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गाँव के बाहर एक बूढ़ा पीपल का पेड़ खड़ा था। कितनी उम्र थी उसकी, ठीक-ठीक कोई नहीं बता सकता। बड़े-बूढ़े कहा करते थे, वह पेड़ गाँव के बसने के समय भी इतना ही बड़ा, ऐसा ही घना और ऐसा ही था, जैसा आज है। उसी पेड़ से उस गाँव का नाम भी पिपरा था। प्राचीनता के लिए तो दस गाँव जोड़कर उसकी ख्याति थी ही, उसके बारे में लोगों में एक भयप्रद कहानी भी प्रचलित थी। वह यह कि उस पर एक अत्यंत विकट ब्रह्मदैत्य रहता है। इस कारण उस पेड़ का भयंकर रूप लोगों की आँखों में और भी भयंकर लगता। संध्या होने पर मजाल किसकी कि उस राह से गुजरे। ऐसा ही आतंक था।

मगर नथुनी नाई एक दिन बुरा फँसा। दोपहर का समय था। चिलचिलाती धूप थी। कौवों के काँव-काँव से दोपहर का सन्नाटा भयावना हो उठा था। पछाँह वायु पेड़-पौधों पर अलग पछाड़ खा रही थी। गर्द के मारे आसमान का नीला रंग गायब था। ऐसे ही दुर्योग के समय नथुनी घर की ओर् लपका आ रहा था। पसीने से भींग कर मैला कपड़ा रूखी चमड़ी से एकबारगी चिपक गया था। भूख-प्यास से चेहरा फीका पड़ गया था। बेचारा लंबी डगें भरता हुआ सोचता जा रहा था कि घर पहुँचा और परोसी थाली पर बैठा। किन्तु, ईश्वर की मर्जी कुछ और थी। किस्मत भोजन कहाँ से कराए, उसे भूत का भोजन अलबत्ता बनाने लगी।

पीपल से एक दिल दहलाने वाली गड़गड़ाहट उठी और सामने ब्रह्मदैत्य की विकट मूर्ति खड़ी हो गई। माथा तो नथुनी का आवाज से ही ठनका, भूत को देखकर तो रहा सहा होश भी हिरन हो गया। उफ़, क्या ही भयानक मूर्ति! सिर घुटा हुआ, दाढ़ी-मूंछ सफाचट। कंधे से कमर तक सफेद जनेऊ। पहनावे में एक लँगोटी दपदप साफ, इतनी साफ कि कोई अन्य वस्तु उसने अपनी जिंदगी में न देखी थी। आँखों में बिजली कौंध रही थी।

नथुनी ने मारे भय के आँखें मूँद ली और जीवन से सब प्रकार निराश होकर ईश्वर का नाम जपने लगा। भूत उसे न तो टपाक निगल ही गया और न पकड़ने को ही तुला। बोला: “क्यों बे! तेरी यह हिम्मत?”

नथुनी तो आप ही वहाँ था कि नहीं, संदेह था। हिम्मत कौन करे। उसकी बोली किसी ने छीन ली थी। जब बहुत देर तक भूत पैंतरे ही बदलता रहा, तब उसे होश आया। साथ ही उसे एक मार्के की युक्ति भी याद आई। बचपन में उसने एक नाई की चतुराई की कथा पढ़ी थी, जिसने आईना दिखाकर आदमखोर सिंह से पीछा छुड़ाया था। बस, अचानक वह बोल उठा: “खूब मिले, परेशानी से छुटकारा मिला। महीनों से तुम्हारी ही तलाश थी, अब तो चांदी कटेगी ही।”

भूत तो अवाक! कमबख्त कहता क्या है?

