खैरा पीपल कभी न डोले -शिवप्रसाद सिंह

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चाहे धूल-भरा अन्धड़ हो, चाहे ताज़ा-ताज़ा, साफ़ आसमान, गांव की तरफ़ नज़र उठती, तो वह ज़रूर उस बूढ़े पीपल से टकराती, जो दक्खिन को जानेवाले छोर पर खड़ा जाने कब से आसमान को निहार रहा है। हां, जब आसमान घिरा होता, ऊदे-ऊदे बादल झुककर गांव की बंसवारियों को दुलराने लगते, तो वह पहले से कहीं ज़्यादा हरा-भरा लगता। एक साथ कई साल जैसे उसकी उम्र से अलग हो जाते और उसकी बूढ़ी नसों में जवानी का ज्वार मचलने लगता।

        पुरुषोत्तम काका को मरे अभी कै दिन हुए, पर शायद ही किसी को उनकी याद आती हो। जब वह ज़िन्दा थे, तो लगता था कि उनके बिना गांव ज़िन्दा नहीं रह सकता। गलियों के मोड़, चौमुंहानियों के चौबारे, कुएं की जगतें उनकी बेलाग हंसी के हिचकोलों से घण्टों गूंजती रहतीं। पर जब पुरुषोत्तम काका उठ गये, तो लोग-बाग उन्हें यों भूल गये, गोया वे लोगों को हंसते देख कभी हंसे ही न हों। यही हाल तुलसी बुढ़िया का हुआ, जाऊ खट्टिक का और जगरोपन साहू का भी। ये सभी ढोल की थाप पर जुड़ते हुए तमाशे की तरह आये और धरम की चादर पर यादगारों के दो-चार दाने फैलाकर चले गये। मैं तो गांव के इन छोकरों पर हैरान हूं कि जो सुबह से शाम तक इन भलेमानसों के चारों ओर हाथ में हाथ फंसाये चक्कर लगाया करते थे और जिनके दिलों की ख़ुशियां कबूतरों की तरह फड़फड़ाती हुई पुरुषोत्तम काका या तुलसी बुढ़िया के क़हक़हों के अड्डों पर हमेशा मंडराया करती थीं, वे भी इन्हें इस तरह बिल्कुल कैसे भूल गये? जब भी मैं इनके भूलने की बात सोचता हूं, तो मन बहुत उदास हो जाता है।

        फागुन बीतते-बीतते हवा में गरमी की लहर बढ़ जाती और वह पेड़ों के पुराने पत्तों को अपने तेज़ नाखूनों से बुरी तरह कुटकने लगती। हलका-सा झोंका लचककर घुमड़ता और पेड़ों के पत्ते टूटे हुए परों की तरह चारों ओर बिखर जाते। बगूलों की लपेट में सरसराते पत्ते आकाश की गहराई में चीख़ते और धूल की धुंधली चादर नंगी डालों को अपने आगोश में छिपा लेती।

        और अब धीरे-धीरे हवा थोड़ी संभल जाती। उसमें शोख़ियों की जगह मादकता आ जाती, थोड़ा कसैला-सा ठहराव आ जाता, छुवन में झनझनाहट नहीं, उत्तेजना का ज़ोर होता और इस बेसब्र बनाने वाली हवा के स्पर्श से पेड़ों की नसें खिंच जातीं, रंगों का लाल-लाल, ताज़ा खून नयी कोपलों में फूट पड़ता — गुलाबी सुख़ब के कोमल परों की तरह मुलायम पत्ते, तोते की लाल, मुंहऐंठी चोंच की तरह खुलने को उत्सुक नये-नये कल्ले! यों तो गांव के सभी पेड़ों में फगुनाहट की बहार अपनी अनोखी रंगत लेकर आती, पर बूढ़े पीपल का तो नज़ारा ही कुछ और होता। ऐसे दिनों में कभी गांव के दक्खिनी छवरे में नज़र उठ गयी, तो पूरा पीपल ठण्डी-सी आग की लपट में सुलगता दिखाई पड़ता। लाल-लाल छोटे-छोटे पत्ते धीरे-धीरे लहराते, तो पेड़ के नीचे अजीब तरह की ललछौंही कालिमा नेवले के बालों की तरह मचलने लगती।

        इसी वक्त लड़के एक-दूसरे का हाथ थामे, इस छाया में एक बड़ा-सा घेरा बनाकर गोलाई में नाचने लगते, एक अजीब उछल-कूद का लयात्मक नृत्यः

        चाक डोले, चकबम्बा डोले

        खैरा पीपल कभी न डोले

        खैरा पीपल कभी न डोले…

       पर इस जंगली ख़ुशी के नाच को देखकर जाने क्यों, मैं पहले-जैसा ही ख़ुश नहीं होता। एक बड़ी डरावनी शंका मेरे मन में घर कर गयी है। मैं सोचता हूं, तो जी मुंह को आ जाता है। कहीं छोकरे पुरुषोत्तम काका या तुलसी बुढ़िया की तरह इस खैरा पीपल को भी तो नहीं भूल जायेंगे? कहीं उनकी नाज़ुक हथेलियों के घेरे से कभी न डोलने वाला खैरा पीपल भी तो नहीं डोल जायेगा?

