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गौरी

अनुमानित समय : 12 मिनट-

शाम को गोधूलि की बेला, कुली के सिर पर सामान रखवाये जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आये, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर उतरवाकर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चला गया और वह पास ही पड़ी, एक आराम कुर्सी पर जिसके स्प्रिंग खुलकर कुछ ढीले होने के कारण इधर-उधर फैल गए थे, गिर से पड़े। उनके इस प्रकार बैठने से कुछ स्प्रिंग आपस में टकराए, जिससे एक प्रकार की झन-झन की आवाज़ हुई। पास ही बैठे कुत्ते ने कान उठाकर इधर-उधर देखा फिर भौं-भौं करके भौंक उठा। इसी समय उनकी पत्नी कुंती ने कमरे में प्रवेश किया। काम की सफलता या असफलता के बारे में कुछ भी न पूछकर कुंती ने नम्र स्वर में कहा, “चलो हाथ-मुंह धो लो, चाय तैयार है।
‘चाय’, राधाकृष्ण चौंक से पड़े, “चाय के लिए मैंने नहीं कहा था।”
“नहीं कहा था तो क्या हुआ, पी लो।” कुंती ने आग्रहपूर्वक कहा।
“अच्छा चलो”, कहकर राधाकृष्ण कुंती के पीछे-पीछे चले गए।
गौरी, अपराधिनी की भाँति, माता-पिता दोनों की दृष्टि से बचती हुई, पिता के लिए चाय तैयार कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि पिता की सारी कठिनाइयों की जड़ वही है। न वह होती और न पिता को उसके विवाह की चिन्ता में, इस प्रकार स्थान-स्थान घूमना पड़ता। वह मुँह खोलकर किस प्रकार कह दे कि उसके विवाह के लिए इतनी अधिक परेशानी उठाने की आवश्यकता नहीं। माता-पिता चाहे जिसके साथ उसकी शादी कर दें, वह सुखी रहेगी। न करें तो भी वह सुखी है। जब विवाह के लिए उसे जरा भी चिन्ता नहीं, तब माता-पिता इतने परेशान क्यों रहते हैं–गौरी यही न समझ पाती थी। कभी-कभी वह सोचती–क्या मैं माता-पिता को इतनी भारी हो गयी हूँ? रात-दिन सिवा विवाह के उन्हें और कुछ सूझता नहीं। तब आत्मग्लानि और क्षोभ से गौरी का रोम-रोम व्यथित हो उठता। उसे ऐसा लगता कि धरती फटे और वह समा जाय, किन्तु ऐसा कभी न हुआ।
गौरी, वह जो पूनो के चाँद की तरह बढ़ना भर जानती थी, घटने का जिसके पास कोई साधन न था, बाबू राधाकृष्ण के लिए चिंता की सामग्री हो गई थी। गौरी उनकी एकमात्र संतान थी। उसका विवाह वे योग्य वर के साथ करना चाहते थे, यही सबसे बड़ी कठिनाई थी। योग्य पात्र का मूल्य चुकाने लायक उनके पास यथेष्ट संपत्ति न थी। यही कारण था कि गौरी का यह उन्नीसवाँ साल चल रहा था। फिर भी वे कन्या के हाथ पीले न कर सके थे। गौरी ही उनकी अकेली संतान थी । छुटपन से ही उसका बड़ा लाड़-प्यार हुआ था । प्राय: उसके उचित-अनुचित सारे हठ पूरे हुआ करते थे । इसी कारण गौरी का स्वभाव निर्भीक, दृढ़-निश्चयी और हठीला था । वह एक बार जिस बात को सोच-समझकर कह दे, फिर उस बात से उसे कोई हटा नहीं सकता था । पिता की परेशानियों को देखते हुए अनेक बार उसके जी में आया कि यह पिता से साफ-साफ पूछे कि आखिर वे उसके विवाह के लिए इतने चिंतित क्यों हैं ? वह स्वयं तो विवाह को इतना आवश्यक नहीं समझती । और अगर पिता विवाह को इतना अधिक महत्त्व देते हैं, तो फिर पात्र और कुपात्र क्या ? विवाह करना है कर दें, किसी के भी साथ, वह हर हालत में सुखी और संतुष्ट रहेगी । उनकी यह परेशानी, इतनी चिंता अब उससे सही नहीं जाती । किंतु संकोच और लज्जा उसकी जबान पर ताला-सा डाल देते । हजार बार निश्चय करके भी वह पिता से यह बात न कह सकी ।
पिता को आते देख, गौरी चुपके से दूसरे कमरे में चली गई । राधाकृष्ण बाबू ने जैसे बेमन से हाथ-मुँह धोया और पास ही रखी एक कुरसी पर बैठ गए । वहीं एक मेज पर कुन्ती ने चाय और कुछ नमकीन पूरियाँ पति के सामने रख दीं । पूरियों की तरफ राधाकृष्ण ने देखा भी नहीं । चाय का प्याला उठाकर पीने लगे ।
ऐसी कन्या को जन्म देकर, जिसके लिए वर ही न मिलता हो, कुन्ती स्वयं ही जैसे अपराधिन हो रही थी । कुन्ती ने डरते-डरते पूछा, जहाँ गए थे क्या वहाँ भी कुछ ठीक नहीं हुआ ?
-ठीक ! ठीक होने को वहाँ धरा ही क्या है, चाय का घूँट गले से नीचे उतारते हुए बाबू राधाकृष्ण ने कहा, सब हमीं लोगों पर है । विवाह करना चाहें तो सब ठीक है, न करना चाहें तो कुछ भी ठीक नहीं है।
कुन्ती ने उत्सुकता से पूछा, फिर क्या बात है, लड़के को देखा?
-हाँ देखा, अच्छी तरह देखा हूँ ! कह राधाकृष्ण फिर चाय पीने लगे । कुन्ती की समझ में यह पहेली न आई, उसने कहा, ‘जरा समझाकर कहो । तुम्हारी बात तो समझ में ही नहीं आती ।’
राधाकृष्ण ने कहा, “समझाकर कहता हूँ, सुनो। वह लड़का, लड़का नहीं आदमी है। तुम्हारी गौरी के साथ मामूली चपरासी की तरह दिखेगा। बोलो करोगी ब्याह?”
कुंती बोली, ”विवाह की बात तो पीछे होगी। क्या रूप-रंग बहुत खराब है ? फोटो में तो वैसा नहीं जान पड़ता।”
राधाकृष्ण ने कहा, “रूप-रंग नहीं, रहन-सहन बहुत खराब है । उम्र भी अधिक है, पैंतीस-छस्तीस साल । साथ ही दो बच्चे भी । उन्हीं बच्चों को सँभालने के लिए तो वह विवाह करना चाहते हैं, वरना वे शायद कभी न करते। उनकी यह दूसरी शादी होगी। उनकी उमंगें , उत्साह सब कुछ ठंडा पड़ चुका है। वे अपने बच्चों के लिए एक धाय चाहते हैं”, मेरी लड़की की तो दूसरी शादी नहीं है। वे साफ़-साफ़ कहते हैं कि मैं बच्चों के लिए शादी कर रहा हूँ।”
कुंती ने कहा, है ‘जिन्हें दूसरी शादी करनी होती है वे ऐसे ही कहते हैं।”
राधाकृष्ण बोले, “अरे नहीं-नहीं यह आदमी कपटी नहीं है। उसके भीतर कुछ और बाहर कुछ नहीं हो सकता। उसका हदय तो दर्पण की तरह साफ़ है। उसका खादी कुरता, गांधी टोपी, फटे-फटे चप्पल देखकर जी हिचकता है। वह नेता बनकर व्याख्यान तो दे सकता है, पर दूल्हा बनकर आने लायक नहीं है। तीस रुपए कुल उनकी तनख्वाह है। कांग्रेस के दफ्तर में वे सेक्रेटरी हैं। तीन बार जेल जा चुके हैं, फिर कब चले जाएँ कुछ पता नहीं।’
कुंती बोली, “आदमी तो बुरा नहीं जान पड़ता।’
राधाकृष्ण ने कहा, “बुरा आदमी तो मैं भी नहीं कहता उसे, पर वह गौरी का पति होने लायक नहीं । सच बात यह है।”
कुंती बोली, “फिर तुमने क्या कह दिया?”
