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हितोपदेश

माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।

कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः॥

                                                                   (हितोपदेशे)

     यों कहकर भाईजी फिर मुझसे बोले,–“ दुलारी, अब तुम अपना बयान मेरे आगे कह जाओ; पर इतना तुम ध्यान रखना कि इस समय जो कुछ तुम कहो, उसे खूब अच्छी तरह सोच-समझ कर कहना।”

     यों कहकर भाईजी ने अपने जेब में से एक मोटी सी पोथी निकाली, जो सादे कागजों की थी। बस, उस पुस्तक को एक हाथ में ले और दूसरे हाथ से स्याही से भरी हुई कलम पकड़कर उन्होंने मेरी ओर देखा।

     मैंने धीरे से कहा,– “आपने जो मुझे बार-बार यह चेतावनी दी कि,  ‘मैं जो कुछ इस समय आपके आगे बयान करूँ, वह सच-सच ही कहूँ, झूठ न कहूँ’; क्यों, आपके इस कहने का यही मतलब है न?”

     भाईजी ने कहा,– “नहीं, मेरा मतलब यह नहीं है; अर्थात्‌ मैं तुम्हें झूठी नहीं समझता, और न यही खयाल करता हूँ कि तुमने अबतक अपने जितने बयान दिए हैं, उनमें कुछ भी झूठ कहा गया है। मेरे कहने का मतलब केवल यही है कि इस समय तुम अपने चित्त को खूब अच्छी तरह सावधान करके जो कुछ लिखवाओगी, उसके साथ मैं तुम्हारे पहिले के दिए हुए बयानों को मिलाऊँगा और तब इस बात की कोशिश कर सकूँगा कि तुम्हारे छुटकारे के लिये कौन सा “पॉइंट” अच्छा है, जिसे पकड़ कर हाईकोर्ट के जजों के आगे बहस की जाये।”

     यह सुन और जरा सा मुसकुराकर मैंने कहा,– “लेकिन मेरा इस समय का लिखाया हुआ बयान तो अब हाईकोर्ट में पेश होगा नहीं, फिर आप क्यों मेरा फिर से, नए सिरे से बयान लेने का कष्ट उठाना चाहते हैं?”

     मेरी ऐसी बात सुनकर भाई दयालसिंह ने  बड़ी नम्रता से कहा,–“बेटी, तुम इन मामलों के एंचपेंच को नहीं समझ सकती, इसलिये अब व्यर्थ हठ करके समय को न खोवो और अपना इजहार लिखाना शुरू कर दो।”

     यह सुनकर मैं बोली,–“अच्छी बात है, लिखिए; पर इतना याद रखिए कि इस समय जो कुछ मैं लिखवाऊँगी, उसके साथ मेरे पहिले के दिए हुए तीनों बयान बिलकुल मिल जायेंगे और सिवाय परिश्रम के, आपके हाथ कुछ भी न लगेगा।”

      भाईजी ने कहा,–“नहीं, यह बात नहीं है; मेरे हाथ सब कुछ लगेगा; क्योंकि यदि तुम्हारे इस समय के लिखवाए हुए बयान के साथ तुम्हारे पेश्तर के तीनों बयान मिल जायें तो समझ लो कि मैंने बाजी मार ली और तुम बेदाग छूट गई! बस, इसीलिए तो मैंने बार-बार तुमसे यह बात कही है कि तुम जरा अपना चित्त खूब ठिकाने कर के, तब अपना बयान लिखवाओ।”

      मैं बोली,–”तो अच्छी बात है। आप लिखिए, मैं कहती हूँ।”

     वे बोले, –“अच्छा, जरा सा ठहर जाओ; क्योंकि मैं तो कलम पकड़े हुए लिखने के लिए तैयार बैठा ही हूँ; पर जरा सा तुम और ठहर जाओ और मेरे अफसर को आ जाने दो। बस, उनके आ जाने पर उन्हीं के सामने मैं तुम्हारा इजहार लिखूँगा। उन्होंने ठीक साढ़े ग्यारह बजे यहाँ पहुँच जाने की बात कही थी, पर अब बारह बजा चाहते हैं। अस्तु, कोई चिन्ता नहीं, वे अब आते ही होंगे।”

     मैंने पूछा,–‘” आपने अपने अफसर को यहाँ आने का क्यों कष्ट दिया?”

