़ान खड़ा हुआ. गुप्त अधिवेशन था, इसलिए रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई पर संसद की दीवारों से टकराकर कुछ शब्द बाहर आए.

           सदस्य गुस्से से चिल्ला रहे थे-

           कोई बीमार बाप का इलाज नहीं कराता.

           डूबते बच्चों को कोई नहीं बचाता.

           जलते मकान की आग कोई नहीं बुझाता.

           आदमी जानवर से बदतर हो गया . सरकार फ़ौरन इस्तीफ़ा दे.

           दूसरे दिन चाँद के प्रधानमंत्री ने मातादीन को बुलाया. मातादीन ने देखा – वे एकदम बूढ़े हो गए थे. लगा, ये कई रात सोए नहीं हैं.

           रुँआसे होकर प्रधानमंत्री ने कहा- मातादीनजी , हम आपके और भारत सरकार के बहुत आभारी हैं. अब आप कल देश वापस लौट जाइये.

           मातादीन ने कहा- मैं तो ‘टर्म’ ख़त्म करके ही जाऊँगा.

           प्रधानमंत्री ने कहा- आप बाकी ‘टर्म’ का वेतन ले जाइये- डबल ले जाइए, तिबल ले जाइये.

            मातादीन ने कहा- हमारा सिद्धांत है: हमें पैसा नहीं काम प्यारा है.

            आखिर चाँद के प्रधानमंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री को एक गुप्त पत्र लिखा.

            चौथे दिन मातादीनजी को वापस लौटने के लिए अपने आई.जी. का आर्डर मिल गया.

            उन्होंने एस.पी. साहब के घर के लिए एड़ी चमकाने का पत्थर यान में रखा और चाँद से विदा हो गए.

            उन्हें जाते देख पुलिसवाले रो पड़े.

            बहुत अरसे तक यह रहस्य बना रहा कि आखिर चाँद में ऐसा क्या हो गया कि मातादीनजी को इस तरह एकदम लौटना पड़ा. चाँद के प्रधान मंत्री ने भारत के प्रधान मंत्री को क्या लिखा था?

             एक दिन वह पत्र खुल ही गया. उसमें लिखा था-

             इंस्पेक्टर मातादीन की सेवाएँ हमें प्रदान करने के लिए अनेक धन्यवाद. पर अब आप उन्हें फ़ौरन बुला लें. हम भारत को मित्रदेश समझते थे, पर आपने हमारे साथ शत्रुवत व्यवहार किया है. हम भोले लोगों से आपने विश्वासघात किया है.

              आपके मातादीनजी ने हमारी पुलिस को जैसा कर दिया है, उसके नतीज़े ये हुए हैं:

              कोई आदमी किसी मरते हुए आदमी के पास नहीं जाता, इस डर से कि वह क़त्ल के मामले में फंसा दिया जाएगा. बेटा बीमार बाप की सेवा नहीं करता. वह डरता है, बाप मर गया तो उस पर कहीं हत्या का आरोप नहीं लगा दिया जाए. घर जलते रहते हैं और कोई बुझाने नहीं जाता- डरता है कि कहीं उसपर आग लगाने का जुर्म कायम न कर दिया जाए. बच्चे नदी में डूबते रहते हैं और कोई उन्हें नहीं बचाता, इस डर से कि उस पर बच्चों को डुबाने का आरोप न लग जाए. सारे मानवीय संबंध समाप्त हो रहे हैं. मातादीनजी ने हमारी आधी संस्कृति नष्ट कर दी है. अगर वे यहाँ रहे तो पूरी संस्कृति नष्ट कर देंगे. उन्हें फ़ौरन रामराज में बुला लिया जाए.

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विश्व का प्रथम साम्यवादी – हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 3 मिनट-
स्वयं वामपंथ से प्रेरित होते हुए भी परसाई जी ने भारतीय वामपंथ पर चुटकी लेने का कोई मौका नहीं छोड़ा. पढ़िए दिवाली के बहाने ऐसा ही एक व्यंग्य 
जिस दिन राम रावण को परास्त करके अयोध्या आए , सारा नगर दीपों से जगमगा उठा . यह दीपावली पर्व अनंत काल तक मनाया जाएगा . पर इसी पर्व पर व्यापारी खाता -बही बदलते हैं और खाता-बही लाल कपडे में बाँधी जाती है .
प्रश्न है – राम के अयोध्या आगमन से खाता -बही बदलने का क्या संबंध ? और खाता -बही लाल कपडे में ही क्यों बाँधी जाती है ?
बात यह हुई कि जब राम के आने का समाचार आया तो व्यापारी वर्ग में खलबली मच गयी .
वे कहने लगे – सेठजी , अब बड़ी आफत है .शत्रुघ्न के राज में तो पोल चल गयी . पर राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं . वे सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स की चोरी बर्दाश्त नहीं करेंगे .वे अपने खाता-बही की जाँच कराएंगे और अपने को सजा होगी .
एक व्यापारी ने कहा – भैया , तब तो अपना नंबर दो का मामला भी पकड़ लिया जाएगा .
अयोध्या के नर -नारी तो राम के स्वागत की तैयारी कर रहे थे , मगर व्यापारी वर्ग घबडा रहा था .
अयोध्या पहुँचने के पहले ही राम को मालूम हो गया था कि उधर बड़ी पोल है . उन्होंने हनुमान को बुलाकर कहा – सुनो पवनसुत , युद्ध तो हम जीत गए लंका में , पर अयोध्या में हमें रावण से बड़े शत्रु का सामना करना पड़ेगा – वह है , व्यापारी वर्ग का भ्रष्टाचार . बड़े – बड़े वीर व्यापारी के सामने परास्त हो जाते हैं .तुम अतुलित बल – बुद्धि निधान हो . मैं तुम्हे ‘एनफोर्समेंट ब्रांच ‘ का डायरेक्टर नियुक्त करता हूँ . तुम अयोध्या पहुँचकर व्यापारियों की खाता -बहियों की जाँच करो और झूठे हिसाब पकड़ो . सख्त से सख्त सजा दो .
इधर व्यापारियों में हडकंप मच गया . कहने लगे – अरे भैया , अब तो मरे . हनुमान जी एनफोर्समेंट ब्रांच के डायरेक्टर नियुक्त हो गए . बड़े कठोर आदमी हैं . शादी -ब्याह नहीं किया . न बाल , न बच्चे . घूस भी नहीं चलेगी .
व्यापारियों के कानूनी सलाहकार बैठकर विचार करने लगे . उन्होंने तय किया कि खाता – बही बदल देना चाहिए . सारे राज्य में ‘ चेंबर ऑफ़ कामर्स ‘ की तरफ से आदेश चला गया कि ऐन दीपोत्सव पर खाता-बही बदल दिए जाएँ .
फिर भी व्यापारी वर्ग निश्चिन्त नहीं हुआ .हनुमान को धोखा देना आसान बात नहीं थी . वे अलौकिक बुद्धि संपन्न थे . उन्हें खुश कैसे किया जाए ? चर्चा चल पड़ी –
  • कुछ मुट्ठी गरम करने से काम नहीं चलेगा ?
  • वे एक पैसा नहीं लेते .
  • वे न लें , पर मेम साब ?
  • उनकी मेम साब ही नहीं हैं . साहब ने ‘मैरिज ‘ नहीं की . जवानी लड़ाई में काट दी .
-कुछ और शौक तो होंगे ? दारु और बाकी सब कुछ ?
  • वे बाल ब्रह्मचारी हैं . काल गर्ल को मारकर भगा देंगे . कोई नशा नहीं करते . संयमी आदमी हैं .
  • तो क्या करें ?
  • तुम्ही बताओ , क्या करें ?
किसी सयाने वकील ने सलाह दी – देखो , जो जितना बड़ा होता है वह उतना ही चापलूसी पसंद होता है . हनुमान की कोई माया नहीं है . वे सिन्दूर शरीर पर लपेटते हैं और लाल लंगोट पहनते हैं . वे सर्वहारा हैं और सर्वहारा के नेता . उन्हें खुश करना आसान है . व्यापारी खाता – बही लाल कपड़ों में बाँध कर रखें .
रातों-रात खाते बदले गए और खाता -बहियों को लाल कपडे में बाँधा गया .
अयोध्या जगमगा उठी . राम-सीता-लक्ष्मण की आरती उतारी गई . व्यापारी वर्ग ने भी खुलकर स्वागत किया . वे हनुमान को घेरे हुए उनकी जय भी बोलते रहे .
दूसरे दिन हनुमान कुछ दरोगाओं को लेकर अयोध्या के बाज़ार में निकल पड़े .
पहले व्यापारी के पास गए . बोले – खाता -बही निकालो . जाँच होगी .
व्यापारी ने लाल बस्ता निकालकर आगे रख दिया . हनुमान ने देखा – लंगोट का और बस्ते का कपड़ा एक है . खुश हुए ;
बोले – मेरे लंगोट के कपडे में खता-बही बाँधते हो ?
व्यापारी ने कहा – हाँ , बल-बुद्धि निधान , हम आपके भक्त हैं . आपकी पूजा करते हैं . आपके निशान को अपना निशान मानते हैं .
हनुमान गद्गद हो गए .
व्यापारी ने कहा – बस्ता खोलूँ . हिसाब की जाँच कर लीजिये .
हनुमान ने कहा – रहने दो। मेरा भक्त बेईमान नहीं हो सकता .
हनुमान जहाँ भी जाते , लाल लंगोट के कपडे में बंधे खाता-बही देखते . वे बहुत खुश हुए . उन्होंने किसी हिसाब की जांच नहीं की .
रामचंद्र को रिपोर्ट दी कि अयोध्या के व्यापारी बड़े ईमानदार हैं . उनके हिसाब बिलकुल ठीक हैं .
हनुमान विश्व के प्रथम साम्यवादी थे . वे सर्वहारा के नेता थे . उन्ही का लाल रंग आज के साम्यवादियों ने लिया है .
पर सर्वहारा के नेता को सावधान रहना चाहिए कि उसके लंगोट से बुर्जुआ अपने खता-बही न बाँध लें .
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टॉर्च बेचने वाले – हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 7 मिनट-
टॉर्च बेचने वाले
फोटो कर्टसी : पत्रिका डॉट कॉम