राधाकृष्ण ने कहा, “क्या कह देता? उन्हें बुला आया हूँ। अगले इतवार को आवेंगे। आने के लिए भी वे बडी मुश्किल सै तैयार हुए: कहने लगे, नहीं साहब ! मैं लड़की देखने न जाऊँगा। इस तरह लड़की देखकर मुझसे किसी लड़की का अपमान नहीं किया जाता। जब मैंने समझाकर कहा कि आप लड़की देखेंगे लड़की और उसकी माँ आपको देखेंगी, तब जाकर कहीं बड़ी मुश्किल से राजी हुए ।”
गौरी दरवाजे की आड़ में खड़ी सब बातें सुन रही थी है जिस व्यक्ति के प्रति उनके पिता इतने असंतुष्ट और उदासीन थे, उसके प्रति गौरी के हदय में अनजाने ही कुछ श्रद्धा के भाव जाग्रत हो गए । राधाकृष्ण बाबू पान का बीड़ा उठाकर अपनी बैठक में चले गए । और उसी रात फिर उन्होंने अपने कुछ मित्रों और रिश्तेदारों को गौरी के लिए योग्य वर तलाशने को कई पत्र लिखे ।
अगला इतवार आया । आज ही बाबू सीताराम जी, गौरी को देखने या अपने आपको दिखलाने आवेंगे । राधाकृष्ण जी ने यह पहले से ही कह दिया है कि किसी बाहर वाले को कुछ न मालूम पड़े कि कोई गौरी को देखने आया है । अतएव यह बात कुछ गुप्त रखी गई है । घर के भीतर आँगन में ही उनके बैठने का प्रबंध किया गया है । तीन-चार कुर्सियों के बीच एक मेज है, जिस पर एक साफ धुला हुआ खादी का कपड़ा बिछा दिया गया है । और एक गिलास में आंगन के ही गुलाब के कुछ फूलों को तोड़कर, गुलदस्ते का स्वरूप दिया गया है । बहुत ही साधारण-सा आयोजन है । सीताराम जी सरीखे व्यक्ति के लिए किसी विशेष आडंबर की आवश्यकता भी तो न थी ।
यथासमय बाबू सीताराम जी अपने दोनों बच्चों के साथ आए । बच्चे भी वही खादी के कुरते और हाफपैंट पहने थे । न जूता न मोजा, न किसी प्रकार का ठाटबाट । पर दोनों बड़े प्रसन्न, हँसमुख; आकर घर में वे इस प्रकार खेलने लगे जैसे इस घर से चिरपरिचित हों । कुंती एक तरफ बैठी थी । बच्चों के कोलाहल से परिपूर्ण घर उसे क्षण भर के लिए नंदनकानन-सा जान पड़ा । उसने मन-ही-मन सोचा, कितने अच्छे बच्चे हैं । यदि बिना किसी प्रकार का संबंध हुए भी, सीताराम इन बच्चों के संभालने का भार उसे सौंप दें, तो वह खुशी-खुशी ले ले । वह बच्चों के खेल में इतनी तन्मय हो गई कि क्षण भर के लिए भूल बैठी कि सीताराम भी बैठे हैं, और उनसे भी कुछ बातचीत करनी है । इसी समय अचानक छोटे बच्चे को जैसे कुछ याद आ गया हो, दौड़कर पिता के पास आया । उनके पैरों के बीच में खड़ा होकर बोला, बाबू, तुम तो कैते थे न कि माँ को दिखाने ले चलते हैं । माँ कआँ है, बतलाओ?
बाबू ने किंचित् हँसकर कहा, ये माँ जी बैठी हैं, इनसे कहो, यही तुम्हें दिखाएँगी ।
बालक ने मचलकर कहा, ‘ऊँ हूँ तुम दिकाओ ।’ और इसी समय एक बड़ी-सी सफेद बिल्ली आँगन से होती हुई भीतर को भाग गई । बच्चे बिल्ली के पीछे सब कुछ भूलकर, दौड़ते हुए अंदर पहुंच गए । गौरी पिछले दरवाजे पर चुपचाप खड़ी थी । वह न जाने किस खयाल में थी । छोटे बच्चे ने उसका आँचल पकड़कर खींचते हुए पूछा, तुम अमारी मां हो ?
गौरी ने देखा हृष्ट-पुष्ट सुंदर-सा बालक, कितना भोला, कितना निश्चल । उसने बालक को गोद में उठाकर कहा, हां ।
बच्चे ने फिर उसी स्वर में पूछा, अमारे घर चलोगी न ? बाबू तो तुम्हें लेने आए हैं औल हम भी आए हैं।
अब तो गौरी उसकी बातों का उत्तर न दे सकी । पूछा, मिठाई खाओगे ?
कुछ क्षण बाद कुंती ने अंदर देखा, छोटा बच्चा गौरी की गोद में और बड़ा उसी के पास बैठा मिठाई खा रहा है । एक नि:श्वास के साथ कुंती बाहर चली गई और थोड़ी देर बाद ज्योंही गौरी ने ऊपर आँख उठाई, उसने माता-पिता दोनों को सामने खड़ा पाया । पिता ने स्नेह से पुत्री से कहा, बेटा जरा चलो, चलती हो न ?
गौरी ने कोई उत्तर न दिया । उसने बच्चों का हाथ-मुँह धुलाया, उन्हें पानी पिलाया, फिर मां के पीछे-पीछे बाहर चली गई । बच्चे अब भी उसी को घेरे हुए थे । वे उसे छोड़ना नहीं चाहते थे । बही मुश्किल से सीताराम जी उन्हें बुलाकर कुछ देर तक अपने पास बिठा सके, किंतु जरा-सा मौका पाते ही वे फिर जाकर गौरी के आसपास बैठ गए । पिता के विरुद्ध उन्हें कुछ नालिशें भी दायर करनी थीं, जो पिता के पास बैठकर न कर सकते थे।
छोटे ने कहा, बाबू हमें कबी खिलौने नहीं ले देते।
बड़े ने कहा, मिठाई भी तो कभी नहीं खिलाते ।
छोटा बोला, और अमें छोड़कर दफ्तर जाते हैं, दिन भर नई आते, बाबू अच्छे नई हैं ।
बड़ा बोला, मां तुम चलो, नहीं तो हम भी यहीं रहेंगे ।
बच्चों की बातों से सभी को हंसी आ रही थी । कुन्ती ने बच्चों से कहा, तो तुम दोनों भाई यहीं रह जायो, बाबू को जाने दो, है न ठीक?
काफी देर हो गई यह देखकर सीताराम जी ने कहा, समय बहुत हो चुका है, अब चलूँगा, नहीं तो शाम की ट्रेन न मिल सकेगी । फिर राधाकृष्ण की तरफ देखकर कहा, आप लोगों से मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई । लड़की तो आपकी साक्षात् लक्षमी है । और यह मैं जानता था कि आपकी लड़की ऐसी ही होगी, इसीलिए देखने को आना नहीं चाहता था । फिर कुछ ठहरकर बोले, और सच बात तो यह है कि मुझे पत्नी की उतनी जरूरत नहीं, जितनी इन बच्चों को जरुरत है एक मां की । मेरा क्या ठिकाना ? आज बाहर हूँ कल जेल में । मेरे बाद इनकी देख-रेख करने बाला कोई नहीं रहता । यही सोच-समझकर विवाह करने को तैयार हो सका हूँ, अन्यथा इस उमर में विवाह? कहकर वे स्वयं हँस पड़े ।
राधाकृष्ण ने मन-ही-मन सोचा, तो मेरी लड़की इनके बच्चों की धाय बनकर जाएगी । कुंती ने सोचा, कोई भी स्त्री ऐसे बच्चों का लालन-पालन कर अपना जीवन सार्थक बना सकती है! गौरी ने मन-ही-मन इस महापुरुष के चरणों में प्रणाम किया और बच्चों की और ममता-भरी दृष्टि से देखा । जैसे यह दृष्टि कह रही थी कि किसी विलासी युवक की पत्नी बनने से अधिक मैं इन भोले-भाले बच्चों की मां बनना पसंद करूँगी । सीताराम जी को जाने के लिए प्रस्तुत देख, बच्चे फिर गौरी से लिपट गए । झूठ ही सही, यदि राधाकृष्ण एक बार भी कहते कि बच्चों को छोड़ जाओ तो सीताराम बच्चों को छोड़कर निश्चिंत होकर चले जाते । परंतु इस ओर से जब ऐसी कोई बात न हुई तो बच्चों को सिनेमा, सरकस और मिठाई का प्रलोभन देकर बड़ी कठिनाई से गौरी से अलग करके वे ले जा सके । जाते समय सीताराम जी को पक्का विश्वास था कि विवाह होगा, केवल तारीख निश्चित करने भर की देर है ।
