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घंटी की आवाज सुनते ही खेल के मैदान में भगदड़ मच गई. लड़के खेल छोड़कर अपने कमरों की और भागे. अशोक तो ‘कबड्डी-कबड्डी’ करता हुआ ही अपने कमरे में पहुँच गया. डेस्क के नीचे पड़े हुए जूते पहनने के लिए वह जैसे ही झुका, उसकी नजर अपनी पुस्तक पर पड़ी. पुस्तक औंधे मुँह पड़ी थी. उसका आधा भाग बीच से फटा हुआ था. ठीक वैसे ही जैसे हरीश, विनोद, आलोक और अतुल की पुस्तकें फटी हुई पाई गई थीं. वह चिल्ला उठा: “भूत मेरी पुस्तक फाड़ गया.”

    लड़कों के तमतमाए हुए चेहरे भय के कारण एकाएक फक पड़ गए. हरीश ने अशोक के हाथ से पुस्तक ली और सुरेश के आगे करते हुए बोला: “सुरेश, क्या तुम अब भी नहीं मानते कि यह किसी भूत का काम है?”

    सुरेश कुछ उत्तर नहीं दे सका. लेकिन दिल से वह अब भी यह मानने को तैयार नहीं था कि आधी छुट्टी के समय इस कमरे में कोई भूत आता है, जो लड़कों की पुस्तकें फाड़ जाता है.

    पिछले दस-बारह दिन में कई लड़कों की पुस्तकें फट चुकी थीं. सबसे पहले हरीश की पुस्तक फटी हुई पाई गई थी. हरीश हेडमास्टर साहब का लड़का था और सब पर उसका दबदबा था. कोई लड़का उसकी पुस्तक फाड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता था. कक्षा में एक-दो लड़के अवश्य ऐसे थे, जो कभी-कभी अपनी पुस्तक का हवाला देकर हरीश को ‘बंदरों का राजा’ कह दिया करते थे. किन्तु, उन पर किसी को पुस्तक फाड़ने का शक नहीं हो सकता था.

    दो दिन बाद विनोद की पुस्तक भी उसी तरह बीच से फटी हुई पाई गई. जब हेडमास्टर साहब के पास खबर पहुँची, तब उन्होंने रामबहादुर चपरासी को आज्ञा दी कि वह आधी छुट्टी के समय कमरे की निगरानी रखे. रामबहादुर को भूत-प्रेतों पर बड़ा विश्वास था. इसलिए जब दो दिन बाद उसके होते हुए भी आलोक की पुस्तक फटी हुई पाई गई, तब उसने जोर-जोर से कहना शुरू किया कि इस कमरे में कोई भूत आता है. लड़कों को भी उसकी बात पर विश्वास हो गया. लेकिन सुरेश नहीं माना. अगले दिन अतुल की पुस्तक फाड़ी गई और आज अशोक की पुस्तक का भी वही हाल हुआ.

    किन्तु, सुरेश अब भी भूत वाली बात मानने को तैयार नहीं था.

    उस दिन छुट्टी के बाद सुरेश की दूसरे लड़कों से फिर बहस छिड़ गई. सुरेश जोश में आकर बोला : “अगर पुस्तकें फाड़ने वाला भूत है, तो मैं उस भूत को पकड़ कर सबके सामने पेश करूंगा, चाहे उसके लिए मुझे कितना भी खतरा क्यों न उठाना पड़े.” कुछ लड़के उसकी बात सुनकर मुस्करा दिए. किन्तु कुछ लड़के ऐसे भी थे जजों यह जानते थे कि सुरेश जो कुछ कहता है, उसे करके दिखा देता है. उन्होंने सुरेश को हिम्मत दिलाई.

    शाम को सुरेश एकांत में बैठकर इस समस्या पर विचार करता रहा. उसने कक्षा के सभी लड़कों पर बारी-बारी से विचार किया, किन्तु किसी भी लड़के पर उसे शक नहीं हुआ. फिर अचानक उसके दिमाग में बिजली की तरह एक विचार आया : “भूत-प्रेतों के नियम बड़े पक्के होते हैं. उनसे वे तिलभर भी इधर-उधर नहीं होते.”

    इस विचार के आते ही वह विनोद के घर की और भागा. उस समय अँधेरा घिरने लगा था. ऐसे में सुरेश को अपने यहाँ देखकर विनोद अचम्भे में पड़ गया. किन्तु सुरेश ने ज्यादा बातचीत नहीं की. विनोद से फटी हुई पुस्तक मांगकर वह अतुल के घर की ओर भागा. इसी तरह उसने हरीश, आलोक, अशोक की फटी हुई पुस्तकें भी प्राप्त कर लीं.