वह पहले चौराहों पर बिजली के टार्च बेचा करता था । बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा । कल फिर दिखा । मगर इस बार उसने दाढी बढा ली थी और लंबा कुरता पहन रखा था ।
मैंने पूछा, ” कहाँ रहे? और यह दाढी क्यों बढा रखी है? ”
उसने जवाब दिया, ” बाहर गया था । ”

दाढीवाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढी पर हाथ फेरने लगा । मैंने कहा, ” आज तुम टार्च नहीं बेच रहे हो? ”
उसने कहा, ” वह काम बंद कर दिया । अब तो आत्मा के भीतर टार्च जल उठा है । ये ‘ सूरजछाप ‘ टार्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं । ”

मैंने कहा, ” तुम शायद संन्यास ले रहे हो । जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है । किससे दीक्षा ले आए? ”

मेरी बात से उसे पीडा हुई । उसने कहा, ” ऐसे कठोर वचन मत बोलिए । आत्मा सबकी एक है । मेरी आत्मा को चोट पहुँचाकर आप अपनी ही आत्मा को घायल कर रहे हैं । ”

मैंने कहा, ” यह सब तो ठीक है । मगर यह बताओ कि तुम एकाएक ऐसे कैसे हो गए? क्या बीवी ने तुम्हें त्याग दिया? क्या उधार मिलना बंद हो गया? क्या
हूकारों ने ज्यादा तंग करना शुरू कर दिया? क्या चोरी के मामले में फँस गए हो? आखिर बाहर का टार्च भीतर आत्मा में कैसे घुस गया? ”

उसने कहा, ” आपके सब अंदाज गलत हैं । ऐसा कुछ नहीं हुआ । एक घटना हो गई है, जिसने जीवन बदल दिया । उसे मैं गुप्त रखना चाहता हूँ । पर क्योंकि मैं आज ही यहाँ से दूर जा रहा हूँ, इसलिए आपको सारा किस्सा सुना देता हूँ । ” उसने बयान शुरू किया पाँच साल पहले की बात है । मैं अपने एक दोस्त के साथ हताश एक जगह बैठा था । हमारे सामने आसमान को छूता हुआ एक सवाल खड़ा था । वह सवाल था – ‘ पैसा कैसे पैदा करें?’ हम दोनों ने उस सवाल की एक-एक टाँग पकड़ी और उसे हटाने की कोशिश करने लगे । हमें पसीना आ गया, पर सवाल हिला भी नहीं । दोस्त ने कहा – ” यार, इस सवाल के पाँव जमीन में गहरे गड़े हैं । यह उखडेगा नहीं । इसे टाल जाएँ । ”
हमने दूसरी तरफ मुँह कर लिया । पर वह सवाल फिर हमारे सामने आकर खडा हो गया । तब मैंने कहा – ” यार, यह सवाल टलेगा नहीं । चलो, इसे हल ही कर दें । पैसा पैदा करने के लिए कुछ काम- धंधा करें । हम इसी वक्त अलग- अलग दिशाओं में अपनी- अपनी किस्मत आजमाने निकल पड़े । पाँच साल बाद ठीक इसी तारीख को इसी वक्त हम यहाँ मिलें । ”
दोस्त ने कहा – ” यार, साथ ही क्यों न चलें? ”
मैंने कहा – ” नहीं । किस्मत आजमानेवालों की जितनी पुरानी कथाएँ मैंने पढ़ी हैं, सबमें वे अलग अलग दिशा में जाते हैं । साथ जाने में किस्मतों के टकराकर टूटने का डर रहता है । ”

तो साहब, हम अलग-अलग चल पडे । मैंने टार्च बेचने का धंधा शुरू कर दिया । चौराहे पर या मैदान में लोगों को इकु कर लेता और बहुत नाटकीय ढंग से कहता – ” आजकल सब जगह अँधेरा छाया रहता है । रातें बेहद काली होती हैं। अपना ही हाथ नहीं सूझता । आदमी को रास्ता नहीं दिखता । वह भटक जाता है । उसके पाँव काँटों से बिंध जाते हैं, वह गिरता है और उसके घुटने लहूलुहान हो जाते हैं। उसके आसपास भयानक अँधेराहै । शेर और चीते चारों तरफ धूम रहे हैं, साँप जमीन पर रेंग रहे हैं । अँधेरा सबको निगल रहा है । अँधेरा घर में भी है । आदमी रात को पेशाब करने उठता है और साँप पर उसका पाँव पड़ जाता है । साँप उसे डँस लेता है और वह मर जाता है । ” आपने तो देखा ही है साहब, कि लोग मेरी बातें सुनकर कैसे डर जाते थे । भरदोपहर में वे अँधेरे के डर से काँपने लगते थे । आदमी को डराना कितना आसान है!
लोग डर जाते, तब मैं कहता – ” भाइयों, यह सही है कि अँधेरा है, मगर प्रकाश भी है । वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूँ । हमारी ‘ सूरज छाप ‘ टार्च में वह प्रकाश है, जो अंधकार को दूर भगा देता है । इसी वक्त ‘ सूरज छाप ‘ टार्च खरीदो और अँधेरे को दूर करो । जिन भाइयों को चाहिए, हाथ ऊँचा करें । ”

