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बयान – 15

आधी रात से ज्यादे जा चुकी है। गयाजी में हर मुहल्ले के चौकीदार ‘जागते रहियो, होशियार रहियो’ कह-कहकर इधर से उधर घूम रहे हैं।

रात अंधेरी है, चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ है। यहां का मुख्य स्थान विष्णु-पादुका है, उसके चारों तरफ की आबादी बहुत घनी है मगर इस समय हम गुंजान आबादी में न जाकर उस मुख्तसर आबादी की तरफ चलते हैं जो शहर के उत्तर में रामशिला पहाड़ी के नीचे आबाद है और जहां के कुल मकान कच्चे और खपड़े की छावनी के हैं। इसी आबादी में से दो आदमी स्याह कम्बल ओढ़े बाहर निकले और फलगू नदी की तरफ रवाना हुए।

रामशिला पहाड़ी से पूरब फलगू नदी के बीचोंबीच में एक बड़ा भयानक ऊंचा टीला है। उस टीले पर किसी महात्मा की समाधि है और उसी जगह पत्थर की मजबूत बनी हुई कुटी में एक साधु भी रहते हैं। उस समाधि और कुटी के चारों तरफ बेर, मकोइचे, घो इत्यादि जंगली पेड़ों से बड़ा ही गुंजान हो रहा है और वहां जमीन पर पड़ी हुई हड्डियों की यह कैफियत है कि बिना उन पर पैर रखे कोई आदमी समाधि या उस कुटी तक जा ही नहीं सकता। छोटी-बड़ी, साबुत और टूटी सैकड़ों तरह की खोपड़ियां इधर से उधर लुढ़क रही हैं। न मालूम कब और क्योंकर इतनी हड्डियां चारों तरफ जमा हो गईं। इस आबादी से निकले हुए दोनों आदमी इसी टीले की तरफ जा रहे हैं।

कोई साधारण आदमी ऐसी अंधेरी रात में उस टीले की तरफ जाने का साहस कभी नहीं कर सकता, मगर ये दोनों बिना किसी तरह की रोशनी साथ लिए अंधेरे में ही हड्डियों पर पैर रखते और कंटीली झाड़ियों में घुसते चले जा रहे हैं। आखिर ये दोनों कुटी के पास जा पहुंचे और दरवाजे पर खड़े होकर एक ने ताली बजाई।

भीतर से – कौन है?

एक : किवाड़ खोलो।

भीतर से – क्यों किवाड़ खोलें?

एक – काम है।

भीतर से – तुम लोग हमें व्यर्थ तंग करते हो।

साधु ने उठकर किवाड़ खोला और वे दोनों अंदर जाकर एक तरफ बैठ गये। भीतर धूनी के जलने से कुटी अच्छी तरह गर्म हो रही थी इसलिए उन दोनों ने कंबल उतारकर रख दिया। अब मालूम हुआ कि ये दोनों औरतें हैं और साथ ही इसके यह भी देखने में आया कि एक औरत की दाहिनी कलाई कटी है जिस पर वह कपड़ा लपेटे हुए है। एक औरत तो चुपचाप बैठी रही मगर बाबाजी से वह दूसरी औरत जिसकी कलाई कटी हुई थी यों बातचीत करने लगी –

औरत – कहिये आपने कुछ सोचा?

बाबाजी – जो काम मेरे किए हो ही नहीं सकता उसके लिए मैं क्या सोचूं।

औरत – बेशक आपके किए वह काम हो सकता है, क्योंकि वह आपको गुरु के समान मानती है।

साधु – गुरु के समान मानती है तो क्या मेरे कहने से वह अपनी जान दे देगी तुम लोग भी क्या अंधेर करती हो!

औरत – इसमें जान देने की क्या जरूरत है!

साधु – तो तुम क्या चाहती हो?

औरत – बस इतना ही कि वह उस मकान को छोड़ दे।

साधु – उस बेचारी ने किसी को दुख तो दिया नहीं, फिर उसके पीछे क्यों पड़ी हो

औरत – क्या उसने मुझे और मेरे आदमियों को धोखा नहीं दिया?