    अब वह अपने पढ़ने के कमरे में दरवाजा बंद करके बैठ गया. पाँच फटी हुई पुस्तकें उसके सामने पड़ी थीं. पहले उसने हरीश की पुस्तक उठाई. उसके पहले तीस पन्ने फटे हुए थे. विनोद की पुस्तक के पहले पचास पन्ने फटे हुए थे. इसी तरह अतुल के बीस, आलोक के पैंतीस और अशोक के चालीस पन्ने फटे हुए थे. इस प्रकार मिलान करने के बाद सुरेश इस नतीजे पर पहुँचा कि पुस्तकें फाड़ने वाला कोई लड़का ही है, भूत नहीं. भूत होता तो सब किताबों के बराबर पन्ने फाड़ता, क्योंकि वह अपने नियम का बड़ा पक्का होता है.

    दूसरे दिन, स्कूल लगने के पहले ही उसने यह बात कुछ लड़कों को बताई, तो वे मानने के लिए तैयार हो गए. किन्तु हरीश को मनवाना आसान नहीं था. जब वह कमरे में आया, तो सुरेश से बहस करने लगा. किन्तु जब सुरेश ने बताया कि यदि भूत ने पुस्तकें फाड़ी होतीं, तो सभी पुस्तकों के एक से पन्ने फटे होने चाहिए थे, तो हरीश से कोई उत्तर नहीं बन पड़ा. लड़कों के सामने सुरेश से हारकर उसका चेहरा उतर गया. थोड़ी देर बाद वह जोश में भरकर बोला : “अगर यह किसी लड़के की शरारत है, तो वह लड़का कौन है?”

    सुरेश बोला : “अभी इस बात का उत्तर देना कठिन है. लेकिन मैं उसका पता लगाऊँगा और बहुत जल्दी ही लगाऊँगा.”

    दिन भर सुरेश के दिमाग में यही बात घूमती रही. शाम को घर आकर वह अपने कमरे के एकांत में बैठकर इसी पर विचार करता रहा. शायद उस रात सपने में भी उसने यही काम किया होगा.

    दूसरे दिन जब सब लड़के प्रार्थना के लिए स्कूल के सहन में जमा हुए, सुरेश चुपचाप वहाँ से निकलकर चपरासी रामबहादुर के पास जा पहुँचा. रामबहादुर कोठरी में बैठा बीड़ी पी रहा था. सुरेश को देखकर उसने बीड़ी फेंक दी और उठ खड़ा हुआ, शायद यह सोचकर कि हेडमास्टर साहब ने उसे बुलाया है. किन्तु सुरेश उसके पास बैठता हुआ बोला : “रामबहादुर, मैं किताबें फाड़नेवाले लड़के का पता लगाना चाहता हूँ; क्या मेरी इसमें मदद करोगे?”

    रामबहादुर पहले तो यही मानने के लिए तैयार नहीं हुआ कि यह किसी लड़के की शरारत है, किन्तु बाद में सुरेश के समझाने पर वह उसके सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गया. सुरेश ने पूछा : “उस दिन जब तुम आधी छुट्टी के समय कमरे का पहरा दे रहे थे, तब क्या कोई लड़का कमरे में आया था?”

    ‘कोई नहीं.’

    ‘क्या कमरे के बाहर कोई लड़का टहलता हुआ दिखाई दिया था?’

    ‘हाँ…हाँ, बहुत से लड़के बाहर टहल रहे थे.’

    ‘मेरा मतलब—ऐसा लड़का जिस पर शक किया जा सके?’

    ‘मुझे तो किसी लड़के पर शक नहीं होता.’

    ‘कोई ऐसा लड़का छिप छिपकर तुमको देख रहा हो?’

    ‘कोई नहीं.’

    ‘क्या उस दिन तुम बीच में उठकर कहीं गए थे?’

    ‘बिलकुल नहीं.’

    ‘बीड़ी पीने या…?’

    ‘हाँ…हां, एक मिनट के लिए मैं…’

    सुरेश का चेहरा उत्साह से चमक उठा.  उसने आगे पूछा : “एक मिनट के लिए कहाँ गए थे?”

    “एक लड़के ने मुझसे आकर कहा था कि हेडमास्टर साहब के कमरे से घंटी की आवाज आ रही है. मैं भागकर वहाँ गया, लेकिन तभी हेडमास्टर साहब बाहर जा चुके थे.

    सुरेश ने दाएं हाथ की मुट्ठी बाईं हथेली पर मारते हुए पूछा : “कौन था वह लड़का?”

    “नाम तो नहीं जानता, लेकिन एक पतला सा भोला-भाला सा लड़का था.”