सीताराम जी उस पत्र की प्रतीक्षा में थे जिसमें विवाह की निश्चित तारीख लिखकर आने वाली थी । देश की परिस्थिति, गवर्नमेंट का रुख, और महात्माजी के वक्तव्यों को पढ़कर, वे जानते थे कि निकट भविष्य में फिर सत्याग्रह-संग्राम छिड़ने बाला है । न जाने किस दिन उन्हें फिर जेल का मेहमान बनना पड़े । पिछली बार जब गए थे तब उनकी बूढ़ी बुआ थीं, पर अब तो वे भी नहीं रहीं । यह कहारिन क्या बच्चों की देखभाल कर सकेंगी । बच्चों की उन्हें बड़ी चिंता थी । और बच्चे भी सदा ही मां-मां की रट लगाए रहते थे । उन्होंने फिर एक पत्र बाबू राधाकृष्ण को शीघ्र ही तारीख निश्चित काने के लिए लिख भेजा । उधर राधाकृष्ण जी दूसरी ही बात तय कर रहे थे । उन्होंने सीताराम के पत्र के उत्तर में लिख भेजा कि गौरी की मां पुराने खयाल की है । वे बिना जन्मपत्री मिलवाए विवाह नहीं करना चाहतीं । अतएव आप अपनी जन्मपत्री भेज दें । पत्र पढ़ने के साथ ही सीताराम को यह समझने में देर न लगी कि यह विवाह न करने का केवल बहाना मात्र है, किन्तु फिर भी उन्होंने जन्मपत्री भेज दी । जन्मपत्री भेजने के कुछ ही दिन बाद उत्तर भी आ गया कि जन्मपत्री नहीं मिलती, इसलिए विवाह न हो सकेगा, क्षमा कीजिएगा ।
बाबू राधाकृष्ण को गौरी के लिए दूसरा वर मिल गया था, जो उनकी समझ में गौरी ” के बहुत योग्य था । धनवान ये भी अधिक न थे । पर अभी-अभी नायब तहसीलदार के पद पर नियुक्त हुए थे, आगे और भी उन्नति की आशा थी । बी०ए० पास थे । देखने में अधिक सुंदर न थे । बदशक्ल भी कहे जा सकते थे, पर पुरुषों की भी कहीं सुंदरता देखी जाती है ? उमर कुछ अधिक न थी, यही 24-25 साल । लेने-देने का झगड़ा यहाँ भी न था । पहली शादी थी और माँ-बाप, भाई-बहन से भरा-पूरा परिवार था । राधाकृष्ण जी इससे अधिक और चाहते ही क्या थे । ईश्वर को उन्होंने कोटिश: धन्यवाद दिए, जिसकी कृपा से ऐसा अच्छा वर उन्हें गौरी के लिए मिल गया ।
विवाह आगामी आषाढ़ में होना निश्चित दुआ । दोनों तरफ से विवाह की तैयारी हो रही थी । राधाकृष्ण जी की यही तो एक लड़की थी । वे बड़ी तन्मयता के साथ गहने-कपड़ों का चुनाव करते थे । सोचते थे, देर से शादी हुई तो क्या हुआ वर भी तो क्तिना अच्छा ढूँढ़ निकाला है । कुन्ती भी बहुत खुश थी । उसकी आँखों में यह दृश्य झूलने लगता था कि उसका दामाद छोटा साहब हो गया है, बेटी-दामाद छोटे-छोटे बच्चों के साथ उससे मिलने आए हैं । किंतु बच्चों की बात सोचते ही उसे सीताराम जी के दोनों बच्चे तुरंत याद आ जाते और याद आ जाती उनकी बात । बच्चों की देख-रेख करने वाला कोई नहीं है । फिर वह सोचती, ऊंह, दुनिया में और भी तो लड़कियाँ हैं । कर लें शादी, क्या मेरी गौरी ही है । इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ही प्रसन्न थे, पर गौरी से कौन पूछता कि उसके हृदय में कैसी हलचल मची रहती है । रह-रहकर उसे उन बच्चों का भोला-भाला मुंह और मीठी-मीठी बातें याद आ जातीं । साथ ही याद आ जाते विनयी, नम्र और सादगी की प्रतिमा सीताराम जी । उनकी याद आते ही श्रद्धा से गौरी का माथा अपने आप ही झुक जाता । देशभक्त त्यागी वीरों के लिए उसके हदय में बड़ा सम्मान था । सीताराम जी ने भी तो देश के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया है, नहीं तो बी०ए० पास करने के बाद क्या प्रयत्न करने पर उन्हें नायब तहसीलदार की नौकरी न मिल जाती ? मिलती क्यों नहीं ? पर सीताराम जी सरकार की गुलामी पसंद करते तब न ?
दूसरी और थे उसके होनेवाले वर-नायब तहसीलदार साहब, जिन्हें अपने आराम, अपने ऐश के लिए ब्रिटिश गवर्नमेंट के जरा से इंगित मात्र से निरीह देशवासियों के गले पर छुरी फेरने में जरा भी संकोच या हिचक नहीं । जिनके सामने कुछ चाँदी के दुकड़े दिए जाते हैं और ये दुम हिलाते हुए, निंद्य-से-निंद्य कर्म करने में भी किंचित् लज्जित नहीं होते । घृणा से गौरी का जी भर जाता, किन्तु उसके इन मनोभावों को जानने वाला यहाँ कोई भी न था । वह रात-दिन एक प्रकार की अव्यक्त पीड़ा से विकल-सी रहती । बहुत चाहती थी कि अपनी मां से कह दे कि वह नायब तहसीलदार से शादी न करेगी, किंतु लज्जा उसे कुछ भी न कहने देती । ज्यों-ज्यों विवाह की तिथि नजदीक आती, गौरी की चिंता बढ़ती ही जाती थी ।
विवाह की निश्चित तारीख से पंद्रह दिन पहले एकाएक तार आया कि नायब तहसीलदार के पिता का देहांत हो गया । इस मृत्यु के कारण विवाह साल भर को टल गया । गौरी के माता-पिता बड़े दुखी हुए, किंतु गौरी के सिर पर से जैसे चिंता का पहाड़ हट गया ।
इसी बीच सत्याग्रह आंदोलन की लहर सारे देश में बड़ी तीव्र गति से फैल गई । शहर-शहर में गिरफ्तारियों का तांता लग गया । रोज ही न जाने कितने गिरफ्तार होते, कितनों को सजा होती । कहीं लाठी चार्ज !- कहीं 144 ! सरकार की दमन की चक्की बड़े भयंकर रूप से चल रही थी । गौरी को चिंता थी उन बच्चों की । जब से सत्याग्रह-संग्राम छिड़ा था, तभी से उसे फिकर थी कि न जाने कब सीताराम जी गिरफ्तार हो जाएँ । और फिर वे बच्चे बेचारे-उन्हें कौन देखेगा । रोज का अखबार ध्यान से पढ़ती, कानपुर का समाचार तो और भी ध्यान से देखती थी । इसी प्रकार उसने एक दिन पढ़ा कि राजद्रोह के अपराध में सीताराम जी गिरफ्तार हो गए । और उन्हें एक साल का सपरिश्रम कारावास हुआ है । इस समाचार को पढ़कर गौरी कुछ क्षण तक स्तब्ध-सी खड़ी रही, फिर कुछ सोचती हुई टहलने लगी । कुछ ही देर बाद उसने अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया । वह मां के पास गई, मां कोई पुस्तक देख रही थी । उसने अपने सारे साहस को समेटकर दृढ़ता से कहा, ‘मां, मैं कानपुर जाऊँगी ।’
‘कानपुर में क्या है ?’ आश्चर्य से कुंती ने पूछा ।
गौरी ने कहा, ‘वहां बच्चे हैं ।’
मां ने उसी स्वर में कहा, ‘बच्चे ? कैसी बात करती हो गौरी, पागलों-सी ?’
गौरी बोली, ‘नहीं माँ, मैं पागल नहीं हूँ । बच्चों को तुम भी जानती हो । उनके पिता को राजद्रोह के मामले में साल भर की सजा हो गई । बच्चे छोटे हैं । मैं जाऊँगी माँ । मुझे जाना ही पड़ेगा ।’