       दिन गुज़रते गये और अवश्यम्भावी की आशंका मेरे मन में बलवती होती गयी। सच ही छोकरे एक दिन खैरा पीपल को बिल्कुल भूल गये। आज दक्खिन छवरे की मोड़ पर पीपल नहीं है।… पहले सुबह होती थी और बैलों की घण्टियों के साथ गांव के बड़े लोगों का भय, उनकी नाराज़गी का डर, सभी कुछ गांव से बहुत दूर सिवानों में जा बसता था। तब छोकरे एक साथ इस गली, उस गली से फुदककर निकलते और पीपल की विशाल छाया के नीचे अपने खेलों और चुहलबाज़ियों की एक नयी सृष्टि रच देते। ‘होलापाती,’ ‘सतघरवा’, ‘कबड्डी’ और जाने क्या-क्या?

       लड़कों की भीड़ बढ़ती जाती और उनकी ख़ुशी के चीत्कार गांव के निठल्ले बूढ़ों, काहिलों और मेहनतचोर आवारों को भी अपने इर्द-गिर्द बटोरने लगते। तब इस पीपल के नीचे सिर्फ मासूम छोकरों का सीधा-सादा खेल ही नहीं होता, मुंहफट, बूढ़े या निठल्ले प्रौढ़ों की गन्दी गालियां भी मंडराने लगतीं। अपनी-अपनी मांओं के साथ अजीब रिश्ते क़ायम करने वाले बूढ़े खूसटों की फूहड़-फूहड़ नंगी बातों की लच्छेदारी से लड़के गुस्से से लाल हो जाते, पर गांव की मर्यादा निभाने के लिए उनकी ज़बान ईंट का जवाब पत्थर से देने में हिचक जाती।

       ‘दिनवां की माई…’ सुर्ती से काले दांत पड़े बदरंग मसूढ़े और रेड़ी के बीये-जैसे काले दांतों को दरेरती हुई जीभ ‘खिस्स्-खिस्स्’ की आवाज़ निकालती और बूढ़े बाबा बड़े प्रेम से बग़ल में बैठे नौजवान-से खीस काढ़-काढ़कर कहते, ‘देखा है कि नहीं तूने, नांद-जैसा पेट निकाले गली दचकाती फिर घूमने लगी है! राम-राम छेर-बकरी को भी मात कर दिया है इस दिनवां की माई ने! पूरा एक कोड़ी बियाय के रहेगी, देखना!’

        ‘पर काका, अजब की काठी है जग्गन बो भौजी की भी!’ नौजवान की नसें लिलार पर खिंचकर तन जातीं, ‘पांच-पांच बच्चे हुए, पर देह तनिक भी टस-से-मस न हई, वैसे ही चढ़ी-की-चढ़ी!’ बुढे काका कुछ और कहते होते, पर उनका नौजवान साथी किसी दूसरी दुनिया में अपने को डूबोकर बिल्कुल खामोश हो जाता। उसका सारा बदन बेकार-सी बना देनेवाली गरमी में झुलसने लगता। बाप-भाई से झगड़कर, बिना काम किये, दोनों जून बेर्रे की रोटियों से पाले हुए बदन को पीपल की छाया में पसारकर वह जाने कहां-कहां घूमने लगता।

        मुझे ऐसी बातों से भी बड़ी हैरानी होती है। जाने कैसे लोग इतनी आसानी से बच्चे पैदा करने वाली मांओं के बारे में सोच लेते हैं। मैं तो कई साल से बराबर किसी-न-किसी औरत के मरने की ख़बर सुनकर परेशान हो जाता हूं। अभी दो साल पहले की बात है। सुबह-सुबह हाथ-मुंह धोकर बखरी में आया, तो रोज़ की तरह दाना-पानी लिये मां को अपनी राह अंगोरते नहीं देखा। पूरे आध घण्टे बाद दौड़ी-दौड़ी आयी थी। मुझे गुस्से में तिनककर बैठा देख वह एक सांस में सब सुना गयी।

        ‘लल्लू बो को देखने चली गयी थी। लगता है, बेचारी बचेगी नहीं। पूरा दिन और पूरी रात चिल्लाते बीत गयी — जाने लड़के ने अंतरी पकड़ ली है या क्या, दो-दो चमाइने पेट मांड़ रही हैं, मगर कोई फायदा नहीं। लड़का तो मर ही गया होगा, अब वह भी नहीं बचेगी।’ अम्मा यह सब सुनाकर बिल्कुल ख़ामोश हो गयी थीं। उन्होंने एक अजीब बेबसी और नियति के प्रति मजबूर समर्पण के साथ कांपते हुए हाथों से पानी का गिलास थामते हुए आसमान की ओर देखा था।

        लल्लू हमारी ही उम्र का था, साथ-साथ बैठना-उठना। मैंने दाने की डाली वैसे ही रख दी। उठकर सीधे लल्लू के दालान में जा रहा। मचिये पर दोनों बांहों में सर गड़ाये वह उदास बैठा था। लल्लू के बाबाजी सामने की चारपाई पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, मुझे देखते ही तपाक से बोले, ‘अब तुम्हीं समझाओ, भाई, इसे। भीतर औरत चिल्ला रही है, बाहर दालान में बैठा यह मउगड़ा टुस्के बहा रहा है। छिः छिः! मेरे ख़ानदान में ऐसा मउगड़ा कोई नहीं जन्मा था। अरे साले! एक मरेगी, तो दूसरी आयेगी, इस तरह रांड़ औरत की तरह फेंकर-फेंकर दिल काहे दुखा रहा है?’