साधु – तुम अपना राज्य दूसरे को देकर आप भाग गईं अब तो वही मालिक है, इसलिए वे लोग उसी के नौकर गिने जायेंगे।

औरत – मैं अपना राज्य फिर अपने कब्जे में किया चाहती हूं।

साधु – जो तुमसे हो सके करो पर मैं किसी तरह की मदद नहीं दे सकता। तुम लड़कपन से मुझे जानती हो, तुम्हारे पिता तुमको गोद में लेकर यहां आया करते थे, कभी मैं किसी के भले-बुरे का साथी नहीं हुआ।

औरत – जो हो मगर आपको वह काम करना ही पड़ेगा जो मैं कहती हूं और याद रखिये कि अगर आप इनकार करेंगे तो इसका नतीजा अच्छा न होगा, मैं साधु और महात्मा समझकर छोड़ न दूंगी।

साधु – (कुछ देर सोचने के बाद) अच्छा आज भर तुम मुझे और मोहलत दो, कल इसी समय यहां आना।

औरत – खैर एक दिन और सही।

ये दोनों औरतें वहां से उठकर रवाना हुईं। न मालूम कब से एक आदमी कुटी के पीछे छिपा हुआ था जो इस समय नजर बचाकर उन दोनों के पीछे-पीछे तब तक चलता ही गया जब तक वे दोनों आबादी में पहुंचकर अपने मकान के अंदर न घुस गईं। जब उन दोनों औरतों ने मकान के अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया जो खुला छोड़ गई थीं, तब वह आदमी वहां से लौटा और फिर उसी कुटी में पहुंचा जिसका हाल ऊपर लिख चुके हैं। कुटी का दरवाजा खुला हुआ था और साधु बेचारे उसी तरह बैठे कुछ सोच रहे थे। वह आदमी कुटी के अंदर बेधड़क चला गया और दंडवत करके एक किनारे बैठ गया।

साधु – कहिए देवीसिंहजी, आप आ गए?

देवी – (हाथ जोड़कर) जी महाराज, मैं तभी से यहां हूं जब वे दोनों यहां आई भी न थीं, अब उन दोनों को उनके घर पहुंचाकर लौटा आ रहा हूं।

साधु – हां!

देवी – जी हां, आपने बड़ी कृपा की जो उसका हाल मुझे बता दिया, कई दिनों से हम हैरान हो रहे थे। क्या कहूं आपकी आज्ञा न हुई, नहीं तो मैं इसी जगह से उन दोनों को अपने कब्जे में कर लेता।

साधु – नहीं भैया, ऐसा करने से यह हमारे गुरु की कुटिया बदनाम होती, अब तुमने उसका घर देख ही लिया है सब काम बना लोगे। वीरेंद्रसिंह बड़े प्रतापी और धर्मात्मा राजा हैं, ऐसे को कभी कोई सता नहीं सकता। देखा, इस दुष्टा माधवी ने अपने चाल-चलन को कैसा खराब किया और प्रजा को कितना दुख दिया, आखिर उसी की सजा भोग रही है! अच्छा अब ईश्वर तुम्हारा कल्याण करें। वीरेंद्रसिंह से मेरा आशीर्वाद कहना। अहा, कैसा भक्त धर्मात्मा और नीति पर चलने वाला राजा है!

देवी – अच्छा तो मुझे आज्ञा है न!

