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हरभगवान मेरा पुराना दोस्त है. अब तो बड़ी उम्र का है, बड़ी-बड़ी मूंछें हैं, तोंद हैं. जब सोता है तो लंबी तानकर और जब खाता है, तो आगा-पीछा नहीं देखता. बड़ी बेपरवाह तबियत का आदमी है, हालांकि उसकी कुछ आदतें मुझे कतई पसंद नहीं. पान का बीड़ा हर वक्त मुँह में रखता है और कभी छुट्टी पर कहीं जा, तो सारा वक्त ताश खेलता रहता है. न सैर को जाता है, न व्यायाम करता है, यों बड़ा हंसमुख है, किसी बात का बुरा नहीं मानता. हमेशा दोस्तों की मदद करता है.
    पर एक दिन उसने मेरे साथ बड़ी अजीब हरकत की.
    शिमला में एक सम्मेलन होने वाला था. हम लोग उसमें भाग लेने के लिए गए. हरभगवान भी अपनी मूंछों समेत, तोंद सहलाता वहां पहुँच गया. और भी कुछ लोग वहां पहुंचे. ये सब लोग एक दिन पहले पहुँच गए, मैं किसी कारणवश दूसरे दिन पहुँच पाया. जब मैं अपना सामान लेकर होटल में पहुंचा, तो क्या देखता हूँ कि सभी अच्छे कमरे भर चुके हैं. मुझे बड़ी कोफ़्त हुई. मेरे साथियों से इतना भी न हुआ कि मेरे लिए भी एक अच्छा सा कमरा ले लेते. जिस वक्त मैं पहुंचा, उस वक्त होटल में कोई नहीं था, सभी कहीं टहलने गए हुए थे. मैं होटल के एक बरामदे से दूसरे बरामदे में चक्कर काटता अपने लिए कमरा खोजता रहा. मैंने हरभगवान के बारे में पूछताछ की. पता चला कि वह कमरा न. 10 में टिका हुआ है. वहां पर गया तो देखा, हरभगवान कमरे में नहीं था. मेरी नज़र साथ वाले कमरे पर पड़ी. कमरा खाली था और बड़ा हवादार व साफ़-सुथरा भी. वास्तव में एक ही कमरे के बीचोबीच छोटी सी दीवार खड़ी करके दो कमरे बना दिए गए थे. मैंने होटल के मैनेजर से कहा कि मेरा सामान उस कमरे में लगवा दे. पर वह संकोच में पड़ गया.
    ‘आप कोई और कमरा देख लीजिये. नीचे की मंज़िल पर दो कमरे खाली हैं.’
    ‘क्यों? यह अच्छा-भला कमरा है. और हरभगवान मेरा दोस्त है. मैं उसके नज़दीक रहना पसंद करूँगा.’ मैंने कहा.
    मैनेजर फिर झिझका. कहने लगा: ‘असल में हरभगवानजी ने ही कहा था कि अगर हो सके तो यह कमरा किसी दूसरे आदमी को न दिया जाए.’
 मैं हैरान हुआ: ‘क्यों? क्या हरभगवान होटल का मालिक है कि आर्डर देता फिरता है कि कौन किस कमरे में रहे ? मैं तो यहीं रहूँगा.’
   फिर मुझे झट से खयाल आया कि मुमकिन है, मेरे लिए ही हरभगवान ने यह कमरा खाली रखवा लिया हो. और कोई कारण नहीं होगा. मुझे हरभगवान के व्यवहार पर बड़ा संतोष हुआ.
  ‘हरभगवान मेरा दोस्त है. मेरे लिए ही उसने यह कमरा रखवा लिया होगा. आप चिंता न करें और मेरा सामान यहाँ भिजवा दें.’ मैंने मैनेजर से कहा.
   चुनांचे सामान रखवा दिया गया. कमरा सचमुच बहुत बढ़िया था. कमरे में दो बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थीं और दोनों बाहर की ओर खुलती थीं, जिनमें से पहाड़ी पर बिछे जंगल और नीचे घाटी का सुंदर दृश्य नजर आता था. दो-तीन दिन यहाँ खूब मजे से बीतेंगे, मैंने मन ही मन सोचा. साथ में हरभगवान रहता है. बीच में छोटी सी दीवार ही तो है. इधर बैठे-बैठे ही एक-दूसरे से बतियाया करेंगे.