साहब, मेरे टार्च बिक जाते और मैं मजे में जिंदगी गुजरने लगा ।
वायदे के मुताबिक ठीक पाँच साल बाद मैं उस जगह पहुँचा, जहाँ मुझे दोस्त से मिलना था । वहाँ दिन भर मैंने उसकी राह देखी, वह नहीं आया । क्या हुआ? क्या वह भूल गया? या अब वह इस असार संसार में ही नहीं है?मैं उसे ढूंढ़ने निकल पडा ।
एक शाम जब मैं एक शहर की सडक पर चला जा रहा था, मैंने देखा कि पास के मैदान में खुब रोशनी है और एक तरफ मंच सजा है । लाउडस्पीकर लगे हैं । मैदान में हजारों नर-नारी श्रद्धा से झुके बैठे हैं । मंच पर सुंदर रेशमी वस्त्रों से सजे एक भव्य पुरुष बैठे हैं । वे खुब पुष्ट हैं, सँवारी हुई लंबी दाढी है और पीठ पर लहराते लंबे केश हैं ।
मैं भीड के एक कोने में जाकर बैठ गया ।
भव्य पुरुष फिल्मों के संत लग रहे थे । उन्होंने गुरुगभीर वाणी में प्रवचन शुरू किया । वे इस तरह बोल रहे थे जैसे आकाश के किसी कोने से कोई रहस्यमय संदेश उनके कान में सुनाई पड़ रहा है जिसे वे भाषण दे रहे हैं ।
वे कह रहे थे – ” मैं आज मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूँ । उसके भीतर कुछ बुझ गया है । यह युग ही अंधकारमय है । यह सर्वग्राही अंधकार संपूर्ण विश्व को अपने उदर में छिपाए है । आज मनुष्य इस अंधकार से घबरा उठा है । वहपथभ्रष्ट हो गया है । आज आत्मा में भी अंधकार है । अंतर की आँखें ज्योतिहीन हो गई हैं । वे उसे भेद नहीं पातीं । मानव- आत्मा अंधकार में घुटती है । मैं देख रहा हूँ, मनुष्य की आत्मा भय और पीड़ा से त्रस्त है । ”
इसी तरह वे बोलते गए और लोग स्तव्य सुनते गए ।
मुझे हँसी छूट रही थी । एकदो बार दबातेदबाते भी हँसी फूट गई और पास के श्रोताओं ने मुझे डाँटा ।
भव्य पुरुष प्रवचन के अंत पर पहुँचते हुए कहने लगे – ” भाइयों और बहनों, डरो मत । जहाँ अंधकार है, वहीं प्रकाश है । अंधकार में प्रकाश की किरण है, जैसे प्रकाश में अंधकार की किंचित कालिमा है । प्रकाश भी है । प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो । अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ । मैं तुम सबका उस ज्योति को जगाने के लिए आहान करता हूँ । मैं तुम्हारे भीतर वही शाश्वत ज्योति को जगाना चाहता हूँ । हमारे ‘ साधना मंदिर ‘ में आकर उस ज्योति को अपने भीतर जगाओ । ” साहब, अब तो मैं खिलखिलाकर हँस पडा । पास के लोगों ने मुझे धक्का देकर भगा दिया । मैं मंच के पास जाकर खडा हो गया ।
भव्य पुरुष मंच से उतरकर कार पर चढ रहे थे । मैंने उन्हें ध्यान से पास से देखा । उनकी दाढी बढी हुई थी, इसलिए मैं थोडा झिझका । पर मेरी तो दाढी नहीं थी । मैं तो उसी मौलिक रूप में था । उन्होंने मुझे पहचान लिया । बोले – ” अरे तुम! ” मैं पहचानकर बोलने ही वाला था कि उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर कार में बिठा लिया । मैं फिर कुछ बोलने लगा तो उन्होंने कहा – ” बँगले तक कोई बातचीत नहीं होगी । वहीं ज्ञानचर्चा होगी । ”
मुझे याद आ गया कि वहाँ ड्राइवर है ।
बँगले पर पहुँचकर मैंने उसका ठाठ देखा । उस वैभव को देखकर मैं थोडा झिझका, पर तुरंत ही मैंने अपने उस दोस्त से खुलकर बातें शुरू कर दीं ।
मैंने कहा – ” यार, तू तो बिलकुल बदल गया । ”
उसने गंभीरता से कहा – ” परिवर्तन जीवन का अनंत क्रम है । ”
मैंने कहा – ” साले, फिलासफी मत बघार यह बता कि तूने इतनी दौलत कैसे कमा ली पाँच सालों में? ”
उसने पूछा – ” तुम इन सालों में क्या करते रहे? ”
मैंने कहा ” मैं तो धूममूमकर टार्च बेचता रहा । सच बता, क्या तू भी टार्च का व्यापारी है? ”
उसने कहा – ” तुझे क्या ऐसा ही लगता है? क्यों लगता है? ”
मैंने उसे बताया कि जो बातें मैं कहता हूँ; वही तू कह रहा था मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू उन्हीं बातों को रहस्यमय ढंग से कहता है । अँधेरे का डर दिखाकर लोगों को टार्च बेचता हूँ । तू भी अभी लोगों को अँधेरे का डर दिखा रहा था, तू भी जरूर टार्च बेचता है ।
उसने कहा – ” तुम मुझे नहीं जानते, मैं टार्च क्यों बेचूगा! मैं साधु, दार्शनिक और संत कहलाता हूँ । ”
मैंने कहा ” तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टार्च हो । तुम्हारे और मेरे प्रवचन एक जैसे हैं । चाहे कोई दार्शनिक बने, संत बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अँधेरे का डर दिखाता है, तो जरूर अपनी कंपनी का टार्च बेचना चाहता है । तुम जैसे लोगों के लिए हमेशा ही अंधकार छाया रहता है । बताओ, तुम्हारे जैसे किसी आदमी ने हजारों में कभी भी यह कहा है कि आज दुनिया में प्रकाश फैला है? कभी नहीं कहा । क्यों? इसलिए कि उन्हें अपनी कंपनी का टार्च बेचना है । मैं खुद भरदोपहर में लोगों से कहता हूँ कि अंधकार छाया है । बता किस कंपनी का टार्च बेचता है? ”

मेरी बातों ने उसे ठिकाने पर ला दिया था । उसने सहज ढंग से कहा – ” तेरी बात ठीक ही है । मेरी कंपनी नयी नहीं है, सनातन है । ”
मैंने पूछा – ” कहाँ है तेरी दुकान? नमूने के लिए एकाध टार्च तो दिखा । ‘ सूरज छाप ‘ टार्च से बहुत ज्यादा बिक्री है उसकी ।

उसने कहा – ” उस टार्च की कोई दुकान बाजार में नहीं है । वह बहुत सूक्ष्म है । मगर कीमत उसकी बहुत मिल जाती है । तू एक-दो दिन रह, तो मैं तुझे सब समझा देता हूँ । ”
” तो साहब मैं दो दिन उसके पास रहा । तीसरे दिन ‘ सूरज छाप ‘ टार्च की पेटी को नदी में फेंककर नया काम शुरू कर दिया । ”
वह अपनी दाढी पर हाथ फेरने लगा । बोला – ” बस, एक महीने की देर और है। ” मैंने पूछा -‘ तो अब कौन-सा धंधा करोगे? ”
उसने कहा – ” धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा । बस कंपनी बदल रहा हूँ । ”
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भेड़ें और भेड़िये – हरिशंकर परसाई

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अनुमानित समय : 7 मिनट-

एक बार एक वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए | और,एक मत से यह तय हो गया कि वन-प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो | पशु-समाज में इस `क्रांतिकारी’ परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गयी कि सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया और वह आया |