साधु – हां जाओ, मगर देखो मैं तुम्हें पहले भी कह चुका हूं और अब भी कहता हूं कि माधवी को जान से मत मारना और बेचारी कामिनी पर दया करना। मैं उसे अपनी पुत्री ही मानता हूं। वीरेंद्रसिंह से कह देना कि वे कामिनी को अपनी लड़की समझें और आनंदसिंह के साथ उसका संबंध करने में कुछ सोच-विचार न करें, क्या हुआ अगर उसका बाप आपके सामने खड़ा होने लायक नहीं है।

देवी – (हाथ जोड़कर) बहुत अच्छा कह दूंगा, राजा वीरेंद्रसिंह कदापि आपकी आज्ञा न टालेंगे मगर फिर एक दफे मैं आपकी सेवा में आऊंगा।

साधु – नहीं अब मुझसे मुलाकात न होगी, मैं आज ही इस कुटी को छोड़ दूंगा। हां, ईश्वर चाहेगा तो मैं एक दिन स्वयं तुम लोगों से मिलूंगा ।

देवी – जैसी आज्ञा।

साधु – हां, बस अब जाओ, यहां मत अटको।

पाठक सोचते होंगे कि देवीसिंह तो वीरेंद्रसिंह के साथ चुनार चले गये थे, यहां कैसे आ पहुंचे! मगर नहीं, लोगों के जानने में वीरेंद्रसिंह, देवीसिंह को अपने साथ ले गये थे परंतु वास्तव में ऐसा न था। राजा वीरेंद्रसिंह की गुप्त नीति साधारण नहीं।

बयान – 16

राजा वीरेंद्रसिंह के चुनार चले जाने के बाद दोनों भाइयों को अपनी-अपनी फिक्र पैदा हुई। क्रुंअर आनंदसिंह किन्नरी की फिक्र में पड़े और कुंअर इंद्रजीतसिंह को राजगृही की फिक्र पैदा हुई। राजगृही को फतह कर लेना उनके लिए एक अदना काम था मगर इस विचार से कि किशोरी वहां फंसी हुई है, हमें सताने के लिए अग्निदत्त उसे तकलीफ न दे, धावा करने का जल्दी साहस नहीं कर सकते थे। जिस समय वह आजाद हुए अर्थात वीरेंद्रसिंह के मौजूद रहने का खयाल जाता रहा, उसी समय से किशोरी की मुहब्बत ने जोर बांधा और तरद्दुद के साथ मिली हुई बेचैनी बढ़ने लगी। आखिर अपने मित्र भैरोसिंह से बोले, ‘‘अब मैं बिना राजगृही गए नहीं रह सकता। जिस जगह हमारे देखते-देखते बेचारी किशोरी हम लोगों से छीन ली गई उस जगह अर्थात उस अमलदारी को बिना तहस-नहस किये और किशोरी को पाये मेरा जी ठिकाने न होगा और न मुझे दुनिया की कोई चीज भली मालूम होगी।

भैरो – आपका कहना ठीक है मगर आप अकेले वहां क्या करेंगे?

इंद्र – दुष्ट अग्निदत्त के लिये मैं अकेला ही बहुत हूं।

भैरो – दुष्ट अग्निदत्त के लिए आप अकेले बहुत हैं। मगर शहर भर के लिये नहीं।

इंद्र – शहर भर से मुझे कोई मतलब नहीं।

भैरो – आखिर शहर वाले उसकी तरफदारी करेंगे या नहीं!

इंद्र – इसका अंदाजा तो गयाजी पर कब्जा करने से ही तुम्हें मालूम हो गया होगा।

भैरो – ठीक है मगर अपनी तरफ से मजबूती रखना मुनासिब है।

इंद्र – अच्छा तो मैं आनंद को समझा दूंगा कि फलाने दिन एक सरदार को थोड़ी फौज देकर हमारी मदद के लिए भेज देना।

भैरो – यह हो सकता है, मगर उत्तम तो यही था कि दो-चार दिन और ठहर जाते तब तक मैं राजगृही से घूम आता।