      मैंने चाय मंगवाई और खिड़की के पास बैठकर देर तक चुस्कियां लेता रहा. फिर मैं उठा, कपड़े बदले, लाल स्वेटर पहना जो मुझे बहुत फबता है, कंधे पर कैमरा लटकाया और घूमने निकल गया. पहले बाज़ार का चक्कर लगाया, जहाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने सैलानी घूम-फिर रहे थे. फिर मैं घाटी की ओर उतर गया और जंगल में से जाने वाली सड़क पर चल पड़ा.
खूब घूम-घाम कर जब मैं लौटा, तब मुझे भूख लग रही थी और बदन में प्यारी-प्यारी सी थकान थी. मैं सोच रहा था कि होटल में पहुंचकर आमलेट बनवाऊंगा और खाना खाने के बाद गरम-गरम काफी पियूँगा. फिर मजे से जाकर सो रहूँगा.
    मैं गुनगुनाता, सीटी बजाता मैं होटल पहुंचा. सीढियां चढ़कर ऊपर गया, तो क्या देखता हूँ कि मेरा सामान कमरे के बाहर रखा है और कमरे पर ताला चढ़ा है. मैं आगबबूला हो गया. मैंने यह भी देखा कि साथ वाले कमरे में रोशनी है और वहां से खूब कहकहों की आवाजें आ रही हैं.
     ‘कौन आदमी है जिसने मेरा सामान बाहर रखवा दिया है?’ मैंने चिल्लाकर एक बैरे से पूछा.
     ‘साथ वाले साहब ने रखवाया है जी, हमने नहीं रखा.’
     मेरा गुस्सा और भी भड़क उठा.
     ‘क्या यह आदमी होटल का मालिक है, जो सामान बाहर रखवा दिया?’, मैंने फिर चिल्लाकर कहा और कदम बढ़ाता हुआ हरभगवान के कमरे में जा पहुंचा.
     कमरे में हरभगवान पलंग पर पालथी जमाये, तीन-चार आदमियों के साथ मजे से बैठा ताश खेल रहा था. उसकी आँखें हाथ में पकड़े ताश के पत्तों पर थीं. एक बार गरदन फेरकर उसने मेरी ओर देखा: ‘आ गए, भैया!’ और फिर ताश के खेल में खो गया.
    ‘तुमने मेरा सामान बाहर क्यों रखवा दिया है हरभगवान?’
    वह ताश के पत्तों पर ही आंखें जमाए लापरवाही से बोला : ‘तुम कहीं और चले जाओ न यार, कितने ही कमरे हैं.’
फिर पलंग पर थोड़ा खिसककर अपनी तोंद को एक ओर सरकाते हुए उसने मेरे बैठने के लिए पलंग की पाटी पर थोड़ी सी जगह बना दी. बोला: ‘आओ, बैठो. तुम्हारा सफ़र कैसा रहा ?’ और फिर ताश के खेल में मशगूल हो गया.
  ‘यह क्या मज़ाक है?’ मैंने गुस्से से कहा: ‘मैं तो इसी कमरे में रहूँगा.’
  पर हरभगवान ने मेरी बात की ओर या मेरी क्रोधभरी आवाज की ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया. मैं थोड़ी देर के लिए वहीँ खड़ा रहा, फिर मुझसे न रहा गया. ‘सुन रहे हो हरभगवान, मैं इसी कमरे में रहूँगा. अव्वल तो तुम्हारा मतलब नहीं था मेरा सामान बाहर निकलवाने का….’
     ताश के पत्तों पर आँखें रखे-रखे ही हरभगवान हँसकर बोला : ‘बिगड़ते क्यों हो यार, सामान निकलवाया ही तो है, खिड़की के नीचे फिंकवा तो नहीं दिया ! कोई और कमरा देख लो न , साहनी भैया, क्यों परेशान होते हो? और हमें भी परेशान करते हो. क्या सारे होटल में यही कमरा रह गया है?’
 ‘तुम्हारे मशविरे के शुक्रिया, मगर मैं तो यहीं पर रहूँगा.’ और यह कहकर मैं बाहर जाने को हुआ.