        मैं अवाक् उस बूढ़े की ओर ताकता रह गया। मुझे तो विश्वास ही नहीं होता था कि एक बाप अपनी बहू की मौत पर लड़के को ऐसा उपदेश दे सकता है!

         ‘काकाजी, आप लल्लू के साथ बहू को शहर क्यों नहीं भेज देते, वहां अच्छे-अच्छे डॉक्टर हैं, दवा-दारू का सारा इन्तज़ाम रहता है, इतनी तकलीफ़ भी न होगी और जच्चा-बच्चा किसी को जान से हाथ न धोना पड़ेगा।’

         बूढ़ा मेरी ओर आंखें तरेरकर यों देखने लगा, जैसे मैंने कोई बहुत भद्दी गाली दे दी हो। ‘तुमसे मुझे यह उम्मीद न थी, हरी बेटा। छिः छिः! दक्खिन पट्टी के ठकुराने की बहु बच्चा जनने अस्पताल जाये, इससे तो यही अच्छा होगा कि वह चिल्ला-चिल्लाकर जान दे दे!’

         मैं कुछ न बोला। लल्लू धीरे से उठा और आंगन की ओर जाने लगा। ‘कहां चला, बे मउगड़े? कभी औरत को बच्चा होता था, तो उसका मर्द लाज के मारे तीन दिन तक आंगन में पैर नहीं डालता था, और आज एक तू है ससुरे कि उतावला होकर ड्योढ़ी पर चक्कर मारे जा रहा है।’

         तभी भीतर से दो-चार औरतों के साथ ही ज़ोर-ज़ोर से धाड़ मारकर रोने की आवाज़ से दालान की शहतीरें तक थरथरा उठीं। तेज़ कांपते हुए झोंके ने आकर ख़बर दी कि दीया बुझ गया। लल्लू की मुट्ठियां दर्द के मारे भिंची जा रही थीं, जैसे उसकी हथेली में कोई उबलता हुआ फफोला फूट पड़ने को आतुर हो और वह उसे आंखों से आंसू टपका-टपकाकर शान्त कर रहा हो। बूढ़े काका वैसे ही हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, फ़र्क सिर्फ इतना था कि वह बुझी हुई चिलम को बड़ी जल्दी-जल्दी सुड़क-सुड़ककर खींचे चले जा रहे थे।

        औरतों से आंगन भर गया था। लाश को नहलाकर लाया गया, तो मैंने कनखी से लल्लू की बहू के मुंह को देखा था, जो जामुन की तरह स्याह हो गया था, पेट बुरी तरह फूला हुआ था और दर्द के मारे आंखें सूजकर बाहर निकल आयी थीं। लाश बहुत देर तक बूढ़े पीपल के नीचे सुलायी गयी और मैं उस नीले चेहरे को देख बार-बार सोचता रहा, जो सकुशल बच्चा जनकर गुलाब को मात करने वाली शरमीली मुसकराहट में कभी खिल न सका।

         शाम हो गयी थी। क़स्बेवाली बस के आने का समय हो गया था। जहां पहले खैरा पीपल की कोमल छाया नेवले के बालों की तरह कांपा करती थी, वहां आज सिवचन्न साहू ने अपनी चाय की दुकान खोल ली है। आज पीपल की छांव की जगह काई लगे करकट की छांव है, जिसमें बैठने वालों की भीड़ लगी रहती है। वे ही प्रौढ़ आवारे, कामचोर छोकरे, वे ही गन्दी गालियों से मन को सन्तोष देने वाले बूढ़े इस दुकान में भी जमे रहते हैं। फ़र्क सिर्फ यह है कि अब छोकरों की नाज़ुक हथेलियां जिस्मों के घेरे बनाकर ‘चाक डोले चकबम्बा डोले’ का खेल नहीं खेलतीं; क्योंकि खैरा पीपल डोल चुका है, उसकी छाया की निर्द्वन्द्व आज़ादी चाय की इस दुकान में कभी नहीं मिल सकती। जब से सिवचन्न साहु की चाय की दुकान खुली है, दक्खिन पट्टी बड़ी मनसायन लगने लगी है। शाम, सुबह और दोपहर तीन बार बसें आती-जाती हैं। कभी-कभार सैर-सपाटे या इधर-उधर किसी काम से जानेवाले मुसाफ़िरों की अपनी निजी गाड़ियां भी रुकती हैं। सिवचन्न साहु मुसाफ़िरों को पहचानने में काफ़ी तेज़ है। उनके आने पर साफ़ प्याले उस कोनेवाली काठ की टूटी अलमारी से बाहर निकालते हैं। बाक़ी लोग शीशे के गिलासों में चाय पीते हैं, जिन्हें धोने-धाने का कोई सवाल नहीं। एक तरफ़ उनकी छोटी लड़की, दुलरिया, नाक का पोंटा सुड़कती हुई लाई-लकठे और गुड़ पर मंडराने वाली मक्खियों और हड्डों से कचपटी का खेल खेलती है और दूसरी तरफ़ उनका लड़का लम्बा-सा पेट निकाले उनकी मिठाइयों के गुणकारी होने का ऐलान करता, लोटा हाथ में थामे राह चलतों को पानी पिलाने में भी कोताही का नया रेकार्ड क़ायम करता है।