जिस वन-प्रदेश में हमारी कहानी ने चरण धरे हैं,उसमें भेंडें बहुत थीं–निहायत नेक , ईमानदार, दयालु , निर्दोष पशु जो घास तक को फूँक-फूँक कर खाता है |
भेड़ों ने सोचा कि अब हमारा भय दूर हो जाएगा | हम अपने प्रतिनिधियों से क़ानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारीकिसी को न सताए, न मारे | सब जिएँ और जीने दें | शान्ति,स्नेह,बन्धुत्त्व और सहयोग पर समाज आधारित हो |
इधर, भेड़ियों ने सोचा कि हमारा अब संकटकाल आया | भेड़ों की संख्या इतनी अधिक है कि पंचायत में उनका बहुमत होगा और अगर उन्होंने क़ानून बना दिया कि कोई पशु किसी को न मारे, तो हम खायेंगे क्या? क्या हमें घास चरना सीखना पडेगा?
ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ों का उल्लास बढ़ता जाता |
ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ियों का दिल बैठता जाता |
एक दिन बूढ़े सियार ने भेड़िये से कहा,“मालिक, आजकल आप बड़े उदास रहते हैं |”
हर भेड़िये के आसपास दो – चार सियार रहते ही हैं | जब भेड़िया अपना शिकार खा लेता है, तब ये सियार हड्डियों में लगे माँस को कुतरकर खाते हैं,और हड्डियाँ चूसते रहते हैं | ये भेड़िये के आसपास दुम हिलाते चलते हैं, उसकी सेवा करते हैं और मौके-बेमौके “हुआं-हुआं ” चिल्लाकर उसकी जय बोलते हैं |
तो बूढ़े सियार ने बड़ी गंभीरता से पूछा, “महाराज, आपके मुखचंद्र पर चिंता के मेघ क्यों छाये हैं?” वह सियार कुछ कविता भी करना जानता होगा या शायद दूसरे की उक्ति को अपना बनाकर कहता हो |
ख़ैर, भेड़िये ने कहा,“ तुझे क्या मालूम नहीं है कि वन-प्रदेश में नई सरकार बनने वाली है? हमारा राज्य तो अब गया |
सियार ने दांत निपोरकर कहा,“ हम क्या जानें महाराज ! हमारे तो आप ही `माई-बाप’ हैं | हम तो कोई और सरकार नहीं जानते| आपका दिया खाते हैं, आपके गुण गाते हैं ”
भेड़िये ने कहा, “ मगर अब समय ऐसा आ रहा है कि सूखी हड्डियां भी चबाने को नहीं मिलेंगी |”
सियार सब जानता था, मगर जानकार भी न जानने का नाटक करना न आता, तो सियार शेर न हो गया होता !
आखिर भेड़िये ने वन-प्रदेश की पंचायत के चुनाव की बात बूढ़े सियार को समझाई और बड़े गिरे मन से कहा, “ चुनाव अब पास आता जा रहा है | अब यहाँ से भागने के सिवा कोई चारा नहीं | पर जाएँ भी कहाँ ?”
सियार ने कहा, “ मालिक, सर्कस में भरती हो जाइए |”
भेड़िये ने कहा, “अरे, वहाँ भी शेर और रीछ को तो ले लेते हैं,पर हम इतने बदनाम हैं कि हमें वहाँ भी कोई नहीं पूछता”
“तो,” सियार ने खूब सोचकर कहा, “ अजायबघर में चले जाइए |”
भेड़िये ने कहा, “ अरे, वहाँ भी जगह नहीं है, सुना है |वहाँ तो आदमी रखे जाने लगे हैं |”
बूढा सियार अब ध्यानमग्न हो गया | उसने एक आँख बंद की, नीचे के होंठ को ऊपर के दाँत से दबाया और एकटक आकाश की और देखने लगा जैसे विश्वात्मा से कनेक्शन जोड़ रहा हो | फिर बोला,“बस सब समझ में आ गया | मालिक, अगर पंचायत में आप भेड़िया जाति का बहुमत हो जाए तो?”
भेड़िया चिढ़कर बोला, “ कहाँ की आसमानी बातें करता है? अरे हमारी जाति कुल दस फीसदी है और भेड़ें तथा अन्य पशु नब्बे फीसदी |भला वे हमें काहे को चुनेंगे | अरे, कहीं ज़िंदगी अपने को मौत के हाथ सौंप सकती है? मगर हाँ, ऐसा हो सकता तो क्या बात थी !”
बूढा सियार बोला,“ आप खिन्न मत होइए सरकार ! एक दिन का समय दीजिये | कल तक कोई योजना बन ही जायेगी | मगर एक बात है | आपको मेरे कहे अनुसार कार्य करना पड़ेगा |”
मुसीबत में फंसे भेड़िये ने आखिर सियार को अपना गुरु माना और आज्ञापालन की शपथ ली |
दूसरे दिन बूढा सियार अपने तीन सियारों को लेकर आया | उनमें से एक को पीले रंग में रंग दिया था, दूसरे को नीले में और तीसरे को हरे में |
भेड़िये ने देखा और पूछा, “ अरे ये कौन हैं?
बूढा सियार बोला, “ ये भी सियार हैं सरकार, मगर रंगे सियार हैं |आपकी सेवा करेंगे | आपके चुनाव का प्रचार करेंगे |”
भेड़िये ने शंका की,“ मगर इनकी बात मानेगा कौन? ये तो वैसे ही छल-कपट के लिए बदनाम हैं |”
सियार ने भेड़िये का हाथ चूमकर कहा, “ बड़े भोले हैं आप सरकार ! अरे मालिक, रूप-रंग बदल देने से तो सुना है आदमी तक बदल जाते हैं | फिर ये तो सियार हैं |”
और तब बूढ़े सियार ने भेड़िये का भी रूप बदला | मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए | बोला, “ अब आप पूरे संत हो गए | अब भेड़ों की सभा में चलेंगे | मगर तीन बातों का ख्याल रखना– अपनी हिंसक आँखों को ऊपर मत उठाना, हमेशा ज़मीन की ओर देखना और कुछ बोलना मत, नहीं तो सब पोल खुल जायेगी और वहां बहुत-सी भेड़ें आयेंगी, सुन्दर-सुन्दर, मुलायम-मुलायम, तो कहीं किसी को तोड़ मत खाना |”
भेड़िये ने पूछा, “ लेकिन रंगे सियार क्या करेंगे?ये किस काम आयेंगे?”
बूढा सियार बोला,“ ये बड़े काम के हैं | आपका सारा प्रचार तो यही करेंगे | इन्हीं के बल पर आप चुनाव लड़ेंगे | यह पीला वाला सियार बड़ा विद्वान है ,विचारक है ,कवि भी है,और लेखक भी | यह नीला सियार नीला और पत्रकार है | और यह हरा धर्मगुरु | बस, अब चलिए |”
“ ज़रा ठहरो,” भेड़िये ने बूढ़े सियार को रोका, “ कवि, लेखक, नेता, विचारक– ये तो सुना है बड़े अच्छे लोग होते हैं | और ये तीनों……..”
बात काटकर सियार बोला, “ ये तीनों सच्चे नहीं हैं, रंगे हुए हैं महाराज ! अब चलिए देर मत करिए |”
और वे चल दिए | आगे बूढा सियार था, उसके पीछे रंगे सियारों के बीच भेड़िया चल रहा था– मस्तक पर तिलक, गले में कंठी, मुख में घास के तिनके | धीरे-धीरे चल रहा था, अत्यंत गंभीरतापूर्वक, सर झुकाए विनय की मूर्ति !
उधर एक स्थान पर सहस्रों भेंड़ें इकट्ठी हो गईं थीं, उस संत के दर्शन के लिए, जिसकी चर्चा बूढ़े सियार ने फैला रखी थी |
चारों सियार भेड़िये की जय बोले हुए भेड़ों के झुण्ड के पास आए| बूढ़े सियार ने एक बार जोर से संत भेड़िये की जय बोली ! भेड़ों में पहले से ही यहाँ-वहाँ बैठे सियारों ने भी जयध्वनि की |
भेड़ों ने देखा तो वे बोलीं, “ अरे भागो, यह तो भेड़िया है |”
तुरंत बूढ़े सियार ने उन्हें रोककर कहा, “ भाइयों और बहनों ! अब भय मत करो| भेड़िया राजा संत हो गए हैं | उन्होंनेहिंसा बिलकुल छोड़ दी है | उनका `हृदय परिवर्तन हो गया है | वे आज सात दिनों से घास खा रहे हैं | रात-दिन भगवान के भजन और परोपकार में लगे रहते हैं | उन्होंने अपना जीवन जीव-मात्र की सेवा में अर्पित कर दिया है | अब वे किसी का दिल नहीं दुखाते, किसी का रोम तक नहीं छूते |भेड़ों से उन्हें विशेष प्रेम है | इस जाति ने जो कष्ट सहे हैं,उनकी याद करके कभी-कभी भेड़िया संत की आँखों में आँसू आ जाते हैं | उनकी अपनी भेड़िया जाति ने जो अत्याचार आप पर किये हैं उनके कारण भेड़िया संत का माथा लज्जा से जो झुका है, सो झुका ही हुआ है | परन्तु अब वे शेष जीवन आपकी सेवा में लगाकर तमाम पापों का प्रायश्चित्त करेंगे | आज सवेरे की ही बात है कि एक मासूम भेड़ के बच्चे के पाँव में काँटा लग गया, तो भेड़िया संत ने उसे दाँतों से निकाला, दाँतों से ! पर जब वह बेचारा कष्ट से चल बसा, तो भेदिया संत ने सम्मानपूर्वक उसकी अंत्येष्टि-क्रिया की | उनके घर के पास जो हड्डियों का ढेर लगा है, उसके दान की घोषणा उन्होंने आज सवेरे ही की | अब तो वह सर्वस्व त्याग चुके हैं | अब आप उनसे भय मत करें | उन्हें अपना भाई समझें | बोलो सब मिलकर, संत भेड़िया जी की जय !”
भेड़िया जी अभी तक उसी तरह गर्दन डाले विनय की मूर्ती बने बैठे थे |बीच में कभी-कभी सामने की ओर इकट्ठी भेड़ों को देख लेते और टपकती हुई लार को गुटक जाते |
बूढा सियार फिर बोला, “ भाइयों और बहनों, में भेड़िया संत से अपने मुखारविंद से आपको प्रेम और दया का सन्देश देने की प्रार्थना करता पर प्रेमवश उनका हृदय भर आया है, वह गदगद हो गए हैं और भावातिरेक से उनका कंठ अवरुद्ध हो गया है | वे बोल नहीं सकते | अब आप इन तीनों रंगीन प्राणियों को देखिये | आप इन्हें न पहचान पाए होंगे | पहचानें भी कैसे? ये इस लोक के जीव तो हैं नहीं | ये तो स्वर्ग के देवता हैं जो हमें सदुपदेश देने के लिए पृथ्वी पर उतारे हैं | ये पीले विचारक हैं,कवि हैं, लेखक हैं | नीले नेता हैं और स्वर्ग के पत्रकार हैं और हरे वाले धर्मगुरु हैं | अब कविराज आपको स्वर्ग-संगीत सुनायेंगे | हाँ कवि जी …….”
पीले सियार को `हुआं-हुआं ‘ के सिवा कुछ और तो आता ही नहीं था | `हुआं-हुआं चिल्ला दिया |शेष सियार भी `हुआं-हुआं’ बोल पड़े | बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला,“ भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं | पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता में से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं | वे कह रहे हैं की जैसे स्वर्ग में परमात्मा वैसे ही पृथ्वी पर भेड़िया | हे भेड़िया जी, महान ! आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सर्वशक्तिमान हैं | प्रातः आपके मस्तक पर तिलक करती है, साँझ को उषा आपका मुख चूमती है , पवन आप पर पंखा करता है और रात्रि को आपकी ही ज्योति लक्ष-लक्ष खंड होकर आकाश में तारे बनकर चमकती है | हे विराट ! आपके चरणों में इस क्षुद्र का प्रणाम है |”
फिर नीले रंग के सियार ने कहा, “ निर्बलों की रक्षा बलवान ही कर सकते हैं | भेड़ें कोमल हैं, निर्बल हैं, अपनी रक्षा नहीं कर सकतीं | भेड़िये बलवान हैं, इसलिए उनके हाथों में अपने हितों को छोड़ निश्चिन्त हो जाओ, वे भी तुम्हारे भाई हैं | आप एक ही जाति के हो | तुम भेड़ वह भेड़िया | कितना कम अंतर है ! और बेचारा भेड़िया व्यर्थ ही बदनाम कर दिया गया है कि वह भेड़ों को खाता है | अरे खाते और हैं, हड्डियां उनके द्वार पर फेंक जाते हैं | ये व्यर्थ बदनाम होते हैं | तुम लोग तो पंचायत में बोल भी नहीं पाओगे | भेड़िये बलवान होते हैं | यदि तुम पर कोई अन्याय होगा, तो डटकर लड़ेंगे | इसलिए अपने हित की रक्षा के लिए भेडियों को चुनकर पंचायत में भेजो| बोलो संत भेड़िया की जय !”
फिर हरे रंग के धर्मगुरु ने उपदेश दिया, “ जो यहाँ त्याग करेगा, वह उस लोक में पाएगा | जो यहाँ दुःख भोगेगा, वह वहां सुख पाएगा | जो यहाँ राजा बनाएगा, वह वहाँ राजा बनेगा | जो यहाँ वोट देगा, वह वहाँ वोट पाएगा | इसलिए सब मिलकर भेड़िये को वोट दो | वे दानी हैं, परोपकारी हैं, संत हैं | में उनको प्रणाम करताहूं |”
यह एक भेड़िये की कथा नहीं है, सब भेड़ियों की कथा है | सब जगह इस प्रकार प्रचार हो गया और भेड़ों को विश्वास हो गया कि भेड़िये से बड़ा उनका कोई हित-चिन्तक और हित-रक्षक नहीं है |
और, जब पंचायत का चुनाव हुआ तो भेड़ों ने अपने हित- रक्षा के लिए भेड़िये को चुना |
और, पंचायत में भेड़ों के हितों की रक्षा के लिए भेड़िये प्रतिनिधि बनकर गए | और पंचायत में भेड़ियों ने भेड़ों की भलाई के लिए पहला क़ानून यह बनाया —-
हर भेड़िये को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा दिया जाए , दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ तथा शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से कम खाना चाहिए, इसलिए आधी भेड़ दी जाए |
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ठिठुरता हुआ गणतंत्र-हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 5 मिनट-