इंद्र – नहीं अब इस किस्म की नसीहत सुनने लायक मैं नहीं रहा।

भैरो – (कुछ सोचकर) खैर जैसी आपकी मर्जी।

शाम के वक्त दोनों भाई घोड़ों पर सवार हो अपने दोनों ऐयारों और बहुत से मुसाहबों और सरदारों को साथ ले घूमने और हवा खाने के लिए महल के बाहर निकले। कायदे के मुताबिक सरदार और मुसाहब लोग अपने-अपने घोड़े उन दोनों भाइयों के घोड़ों से लगभग पच्चीस कदम पीछे लिए जाते थे, जब इंद्रजीतसिंह या आनंदसिंह घूमकर उनकी तरफ देखते तब ये लोग झट आगे बढ़ जाते और बात सुनकर पीछे हट जाते, हां दोनों ऐयार घोड़ों की रकाब थामे पैदल साथ जा रहे थे। जब ये दोनों भाई घूमने के लिए बाहर निकलते तब शहर के मर्द-औरत बल्कि छोटे-छोटे बच्चे भी इनको देखकर खुश होते थे। जिसके मुंह से सुनिये यही आवाज निकलती थी, ‘‘ईश्वर ने हम लोगों की सुन ली जो ऐसे राजकुमारों के चरण यहां आये और उस खुदगर्ज नमकहराम बेईमान का साया हमारे सिर से हटा।’’

जब घूमते हुए ये दोनों भाई शहर से बाहर हुए इंद्रजीतसिंह ने आनंदसिंह से कहा, ‘‘मैं किसी काम के लिए भैरोसिंह को साथ लेकर राजगृही जाता हूं, आज से ठीक आठवें दिन अर्थात रविवार को किसी सरदार के साथ थोड़ी-सी फौज हमारी मदद को भेज देना।’’

आनंद – (थोड़ी देर चुप रहने के बाद) जो हुक्म, मगर…

इंद्र – तुम किसी तरह की चिंता मत करो, मैं अपने को हर तरह से सम्भाले रहूंगा।

आनंद – ठीक है लेकिन…

इंद्र – गयाजी पहुंचने से ही तुम्हें मालूम हो गया होगा कि माधवी की रियाया हमारे खिलाफ न होगी।

आनंद – ईश्वर करे ऐसा ही हो, परंतु…

इंद्र – जब तक तुम्हारी फौज वहां न पहुंच जायगी हम लोगों को जो कुछ करना होगा छिपकर करेंगे।

आनंद – ऐसा करने पर भी…

इंद्र – खैर जो कुछ तुम्हें कहना हो साफ-साफ कहो!

आनंद – आपका अकेले जाना मुनासिब नहीं, दुश्मन के घर में जाकर अपने को सम्हाले रहना भी कठिन है, राजा की मौजूदगी में रियाया को हर तरह उसका डर बना ही रहता है, आप दुश्मन के घर में किसी तरह निश्चिंत नहीं रह सकते और आपके इस तरह चले जाने के बाद मेरा जी यहां कभी नहीं लग सकता।

राजगृही जाने पर कुंअर इंद्रजीतसिंह कैसे ही मुस्तैद क्यों न हों लेकिन छोटे भाई की आखिरी बात ने उन्हें हर तरह से मजबूर कर दिया। कुंअर इंद्रजीतसिंह बड़े ही समझदार और बुद्धिमान थे, मगर मुहब्बत का भूत जब किसी के सिर पर सवार होता है तो वह पहले उसकी बुद्धि की ही मिट्टी पलीद करता है।

छोटे भाई की बात सुन इंद्रजीतसिंह ने भैरोसिंह की तरफ देखा।

भैरो – मैं भी यही चाहता था कि आप दो-चार रोज यहीं और सब्र करें और तब तक मुझे राजगृही से घूम आने दें।

आनंद – (भैरोसिंह की तरफ देखकर) वादा कर जाओ कि तुम कब लौटोगे?

भैरो – चार दिन के अंदर ही मैं यहां पहुंच जाऊंगा।

आनंद – (भैरो की तरफ देखकर इंद्रजीतसिंह से) यदि आज्ञा हो जाय तो ये इधर ही से चले जायें, घर जाने की जरूरत ही क्या?