         शाम को बस आकर रुकी, तो चाय-घर में बैठे लोगों की आंखें उतरने वाले मुसाफ़िरों पर जा अटकीं।

       ‘लाओ, दे दो मुझे। तुम ख़याल से उतरना।’ सुरेश ने अपनी बीवी के हाथ से नन्हे-से बच्चे को लेकर अपने कन्धे से चिपका लिया। उसकी पत्नी बस से उतरकर नीचे आ चुकी थी और आस-पास बैठे गांववालों से नज़र बचाती, माथे के गिरे पल्लू को सर पर डाल रही थी। उसके पीले मुरझाये चेहरे पर कितनी शान्ति और ख़ुशी थी! होंठ सूखे-सूखे थे ज़रूर, फिर भी उनके भीतर एक अजीब आनन्द-भरी मुसकराहट खेल रही थी।

         ‘क्यों भौजी, मिठाई कब खिलाओगी?’ मेरी बात से सुरेश बो भौजी दुहरी होते-होते बचीं। शायद ही सुरेश के घर जाने पर वह मेरे सामने पड़ी हों। पर आज तो बस के मुसाफ़िर से कोई भी बात कर सकता था।

         ‘मिठाई तुम्हें खिलानी चाहिए, देवर! लड़के का बाप न मिठाई खिलाता है!’ वह धीरे से मुसकराकर गांव की गली में चल पड़ीं।

          ‘कोई दिक्कत तो नहीं हुई?’ मैंने सुरेश की गोद में चिपके नन्हे की आंखों में झांकते हुए पूछा।

          ‘नहीं, सब ठीक से हो गया।’

          बच्चा बड़ी उत्सुकता से चाय की दुकान के करकट को देख रहा था। उसे क्या मालूम था कि इसी जगह कभी हरी-हरी पत्तियों में विहंसता एक विशाल पीपल था, जिसकी छाया में लड़के हथेलियां फंसाकर ‘चाक चकई’ का खेल खेला करते थे। बहरहाल, खैरा पीपल नहीं है, तो क्या हुआ, सिवचन्न साहु की चाय की दुकान तो है, जिसमें इस वक्त गांव के तमाम छंटे हुए नामी-गरामी लोग इकट्ठे बैठे हैं।

        ‘शहर ले गया था,’ अपनी ढंढरवाली आंख को बुरी तरह मिचकाकर जगिया ने बग़ल में बैठे कैरा से कहा, ‘सुना, वहां मेम पेट में हाथ डालकर बच्चा निकाल लेती है।’

        ‘देखा नहीं, हरी से कैसे मुसकाकर बोली थी! बड़ी सतवन्ती बनती है। पिछले फगुवा को ज़रा गाल पर अबीर छुला दी थी, तो आंख तरेरकर झनझना उठी थी। झटक-कर बोली — ‘ख़बरदार, जो कभी इस घर का चौखट हेलकर आये! हुंह!’

        ‘अबे, चुप रह, हरिया इधर ही आ रहा है।’ दोनों चाय के गिलास में मुंह सटाकर ऐसे सन्न हो गये, जैसे सांप सूंघ गया हो।

        मुश्किल से अभी पन्द्रह मिनट हुए होंगे। बस के मुसाफ़िर डराइबरजी को जल्दी करने को उकील रहे थे, पर डराइबरजी हाथ में गिलास थामे दुकान की बग़ल के पाये पर पैर अड़ाये कुछ खोल रहे थे। बग़ल की डगरसे गांव की कई लड़कियां पानी की कलसी भरे घरों को लौट रही थीं।

        ‘अरे डराइबरजी, जल्दी करो, भैया! रात यहीं हुई जा रही है।’ कहने वाला डराइबरजी को अपनी ओर गुस्से में उबलते देख, आगे की बात को झटके से निगलता हुआ बग़ल के किसी से कुछ अनावश्यक बातें करने लगा था।

        ‘अभी फुलिया की बाट देख रहे हैं डराइबरजी!’ जगिया बीड़ी जलाकर कांटी से कैरा की हथेली पर टुन्ना देते हुए बुदबुदाया, ‘अबे, कल शाम को था न यहां? साला कैसे लसड़-फसड़कर बात कर रहा था।’

        ‘तो वो साली कौन दूध की धोयी है! आन गांव के आदमी से बात करते उसकी आंख का पानी नहीं ढरता, तो वो क्या करे?’