    “अतुल, महेश, आलोक? याद कर लो नाम उसका.”

    “वह सबसे आगे बैठता है.”

    “ओह, रामू?”

    “हाँ…हाँ, शायद रामू ही नाम है उसका.”

    सुरेश प्रसन्न हो गया. अब वह रामबहादुर से क्षमा माँगकर अपने कमरे की ओर चला : “रामू…रामू ने ऐसा क्यों किया? ठीक, कमजोर होने के कारण वह लड़कों के साथ खेलता-कूदता नहीं. लड़के बात-बात पर उसे पीट देते हैं और वह उनका विरोध नहीं कर पाता. किन्तु भीतर ही भीतर वह उनसे नाराज रहता है. वह उनसे बदला लेना चाहता है. इसीलिए उनकी पुस्तकें फाड़ने में उसे बड़ा मजा आता है.”

    यही सोचता-सोचता सुरेश अपने कमरे में आ गया. प्रार्थना अभी चल रही थी. कमरे में अकेले रामू को बैठा देखकर वह चौंक पड़ा. रामू भी सुरेश को देखकर सकपका गया. सुरेश ने पूछा : “रामू, तुम प्रार्थना करने नहीं गए?”

    रामू कुछ डरते-डरते बोला : “मैंने घर का काम पूरा नहीं किया था. सोचा, यहीं कर डालूँ.”

    सुरेश ने कुछ सख्ती से पूछा : “घर का काम या और कुछ?”

    रामू कुछ नहीं समझ सका, इसलिए वह सुरेश की ओर देखता रहा.

    सुरेश ने जरा और कड़ी आवाज में कहा : “देखो, दूसरों को बेवकूफ मत बनाओ. सच-सच बताओ, तुम लड़कों की पुस्तकें क्यों फाड़ते हो?”

    रामू से कोई उत्तर नहीं बन पड़ा और वह रो पड़ा.

    “रोने से काम नहीं चलेगा, रामू. यदि तुम सच-सच बता दोगे, तो मैं इस मामले को हेडमास्टर के आगे नहीं रखूँगा.”

    रामू रोते-रोते बोला : “रमेश भैया, मैंने किसी की पुस्तक नहीं फाड़ी. मैं विद्या की कसम खाकर कहता हूँ. मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता.”

    अच्छा तो उस दिन तुमने रामबहादुर को झूठ-मूठ क्यों बताया कि हेडमास्टर के कमरे से घंटी की आवाज आ रही है?”

    रामू कुछ याद करके बोला : “मुझे तो हरीश ने बताया था. मैं कुछ नहीं जानता.”

    सुरेश के सारे किए-कराए पर पानी फिर गया. तभी प्रार्थना समाप्त करके लड़के कमरे में आने लगे. बेंच की तड़ाक-फड़ाक की आवाजों से कमरा गूँजने लगा. किन्तु इस शोरगुल में भी सुरेश अपने विचारों में ही डूबा रहा. तभी हरीश और अमुल में मार-पीट होने लगी. लड़कों ने दोनों को अलग किया, तो हरीश दांत पीसते हुए बोला : “अब कभी मुझे बंदर कहा, तो मार-मारकर भुरता बना दूँगा.”

    अमुल बोला : “बंदर मैंने तुम्हें नहीं कहा. मैं तो पाठ याद कर रहा था. पुस्तक में लिखा है—हरीश माने बंदरों का राजा.”

    “अच्छा, बच्चू, आधी छुट्टी में चखाऊँगा तुम्हें मजा.”

    मास्टरजी के कमरे में आते ही उनकी लड़ाई बंद हो गई. सुरेश के दिमाग में अब भी उनकी बातें घूम रही थीं. जब मास्टरजी पढ़ाने लगे, तब सुरेश ने बस्ते से अपनी पुस्तक निकालनी चाही, लेकिन उसके हाथ हरीश वाली पुस्तक आई. सुरेश हरीश की याद करके मुसकरा दिया. फिर उसने वह पुस्तक बस्ते में रख दी और गणित की पुस्तक निकाल ली, क्योंकि पहला घंटा गणित का था.

    लड़कों को विश्वास था कि आधी छुट्टी के समय हरीश और अमुल की फिर लड़ाई होगी. इसलिए वे घंटी बजते ही मैदान की ओर तमाशा देखने के लिए भागे. अमुल की मदद के लिए तीन-चार लड़के तैयार हो गए. सुरेश भी लड़ाई का तमाशा देखने के लिए बाहर निकलने लगा, तो वह अमुल की बेंच से टकरा गया. बेंच पर नीली स्याही से भरी दावात थी, जो सुरेश के धक्के से नीचे गिर पड़ी. बेंच के आस-पास नीली स्याही फ़ैल गई.