हरभगवान फिर भी परेशान नहीं हुआ. तोंद खुजलाता हुआ बोला: ‘ गुस्सा क्यों करते हो यार, मैं तो तुम्हारे ही भले के लिए कहता हूँ. आगे जैसा मन आए करो, हमें क्या है….’
मैं कमरे में लौट आया और सामान अंदर रखवा लिया. पहाड़ पर आने का मेरा आधा मजा किरकिरा हो गया. हरभगवान के कमरे से फिर कहकहों की आवाजें आने लगीं.
इसे इतनी तमीज नहीं कि ताश छोड़कर मेरे साथ सीधे मुँह बात कर सके. सामान लगाते समय मुझे तरह-तरह के खयाल आने लगे. आखिर इसने सामान बाहर रखवाया क्यों? मुमकिन है, इसकी पत्नी आने वाली हो. अगर यह बात है तो बोला क्यों नहीं? क्या मालूम, यह जुआ खेलना चाहते हों? क्या मालूम, किसी दूसरे आदमी को इसने वचन दे रखा हो कि तुम आओ तो एक साथ ठहरेंगे. पर हरभगवान समझ ले कि हम भी बिदकने वाले नहीं हैं. हमारी रगों में भी खत्री खून बहता है. खैर, तो मैंने खाना खाया, थोड़ी देर के लिए फिर बाहर टहलने चला गया. ठंडी-ठंडी हवा का मजा लिया, और फिर चुपचाप कमरे में आकर सो गया. जब मैं अपने कमरे में गया तो हरभगवान के साथी जा चुके थे और वह स्वयं खाना खाने गया हुआ था. वह लौटकर कब आकर सो गया, मुझे इसका पता ही न चला.
       रात में सोए सोए ही –मैं नहीं जानता क्या वक्त रहा होगा—या तो मैं सपना देखने लगा, या सचमुच मेरे कान में आवाजें पड़ने लगीं. मुझे लगा जैसे दो कुत्ते खिड़की के नीचे कहीं एक दूसरे पर गुर्रा रहे हैं, बार-बार एक दूसरे पर झपट रहे हैं.
        एक कुत्ता गहरी खरज आवाज में गुर्राता तो दूसरा पतली तीखी आवाज में और दोनों दांत निकाले एक दूसरे पर झपट पड़ते हैं— ‘ग….र्र..र्र…’
मैंने करवट बदल ली. मैं उस वक्त गहरी नींद में था और मुझे इस बात का खयाल तक नहीं आया कि खिड़की के ऐन नीचे कुत्ते कैसे पहुँच गए होंगे.
        पर थोड़ी ही देर बाद सोए सोए ही मुझे लगा, जैसे दोनों कुत्ते कमरे के अंदर आ गए हैं और मेरे पलंग के पास ही एक दूसरे पर गुर्राए जा रहे हैं. गुर्राने की इतनी ऊंची आवाज मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी. पहाड़ी कुत्ते होते भी खूंखार हैं. मगर ये मेरे कमरे में कैसे घुस आये? यह कैसा होटल है, जिसमें रात को कुत्ते कमरे में घुस आते हैं, एक नहीं, दो दो !
       मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा. झांकझांक कर बिस्तर के आस-पास देखा. मुझे कोई कुत्ता नजर नहीं आया. दरवाजे की ओर झांक कर देखा, वहां पर भी कोई कुत्ता नहीं था. मगर गुर्राने की आवाजें बराबर आ रही थीं.
               ‘ग…र्र…गर्र …गांऊ…गां…खख…खा…खा…ख….’
मैंने उठकर बत्ती जलाई. कमरे में रौशनी हो गई और मैं पूरी तरह से जाग गया.
तब मैं समझा. श्री हरभगवानजी खर्राटे भर रहे थे. और खर्राटे भी इतने ऊंचे कि लगता अभी छत उड़ जाएगी.
‘ग…र्र…र्र…खा…..खा….’
दोनों कुत्तों की आवाजें एक ही मुँह में से निकल रही थीं. सांस खींचते तो झबरैले मोटे कुत्ते की आवाज आती, सांस छोड़ते तो छोटे, पतले कुत्ते की आवाज.