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ़ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।

इतना बेवकूफ़ भी नहीं कि मान लूँ , जिस साल मैं समारोह देखता हूँ, उसी साल ऐसा मौसम रहता है। हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र-दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है।
आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है?
जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस मंत्री से पूछा था कि यह क्या बात है कि हर गणतंत्र-दिवस को सूर्य छिपा रहता है? सूर्य की किरणों के तले हम उत्सव क्यों नहीं मना सकते? उन्होंने कहा-जरा धीरज रखिए। हम कोशिश में हैं कि सूर्य बाहर आ जाए। पर इतने बड़े सूर्य को बाहर निकालना आसान नहीं हैं। वक्त लगेगा। हमें सत्ता के कम से कम सौ वर्ष तो दीजिए।
दिए। सूर्य को बाहर निकालने के लिए सौ वर्ष दिए, मगर हर साल उसका छोटा-मोटा कोना तो निकलता दिखना चाहिए। सूर्य कोई बच्चा तो है नहीं जो अन्तरिक्ष की कोख में अटका है, जिसे आप आपरेशन करके एक दिन में निकाल देंगे।
इधर जब कांग्रेस के दो हिस्से हो गए तब मैंने एक इंडिकेटी कांग्रेस से पूछा। उसने कहा-हम हर बार सूर्य को बादलों से बाहर निकालने की कोशिश करते थे, पर हर बार सिंडीकेट वाले अड़ंगा डाल देते थे। अब हम वादा करते हैं कि अगले गणतंत्र दिवस पर सूर्य को निकालकर बताएँगे।
एक सिण्डीकेटी पास खड़ा सुन रहा था। वह बोल पड़ा- यह लेडी (प्रधानमंत्री) कम्युनिस्टों के चक्कर में आ गई है। वही उसे उकसा रहे हैं कि सूर्य को निकालो। उन्हें उम्मीद है कि बादलों के पीछे से उनका प्यारा लाल सूरजनिकलेगा। हम कहते हैं कि सूर्य को निकालने की क्या जरूरत है? क्या बादलों को हटाने से काम नहीं चल सकता?
मैं संसोपाई भाई से पूछ्ता हूँ। वह कहता है-सूर्य गैर-कांग्रेसवाद पर अमल कर रहा है। उसने डाक्टर लोहिया के कहने पर हमारा पार्टी-फार्म दिया था। काँग्रेसी प्रधानमंत्री को सलामी लेते वह कैसे देख सकता है? किसी गैर-काँग्रेसी को प्रधानमंत्री बना दो, तो सूर्य क्या ,उसके अच्छे भी निकल पड़ेंगे।
जनसंघी भाई से भी पूछा। उसने कहा-सूर्य सेक्युलर होता तो इस सरकार की परेड में निकल आता। इस सरकार से आशा मत करो कि भगवान अंशुमाली को निकाल सकेगी। हमारे राज्य में ही सूर्य निकलेगा।
साम्यवादी ने मुझसे साफ़ कहा-यह सब सी.आई.ए. का षडयंत्र है। सातवें बेड़े से बादल दिल्ली भेजे जाते हैं।
स्वतंत्र पार्टी के नेता ने कहा-रूस का पिछलग्गू बनने का और क्या नतीजा होगा?
प्रसोपा भाई ने अनमने ढंग से कहा-सवाल पेचीदा है। नेशनल कौंसिल की अगली बैठक में इसका फ़ैसला होगा। तब बताऊँगा।
राजाजी से मैं मिल न सका। मिलता, तो वह इसके सिवा क्या कहते कि इस राज में तारे निकलते हैं, यही गनीमत है।
मैं इंतजार करूँगा, जब भी सूर्य निकले।
स्वतंत्रता-दिवस भी तो भरी बरसात में होता है। अंग्रेज बहुत चालाक हैं। भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए। वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है।
स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है।
मैं ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूँ। प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है-घोर करतल-ध्वनि हो रही है।मैं देख रहा हूँ, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं। बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जाएँगे।
लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियाँ बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिए कोट नहीं है। लगता है, गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है। गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिए गर्म कपड़ा नहीं है। पर कुछ लोग कहते हैं-गरीबी मिटनी चाहिए।तभी दूसरे कहते हैं-ऐसा कहने वाले प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।
गणतंत्र-समारोह में हर राज्य की झाँकी निकलती है। ये अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। सत्यमेव जयतेहमारा मोटो है मगर झाँकियाँ झूठ बोलती हैं। इनमें विकास-कार्य, जनजीवन इतिहास आदि रहते हैं। असल में हर राज्य को उस विशिष्ट बात को यहाँ प्रदर्शित करना चाहिए
जिसके कारण पिछले साल वह राज्य मशहूर हुआ। गुजरात की झाँकी में इस साल दंगे का दृश्य होना चाहिए, जलता हुआ घर और आग में झोंके जाते बच्चे। पिछले साल मैंने उम्मीद की थी कि आन्ध्र की झाँकी में हरिजन जलते हुए दिखाए जाएँगे। मगर ऐसा नहीं दिखा। यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाए, लेकिन झाँकी सजाए लघु उद्योगों की। दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं। मेरे मध्यप्रदेश ने दो साल पहले सत्य के नजदीक पहुंचने की कोशिश की थी। झाँकी में अकाल-राहत कार्य बतलाए गए थे। पर सत्य अधूरा रह गया था। मध्यप्रदेश उस साल राहत कार्यों के कारण नहीं, राहत-कार्यों में घपले के कारण मशहूर हुआ था। मेरा सुझाव माना जाता तो मैं झाँकी में झूठे मास्टर रोल भरते दिखाता, चुकारा करनेवाले का अँगूठा हज़ारों मूर्खों के नाम के आगे लगवाता। नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच लेन-देन का दृश्य दिखाता। उस झाँकी में वह बात नहीं आई। पिछले साल स्कूलों के टाट-पट्टी कांडसे हमारा राज्य मशहूर हुआ। मैं पिछले साल की झाँकी में यह दृश्य दिखाता- मंत्री, अफसर वगैरह खड़े हैं और टाट-पट्टी खा रहे हैं।
जो हाल झाँकियों का, वही घोषणाओं का। हर साल घोषणा की जाती है कि समाजवाद आ रहा है। पर अभी तक नहीं आया। कहां अटक गया? लगभग सभी दल समाजवाद लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वह नहीं आ रहा। मैं एक सपना देखता हूँ। समाजवाद आ गया है और वह बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है। बस्ती के लोग आरती सजाकर उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हैं। पर टीले को घेरे खड़े हैं कई समाजवादी। उनमें से हरेक लोगों से कहकर आया है कि समाजवाद को हाथ पकड़कर मैं ही लाऊँगा।
समाजवाद टीले से चिल्लाता है-मुझे बस्ती में ले चलो।
मगर टीले को घेरे समाजवादी कहते हैं –पहले यह तय होगा कि कौन तेरा हाथ पकड़कर ले जाएगा।
समाजवाद की घेराबंदी है। संसोपा-प्रसोपावाले जनतान्त्रिक समाजवादी हैं, पीपुल्स डेमोक्रेसी और नेशनल डेमोक्रेसीवाले समाजवादी हैं। क्रान्तिकारी समाजवादी हैं। हरेक समाजवाद का हाथ पकड़कर उसे बस्ती में ले जाकर लोगों से कहना चाहता है-लो, मैं समाजवाद ले आया।
समाजवाद परेशान है। उधर जनता भी परेशान है। समाजवाद आने को तैयार खड़ा है, मगर समाजवादियों में आपस में धौल-धप्पा हो रहा है। समाजवाद एक तरफ उतरना चाहता है कि उस पर पत्थर पड़ने लगते हैं।खबरदार, उधर से मत जाना!एक समाजवादी उसका एक हाथ पकड़ता है, तो दूसरा हाथ पकड़कर खींचता है। तब बाकी समाजवादी छीना-झपटी करके हाथ छुड़ा देते हैं। लहू-लुहान समाजवाद टीले पर खड़ा है।
इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है। लेखकीय स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं। सहकारिता के लिए प्रतिबद्ध इस आंदोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं। सहकारिता तो एक स्पिरिट है। सब मिलकर सहकारितापूर्वक खाने लगते हैं और आंदोलन को नष्ट कर देते हैं। समाजवाद को समाजवादी ही रोके हुए हैं। यों प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि अब समाजवाद आ ही रहा है।
मैं एक कल्पना कर रहा हूँ।
दिल्ली में फरमान जारी हो जाएगा-समाजवाद सारे देश के दौरे पर निकल रहा है।उसे सब जगह पहुँचाया जाए। उसके स्वागत और सुरक्षा का पूरा बन्दोबस्त किया जाए।
एक सचिव दूसरे सचिव से कहेगा-लो, ये एक और वी.आई.पी. आ रहे हैं। अब इनका इंतज़ाम करो। नाक में दम है।
कलेक्टरों को हुक्म चला जाएगा। कलेक्टर एस.डी.ओ. को लिखेगा, एस.डी.ओ. तहसीलदार को।
पुलिस-दफ़्तरों में फरमान पहुँचेंगे, समाजवाद की सुरक्षा की तैयारी करो।
दफ़्तरों में बड़े बाबू छोटे बाबू से कहेंगे-काहे हो तिवारी बाबू, एक कोई समाजवाद वाला कागज आया था न! जरा निकालो!
तिवारी बाबू कागज निकालकर देंगे। बड़े बाबू फिर से कहेंगे-अरे वह समाजवाद तो परसों ही निकल गया। कोई लेने नहीं गया स्टेशन। तिवारी बाबू, तुम कागज दबाकर रख लेते हो। बड़ी खराब आदत है तुम्हारी।
तमाम अफसर लोग चीफ़-सेक्रेटरी से कहेंगे-सर, समाजवाद बाद में नहीं आ सकता? बात यह है कि हम उसकी सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकेंगे। पूरा फोर्स दंगे से निपटने में लगा है।
मुख्य सचिव दिल्ली लिख देगा-हम समाजवाद की सुरक्षा का इंतजाम करने में असमर्थ हैं। उसका आना अभी मुल्तवी किया जाए।
जिस शासन-व्यवस्था में समाजवाद के आगमन के कागज दब जायें और जो उसकी सुरक्षा की व्यवस्था न करे, उसके भरोसे समाजवाद लाना है तो ले आओ। मुझे खास ऐतराज भी नहीं है। जनता के द्वारा न आकर अगर समाजवाद दफ़्तरों के द्वारा आ गया तो एक ऐतिहासिक घटना हो जाएगी।
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दस दिन का अनशन—- हरिशंकर परसाई