गौरी के स्वभाव से कुन्ती भली-भांति परिचित थी । वह जानती थी कि गौरी जिस बात की हठ पकड़ती है, कभी छोड़ती नहीं है अतएव सहसा वह गौरी का विरोध न कर सकी, बोली, पर तेरे बाबू जी तो बाहर गए हैं, उन्हें तो आ जाने दे ।

गौरी ने दृढ़ता के साथ कहा, बाबूजी के आने तक नहीं ठहर सकूंगी मां। मुझे जाने दो । रास्ते में मुझे कुछ कष्ट न होगा । अब मैं काफी बड़ी हो गई हूँ ।

और उसी दिन शाम को एक नौकर के साथ गौरी कानपुर चली गई ।

अपनी सजा पूरी करके सीताराम घर लौटे । इस साल भर के भीतर उन्होंने बच्चों को एक बार भी न देखा था । उन्हें कायदे के अनुसार हर महीने उनका कुशल-समाचार मिल जाता था, पर बच्चों की चिंता उन्हें लगातार बनी ही रहती थी । जिस कहारिन के भरोसे वे बच्चों को छोड़ गए थे, उसके भी तीन-चार बच्चे थे । वह बच्चों को कैसे रखेगी, सो सीताराम जी जानते थे; पर विवशता थी क्या करते । सबेरे-सबेरे छै बजे ही जेल से मुक्त कर दिए गए । एक ताँगे पर बैठकर वे घर की ओर चले । जेब में कुछ पैसे थे । एक जगह गरम-गरम जलेबियां बन रही थीं । बच्चों के लिए थोड़ी-सी खरीद लीं । घर के दरवाजे पर पहुंचे । दरवाजा खुला था । घर के अंदर पैर रखने में हृदय धड़कता था । न जाने किस हालत में हों । वे चोरों की तरह चुपके-चुपके घर में घुसे । परंतु यह क्या ? आँगन में पहुंचते ही वे ठगे-से खड़े रह गए । फिर जरा आगे बढ़कर उन्होंने कहा, आप ?

गौरी ने झुककर उनकी पद-धूलि माथे से लगा ली ।

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उन्मादिनी-सुभद्रा कुमारी चौहान

अनुमानित समय : 13 मिनट-

लोग मुझे उन्मादिनी कहते हैं। क्यों कहते हैं, यह तो कहने वाले ही जानें, किन्तु मैंने आज तक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है जिसमें उन्माद के लक्षण हों। मैं अपने सभी काम नियम-पूर्वक करती हूँ। क्या एक भी दिन मैं उस समाधि पर फूल चढ़ाना भूली हूँ? क्या ऐसी कोई भी संध्या गयी है जब मैंने वहाँ दीपक नहीं जलाया है? कौन सा ऐसा सबेरा हुआ है जब ओस से धुली हुई नयी-नयी कलियों से मैंने उस समाधि को नहीं ढँक दिया? फिर भी मैं उन्मादिनी हूँ! यदि अपने किसी आत्मीय के सच्चे और निःस्वार्थ प्रेम को समझने और उसके मूल्य करने को ही उन्माद कहते हैं, तो ईश्वर ऐसा उन्माद सभी को दे। क्या कहा–वह मेरा कौन था? यह तो मैं भी नहीं कह सकती, पर कोई था अवश्य, और ऐसा था, मेरे इतने निकट था कि आज वह समाधि में सोया है और मैं बावली की तरह उसके आस-पास फेरी देती हूँ। उसकी और मेरी कहानी भिन्न-भिन्न तो नहीं है। जो कुछ है यही है। सुनो–

बचपन से ही मुझे कहानी सुनने का शौक था। मैं बहुत–सी कहानियाँ सुना करती और मुझे उनका वह भाग बहुत ही प्रिय लगता, जहाँ किसी युवक की वीरता का वर्णन होता। मैंने वीरता की परिभाषा अपनी अलग ही बना ली थी। यदि कोई युवक किसी शेर को भी मार डाले, तो मुझे वह वीर न मालूम होता, मेरा हृदय सुनकर उछलने न लगता। किन्तु यदि किसी युवती को बचाने के लिए वह किसी कुत्ते की टाँग ही क्यों न तोड़ दे तो मुझे बड़ा बहादुर मालूम होता, मेरा हृदय प्रसन्नत्रा से उछलने लगता। पहिले उदाहरण में स्वार्थ था, क्रूरता थी, और थी नीरसता। उसके विपरीत दूसरे उदाहरण में एक तरफ थी भयत्रस्त हरिणी की तरह दो आँखें और हृदय से उठने वाली अमोघ प्रार्थना और दूसरी ओर थी रक्षा करने की स्फूर्ति, वीर प्रमाणित होने की पवित्र आकांक्षा, और विजय की लालसा। इन सबके ऊपर स्नेह का मधुर आवरण था जो इस चित्र को और भी सुन्दर बना रहा था। कहानी-प्रेम ने मेरे हृदय को एक काल्पनिक कहानी की नायिका बनने की आतुरता में उड़ना सिखला दिया था।

जवानी आई और उसी के साथ मेरी कहानी की आशा भी। यों तो शीशे में अपना मुँह रोज ही देखा जाता है, परंतु आँखें कभी-कभी केवल अपने को ही देखती रह जाती हैं। गहरे आँधेरे में बंद हृदय भी कदाचित्‌ अपना स्वरूप दर्पण में देखने के लिए मचलने लगता है, आँखों से लड़ जाता है और उसकी सौंदर्य-समाधि को तोड़ देता है। मैंने सुना है कि एक समय ऐसा आता है, जब कुरूप-से-कुरूप व्यक्ति भी अपने को सुंदर समझने लगता है, फिर मैं तो सुंदरी थी ही।

बचपन में माँ मुझे प्यार से ‘मेरी सोना’, ‘मेरी हीरा’, ‘मेरी चाँद’ कहा करती थीं। बड़ी होने पर एक दिन कलूटे कुन्दन ने मुझसे लड़ाई में कह दिया, कि ‘हम तुम्हारी सरीखा गोरा-गोरा मुँह कहाँ से लावें? बेचारा कुन्दन क्‍या जाने कि उसने इन शब्दों से कौन-सा जादू फूँक दिया, कि फिर मैं उससे लड़ न सकी; इस बात के उत्तर में उसे पत्थर फेंककर मार न सकी हाँ, मैंने अंदर जाकर दर्पण के सामने खड़ी होकर कुन्दन के मुँह से अपने मुँह की तुलना अवश्य की थी। सचमुच मेरा मुँह बहुत गोरा था, परंतु कुन्दन-कुन्दन भी तो काला न था, साँवला था। और मुझे साँवले पुरुष ही अच्छे लगते थे। बचपन में अनेक बार राधा-कृष्ण की कहानी सुनते-सुनते मैं भी अपने को राधा-रानी समझने लगी थी और कृष्ण? कृष्ण, बहुत तलाश करने पर भी सिवा कुन्दन के और कोई न मिलता। कुन्दन बाँसुरी भी बजाता था। और साँवला भी था, फिर भला मेरा कृष्ण सिवा कुन्दन के और हो ही कौन सकता था?