भैरो – मैं तैयार हूं।

इंद्र – घर जाकर अपना सामान तो इन्हें दुरुस्त करना ही होगा, हां, मुझसे चाहे इसी समय विदा हो जायें।

बयान – 17

भैरोसिंह को राजगृही गये आज तीसरा दिन है। यहां का हाल-चाल अभी तक कुछ मालूम नहीं हुआ, इसी सोच में आधी रात के समय अपने कमरे में पलंग पर लेटे हुए कुंअर इंद्रजीतसिंह को नींद नहीं आ रही है। किशोरी की खयाली तस्वीर उनकी आंखों के सामने आ-आकर गायब हो जाती है। इससे उन्हें और भी दुख होता है, घबराकर लंबी सांस ले उठ बैठते हैं। कभी भी जब बेचैनी बहुत बढ़ जाती है तो पलंग को छोड़ कमरे में टहलने लगते हैं।

इसी हालत में इंद्रजीतसिंह कमरे के अंदर टहल रहे थे, इतने में पहरे के एक सिपाही ने अंदर की तरफ झांककर देखा और इनको टहलते देख हट गया, थोड़ी देर बाद वह दरवाजे के पास इस उम्मीद में आकर खड़ा हो गया कि कुमार उसकी तरफ देखकर पूछें तो वह कुछ कहे मगर कुमार तो अपने ध्यान में डूबे हुए हैं, उन्हें खबर ही क्या है कि कोई उनकी तरफ झांक रहा है या इस उम्मीद में खड़ा है कि वे उसकी तरफ देखें और कुछ पूछें। आखिर उस सिपाही ने जान-बूझकर किवाड़ का एक पल्ला इस ढंग से खोला कि कुछ आवाज हुई, साथ ही कुमार ने घूमकर उसकी तरफ देखा और इशारे से पूछा कि क्या है।

राजा सुरेंद्रसिंह, वीरेंद्रसिंह, इंद्रजीतसिंह और आनंदसिंह का बराबर ये हुक्म था कि मौका न होने पर चाहे किसी की इत्तिला न की जाय मगर जब कोई ऐयार आवे और कहे कि मैं ऐयार हूं और इसी समय मिलना चाहता हूं तो चाहे कैसा ही बेमौका क्यों न हो हम तक उसकी इत्तिला जरूर पहुंचनी चाहिए। अपने घर के ऐयारों के लिए तो कोई रोक-टोक थी नहीं, चाहे वह कुसमय में भी महल में घुस जाय या जहां चाहे वहां पहुंचे, महल में उनकी खातिर और उनका लिहाज ठीक उतना ही किया जाता था, जितना पंद्रह वर्ष के लड़के का किया जाता और इसी का ठीक नमूना ऐयार लोग दिखलाते थे।

सिपाही ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘एक ऐयार हाजिर हुआ है और इसी समय कुछ अर्ज किया चाहता है!’’ कुमार ने कहा, ‘‘रोशनी तेज कर दो और उसे अभी यहां लाओ।’’ थोड़ी देर बाद चुस्त स्याह मखमल की पोशाक पहिरे कमर में खंजर लटकाये, हाथ में कमंद लिए एक खूबसूरत लड़का कमरे में आ मौजूद हुआ।

इंद्रजीतसिंह ने गौर से उसकी ओर देखा, साथ ही उनके चेहरे की रंगत बदल गई, जो अभी उदास मालूम होता था खुशी से दमकता हुआ दिखाई देने लगा।

इंद्र – मैं तुम्हें पहचान गया।

लड़का – क्यों न पहचानेंगे जबकि आपके यहां एक से एक बढ़कर ऐयार हैं और दिन-रात उनका संग है, मगर इस समय मैंने भी अपनी सूरत अच्छी तरह नहीं बदली है।

इंद्र – कमला, पहले यह कहो कि किशोरी कहां और किस हालत में हैं, और उन्हें अग्निदत्त के हाथ से छुट्टी मिली या नहीं।