नथुनी ने कहना जारी रखा: “राजा का यज्ञ भी पूर्ण होगा और मैं तो भरपूर इनाम पाऊँगा ही। दो भूत पकड़ने का मुझे भार मिला था। एक तो झोली में अपने दिन गिनता है। क्यों जी, देखो देखो तुम्हारा साथी भी जीवन से हाथ धोने को आ ही धमका।” इतना कहकर उसने आईना झोली से निकालकर भूत को दिखाया।

भूत की तो रूह ही फ़ना हो गई। सचमुच, मेरे ही जैसा एक तो इसके पास भी है। अब मेरी भी दुर्दशा आ पहुँची। उसने गिड़गिड़ाकर कहा: “भैया, रहम करो, जान बख्शो! मैं आज से तुम्हारा बेपैसे का गुलाम रहा। रोज एक मन धान तुम्हारे घर दे आया करूँगा।”

नथुनी को धान का लोभ तो क्या हो,पड़ी थी जान बचाने की। युक्ति को काम आया देख उसने कुछ और झाँसे दिए। अंत में उसी शर्त पर उसको रिहा कर दिया।

वहाँ से कुशल लौट कर उसने संतोष की साँस ली, साथ ही, धान-पान के आसरे से तो हाथ धोया। परंतु भूत भी इतना अधिक डर गया था कि वह बेगारी करने लगा। रोज एक मन धान। नथुनी देखते ही देखते मालामाल हो गया। लोगों ने आश्चर्य किया, कमबख्त को कहीं अलादीन का चिराग तो नहीं हाथ लग गया।

एक दिन भूत सिर पर धान का बोरा लिए आ रहा था। एक खेत के अड्डे पर के पलास से एक आबनूस का कुंदा सा उतर आया। उसकी दाढ़ी पेट पर झूलती थी। उसने कहा: “यह बोझा लिए कहाँ चले जी?”

वह बोला: “कुछ मत पूछो भाई, बुरा फँसा हूँ।”

उसके आग्रह से ब्रह्मदैत्य ने उसके आगे अपना दुखड़ा रोया।

उसने गर्व से कहा, “तुम पूरे बछिया के ताऊ ही रहे। भूत और आदमी की बेगारी! …ह: ह: …”

ब्रह्मदैत्य बोला: व्यंग्य की बात नहीं, मुआमला है ही ऐसा टेढ़ा। उसके पास जाने पर तुम्हें भी आटे-दाल का भाव मालूम हो जाएगा।”

उसने तुनक कर कहा: “मैंने उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम न कर दी तो मेरा नाम काला कुदरा ही नहीं। जानते हो, मैंने इनायतुल्ला जैसे आदमी से पूजा ली है। तुम पर लानत है कि … । लाओ तुम बोझा मेरे सिर पर रखो।”

उसने बोझा देने से इनकार करते हुए कहा: “वह भाई तुम जानो। चलो मैं तुम्हें घर दिखा दूँगा। मुझे जहन्नुम में थोड़े ही जाना है कि धान न पहुँचाऊँ।”

काला कुदरा को अपनी करामात दिखाने की ऐसी सनक सवार हुई कि वह पीछे लग गया और घर देखकर लौट आया।

दूसरे दिन आधी रात को वह जा धमका। नाई आज उस शरारती बिल्ली की खबर लेने की टोह में था, जो आज उसके घर पर दूध पी गई थी। आँगन के पानी निकलने की एक नाली थी। उसमें उसने एक फाँस लगा रखी थी और जाग ही रहा था। बिल्ली आई कि फँसी।

उस नाली के सिवा भूत ने भीतर जाने की दूसरी राह न पाई। उसे नाई की बहादुरी देखनी थी, इसलिए पिल ही तो पड़ा। बस पिलना था कि फँसा फाँस में। खटका हुआ और नाई ने डंडा थाम लिया। मगर बिल्ली तो नहीं, यह तो दढ़ियल मूँछियल भूत था। लगा उसकी खबर लेने। ऐसा पीटा- ऐसा पीटा कि बच्चे को छठी का दूध उबल पड़ा। नाई बोला: “बड़-बड़ गए तो बैजू आए। एक तो धान पहुँचाता है मारे डर के और ये आए हिम्मत आजमाने।”

हाथ बाँध कर काला कुदरा बोला: “बाबा अब मत मारो। मैं रोज एक मन चावल दिया करूँगा- दया करो।”

नथुनी ने उसे छोड़ तो दिया पर अधमरा बनाकर। दूसरे दिन से एक मन चावल की भी आय होने लगी। यह क्रम तब तक रहा, जब तक नथुनी जीता रहा। लोग आज भी नथुनी के दुस्साहस की कहानी कहा करते हैं कि उसने भूत से बेगारी कराई।

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