अनुमानित समय : 7 मिनट-

आज मैंने बन्नू से कहा, ” देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है की संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल.”
बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.
सोचकर बोला, ” मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? “
मैंने कहा, ” इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर आदमी जटा रखेगा और उसे कभी धोएगा नहीं. तमाम सिरों से दुर्गन्ध निकल रही है. तेरी मांग तो बहुत छोटी है- सिर्फ एक औरत के लिए.”
सुरेन्द्र वहां बैठा था. बोला, ” यार कैसी बात करते हो! किसी की बीवी को हड़पने के लिए अनशन होगा? हमें कुछ शर्म तो आनी चाहिए. लोग हँसेंगे.”
मैंने कहा, ” अरे यार, शर्म तो बड़े-बड़े अनशनिया साधु-संतों को नहीं आई. हम तो मामूली आदमी हैं. जहाँ तक हंसने का सवाल हैगोरक्षा आन्दोलन पर सारी दुनिया के लोग इतना हंस चुके हैं क उनका पेट दुखने लगा है. अब कम-से-कम दस सालों तक कोई आदमी हंस नहीं सकता. जो हंसेगा वो पेट के दर्द से मर जाएगा.”
बन्नू ने कहा,” सफलता मिल जायेगी?”
मैंने कहा,” यह तो इशूबनाने पर है. अच्छा बन गया तो औरत मिल जाएगी. चल, हम एक्सपर्टके पास चलकर सलाह लेते हैं. बाबा सनकीदास विशेषज्ञ हैं. उनकी अच्छी प्रैक्टिसचल रही है. उनके निर्देशन में इस वक़्त चार आदमी अनशन कर रहे हैं.”
हम बाबा सनकीदास के पास गए. पूरा मामला सुनकर उन्होंने कहा,” ठीक है. मैं इस मामले को हाथ में ले सकता हूँ. जैसा कहूँ वैसा करते जाना. तू आत्मदाह की धमकी दे सकता है?”
बन्नू कांप गया. बोला,” मुझे डर लगता है.”
जलना नहीं है रे. सिर्फ धमकी देना है.”
मुझे तो उसके नाम से भी डर लगता है.”
बाबा ने कहा,” अच्छा तो फिर अनशन कर डाल. इशूहम बनायेंगे.”
बन्नू फिर डरा. बोला,” मर तो नहीं जाऊँगा.”
बाबा ने कहा,” चतुर खिलाड़ी नहीं मरते. वे एक आँख मेडिकल रिपोर्ट पर और दूसरी मध्यस्थ पर रखते हैं. तुम चिंता मत करो. तुम्हें बचा लेंगे और वह औरत भी दिला देंगे.”
11 जनवरी
आज बन्नू आमरण अनशन पर बैठ गया. तम्बू में धुप-दीप जल रहे हैं. एक पार्टी भजन गा रही है – सबको
सन्मति दे भगवान्!‘. पहले ही दिन पवित्र वातावरण बन गया है. बाबा सनकीदास इस कला के बड़े उस्ताद हैं. उन्होंने बन्नू के नाम से जो वक्तव्य छपा कर बंटवाया है, वो बड़ा ज़ोरदार है. उसमें बन्नू ने कहा है कि मेरी आत्मा से पुकार उठ रही है कि मैं अधूरी हूँ. मेरा दूसरा खंड सावित्री में है. दोनों आत्म-खण्डों को मिलाकर एक करो या मुझे भी शरीर से मुक्त करो. मैं आत्म-खण्डों को मिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठा हूँ. मेरी मांग है कि सावित्री मुझे मिले. यदि नहीं मिलती तो मैं अनशन से इस आत्म-खंड को अपनी नश्वर देह से मुक्त कर दूंगा. मैं सत्य पर हूँ, इसलिए निडर हूँ. सत्य की जय हो!
सावित्री गुस्से से भरी हुई आई थी. बाबा सनकीदास से कहा,” यह हरामजादा मेरे लिए अनशन पर बैठा है ना?”
बाबा बोले,” देवी, उसे अपशब्द मत कहो. वह पवित्र अनशन पर बैठा है. पहले हरामजादा रहा होगा. अब नहीं रहा. वह अनशन कर रहा है.”
सावित्री ने कहा,” मगर मुझे तो पूछा होता. मैं तो इस पर थूकती हूँ.”
बाबा ने शान्ति से कहा,” देवी, तू तो इशूहै. इशूसे थोड़े ही पूछा जाता है. गोरक्षा आन्दोलन वालों ने गाय से कहाँ पूछा था कि तेरी रक्षा के लिए आन्दोलन करें या नहीं. देवी, तू जा. मेरी सलाह है कि अब तुम या तुम्हारा पति यहाँ न आएं. एक-दो दिन में जनमत बन जाएगा और तब तुम्हारे अपशब्द जनता बर्दाश्त नहीं करेगी.”
वह बड़बड़ाती हुई चली गई.
बन्नू उदास हो गया. बाबा ने समझाया,” चिंता मत करो. जीत तुम्हारी होगी. अंत में सत्य की ही जीत होती है.”
13 जनवरी
बन्नू भूख का बड़ा कच्चा है. आज तीसरे ही दिन कराहने लगा. बन्नू पूछता है, ” जयप्रकाश नारायण आये?”
मैंने कहा,” वे पांचवें या छठे दिन आते हैं. उनका नियम है. उन्हें सूचना दे दी है.”
वह पूछता है,” विनोबा ने क्या कहा है इस विषय में?”
बाबा बोले,” उन्होंने साधन और साध्य की मीमांसा की है, पर थोड़ा तोड़कर उनकी बात को अपने पक्ष में उपयोग किया जा सकता है.”
बन्नू ने आँखें बंद कर लीं. बोला,”भैया, जयप्रकाश बाबू को जल्दी बुलाओ.”
आज पत्रकार भी आये थे. बड़ी दिमाग-पच्ची करते रहे.
पूछने लगे,” उपवास का हेतु कैसा है? क्या वह सार्वजनिक हित में है? “
बाबा ने कहा,” हेतु अब नहीं देखा जाता. अब तो इसके प्राण बचाने की समस्या है. अनशन पर बैठना इतना बड़ा आत्म-बलिदान है कि हेतु भी पवित्र हो जाता है.”
मैंने कहा,” और सार्वजनिक हित इससे होगा. कितने ही लोग दूसरे की बीवी छीनना चाहते हैं, मगर तरकीब उन्हें नहीं मालूम. अनशन अगर सफल हो गया, तो जनता का मार्गदर्शन करेगा.”
14 जनवरी
बन्नू और कमज़ोर हो गया है. वह अनशन तोड़ने की धमकी हम लोगों को देने लगा है. इससे हम लोगों का मुंह काला हो जायेगा. बाबा सनकीदास ने उसे बहुत समझाया.
आज बाबा ने एक और कमाल कर दिया. किसी स्वामी रसानंद का वक्तव्य अख़बारों में छपवाया है. स्वामीजी ने कहा है कि मुझे तपस्या के कारण भूत और भविष्य दिखता है. मैंने पता लगाया है क बन्नू पूर्वजन्म में ऋषि था और सावित्री ऋषि की धर्मपत्नी. बन्नू का नाम उस जन्म में ऋषि वनमानुस था. उसने तीन हज़ार वर्षों के बाद अब फिर नरदेह धारण की है. सावित्री का इससे जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है. यह घोर अधर्म है कि एक ऋषि की पत्नी को राधिका प्रसाद-जैसा साधारण आदमी अपने घर में रखे. समस्त धर्मप्राण जनता से मेरा आग्रह है कि इस अधर्म को न होने दें.