कमला – अग्निदत्त को अब उनकी कोई खबर नहीं है।

इंद्र – इधर आओ और हमारे पास बैठो, खुलासा कहो कि क्या हुआ, मैं तो इस लायक नहीं कि अपना मुंह उन्हें दिखाऊं क्योंकि मेरे किए कुछ भी न हो सका।

कमला – (बैठकर) आप ऐसा खयाल न करें, आपने बहुत कुछ किया, अपनी जान देने को तैयार हो गये और महीनों दुख झेला। अपने ऐयार लोग अभी तक राजगृही में इस मुस्तैदी से काम कर रहे हैं कि अगर उन्हें यह मालूम हो जाता कि किशोरी वहां नहीं है तो उस राज्य का नाम-निशान मिटा देते।

इंद्र – मैंने भी यही सोच के उस तरफ जोर नहीं दिया कि कहीं अग्निदत्त के हाथ पड़ी हुई बेचारी किशोरी पर कुछ आफत न आवे, हां तो अब किशोरी वहां नहीं है।

कमला – नहीं!

इंद्र – कहां हैं और किसके कब्जे में हैं?

कमला – इस समय वह खुदमुख्तार हैं, सिवाय लज्जा के उन्हें और किसी का डर नहीं।

इंद्र – जल्द बताओ वह कहां हैं मेरा जी घबड़ा रहा है।

कमला – वह इसी शहर में हैं मगर अभी आपसे मिलना नहीं चाहतीं।

इंद्र – (आंखों में आंसू भरकर) बस तो मुझे मालूम हो गया कि उन्हें मेरी तरफ से रंज है, मेरे किए कुछ न हो सका इसका उन्हें दुख है।

कमला – नहीं-नहीं, ऐसा भूल के भी न सोचिए।

इंद्र – तो फिर मैं उनसे क्यों नहीं मिल सकता?

कमला – (कुछ सोचकर) मिल क्यों नहीं सकते, मगर इस समय…

इंद्र – क्या तुमको मुझ पर दया नहीं आती! अफसोस, तुम बिल्कुल नहीं जानतीं कि तुम्हारी बातें सुनकर इस समय मेरी दशा कैसी हो रही है। जब तुम खुद कह रही हो कि वह स्वतंत्र हैं, किसी के दबाव में नहीं हैं और इसी शहर में हैं तो मुझसे न मिलने का कारण ही क्या है बस यही न कि मैं उस लायक नहीं समझा जाता।

कमला – फिर आप उसी खयाल को मजबूत करते हैं! खैर तो फिर चलिए मैं आपको ले चलती हूं, जो होगा देखा जायेगा, मगर अपने साथ किसी ऐयार को लेते चलिए। भैरोसिंह तो यहां हैं नहीं, आपने उन्हें राजगृही भेज दिया है।

इंद्र – क्या हर्ज है तारासिंह को साथ लिए चलता हूं, मगर भैरोसिंह के जाने की खबर तुम्हें क्योंकर मिली?

कमला – मैं बखूबी जानती हूं, बल्कि उनसे मिलकर मैंने कह भी दिया है कि किशोरी राजगृही में नहीं है तुम बेखौफ अपना काम करना।

इंद्र – अगर तुमने उससे ऐसा कह दिया है तो राजगृही में बड़ा ही बखेड़ा मचावेगा!

कमला – मचाना ही चाहिए।

कुंअर इंद्रजीतसिंह ने उसी समय तारासिंह को बुलाया और उन्हें साथ ले कपड़े पहन कमला के साथ किशोरी से मिलने की खुशी में लंबे-लंबे कदम बढ़ाते रवाना हुए।

शहर ही शहर बहुत-सी गलियों में घुमाती हुई इन दोनों को साथ लिए कमला बहुत दूर चली गई और विष्णु पादुका मंदिर के पास ही एक मकान के मोड़ पर पहुंचकर खड़ी हो गई।

इंद्र – क्यों क्या हुआ रुक क्यों गईं?