        ‘ठीक कहता है, दो आने भी उसके लिए काफ़ी हैं। कल यहीं दांत चिपोरकर ड्राइवर से कह रही थी, क्यों डराइबरजी एक दिन हमें बनारस नहीं दिखाओगे? उसके कानों के बुन्दे इसी ड्राइवर के बच्चे ने दिये हैं। और उसके साथ की दूसरी छोरियों को नहीं देखा? इस तरह ललचायी-ललचायी देख रही थीं कि ड्राइवर जेब से निकालकर उन्हें भी बुन्दे थमा देगा। हुंह!’

        बस खुल गयी। गर्द का एक पूरा पहाड़ दुकान के करकट पर उलट पड़ा। ड्राइवर ने हाथ लटकाकर कपड़े में बंधी एक पोटली उछाल दी। गली की आड़ से फुलिया झपककर आयी और पोटली उठाकर चलने लगी। जगिया और कैरा दुकान से निकलकर उधर ही देख रहे थे। लड़की मुड़कर चलने लगी, तो कैरा ने ज़ोर से अलाप लीः

काशीजी में लगलीं बिजुरी के रोशनियां

पिया देखाई देता ना

हो पिया देखाई देता ना…।

       अलाप ज़ोर पर पहुंचकर आसमान छूने को उठा ही था कि कैरा ने आवाज़ को बड़े ज़ोर से सुड़ककर पी लिया। उसके गले की घण्टी को जैसे किसी ने हथेली में दबोच लिया। घुनघुनाकर वह एकदम चुप हो गया। ‘सलाम, काका!’ जगिया ने बड़ा शरीफ़ाना चेहरा बनाते हुए गुदई काका को नमस्ते किया।

      ‘पालागीं काका!’ कैरा ने घिघियाकर दुहराया। ‘बड़ा ज़ोर से गवनई कर रहा था, रे कैरा!’ काका ने कहा और आगे बढ़े। दोनों फुर्र से एक-दूसरे का हाथ थामे, मुंह से बेलाग फूटती हंसी को दबाने की कोशिश करते गली में ग़ायब हो गये।

      शाम घनी हो रही थी। चाय की दुकान से सटकर लेटी हुई नयी कच्ची सड़क धुन्ध में विशाल अजदहे की तरह निश्चेष्ट फैली हुई थी। गर्द-गुबार की केंचुल में सारा सिवान सिमटता जा रहा था। हवा तेज़ और सर्द थी। गांवों के घरों से उठा हुआ रसोई का धुआं पूरे गांव पर मटमैला चंदोवा टांग रहा था।

      गुदई काका दुकान से सटकर निकले, तो भीखम चौधरी ने हांक लगायी, ‘अरे, ज़रा गरमाय लो, मालिक! आज तो बड़ा कटकटाता जाड़ा पड़ रहा है।’

      गुदई काका मुड़कर करकट की छाजन के भीतर आ रहे।

      ‘चाय का सबख नहीं है, चौधरी!’

      गुदई काका को सामने खड़े देखकर भीखम चौधरी स्टूल पर से उतरकर खड़े हो गये। ‘बैठ जाओ, सरकार। सबख तो हमें भी कोई ज़ियादा नहीं है, बाक़ी जाड़ा से कुछ बचाव ज़रूर हो जाता है।’

      ‘अरे बैठे रहो न, चौधरी!’

      ‘नहीं-नहीं सरकार, बैठ जाइये! हम लोग कहीं बैठ लेंगे।’ भीखम चौधरी ने अपना गिलास उठाया और कच्चे फ़र्श पर बड़े इत्मीनान से पसरकर बैठ गये।

      मैं बूढ़े चौधरी की धुंधुआई, पुरानी आंखों में झांकता रह गया। गुदई काका से कुछ अधिक ही उम्र होगी। काम और मेहनत ने उनके काले शरीर को लोहे की तरह सख़्त कर दिया है। लटकी हुई झुर्रियां कितनी मोटी और चीमड़ हैं, इन पर भला गरमी-सर्दी का क्या असर होता होगा! भीखम चौधरी के चेहरे पर हमेशा एक हलकी-सी मुसकराहट छायी रहती। इस मुसकराहट को पैदा करने में चौधरी ने जाने कितना ग़म सहा होगा! सदाबहार का ऐसा फूल मामूली ज़मीन में कभी नहीं खिल पाता।

      गुदई और भीखम, भीखम और गुदई, मेरी आंखों के सामने खैरा पीपल घूमकर फिर खड़ा हो गया। तब वह इतना पुराना न था। उसकी पश्चिमवाली लम्बी-चौड़ी डाल तब कटी न थी। हाथ-कटे लूले की तरह तो वह बाद में लगने लगा था, जब दस साल पहले उसकी पत्तियों से लदी-फदी, चिड़ियों के घोंसलों से आबाद दायीं बांह पर आसमान से बिजली फट पड़ी थी। बाद में तो यह डाल ऐसी लगती, गोया किसी ने पतले-से पुराने ठूठ पेड़ के तने को खैरा के कन्धे से साट दिया है।