इस वक्तव्य का अच्छा असर हुआ. कुछ लोग धर्म की जय हो!नारे लगाते पाए गए. एक भीड़ राधिका बाबू के घर के सामने नारे लगा रही थी—-
राधिका प्रसाद– पापी है! पापी का नाश हो! धर्म की जय हो.”
स्वामीजी ने मंदिरों में बन्नू की प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना का आयोजन करा दिया है.
15 जनवरी
रात को राधिका बाबू के घर पर पत्थर फेंके गए.
जनमत बन गया है.
स्त्री-पुरुषों के मुख से यह वाक्य हमारे एजेंटों ने सुने—
बेचारे को पांच दिन हो गए. भूखा पड़ा है.”
धन्य है इस निष्ठां को.”
मगर उस कठकरेजी का कलेजा नहीं पिघला.”
उसका मरद भी कैसा बेशरम है.”
सुना है पिछले जन्म में कोई ऋषि था.”
स्वामी रसानंद का वक्तव्य नहीं पढ़ा!”
बड़ा पाप है ऋषि की धर्मपत्नी को घर में डाले रखना.”
आज ग्यारह सौभाग्यवतियों ने बन्नू को तिलक किया और आरती उतारी.
बन्नू बहुत खुश हुआ. सौभाग्यवतियों को देख कर उसका जी उछलने लगता है.
अखबार अनशन के समाचारों से भरे हैं.
आज एक भीड़ हमने प्रधानमन्त्री के बंगले पर हस्तक्षेप की मांग करने और बन्नू के प्राण बचाने की अपील करने भेजी थी. प्रधानमन्त्री ने
मिलने से इनकार कर दिया.
देखते हैं कब तक नहीं मिलते.
शाम को जयप्रकाश नारायण आ गए. नाराज़ थे. कहने लगे,” किस-किस के प्राण बचाऊं मैं? मेरा क्या यही धंधा है? रोज़ कोई अनशन पर बैठ जाता है और चिल्लाता है प्राण बचाओ. प्राण बचाना है तो खाना क्यों नहीं लेता? प्राण बचाने के लिए मध्यस्थ की कहाँ ज़रुरत है? यह भी कोई बात है! दूसरे की बीवी छीनने के लिए अनशन के पवित्र अस्त्र का उपयोग किया जाने लगा है.”
हमने समझाया,” यह इशूज़रा दूसरे किस्म है. आत्मा से पुकार उठी थी.”
वे शांत हुए. बोले,” अगर आत्मा की बात है तो मैं इसमें हाथ डालूँगा.”
मैंने कहा,” फिर कोटि-कोटि धर्मप्राण जनता की भावना इसके साथ जुड़ गई है.”
जयप्रकाश बाबू मध्यस्थता करने को राज़ी हो गए. वे सावित्री और उसके पति से मिलकर फिर प्रधानमन्त्री से मिलेंगे.
बन्नू बड़े दीनभाव जयप्रकाश बाबू की तरफ देख रहा था.
बाद में हमने उससे कहा,” अबे साले, इस तरह दीनता से मत देखा कर. तेरी कमज़ोरी ताड़ लेगा तो कोई भी नेता तुझे मुसम्मी का रस पिला देगा. देखता नहीं है, कितने ही नेता झोलों में मुसम्मी रखे तम्बू के आस-पास घूम रहे हैं.”
16 जनवरी
जयप्रकाश बाबू की मिशनफेल हो गई. कोई मानने को तैयार नहीं है. प्रधानमन्त्री ने कहा,” हमारी बन्नू के साथ सहानुभूति है, पर हम कुछ नहीं कर सकते. उससे उपवास तुडवाओ, तब शान्ति से वार्ता द्वारा समस्या का हल ढूँढा जाएगा.”
हम निराश हुए. बाबा सनकीदास निराश नहीं हुए. उन्होंने कहा,” पहले सब मांग को नामंज़ूर करते हैं. यही प्रथा है. अब आन्दोलन तीव्र करो. अखबारों में छपवाओ क बन्नू की पेशाब में काफी एसीटोनआने लगा है. उसकी हालत चिंताजनक है. वक्तव्य छपवाओ कि हर कीमत पर बन्नू के प्राण बचाए जाएँ. सरकार बैठी-बैठी क्या देख रही है? उसे तुरंत कोई कदम उठाना चाहिए जिससे बन्नू के बहुमूल्य प्राण बचाए जा सकें.”
बाबा अद्भुत आदमी हैं. कितनी तरकीबें उनके दिमाग में हैं. कहते हैं, “अब आन्दोलन में जातिवाद का पुट देने का मौका आ गया है. बन्नू ब्राम्हण है और राधिकाप्रसाद कायस्थ. ब्राम्हणों को भड़काओ और इधर कायस्थों को. ब्राम्हण-सभा का मंत्री आगामी चुनाव में खड़ा होगा.
उससे कहो कि यही मौका है ब्राम्हणों के वोट इकट्ठे ले लेने का.”
आज राधिका बाबू की तरफ से प्रस्ताव आया था कि बन्नू सावित्री से राखी बंधवा ले.
हमने नामंजूर कर दिया.
17 जनवरी
आज के अखबारों में ये शीर्षक हैं—
बन्नू के प्राण बचाओ!
बन्नू की हालत चिंताजनक!
मंदिरों में प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना!”
एक अख़बार में हमने विज्ञापन रेट पर यह भी छपवा लिया—
कोटि-कोटि धर्म-प्राण जनता की मांग—!
बन्नू की प्राण-रक्षा की जाए!
बन्नू की मृत्यु के भयंकर परिणाम होंगे !”
ब्राम्हण-सभा के मंत्री का वक्तव्य छप गया. उन्होंने ब्राम्हण जाति की इज्ज़त का मामला इसे बना लिया था. सीधी कार्यवाही की धमकी दी थी.
हमने चार गुंडों को कायस्थों के घरों पर पत्थर फेंकने के लिए तय कर किया है.
इससे निपटकर वही लोग ब्राम्हणों के घर पर पत्थर फेंकेंगे.
पैसे बन्नू ने पेशगी दे दिए हैं.
बाबा का कहना है क कल या परसों तक कर्फ्य लगवा दिया जाना चाहिए. दफा 144 तो लग ही जाये. इससे केसमज़बूत होगा.
18 जनवरी
रात को ब्राम्हणों और कायस्थों के घरों पर पत्थर फिंक गए.
सुबह ब्राम्हणों और कायस्थों के दो दलों में जमकर पथराव हुआ.
शहर में दफा 144 लग गयी.
सनसनी फैली हुई है.
हमारा प्रतिनिधि मंडल प्रधानमन्त्री से मिला था. उन्होंने कहा,” इसमें कानूनी अडचनें हैं. विवाह-क़ानून में संशोधन करना पड़ेगा.”
हमने कहा,” तो संशोधन कर दीजिये. अध्यादेश जारी करवा दीजिये. अगर बन्नू मर गया तो सारे देश में आग लग जायेगी.”
वे कहने लगे,” पहले अनशन तुडवाओ ? “
हमने कहा,” सरकार सैद्धांतिक रूप से मांग को स्वीकार कर ले और एक कमिटी बिठा दे, जो रास्ता बताये कि वह औरत इसे कैसे मिल सकती है.”
सरकार अभी स्थिति को देख रही है. बन्नू को और कष्ट भोगना होगा.
मामला जहाँ का तहाँ रहा. वार्ता में डेडलॉकआ गया है.
छुटपुट झगड़े हो रहे हैं.
रात को हमने पुलिस चौकी पर पत्थर फिंकवा दिए. इसका अच्छा असर हुआ.
प्राण बचाओ‘—की मांग आज और बढ़ गयी.
19 जनवरी