कमला – इस मकान के दरवाजे के सामने ही एक भारी जमींदार की बैठक है। वहां दिन-रात पहरा पड़ता है। इधर से आप लोगों का जाना और यह जाहिर करना कि आज इस मकान में दो आदमी नये घुसे हैं मुनासिब नहीं।

तारा – तो फिर क्या करना चाहिए।

कमला – मैं दरवाजे की राह से जाती हूं। आप लोग पीछे की तरफ जाइये और कमंद लगाकर मकान के अंदर पहुंचिये।

इंद्र – क्या हर्ज है, ऐसा ही होगा, तुम दरवाजे की राह से जाओ।

कमला – मगर एक बात और सुन लीजिए। जब मैं इस मकान में पहुंचकर छत पर से झांकू तभी आप कमंद फेंकिए, क्योंकि बिना मेरी मदद के कमंद अड़ न सकेगी।

बयान – 18

मकान के अंदर कमला, इंद्रजीतसिंह और तारासिंह के पहुंचने के पहले ही हम अपने पाठकों को इस मकान में ले चलकर यहां की कैफियत दिखाते हैं।

इस मकान के अंदर छोटी-छोटी न मालूम कितनी कोठरियां हैं पर हमें उनसे कोई मतलब नहीं, हम तो उस दालान के पास जाकर खड़े होते हैं जिसके दोनों तरफ दो कोठरियां और सामने लंबा-चौड़ा सहन है। इस दालान में किसी तरह की कोई सजावट नहीं, सिर्फ एक दरी बिछी हुई है और खूंटियों पर कुछ कपड़े लटक रहे हैं। आधी रात का समय होने पर भी दालान में चिराग की रोशनी नहीं है। यह दालान ऊपर के दर्जे में है, इसके ऊपर कोई इमारत नहीं। सामने का सहन बिल्कुल खुला हुआ है, चंद्रमा की फैली हुई सफेद चांदनी सहन से घुसती हुई धीरे-धीरे दालान में आ रही है, जिसकी रोशनी उस दालान की हर चीज को दिखलाने के लिए काफी है। एक तरफ की कोठरी तो बंद है मगर दूसरी बगल वाली कोठरी का दरवाजा खुला हुआ है। यह कोठरी बहुत बड़ी नहीं है और इसके भीतर सफेद फर्श पर दो औरतें बैठी हुई धीरे-धीरे कुछ बातें कर रही हैं।

हमारे पाठक इन दोनों को बखूबी पहचानते हैं इनमें से एक तो किशोरी और दूसरी वही किन्नरी है जिस पर कुंअर आनंदसिंह रीझे हुए हैं, जो कई दफे आनंदसिंह के कमरे में कोठरी के अंदर से निकल अपने चितवनों से उन्हें घायल कर चुकी है और साथ-साथ आप भी आशिक हो चुकी है।

किशोरी – बहिन, तुमने जो कुछ नेकी मेरे साथ की है उसे मैं किसी तरह भूल नहीं सकती। मुझसे यह कभी न होगा कि तुम्हें ऐसी हालत में छोड़ इंद्रजीतसिंह के पास चली जाऊं।

किन्नरी – फिर क्या किया जाय, किस तरह उम्मीद हो कि मुझे कोई पूछेगा।

किशोरी – कमला ने मुझसे कसम खाकर कहा है कि आनंदसिंह किन्नरी की चाह में डूबे हैं। इसे भी जाने दो, आखिर तुम्हारा अहसान कुछ उनके ऊपर है या नहीं इतने बदमाशों को जो वहां फसाद मचा रहे थे सिवाय तुम्हारे कौन मार सकता था!

किन्नरी – खैर जो होगा देखा जायेगा, अब तो यह सोचना चाहिए कि हम लोग कहां जायं और क्या करें?