युवती होने पर मेरे विवाह की चर्चा स्वाभाविक थी। मैंने सुन रखा था कि विवाह कुछ चक्कर लगाकर होता है। और एक अपरिचित व्यक्ति उन्हीं कुछ चककरों के बाद लड़की को अपने साथ लिवा ले जाता है। किंतु मुझे तो विवाह के चक्करों से वे चक्कर अधिक रुचते थे, जो कभी-कभी मैं कुन्दन के लिए और प्राय: कुन्दन मेरे लिए लगाया करता था। मैं चाहती तो यही थी कि मुझे अब और किसी के साथ चक्कर न लगाने पड़ें। मैं तथा कुन्दन-दोनों ने मिलकर जितने चक्कर लगाए हैं, हमारी जीवन-यात्रा के लिए उतने ही पर्याप्त हैं। किंतु पिताजी तो चिट्ठी-पत्री से कुछ और ही तय कर रहे थे। सुना, कि कोई इंग्लैंड से लौटे हुए इंजीनियर हैं, उनके साथ पिताजी मुझे जीवन भर के लिए बाँध देना चाहते हैं।

सोचा, मुझे कौन-सी इमारत खड़ी करवानी है या कौन-सा पुल तैयार करवाना है, जो पिताजी ने इंजीनियर तलाश किया। मेरे जीवन के थोड़े से दिन तो कुन्दन के ही साथ हंसते-खेलते बीत जाते, किंतु वहाँ मेरी कौन सुनता था? परिणाम यह हुआ कि यहाँ इतने चक्कर लगाकर भी मेरे ऊपर कुन्दन का कुछ अधिकार न हो पाया और इंजीनियर साहब ने, जिनसे न मेरी कभी की जान थी न पहिचान, मेरे साथ केवल सात चक्कर लगाए और मैं उनकी हो गई।

इधर मेरा विवाह हो रहा था उधर कुन्दन बी०ए० की परीक्षा दे रहा था। सुना कि कुन्दन परीक्षा-भवन में बेहोश हो गया। आह! बेचारा एक ही साथ दो-दो परीक्षाओं में बैठा भी तो था!

विवाह की आड़ में, न जाने कितने मित्र और रिश्तेदारों की जमघट में, मेरी उत्सुक आँखें सदा कुन्दन को खोजती रहती, किंतु इन तीन-चार दिनों में वह मुझे एक दिन भी न दिखा । विदा के दिन तो मेरे धैर्य का बाँध टूट गया। कुन्दन की बहिन से मैंने पूछा; मालूम हुआ कि वह कई दिनों से बीमार है। अब क्या करती, हृदय में एक पीड़ा छिपाए हुए मैं विदा हुई। स्टेशन पर पहुँची, व्याकुलता असंभव को भी संभव बनाने की उधेड़बुन में रहती है। मैं जानती थी कि बीमार कुन्दन स्टेशन नहीं आ सकता, फिर भी आँखें चारों तरफ किसी को खोज रही थीं। इधर ट्रेन ने चलने की सीटी दी, उधर गेट की तरफ से कोई तेजी से आता हुआ दिखा। आँखों ने कहा, कुन्दन है; हृदय ने समर्थन दिया, किंतु मस्तिष्क ने विरोध किया, वह बीमार है, भला स्टेशन पर कैसे आएगा।

पर वह मेरा कुन्दन ही था। उसकी आँखों में निशाशाजनक उन्माद, चेहरे पर विषाद की गहरी छाया और होंठों पर वही स्वाभाविक मुस्कराहट थी। सिर के बिखरे हुए रूखे बालों ने पूरा माथा ढंक रखा था। मैं चिल्ला उठी, ‘कुन्दन, इतनी देर बाद! पास ही बैठी हुई नाइन ने मेरा मुँह बंद कर दिया, बोली, ‘चिल्लाओ मत बेटी, बराती सुनेंगे तो क्या कहेंगे!’ अब मुझे होश आया कि मैं कहीं जा रही हूँ, अपने कुन्दन से बहुत दूर, बहुत दूर।

कटे वृक्ष की तरह मैं बेंच पर गिर पड़ी। हृदय जैसे डूबने लगा। ट्रेन चल पड़ी। जब मनुष्य के प्रति मनुष्य की ही सहानुभूति कम देखने में आती है, तब भला इस जड़ पदार्थ रेलगाड़ी को मुझसे क्या सहानुभूति हो सकती थी! उसने मुझे कुन्दन से दो बातें भी न करने दीं और झुक-झुककर हवा के साथ उड़ चली। मैं ससुराल आई, बड़ी भारी कोठी थी। बहुत-सी दास-दासियाँ थीं। वहाँ का रंग ही दूसरा था। पतिदेव को अंग्रेजियत अधिक पसंद थी। उनका रहन-सहन, चाल-ढाल, बात-व्यवहार सभी साहबाना था। वे हिंदी बहुत कम बोला करते और अंग्रेजी मैं जरा कम समझती थी; इसलिए उनकी बहुत-सी बातों में प्रायः चुप रह जाया करती उनके स्वभाव में कुछ रूख़ापन और कठोरता अधिक मात्रा में थी। नौकरों के साथ उनका जो बर्ताव होता, उसे देखकर मैं भय से सिहर उठती थी।

वे मुझे प्रायः रोज शाम को कभी सबेरे भी अपने साथ मोटर पर बैठाकर मीलों तक घुमा लाते, अपने साथ सिनेमा और थिएटर भी ले जाया करते; किंतु अपने इस साहब बहादुर के पार्श्व में बैठकर भी मैं कुन्दन को न भूल सकती। सिनेमा की तस्वीरों में रेशमी कुर्ता और धोती पहिने हुए मुझे कुन्दन की ही तस्वीर दिखाई पड़ती।

पति का प्रेम मैं पा सकी थी या नहीं यह मैं नहीं जानती, पर मैं उनसे डरती बहुत थी। भय का प्रेत रात-दिन मेरे सिर पर सवार रहता था। उनकी साधारण-सी भावभंगिमा भी मुझे कँपा देने के लिए पर्याप्त थी। वे मुझसे कभी नाराज न हुए थे, फिर भी उनके समीप मैं सदा यही अनुभव करती कि मैं बंदी हूँ और यहाँ जबरदस्ती पकड़कर लाई गई हूँ।