बन्नू बहुत कमज़ोर हो गया है. घबड़ाता है. कहीं मर न जाए.

बकने लगा है कि हम लोगों ने उसे फंसा दिया है. कहीं वक्तव्य दे दिया तो हम लोग एक्सपोज़हो जायेंगे.

कुछ जल्दी ही करना पड़ेगा. हमने उससे कहा कि अब अगर वह यों ही अनशन तोड़ देगा तो जनता उसे मार डालेगी.
प्रतिनिधि मंडल फिर मिलने जाएगा.
20 जनवरी
डेडलॉक
सिर्फ एक बस जलाई जा सकी.
बन्नू अब संभल नहीं रहा है.
उसकी तरफ से हम ही कह रहे हैं कि “वह मर जाएगा, पर झुकेगा नहीं!”
सरकार भी घबराई मालूम होती है.
साधुसंघ ने आज मांग का समर्थन कर दिया.
ब्राम्हण समाज ने अल्टीमेटम दे दिया. १० ब्राम्हण आत्मदाह करेंगे.
सावित्री ने आत्महत्या की कोशिश की थी, पर बचा ली गयी.
बन्नू के दर्शन के लिए लाइन लगी रही है.
राष्ट्रसंघ के महामंत्री को आज तार कर दिया गया.
जगह-जगह- प्रार्थना-सभाएं होती रहीं.
डॉ. लोहिया ने कहा है क जब तक यह सरकार है, तब तक न्यायोचित मांगें पूरी नहीं होंगी. बन्नू को चाहिए कि वह सावित्री के बदले इस सरकार को ही भगा ले जाए.
21 जनवरी
बन्नू की मांग सिद्धांततः स्वीकार कर ली गयी.
व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एक कमेटी बना दी गई है.
भजन और प्रार्थना के बीच बाबा सनकीदास ने बन्नू को रस पिलाया. नेताओं की मुसम्मियाँ झोलों में ही सूख गईं. बाबा ने कहा कि जनतंत्र में जनभावना का आदर होना चाहिए. इस प्रश्न के साथ कोटि-कोटि जनों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं. अच्छा ही हुआ जो शान्ति से समस्या सुलझ गई, वर्ना हिंसक क्रान्ति हो जाती.
ब्राम्हणसभा के विधानसभाई उमीदवार ने बन्नू से अपना प्रचार कराने के लिए सौदा कर लिया है. काफी बड़ी रकम दी है. बन्नू की कीमत बढ़ गयी.
चरण छूते हुए नर-नारियों से बन्नू कहता है,” सब ईश्वर की इच्छा से हुआ. मैं तो उसका माध्यम हूँ.”
नारे लग रहे हैं — सत्य की जय! धर्म की जय!