       तब मेरी आंखों में भी नीच-ऊंच का ख़याल इस आग की लपट की तरह कभी सुलग न पाता था। गुदई काका हमारे परिवार के हैं, अलग हो गये, तो क्या हुआ? हैं तो ख़ानदान के आदमी। लोचन बाबा का शरीर भी तो गुदई काका की तरह ही काफ़ी भारी-भरकम था। बड़ी-बड़ी मूंछे थीं, ऊपर को खिंची-खिंची। उनका गलगोच्छा अरियात-करियात में मशहूर था। बन्दोंवाली मिरजई पहनते थे और साफ़-चटक धोती को खूब चुन्नट देकर आगे लटकाये रहते थे। बड़ी-बड़ी लाल-लाल आंखें। बुड्ढा मुझे परेशान करता। गली से कभी जाते देख लिया कि बस!

       ‘कौन है हो? हरी बेटा?’

       ‘हां, बाबा!’

       ‘ज़रा चिलम चढ़ाते आओ, बचवा!’

       मैं मन-ही-मन बुरी तरह बिफर पड़ता। बुड्ढे के मरने के लिए दो-चार बार मनौतियां भी मानी होंगी। पर जब हरू चौधरी ने बाबा का अपमान किया, तो मुझे भी गुस्सा कम न आया। जब हमारे ख़ानदान की दो दर्जन लाठियां चमारों को ठीक करने के लिए निकल पड़ीं, तो मैंने भी ‘होलापाती’ का डण्डा कांख में दबा लिया था।

       मगर सच पूछो, तो मेरी समझ में न तब कुछ आया था, न अब। हमारे पिताजी कहते थे कि सारा दोष गांधीजी का है। उन्होंने नीच जातवालों का दिमाग़ आसमान पर चढ़ा दिया है। मुझे तो हरू चौधरी का दिमाग़ आसमान पर नहीं दिखाई पड़ता। हां, एक बात थी, वह चमार क़तई नहीं लगता था। बड़ा साफ़ कपड़ा पहनता। वह आस-पास के चमारों का ‘गुरुजी’ था। सिवनरायन का चेला था। सिवनरायन को हमने नहीं देखा, मगर लोग कहते हैं, वह पुराना महात्मा है। सब चमार उसी के चेले होते हैं।

       हमारे गांव की चमटोली में भी सिवनरायन गुरु की गद्दी लगती थी। दूर-दूर के चमार दर्शन करने आते। उस दिन हरू के दरवाज़े पर दरी बिछती और बड़ी भीड़ होती। सामने की चादर चावल से भर जाती। कुछ रुपया-पैसा भी गिरता। हमको गादी की चौकी बहुत पसन्द आती। हरी-लाल पन्नी से सजाकर चौकी पर सिवनरायन गुरु की तस्वीर लगायी जाती। नाच-गाना भी होता। पहले तो किर्तनिया लोग धीरे-धीरे कुछ मधुर स्वर में गुनगुनाते, फिर अचानक जाने क्या होता कि कोई ज़ोर से ‘होए’ कहता और ढोलक बड़ी तेज़ी से बजने लगती, सभी ताली पीटकर झूमने लगते।

       एही पार गंगा, ओही पार जमुना

       होए-ए ए

       बिचवा में साहब क डेरा….

       बिचवा में साहब क डेरा…

    उस बार भी गादी लगी थी। लोचन बाबा किसी काम से चमटोली के रास्ते जा रहे थे। हरू अपने दरवाज़े पर चारपाई बिछाये बैठा था। उसके बहुत से चेले तो चले गये थे, कुछेक रह गये थे। वे सब ज़मीन पर बैठे थे। हरू उनसे सत्संग कर रहा था। बाबा गली से निकले, तो हरू ने उन्हें देखा-अनदेखा कर दिया। बाबा कुछ बोले नहीं। आकर उन्होंने ख़ानदान-भर के सवांगों को बटोरकर सब बात सुनायी। बस, लाठियां निकल पड़ीं। गुदई काका सबसे आगे थे। चेले जाने कब सटक गये। हरू और भीखम पर बड़ी मार पड़ी। इसी पीपल के नीचे हरू को रस्सी में बांधकर बाबा ने उकड़ू लटकवा दिया था।

       हम लोग तमाम लड़के ‘चाक चकबम्बा’ का खेल छोड़कर खैरा की जड़ में धंस गये थे और उसके भारी तने की आड़ से झांक-झांककर हरू चौधरी के सर पर चप-चपाये हुए खून के क़तरों को देख रहे थे।

       ‘क्यों हरू,’ गुदई काका ने चाय पीते-पीते अचानक मुझे टोक दिया, ‘क्या सोच रहे हो? सुरेश मिला था?’

       ‘हां, अभी-अभी बस से उतरे, तो मुलाकात हुई थी।’ मैंने एक लम्बी सांस लेकर उस दु:स्वप्न को भुलाने की कोशिश की, जो मेरी आंखों के सामने अचानक खड़ा हो गया था।

       ‘हां, बात तो मैं भूल ही गया, गुदई सरकार,’ भीखम चौधरी को जैसे कोई बहुत ज़रूरी बात याद आ गयी थी, ‘छोटे भैया अभी उतरे बस से, ई बात आपने बड़ी अच्छी की कि बहू को बनारस भेज दिया। लेकिन नाती होने की ख़ुशी में मिठाई कब खिला रहे हैं?’