     भाईजी ने कहा,— “मैंने नहीं दिया, बल्कि इस कष्ट को उठाना उन्होंने स्वयं स्वीकार किया। अच्छा, इस बात को भी तुम सुन लो। बात यह हुई कि कल रात को मैं अपने अफसर, अर्थात्‌ जासूसी महकमे के छोटे साहब से मिला और तुम्हारा सारा हाल उन्हें सुना कर मैंने उनसे यों कहा कि, “वह लड़की बिलकुल बेकसूर है।” यह सुनकर उन्होंने मुझसे यों कहा कि, “अच्छा, कल ग्यारह बजे मैं खुद वहाँ चल कर उस लड़की का इजहार लिखूँगा और अगर वाकई वह बेकसूर हुई तो मैं अपनी रिपोर्ट अपने बड़े साहब के पास भेज दूँगा और वे उस रिपोर्ट पर अपनी राय लिख कर हाईकोर्ट के जजों के पास भेज देंगे, जिसका नतीजा यह होगा कि उस रिपोर्ट पर खूब अच्छी तरह गौर करके हाईकोर्ट उस लड़की को बेगुनाह समझ कर छोड़ देगी।”

     भाईजी इतना ही कहने पाए थे कि एक लम्बे कद के साहब (अंगरेज) आ पहुँचे। उन्हें देखते ही भाईजी और बैरिस्टर साहब उठ खड़े हुए और जब वे साहब बीच की कुर्सी पर बैठ गए, तो उनकी दाहिनी ओर भाई दयालसिंह और बाईं ओर बारिष्टर साहब बैठ गए। यहाँ पर यह भी कह देना उचित होगा कि उस समय मैं भी उठ खड़ी हुई थी और उन तीनों महाशयों के बैठ जाने पर बैठ गई थी।

     अस्तु, कुछ देर तक भली भांति मेरी ओर देख कर उन अंगरेज अफसर ने भाईजी से कहा,–“अच्छा, अब आप इस औरत का इजहार हिन्दी में लिखें, पर मैं अंगरेजी में लिखूँगा और फिर पीछे अपनी राय के साथ उसे बड़े साहब के पास भेज दूँगा। हाँ, इस औरत के वे तीनों बयान कहाँ हैं, जो इसने पुलिस, मजिस्ट्रेट और जज के आगे दिए थे?”

      यह सुन कर बारिस्टर साहब ने अपने पाकेट में से फीता बँधा हुआ एक पुलिंदा निकाल कर खोला और फिर उसे साहब के आगे रखकर यों कहा,— “लीजिए, इस मुकदमे के कुल कागजात ये हैं।”

      साहब ने उसे ले, उलट-पलट कर देखा और फिर बारिष्टर साहब के हाथ में उसे देकर कहा,–“आप इसे देखिए और अब जो यह औरत अपना इजहार लिखावेगी, उससे इसे मिलाते जाइए। अगर कहीं पर इस वक्त के बयान से पहिले के दिए हुए बयानों में कुछ फर्क पड़े तो उस जगह पर लाल पेन्सिल से निशान कर दीजिएगा।”

       इस पर बारिष्टर साहब ने “अच्छा” कहकर उस कचहरी वाली मिसिल को अपने बाएँ हाथ से पकड़ा और दाहिने हाथ में लाल पेन्सिल ले ली।

       भाईजी पहिले ही से सादे कागज़ों की पोथी और कलम लिए हुए बैठे थे। अब अंगरेज अफसर ने भी भाईजी की तरह एक सादी किताब और स्याही-भरी कलम ले ली और मेरी ओर देखकर यों कहा,– “टुमारा नाम बोलो।”

       मैं बोली,–“मेरा नाम दुलारी है।”

       साहब,–“डेको, डुलारी! टुम को हाम एक बाट बोलटा है।”

       मैने पूछा,–“जी, कहिए।”

       साहब ने कहा,–“टुम बरा भला लेड़की हाय। इश बाशते टुम को शब बाट शच शच बोलना होगा।”

       मैंने यों कहा,– “मेरी झूठ बोलने की बान नहीं है।”

       इस पर साहब ने कहा,–“टो, अच्छा बाट है। बोलो।”

       यह सुनकर मैंने मन ही मन जगत्पिता परमेश्वर और अपने माता-पिता को बार-बार दण्डवत् प्रणाम किया और उसके पीछे यों अपनी जीवनी कहनी प्रारंभ की।

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