    मैदान में लड़के हरीश की राह देख रहे थे, किन्तु वह अभी तक नहीं आया था. सुरेश ने अनुमान लगाया कि हरीश खाना खाने घर गया होगा. हेडमास्टर साहब का मकान स्कूल के साथ ही लगा हुआ था. कक्षा के कमरे में खड़े होकर खिड़की से उनका बरामदा दस-बारह फुट ही दूर लगता था. उसका अनुमान सही था. हरीश खाना खाने गया था, इसीलिए वह मैदान में पंद्रह मिनट बाद पहुँचा. अमुल के साथ चार-पांच लड़के देखकर शायद उसने झगड़ा मोल लेना ठीक नहीं समझा. वह महेश और कृपाल के साथ बातें करता हुआ टहलने लगा. दूसरे लड़के भी अपने-अपने खेल में लग गए.

    किन्तु आधी छुट्टी के बाद जब लड़के कमरे में आए, तब वहाँ एक और पुस्तक फटी हुई मिली. अबकी बार अमुल की पुस्तक फटी थी.

    हरीश और अन्य दो-तीन लड़कों ने फिर सुरेश को घेर लिया. पहले तो सुरेश गंभीर बना रहा, किन्तु जब वे लोग खूब जोश में आ गए, तब वह बोला : “अगर तुम अपराधी को देखना चाहते हो, तो छुट्टी के बाद मैदान में जमा हो जाना.”

    छुट्टी के बाद कक्षा के सभी लड़के मैदान में जमा थे.

    सुरेश ने कहना शुरू किया : “दोस्तो, अपराधी का पता मैंने लगा लिया है. वह कोई भूत नहीं, हमारे बीच का एक लड़का है. किन्तु मैं चाहता हूँ कि वह लड़का स्वयं ही अपना अपराध स्वीकार कर ले.”

    सब लड़के एक-दूसरे की ओर देखने लगे. जब कोई आगे नहीं बढ़ा, तो सुरेश ने हरीश की कमीज का कॉलर पकड़ते हुए कहा : “यही है पुस्तकें फाड़ने वाला भूत!”

    हरीश क्रोध में बोला : “तुम कैसे कह सकते हो?”

    सुरेश ने उसके कैनवास के जूतों की ओर इशारा करते हुए कहा : “मैं नहीं, ये बताते हैं!”

    सबने देखा कि हरीश के सफ़ेद जूतों का निचला भाग कुछ नीली स्याही से रंगा हुआ था.

    सुरेश बोला : “पुस्तक फाड़ने के बाद तुम खिड़की के रास्ते कूदकर अपने घर चले गए थे. इसीलिए नीली स्याही के निशान खिड़की पर भी हैं और खिड़की से दिखाई पड़नेवाले तुम्हारे घर के बरामदे में भी.”

    हरीश का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था. महेश बोला : “लेकिन पुस्तक तो हरीश की भी फटी है? क्या इसने स्वयं ही अपनी पुस्तक फाड़ी थी? और दूसरों की पुस्तकें इसने क्यों फाड़ी? उनसे तो हरीश का झगड़ा नहीं था.”

    सुरेश ने बस्ते से हरीश की फटी पुस्तक निकालकर सबको दिखाई : “हरीश को बंदरों के राजा वाले पाठ से चिढ़ थी. इसी पाठ पर क्रोधित होकर इसने अपनी पुस्तक फाड़ी थी. क्यों, हरीश, मेरा अनुमान सही है न?”

    हरीश का गला सूख गया था. किन्तु, उसने अपराध स्वीकार करते हुए कहा : “सुरेश भैया, तुम्हारा अनुमान सही है, किन्तु पिताजी को मत बताना कि…”

    सुरेश बोला : “यह बात हमलोगों के बीच ही रहेगी, हरीश, लेकिन यह बता दो कि तुमने दूसरे लड़कों की पुस्तकें क्यों फाड़ डाली?”

    हरीश कुछ देर चुप रहा. फिर बोला : “मैंने पिताजी से एक बार झूठ कह दिया कि किसी लड़के ने मेरी पुस्तक फाड़ दी है. अपनी बात रखने के लिए मैं यह बताना चाहता था कि उस शरारती लड़के या भूत ने दूसरे लड़कों की पुस्तकें भी फाड़ी हैं. मैं अपने जेबखर्च से उनका नुकसान भर दूंगा.

    सुरेश ने कहा : “अच्छा अब इन बातों को छोड़ो, चलो. और वह हरीश के कंधे पर हाथ रखकर चलने लगा. लड़के धीरे-धीरे तितर-बितर हो गए.

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