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बन्धुमान्यगण,

आज लेखक दिवस है। ये जानकर मुझे आश्चर्य का जोरदार झटका लगा। भला लेखक का भी कोई दिवस हो सकता है? लेखक तो वर्ष में 365 दिवस अपने दिमाग को घिस-घिसकर उसका दही करता रहता है। फिर भला कोई एक ही दिवस लेखक का किस प्रकार हो सकता है? और इस दिवस को मनाने के क्या विधान हैं?

इस दिवस को मनाने के लिये किस-किस सामग्री की आवश्यकता होती है और वो सामग्री किन-किन प्रतिष्ठानों, केंद्रों पर मिलती है? क्या शिक्षक दिवस की तरह इस दिवस पर लेखक की शान में तराने गाये जाते हैं? या फिर लेखक को किसी उपाधि से नवाजा जाता है? क्या लेखक इस दिन छुट्टी रख सकता है और अपने खुराफाती दिमाग से कोल्हू वाला काम लेना बंद कर चैन की बंशी बजा सकता है?

जो भी है, लेखक दिवस सुनने में काफी अजीब लगता है। मेरे विचार से जब इस दिवस की घोषणा की गई होगी तो दुनिया के सारे लेखक खुशी से फूले नहीं समाये होंगें। लो! हमारे नाम पर भी दिवस हो गया। अब दिवस है तो दिवस है। इसमें सभी लेखक आ जाते हैं। छोटे लेखक-बड़े लेखक। गम्भीर साहित्य लेखक-लोकप्रिय साहित्य लेखक। व्यंग्य लेखक-जासूसी लेखक। लम्बे लेखक-ठिगने लेखक। पतले लेखक-मोटे लेखक। यानी सभी लेखक। लेखक दिवस पर सभी लेखकों को वैसा ही अनुभव होता है, जैसा एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनजिंग नोरके को पहली बार एवरेस्ट पर झंडा गाड़ते समय महसूस हुआ था।

इस दिन हम सभी लेखक सुबह उठकर सज-धजकर तैयार हो जाते हैं कि आज हमारा सम्मान होगा। हमारी शान में कशीदे पढ़े जायेंगे। हमें इतने ऊंचे चने के झाड़ पर चढ़ा दिया जाएगा, जहां से उतरना लगभग नामुमकिन-सा होगा। लेकिन 10 बजते हैं। 11 बजते हैं। दोपहर होती है। शाम भी हो जाती है। और फिर रात भी हो जाती है। हताश-निराश लेखक अपने सिर को धुनते हुए अपने जीविकोपार्जन के मुख्य कार्य में (क्योंकि आज के जमाने में केवल लेखन से ही घर चला पाना नामुमकिन नहीं लेकिन मुश्किल तो जरूर है) व्यस्त रहने के बाद शाम को थका-हारा घर वापस लौट जाता है। इतिहास गवाह है कि सभी बड़े लेखकों ने सरस्वती पूजा करने के लिये डबल शिफ्ट में काम किया है। सभी जॉन कैथरीन रॉलिंग नहीं बन सकते।

खैर, इधर-उधर न भटकते हुए लेखक दिवस पर वापस आते हैं। तो एक लेखक की दृष्टि से लेखक दिवस एक नायाब दिवस है। क्योंकि वो बेचारा लेखक है। लेखक बनने के बाद से ‘लेखक दिवस’ जैसा कुछ सुनने के लिये उस बेचारे के कान तरस गये थे। लेखक के लिये न कोई स्कॉलरशिप है। न नौकरी में आरक्षण। चिन्ता लगी रहती है प्रतिक्षण।

पाठक भी अपनी ही तरह के जीव होते हैं। कुछ पाठक सहृदयता की जीवंत मिसाल होते हैं। पुस्तक औसत लगने पर भी वो लेखक की तारीफ कर देते हैं, जिससे लेखक खुशी से फूला नहीं समाता। लेकिन कुछ पाठक पाषाण हृदय वाले भी होते हैं। किताब पसन्द नहीं आने पर वे ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से बिल्कुल नहीं हिचकते, जिनसे लेखक की जिंदगी झण्ड हो जाये। उनका बस चले तो किताब लेखक के मुंह पर फेंक मारें। ऐसे कठोर हृदय पाठकों से अपनी प्राणरक्षा करते हुए लेखक सहृदय पाठकों के प्रशंसा वचनों का उपयोग ऑक्सीजन की तरह करते हुए दिन गुजारता है, जब तक लेखक दिवस नहीं आ जाता। लेकिन फिर लेखक दिवस भी आकर चला जाता है। और लेखक बेचारा टापता रह जाता है।

फिर वही घिसाई शुरू। और काका हाथरसी की किताबें पढ़-पढ़कर अब तो पाठक भी बेहद खुराफाती हो गए हैं। वे स्वयं लिखने लगे हैं। पाठक अपनी किताब लिखकर लेखक को दे देते हैं। लेखक कहता है-“ये क्या है?” पाठक कहते हैं-“हमारी किताब है।” लेखक कहता है-“तो मैं क्या करूँ? प्रकाशक के पास ले जाइये या किंडल पर स्वयं प्रकाशित कर लीजिये।” पाठक की भृकुटि तन जाती है। वो जान जाता है कि लेखक घमण्डी है। लेकिन वो ये नहीं जानता कि लेखक कितना निरीह प्राणी होता है। उसे अपनी किताब प्रकाशित करवाने के लिये इतने पापड़ बेलने पड़ते हैं कि वो स्वयं पापड़ जैसा अनुभव करने लगता है।

ऐसे में पाठक से लेखक के रूप में अपग्रेड हो रहे पाठक की किताब प्रकाशक के पास कैसे ले जाये? किस मुंह से ले जाये? लेकिन ये चीज पाठक नहीं समझता। वो लेखक के माथे पर घमण्डी का लेबल चस्पां कर वहां से कूच कर जाता है स्वयं अपने दम पर लेखक बनने के लिये। और वो लेखक बन भी जाता है। लेकिन उस लेखक की पीड़ा उसे तभी अनुभव होती है, जब एक दिन कोई पाठक अपनी भी किताब लेकर उसके समक्ष पहुंच जाता है। और लेखक दिवस फिर आ जाता है।

वे दोनों लेखक (पूर्व लेखक और पाठक से लेखक के रूप में अपग्रेड हुआ लेखक) कहीं किसी मोड़ पर टकरा जाते हैं। दोनों मौन दृष्टि से एक-दूसरे की ओर देखते हैं। अपग्रेड वाला लेखक आंखों ही आंखों में पुराने लेखक से क्षमायाचना करता है। पुराना लेखक समझने के भाव से धीमे से सिर हिला देता है। फिर सब्जी का थैला लिये हुए दोनों अपनी-अपनी राह लग जाते हैं। दूर कहीं क्षितिज में सूरज डूब रहा है।

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