इस ऐश्वर्य की चकाचौंध और विभूतियों के साम्राज्य में भी मैं अपने बाल-सखा कुन्दन को न भूल सकी। मैके की स्वच्छंद वायु में कुन्दन के साथ खेलना, लड़ना-झगड़ना और उसकी बाँसुरी की ध्वनि मुझे भुलाए से भी न भूलती थी। क्षण भर का भी एकांत पाते ही बचपन की सुनहली स्मृतियाँ साकार होकर मेरी आँखों के सामने फिरने लगतीं; जी चाहता कि इस लोक-लज्जा की जंजीर को तोड़कर मैं मैके चली जाऊँ। किंतु इसी बीच छोटे भाई के पत्र से मुझे मालूम हुआ कि कुन्दन घर छोड़कर न जाने कहाँ चला गया है, उसका कहीं पता नहीं है। इसलिए मेरी कुछ-कुछ यह धारणा हो गई कि अब इस जीवन के कैदखाने से निकलकर भी कदाचित्‌ मैं कुन्दन को देख न सकूँगी। मैके जाने की भी अब मुझे उत्सुकता न थी, अब तो किसी प्रकार अपने दिन काटने थे।

न तो जीवन से ही कुछ आकर्षण था और न किसी के प्रति किसी तरह का अनुराग ही शेष रह गया था; पर काठ की पुतली की तरह सास और पति की आज्ञाओं का पालन करती हुई नियम से खाती-पीती थी, स्नान और श्रृंगार करती थी, और भी जो कुछ उनकी आज्ञा होती उसका पालन करती।

इसी समय एक ऐसी घटना हुई जिससे मेरी सोई हुई स्मृतियाँ फिर से जाग उठीं, मेरा उन्माद और बढ़ गया।एक दिन दोपहर के बाद मैं अपने छज्जे पर खड़ी हुई अन्यमनस्क भाव से बाहर सड़क से आने-जाने वालों को देख रही थी। सहसा सामने से कपड़ा बेचता हुआ, कुछ कपड़े स्वयं कंधे पर धरे हुए, कुछ नौकर के सिर पर रखवाए हुए, मुझे कुन्दन दिखाई पड़ा। विश्वास न हुआ, परंतु आँखें खुली थीं; मैं सपना नहीं देख रही थी। दौड़कर नीचे आई, आते ही खयाल आया, कि मेरे पैरों में तो मर्यादा की बेड़ियाँ पड़ी हैं, मैं कुन्दन के पास दौड़कर कैसे जाऊँगी। उसके बाद मैंने देखा कि कुन्दन स्वयं ही मेरे यहाँ के एक नौकर के साथ हमारे अहाते में आ रहा है। बाहरी बरामदे में उसने कपड़े उतार दिए। सोफे पर सास बैठी थीं। मैंने उनके बुलाने की प्रतीक्षा न की, चुपचाप आकर सोफे के पीछे खड़ी हो गई।

मेरी सास सामान खरीदने की बड़ी शौकीन थीं, हमारे दरवाजे पर से कोई फेरीवाला ऐसा न निकलता था जिससे वह कुछ-न-कुछ खरीद न लेती हों। सास की इस आदत की आज मैंने मुक्त हृदय से प्रशंसा की। यदि उन्हें सामान खरीदने का इतना शौक न होता तो शायद मैं इस कपड़े वाले (कुन्दन) को इतने समीप से न देख पाती। मुझे अपने पीछे देखकर वह हँसकर बोली, “बहू क्या लेना है, जो कुछ लेना हो अपने मन का पसंद कर लो ।” बेचारी सास कया जानती थीं कि कपड़ों से अधिक मुझे कपड़े वाला पसंद है। फिर भी उनके आग्रह से मैंने दो शांतिपुरी साड़ियाँ ले लीं; उन्होंने भी अपने लिए कुछ साड़ियाँ खरीदीं। उसे दाम देकर और कई तरह की साड़ियाँ लाने के लिए कहकर सास ने उसे विदा किया।

कुन्दन में बड़ा परिवर्तन था। अब वह बहुत दुबला और अधिक साँवला हो गया था। चेहरे पर वह लालिमा न थी, किंतु वही मनस्विता और ‘तेज’ टपक रहा था जो पहिले था। इस घटना को करीब एक महीना बीत गया। लगातार प्रतीक्षा करते रहने के बावजूद मैं कुन्दन को न देख सकी।

जेठ का महीना था, बगीचे का एक माली छुट्टी पर गया था। बूढ़ा माली एक मेहनती आदमी की तलाश में था। चार बजे तक घर में बंद रहकर, गर्मी के कारण घबराकर, मैं अपनी सास के साथ बगीचे में चली गई । वहीं बगीचे में मौलसिरी की घनी छाया में चबूतरे पर मैं सास के साथ बैठी थी। बार-बार यही सोचती थी कि कुन्दन कहाँ चला गया? कपड़ा लेकर फिर क्‍यों नहीं आया? बीमार तो नहीं पड़ गया? और अगर बीमार हो गया होगा, तो उसकी देखभाल कौन करता होगा? मेरी आँखों में आँसू आ गए। इसी समय पीछे से आकर बूढ़े माली ने कहा, “सरकार यह एक आदमी है जो माली का काम कर सकता है, हुकुम हो तो रख लिया जाए । मैंने मुड़कर देखा तो सहसा विश्वास न हुआ । कुन्दन! और माली का काम! मेरी बेसुध वेदना तड़प उठी। एक संपन्‍न परिवार का होनहार युवक दस रुपए माहवार की मालीगीरी करने आए! इतनी कड़ी तपस्या !! हे ईश्वर! क्या इस तपस्या का अंत न होगा?

दस रुपए माहवार पर कुन्दन बगीचे में माली का काम करने लगा। मैं देखती, कड़ी दोपहरी में भी वह दिन-दिन भर कुदाल चलाया करता, पानी सींचता और टोकरी भर-भर मिट्टी ढोता। उसका शरीर अब दिन-दिन दुबला और साँवला पड़ता जाता था। उसके स्वभाव में कितनी नवाबी थी, वह मेहनत के काम से कितना बचता था, मुझसे छिपा न था, किंतु अब वह कितना परिश्रम कर रहा है। मुझे चिंता रहती थी कि उसका सुकुमार शरीर इस कठिन परिश्रम को सह न सकेगा। मैं चाहती थी कि किसी प्रकार उसे रोक दूँ, यह काम वह छोड़ दे; परंतु कैसे रोकती, उससे बात करने की मुझे इजाजत ही कहाँ थी? पहिले की अपेक्षा अब मैं बगीचे में अधिक आने-जाने लगी। पहिले आने-जाने पर किसी ने ध्यान न दिया? किंतु कुछ ही दिनों बाद टीका-टिप्पणी होने लगी। बाद में रुकावट भी पड़ने लगी। जिसका परिणाम यह हुआ कि अब शाम-सुबह छोड़कर मैं प्रायः दोपहर को जाने लगी।

कुन्दन से दो मिनट बात करने का मैं अवसर खोजा करती थी, किंतु मेरे पीछे भी लोग जासूस की तरह रहते थे। मैं एकांत कभी न पाती और सबके सामने उससे बात करने का साहस न होता। कभी-कभी मैं उसके नजदीक भी पहुँच जाती तो भी वह मेरी ओर आँख उठाकर न देखता, मैं ही उसे देख लिया करती। अनेक बार जी चाहा कि आखिर कब तक ऐसा चलेगा, जाऊँ, उसकी कुदाल छीनकर फेंक दूँ और उसे अपने साथ लिवा लाऊँ, अब उसकी तपस्या आवश्यकता से अधिक हो चुकी है। उसे अब मेरे निकट रहकर मेरे स्नेह की शीतल छाया में विश्राम करना चाहिए।

उस दिन बड़ी गरमी थी। बंद कमरे में पंखा और खस की टट्टियों के भीतर से मैं उस गरमी का अंदाजा न लगा सकती थी। नींद नहीं आ रही थी, न जाने क्यों एक प्रकार की बेचैनी से मैं अत्यंत अस्थिर-सी थी। उठी, खिड़की खोलकर बाहर निकली । पंखा खींचने वाली दासी ने रोका। ‘बहू इतनी गरमी में भीतर से बाहर न जाओ लू लग जाएगी ।’ मैंने उसे हाथ के इशारे से चुप रहने के लिए कहा और बगीचे में पहुँची ।
कुन्दन की कुदाल रुक गई। कुदाल को जमीन पर रख एक तरफ फेंककर उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

मैंने कहा, “कुन्दन! तुम इतनी कड़ी तपस्या क्यों करते हो? तुम्हें इस प्रकार काम करते देखकर मुझे कष्ट नहीं होता? तुम्हारा शरीर इस मेहनत को सह सकेगा! तुम कहीं सुख से रहो तो मुझे भी शांति मिले। आखिर इस प्रकार जीवन को तपाने से क्या लाभ होगा? तुम तो मुझसे अधिक समझदार हो कुन्दन!”