       ‘अरे भाई, खिला देंगे, चौधरी। जैसा हमारा नाती, वैसा तुम्हारा।’

       ‘सो भी ठीक। सिवचन्न साहु…’ चौधरी तैश में आ गये थे, ‘आज हमारे पैसे से यहां बैठे सब छोटे-बड़े भाई को एक-एक मिठका बिसकुट बांट दो!’ ऐसा कहकर भीखम चौधरी ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस पड़े।

       ‘अभी बांटा, चौधरी!’ सिवचन्न साहु ने दुलरिया को सनकारा और वह नाक सुड़कती आलमारी से बिसकुट का टीन लाने चल पड़ी।

       चौधरी का बिसकुट हाथ में थामे, मैं चाय की दुकान के करकट को देखता रहा, जो लोगों की हंसी से बुरी तरह थरथरा रहा था।

       रात काफ़ी ढल गयी थी। लोग एक-एक करके दुकान से उठने लगे थे। गुदई काका पता नहीं क्या सोच रहे थे। उनकी इस तरह की चुप्पी मुझे खल रही थी। मैंने उनकी मनहूसी से बचने के लिए गरदन हिलायी, तो भीखम चौधरी को भी उसी तरह ख़ामोश देखा। अभी दो मिनट पहले अचानक खुशियों का एक ज्वार आया था, जो इनकी आंखों के किनारे टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों का निशान बनाकर वापस लौट गया है। मुझे दोनों का इस तरह चुप हो जाना अखर गया। भीखम चौधरी की हंसी भला गूलर का फूल कब से बनने लगी?

      ‘कैरा फिर लौटकर आ गया है,’ मैंने धीरे से कहा।

      ‘हां-हां,’ दोनों नींद से चौंक उठे, ‘बाक़ी रुकेगा नहीं। पहले तो इधर-उधर गांव का चक्कर काटकर ही लौट आता था, अब ममिआउर करने लगा है। एक नम्बर का काहिल आवारा हो गया है यह लड़का, अभी-अभी भड़ैती गाते हुए गली में जा रहा था।’ गुदई काका ने धीरे से कहा।

       ‘इसमें सारी बदमाशी उस जगिया की है, वही बिगाड़ रहा है कैरा को भी।’ चौधरी ने गरदन हिलाकर अपनी बात की अहमियत समझा दी।

       सुबह मैं अभी मुंह-हाथ धो ही रहा था कि गली के मोड़ पर हंगामा मच गया। कैरा भीड़ के बीचों-बीच खड़ा था और उसके बाबू, काका, चाचा, सभी उसको पीटने के लिए मचल रहे थे। लोग-बाग उन्हें किसी तरह संभाल रहे थे। कैरा को भी कई लोग पकड़े हुए थे और वह सबको धक्का देकर छुड़ाने की कोशिश करते हुए चिल्ला रहा था।

       ‘एक-एक को समझ लूंगा, हां! काम पड़ने पर कोई भवद्दी करने नहीं आता। और हमको पीटने के लिए सब भाई एक होकर सहायता करने आ जाते हैं। हम एक बार नहीं सौ बार कह देते हैं, हम कुछ नहीं करेंगे, कुछ नहीं करेंगे! करेंगे, तो अपने मन से। जैसे हम कहते हैं, वैसे चलना पड़ेगा। नहीं तो फूंक देंगे, सब जल जायेगा!’

        ‘तू फूंकेगा? फूंक तो देखें! मारे जूता सरवा खोपड़ी का बाल सफा कर देंगे!’ दीना चाचा कैरा को पीटने के लिए बार-बार पैर से चमरौधा सरका रहे थे, पर उनका हाथ दूसरों के हाथों से बंधा हुआ था, ‘ऐसे कुलच्छन पूत से निपूता भला! ई साला कहीं मर-खप भी नहीं जाता! जांगर-चोर, हरामी कहीं का! दो दिन जहां काम करना पड़ा कि साले की नस टूटने लगती है। दोगला, सूरतहराम…’

        ‘हमको दोगला-फोगला तो मत कहो, कह देते हैं!’ कैरा अपने बाबू की ओर लाल-लाल आंखें निकालकर बोला, ‘नहीं गटवा तोड़ के रख दूंगा, हां!’

        तभी लोगों से हाथ छुड़ाकर दीना चाचा भूखे बाघ की तरह कैरा पर झपट पड़े और गुस्से से पागल होकर उन्होंने दनादन घूंसे-थप्पड़ की बौछार लगा दी। धर-पकड़ करने वालों को एकाध हाथ अनजाने लगा, तो वे सरककर किनारे हो गये। कैरा काफ़ी पिट गया।

        ‘काट डाल, कसाई!’ कैरा रो-रोकर कह रहा था, ‘कोई तुझको दगध (आग) देनेवाला भी न मिलेगा!’