किशोरी – कमला आ जाय तो उससे राय मिलाकर जो मुनासिब मालूम हो किया जाय। ओह, यहां बैठे-बैठे जी घबड़ा गया, चलो बाहर चलें, चांदनी खूब निकली हुई है।

दोनों औरतें कोठरी के बाहर निकलीं और सहन में आकर टहलने लगीं। मौसम के मुताबिक कुछ सर्दी पड़ रही थी इसलिए दोनों ज्यादे देर तक सहन में टहल न सकीं, दालान में आकर दरी पर बैठ गईं और बातचीत करने लगीं।

इस मकान के बगल में एक छोटा-सा नजरबाग था मगर उसकी हालत ऐसी खराब हो रही थी कि उसे नजरबाग की जगह खंडहर या जंगल ही कहना मुनासिब है। नजरबाग में जाने के लिए इस मकान में एक रास्ता था, बाकी चारों तरफ उसके ऊंची-ऊंची दीवारें थीं, इस मकान में बिना भीतर वाले की मदद के कोई कमंद लगाकर चढ़ नहीं सकता था क्योंकि इसकी ऊपर की दीवारें इस खूबी से बनी हुई थीं कि किसी तरह कमंद अड़ नहीं सकती थी। हां अगर कोई चाहे तो कमंद के जरिए उस नजरबाग में जरूर जा सकता था, मगर इस मकान में आने के लिए वहां से भी वही दिक्कत होती।

थोड़ी देर किन्नरी और किशोरी बातें करती रहीं, इसके बाद नीचे से किवाड़ खटखटाने की आवाज आई। किशोरी ने कहा, ‘‘लो बहिन कमला भी आ पहुंची।’’

किन्नरी – खटखटाने की आवाज से तो मालूम होता है कि कमला ही है, मगर तो भी खिड़की से झांककर मामूली सवाल कर लेना मुनासिब है।

किशोरी – ऐसा जरूर करना चाहिए क्योंकि हम लोगों को धोखा देने के लिए दुश्मन लोग पचासों रंग लाया करते हैं।

‘‘तुम ठहरो मैं कुछ पूछती हूं!’’ इतना कहकर किशोरी ने दरवाजे की तरफ वाली खिड़की में से झांककर पूछा, ‘‘गिनती पूरी हुई’ इसके जवाब में किसी ने कहा, ‘‘हां पचासी तक।’’

किशोरी – अच्छा मैं नीचे आकर दरवाजा खोलती हूं।

दरवाजा खोलने के लिए खुशी-खुशी किशोरी नीचे उतरी मगर चौखट के पास पहुंचने के पहले ही नीचे के अंधेरे दालान में एक मोटे और कद्दावर आदमी को खड़ा देख डर के मारे चिल्ला उठी तथा उस समय तो एक चीख मारकर बिल्कुल ही बेहोश हो गई जब वह शैतान इस बेचारी की तरफ झपटा और हाथ तथा कमर पकड़कर बेदर्दी के साथ एक तरफ खींच ले गया।

किशोरी के चिल्लाने की आवाज सुनते ही हाथ में नंगी तलवार लिए किन्नरी बड़बड़ाती हुई नीचे पहुंची मगर चारों तरफ घूम-घूमकर देखने पर भी उसने किसी को न पाया बल्कि किशोरी का भी पता न लगा।

किन्नरी दरवाजा तो खोलना भूल गई और किशोरी को न पाने से घबड़ाकर इधर-उधर ढूंढ़ने लगी। उस भयानक अंधेरे में दालान और कोठरियों में घूमती हुई किन्नरी को इस बात का जरा भी खौफ न मालूम हुआ कि किशोरी की तरह कहीं मुझ पर आफत न आ जाय।

बेचारी किशोरी चीख मारकर बेहोश हो गई मगर जब वह होश में आई तो उसने अपने को मौत के पंजे में गिरफ्तार पाया। उसने देखा कि झाड़ियों के बीच में जबर्दस्ती जमीन पर गिराई हुई है, एक आदमी नकाब से अपनी सूरत छिपाये उसकी छाती पर सवार है और खंजर उसके कलेजे के पार किया ही चाहता है।

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चंद्रकांता संतति-भाग-2 (बयान-15 से 18)

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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