सारी करुणा सिमटकर कुन्दन की आँखों में उतर आई | वह कुछ बोला नहीं, बोलता भी कैसे? उसी समय खाँसता हुआ बूढ़ा माली अपनी कोठरी से बाहर आया और फिर उसे कुदाल उठा लेनी पड़ी।

मेरा स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता जा रहा था। लोगों को संदेह था, शायद मुझे टी०बी० हो गई है। पतिदेव मुझे भुवाली भेजने की तैयारी कर रहे थे; किंतु वे क्‍या जानते थे कि भुवाली से भी अधिक स्वास्थ्य-लाभ मैं कुन्दन के समीप, केवल उसके सहवास से कर सकती हूँ। मेरी दवा तो कुन्दन है। भुवाली और शिमला मुझे वह स्वास्थ्य नहीं प्रदान कर सकते, जो मुझे कुन्दन से केवल स्वतंत्रतापूर्वक मिलने-जुलने से मिल सकता है। मैं उससे केवल स्वतंत्रता से बातचीत करना और मिलना-जुलना चाहती थी, और यह मेरे पतिदेव को स्वीकार न था।

नौकरों को वे मिट्टी के ठीकरों से भी गया-बीता समझते थे। दस रुपए माहवार देने के बाद समझते थे कि उन नौकरों की आत्मा और शरीर दोनों को उन्होंने खरीद लिया है। उनसे इतनी सख्ती से पेश आते कि नौकरों को उनके सामने पहुँचने में बड़े साहस से काम लेना पड़ता।

इधर कुन्दन से एक दिन खुलकर बातचीत करने के लिए रात-दिन मेरे मस्तिष्क और हृदय में युद्ध छिड़ा रहता; अब न मुझसे पढ़ा-लिखा जाता और न किसी काम में ही जी लगता। खाने-पीने की तरफ भी कुछ विशेष रुचि न रह गई थी। खाना देखते ही वे दिन याद आ जाते, जब मैं और कुन्दन एक ही थाली में बैठकर खाया करते थे। चाय सामने आते ही कुन्दन की याद आ जाती। मुझसे भी अधिक चाय का भक्त तो वही था। आज वह मेरे बगीचे में माली है, और मुझे इतनी भी स्वतंत्रता नहीं कि उससे एक-दो बात भी कर सकूँ, फिर उसके साथ बैठकर चाय पीने, और भोजन करने की बात तो बहुत दूर की रही।’

मैं रात-दिन इसी चिंता में घुली जाती थी। किंतु मेरी पीड़ा को कौन पहिचानता? अपने इस घर में तो मुझे सभी हृदयहीन जान पड़ते थे। एक दिन ऑफिस से लौटते ही पतिदेव ने मुझसे प्रश्न किया, “आखिर उस माली से तुम्हें क्या बातें करनी रहती हैं जो दोपहर को भी बगीचे में जाया करती हो। कितनी बार तुमसे कहा कि नौकरों से बातचीत करने की तुम्हें जरूरत नहीं है, पर तुम्हें मेरी बात याद रहे तब न! इस बात को भूल जाती हो कि तुम एक इंजीनियर की स्त्री हो, तुम्हें मेरी इज्जत का भी खयाल रखना चाहिए।’

मैं कुछ न बोली, बोलती भी क्या? मैंने चुप रहना ही उचित समझा। मुझे उससे क्या बातचीत करनी रहती है, मैं उन्हें क्या बतलाती? वह बतलाने की बात नहीं थी, समझने की बात थी, और उसे वही समझ सकता था जिसके पास हृदय हो। जिसके पास हृदय ही न हो, वह हृदय की बात क्‍या समझे?

मेरी इस चुप्पी का अर्थ उन्होंने चाहे जो लगाया हो, किंतु उनकी इस बाधा से मुझे बड़ी वेदना हुई । कुन्दन से दो-चार मिनट बात करके न तो मैं “उनका” कुछ बिगाड़ देती और न कुन्दन को ही कुछ दे देती, फिर भी कुन्दन से मिलने में उन्हें इतनी आपत्ति क्‍यों थी कौन जाने। चाहे जो हो, इस बाधा का परिणाम उलटा ही हुआ। ज्यों-ज्यों मुझे उसके समीप जाने से रोक गाया, त्यों-त्यों उसके पास पहुँचने के लिए मेरी उत्कंठा प्रबल होती गई।

गर्मी की रात थी। बगीचे में बेले इस प्रकार खिले थे जैसे आसमान में तारे फैले हों। मैं उन्हीं बेलों के पास संगमरमर की बेंच पर बैठी थी। कई दिन हो गए थे, कुन्दन बगीचे में काम करता हुआ न दिखा था, वह कहाँ गया? काम करने क्‍यों नहीं आता? यद्यपि यह जानने के लिए मैं अत्यंत अस्थिर थी, फिर भी किसी से कुछ पूछने का मुझमें साहस न था।

अत्यंत उद्विग्नता से मैं बगीचे में इधर-उधर टहलने लगी। टहलते-टहलते मैं मालियों के क्वार्टर की तरफ निकल गई। दूर से कुन्दन की कोठरी कई बार देखी थी। आज उस कोठरी के बहुत समीप पहुँच गई थी। कोठरी में प्रकाश तो न था, किंतु अंदर से कराहने की आवाज साफ-साफ सुनाई पड़ती थी। मैंने ध्यान से सुना, आवाज कुन्दन की थी। अब मैं बिलकुल भूल गई कि मैं किसी इंजीनियर की स्त्री हूँ और कुन्दन मेरा माली। तेजी से कदम बढ़ाकर मैं कोठरी में पहुँच गई। बिजली का बटन दबाते ही कोठरी में प्रकाश फैल गया, कुन्दन ने घबराकर आँखें खोल दीं, मुझे देखते ही इस बीमारी में भी उसकी आँखें चमक उठीं, और वह वही चमक थी, जिसे उसकी आँखों में मैंने एक बार नहीं, अनेक बार देखी थी। मैं उसी की चारपाई पर उसके सिरहाने बैठ गई।

तेज बुखार से उसका शरीर जल रहा था। मालूम हुआ कि उसे कई दिनों से बुखार आ रहा है, काम वह फिर भी बराबर करता है, इधर कई दिनों से वह बहुत अशक्त हो गया है और दो दिनों से छाती और पसलियों में अधिक दर्द होने के कारण वह कोठरी से बाहर नहीं निकल सका। उसकी अवस्था चिंताजनक थी। कुछ देर तक खाँसकर वह फिर बोला, हीना रानी, तुम आई तो हो, कोई तुम्हें कुछ कहेगा तो नहीं? पर अब तो आई ही हो, अपने हाथ से एक गिलास पानी पिला दो, बड़ी देर से प्यासा हूँ।’

मैंने मटकी से एक गिलास भर पानी उसे पिलाया और फिर बैठ गई। मैं उसके सिर पर हाथ फेरने लगी। रोकने पर भी मेरी आँखों से झड़ी रुकी नहीं, चलती रही। और गला रुँधा जा रहा था। प्रयत्न करने पर भी मैं कुन्दन से एक शब्द न कह सकी। कुन्दन ने अपने गरम-गरम हाथों को नीचे झुकाकर, मेरे पैरों को छू लिया और क्षीण स्वर में बोला, ‘हीना रानी, घर जाओ । तुम्हें कोई यहाँ देख लेगा तो नाहक तुम पर कोई विपत्ति न आ जाए? कहीं मेरा यह सुख भी न छिन जाए? तुम्हारे समीप इस हालत में भी रहकर मैं एक प्रकार का सुख पाता हूँ।