        आख़िरी बात ने दीना चाचा को और भी आगबबूला कर दिया।  वह पैर की ठोकर से कैरा को धकेलते हुए गुस्से में कांपते हुए बोले, ‘निकल जा, हरामी साला! फिर कभी काला मुंह मत दिखाइयो, हां!’

        धीरे-धीरे भीड़ छंट गयी। कैरा वैसे ही घुटनों में सर डाले सिसकता रहा। गांव का कोई आदमी उसे चुप कराने क्यों आये? कैरा के साथ यह पहली बार थोड़े हुआ है, नहीं यह आख़िरी बार ही है, यह सभी जानते हैं। पांच साल से दीना काका और उनके दूसरे भाई अलग-अलग हो गये। कैरा की पढ़ाई छूट गयी। काम करने में उसका जी लगता नहीं। दीना काका से अकेले सब होता नहीं। रोज़ झगड़ा, रोज़ मारा-पीटी।

        कैरा भी एक ही है। मार खायेगा, पर गाली देने से बाज़ न आयेगा। गुस्सा होकर चलेगा कि इस बार कभी लौटकर नहीं आयेगा। सारे महल्ले के लोगों को चलते वक्त प्रणाम करेगा, हाथ जोड़ेगा कि भूल-चूक माफ़ कर दो, हम सदा के लिए गांव छोड़कर जा रहे हैं। पहले तो लोग बहुत पिघले। दया के मारे औरतों की आंखें भर आयीं। कई लोगों ने दीना चाचा को समझा-बुझा के शान्त कर दिया। पर बाद में यह उसका नियम हो गया। सब से कहकर चलता, तो खैरा पीपल के नीचे आकर बैठ जाता। घण्टों बैठा रहता, शाम हो जाती, तो दीना बो चाची किसी छोकरे को भेजकर बुलवा लेतीं। दीना चाचा कटकटाते, गाली देते, पर मन-ही-मन ख़ुश होते कि अब कुछ दिन यह डरकर ठीक से काम करेगा। फिर भी, जब कैरा की आदत न छूटी, तो उन्होंने चाची को भी घुड़ककर मना कर दिया। रात हो जाने पर बहुत देर तक कैरा प्रतीक्षा करता रहता कि अब कोई आ रहा होगा, मगर जब कोई न आता और पेट में चूहे उछल-कूद मचाने लगते, तो लाचार होकर धीरे से आकर बखरी में घुस जाता। दीना चाचा को ख़ूब मालूम था कि इसे कुछ अकल नहीं, आखिर जायेगा भी कहां, बस, कैरा की दौड़ खैरा तक! पीपल के नीचे बैठकर मक्खी मारेगा और हमेशा गांव से किसी के आने की राह देखेगा कि कोई मनानेवाला एक बार भी कह दे, तो वह घर लौट आये।

        लेकिन आज कैरा के दिल पर चोट गहरी थी। वह बहुत देर तक सिसकता रहा। फिर बड़े ताव से उठा और बखरी में जाकर अपना कुरता डाल बाहर आ गया। उसके चेहरे को देखकर दीना बो चाची का मातृ हृदय आशंका से कांप उठा। दीना चाचा को ख़बर लगी, तो वह हंस पड़े। उनके दूसरे भाई भी मुसकराहट रोक न सके। सभी बाहर आकर कैरा के गांव छोड़ने का तामाशा देखते रहे। कैरा चला, तो उसके सामने आज कहीं बूढ़ा पीपल न था। चाय की दुकान थी, जहां कुछ देर खड़े होकर वह गांववालों को देखता रहा। फिर बस आयी, तो कैरा ने पहली बार सब को हाथ जोड़कर नमस्ते किया और बस में बैठ गया। सभी को उम्मीद थी कि बस चलने लगेगी, तो कैरा मुंह लटकाये बाहर उतर आयेगा और हमेशा की तरह मुंह पर काला परदा डालकर गांव में घुस पड़ेगा। लेकिन बस चल दी और कैरा नहीं उतरा। उसने खिड़की से एक बार दीना चाचा और चाची को देखा और आंखें फेर लीं। बस गर्द-गुबार का घना परदा पीछे छोड़कर सिवान में खो गयी। दीना बो चाची की आंखों से आंसू टपक पड़े।

        उन्होंने हमेशा की तरह कैरा को ढूंढ़ने वाली आंखें ऊपर उठायीं, मातृ हृदय की व्याकुलता से थरथराती आंखें, पर उन आंखों को शून्यता में डुबोने से बचानेवाला बूढ़ा पीपल न था, वहां तो सिर्फ़ नीचे की तरफ़ औंधा हुआ रोता-सा आसमान था, नीला-नीला, डरावना।

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शिव प्रसाद सिंह

शिव प्रसाद सिंह

जन्म: 19 अगस्त 1928, चंदौली, मृत्यु: 28 सितंबर 1998 उपन्यास : अलग-अलग वैतरणी, गली आगे मुड़ती है, नीला चाँद, वैश्वानर कहानी संग्रह : आर पार की माला, कर्मनाशा की हार, शाखा मृग