मैं टांगे लटकाए पलंग पर बैठ गया. अब मैं क्या करूं? कहाँ जाऊं? हे भगवान, मैं क्योंकर इस कमरे में रहने की भूल कर बैठा? अच्छा-भला सामान बाहर पड़ा था, मैं किसी दूसरे कमरे में चला जाता. साथ वाले कमरे में बराबर तोपें दागी जा रही थीं.
   मैंने फिर सोने की कोशिश की. मेरे सूटकेस में थोड़ी सी रुई पड़ी थी. मैंने रुई के मोटे मोटे फाहे बनाकर दोनों कानों में घुसेड़े. सिरहाना सिर के नीचे रखने के बजाय सिर के ऊपर रख लिया. चादर को सिर पर पगड़ी की तरह लपेट लिया. पर हरभगवान के खर्राटों की आवाजें पहले की ही तरह कानों के परदे फाड़ रही थीं.
‘ओ हरभगवान …!’ मैं चिल्लाया. मगर कोई उत्तर नहीं. पर मेरी आवाज उसके खर्राटों से ऊंची हो, तभी वह सुने.
‘ओ हरभगवान के बच्चे !’ मैं पूरे जोर से चिल्लाया.
“हैं..हैं…? हूँ …? क्या है? कौन है?” हरभगवान की आवाज आई.
‘यार, जरा करवट बदल कर सोओ.’
‘क्या बात है, भैया साहनी?? तुम अभी तक सोए नहीं?’
‘मैं तो सोना चाहता हूँ, मगर तुम्हारे खर्राटे कहाँ सोने देते हैं?’
वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि हरभगवान फिर खर्राटे भरने लगा. मैं उठकर कमरे से बाहर निकल आया. मैंने सोचा, इधर-उधर झांककर देखूं, कहीं कोई बेंच पड़ा हो, कहीं कोई खाट बिछी हो, जिस पर इस मरदूद से हट कर रात काट सकूं. मैं आँगन में गया, फिर गलियारे में जा पहुंचा, फिर सीढ़ियों के पास तक चला गया, मगर एक टूटी कुर्सी के अलावा कुछ नजर नहीं आया.
     मैं लौट आया. हरभगवान की चांदमारी पूरे जोरों पर चल रही थी. ऐसी आवाज आती जैसे, सौ हवाई जहाज घरघराते सिर के ऊपर उड़ रहे हों. और हरभगवान मजे से पीठ के बल लेटा, तोंद फैलाए अपनी मूंछों के बीच से ये प्रलयंकारी आवाजें छोड़े जा रहा था.
       तौबा-तौबा करके रात कटी. जब भी मैं सोने की कोशिश करता, तभी भूचाल आने लगता. लगता, अभी दरवाजे और खिड़कियाँ टूट-टूट कर गिरेंगे.
      इधर उजाला हुआ, उधर मैंने उठकर अपना सामान बांधना शुरू कर दिया. दीवार की पिछली ओर से आवाज आई: ‘कहो साहनी भैया ! गुड मॉर्निंग !’
    मैं खून का घूँट पीकर रह गया और सामान बाहर रखने लगा.
थोड़ी देर बाद वह मेरे सामने खड़ा था. ‘अरे, सामान बाँध रहे हो ?’
मैंने आगबबूला होकर उसकी ओर देखा. वह सारी बात समझ गया. मेरे कंधे पर हाथ रखकर मूंछों ही मूंछों में मुस्कुरा कर बोला: ‘हमने तो तुमसे पहले ही कहा था कि यह कमरा तुम्हारे लिए ठीक नहीं है. तुम नहीं माने तो हम क्या क्या करें? कहो तो हम किसी दूसरे कमरे में चले जाएँ ?’

 

मैं अपना सामान कमरे के बाहर रखता रहा.
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भीष्म साहनी

भीष्म साहनी

जन्म: 8 अगस्त 1915, मृत्यु: 11 जुलाई 2003 उपन्यास: तमस, कड़ियाँ, झरोखे, बसंती, नीलू नीलिमा नीलोफर कहानियाँ: चीफ की दावत, वाङ्गचू
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