ठीक उसी समय पतिदेव ने कोठरी में प्रवेश किया। उन्होंने आग्नेय नेत्रों से मेरी तरफ देखा, फिर कुछ बोले, क्या बोले मैं कुछ समझी नहीं। मैं उसी प्रकार कुन्दन के सिर पर हाथ धरे बैठी रही। मेरी आत्मा ने कहा, मैंने कोई अपराध नहीं किया है, किसी बीमार की सेवा-सुश्रूषा करना मनुष्य मात्र का धर्म है। फिर मृत्यु की घड़ियों को गिनते हुए, उसकी नजरों में अपने एक आश्रित और अपनी आँखों में अपने एक बाल सखा को यदि मैंने एक घूँट पानी पिला दिया, तो क्या यह कोई अपराध कर डाला?

किंतु मैं उसी क्षण कोठरी छोड़ देने के लिए बाध्य कर दी गई। मैं ऊपर आई तो अवश्य, किंतु मेरी अवस्था पागलों की तरह हो गई थी; रह-रहकर कुन्दन की रुग्ण मुखाकृति मेरी आँखों के सामने फिरने लगी। बार-बार ऐसा मालूम होता कि कुन्दन एक घूँट पानी के लिए चिल्ला रहा है। पतिदेव सोए थे, मैं भी एक तरफ पड़ी थी। पर मेरी आंखों में नींद कहां? उठी और छज्जे पर बेचैनी से टहलने लगी। बंगले के पास ही बिजली के खंभे के नीचे मैंने कुछ सफेद-सफेद-सा देखा। अज्ञात आशंका से मैं सिहर उठी। ध्यान से देखा वह कुन्दन था। कदाचित्‌ जीवन की अंतिम साँसें गिन रहा था। उस समय न तो कुल की मान-प्रतिष्ठा का ध्यान रहा, न किसी के भय का; और न यहीं ध्यान रहा कि इतनी रात को लोग मुझे बाहर देखकर क्या कहेंगे।

चौकीदार मेरी आज्ञा का उल्लंघन कैसे करता? फाटक ख़ुलवाकर मैं बाहर निकल गई। पास पहुँचकर देखा, कुन्दन ही था। आह! वही अपने माता-पिता का दुलारा कुन्दन, अपने मित्रों का प्यारा कुन्दन, जिसका कुम्हलाया हुआ मुख देखकर कितने ही हृदय सहानुभूति से द्रवीभूत हो उठते थे, जिसके इंगित मात्र पर परिचालक वर्ग सेवा के लिए प्रस्तुत रहता था, आज वही कुन्दन जीवन के अंतिम समय में अकेला और असहाय, शून्य दृष्टि से आसमान की ओर देख रहा था। मुझे देखते ही जैसे उसमें कुछ शक्ति आ गई हो। वह क्षीण स्वर में बोल उठा, ‘हीना रानी, अच्छा हुआ जो तुम आ गईं। थोड़ा पानी पिला दो। मैं बहुत प्यासा हूँ।’ मैंने पानी के लिए चारों तरफ नजर दौड़ाई। थोड़ी दूर पर नल तो था, पर बरतन कोई न था। जिससे मैं उसे पानी पिलाती। सोचा घर तक जाऊँ, पर घर जाने का समय न था। नल पर से साड़ी का छोर भिगोकर लौटी, परंतु अब वह पानी माँगने वाला इस संसार में था ही कहाँ? बस मेरी या उसकी कहानी यही है।

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काव्य संसार

वीरों का कैसा हो वसंत- सुभद्रा कुमारी चौहान

अनुमानित समय : < 1 मिनट-

वीरों का कैसा हो वसंत?

आ रही हिमालय से पुकार

है उदधि गरजता बार-बार

प्राची-पश्चिम, भू नभ अपार.

सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत

वीरों का कैसा हो वसंत?

फूली सरसों ने दिया रंग

मधु लेकर आ पहुंचा अनंग

वसु-वसुधा पुलकित अंग-अंग

हैं वीर वेश में किंतु कंत

वीरों का कैसा हो वसंत?

गलबांही हो, या हो कृपाण

चल-चितवन हो, या धनुष-बाण

हो रस-विलास, या दलित त्राण

अब यही समस्या है दुरंत

वीरों का कैसा हो वसंत?

भर रही कोकिला इधर तान

मारू बाजे पर उधर गान

है रंग और रण का विधान

मिलने आए हैं आदि अंत

वीरों का कैसा हो वसंत?

कह दे अतीत अब मौन त्याग

लंके! तुझमें क्यों लगी आग

ऐ कुरुक्षेत्र ! अब जाग, जाग

बतला अपने अनुभव अनंत

वीरों का कैसा हो वसंत ?

हल्दीघाटी के शिलाखंड

ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड

राणा-ताना का कर घमंड

दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलंत

वीरों का कैसा हो वसंत?

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काव्य संसार

मेरा नया बचपन- सुभद्राकुमारी चौहान

अनुमानित समय : 2 मिनट-

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा ‘यह क्या लायी?’ बोल उठी वह ‘माँ, काओ’।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा – ‘तुम्हीं खाओ’॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

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काव्य संसार बाल कविताएँ बाल जगत

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी – सुभद्रा कुमारी चौहान

अनुमानित समय : 4 मिनट-

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़
महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झांसी में
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छायी झांसी में
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छायी
किंतु कालगति चुपके चुपके काली घटा घेर लायी
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भायी
रानी विधवा हुई, हाय विधि को भी नहीं दया आयी
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक समानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हर्षाया
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई बिरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट फिरंगी की माया
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों बात
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात
उदैपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी रोयीं रनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
बहिन छबीली ने रण चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी
यह स्वतंत्रता की चिन्गारी अंतरतम से आई थी
झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी बढ़ी कालपी आयी, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खायी रानी से हार
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी गयी सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुष नहीं अवतारी थी
हमको जीवित करने आयी, बन स्वतंत्रता नारी थी
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी
यह तेरा बलिदान जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी
होये चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

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यह कदम्ब का पेड़ -सुभद्रा कुमारी चौहान

अनुमानित समय : < 1 मिनट-

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मै भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
ले देती यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदम्ब की डाली

तुम्हे नहीं कुछ कहता, पर मै चुपके चुपके आता
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता
वही बैठ फिर बड़े मजे से मै बांसुरी बजाता
अम्मा-अम्मा कह बंसी के स्वर में तुम्हे बुलाता

सुन मेरी बंसी माँ, तुम कितना खुश हो जाती
मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आती
तुमको आती देख, बांसुरी रख मै चुप हो जाता
एक बार माँ कह, पत्तो में धीरे से छिप जाता

तुम हो चकित देखती, चारो ओर ना मुझको पाती
व्याकुल-सी हो तब कदम्ब के नीचे तक आ जाती
पत्तो का मरमर स्वर सुन, जब ऊपर आँख उठाती
मुझे देख ऊपर डाली पर, कितना घबरा जाती

गुस्सा होकर मुझे डांटती, कहती नीचे आ जा
पर जब मै ना उतरता, हंसकर कहती मून्ना राजा
नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्हे मिठाई दूंगी
नए खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी

मै हंसकर सबसे ऊपर की डाली पर चढ़ जाता
वही कही पत्तो में छिपकर, फिर बांसुरी बजाता
बुलाने पर भी जब मै ना उतारकर आता
माँ, तब माँ का ह्रदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता

तुम आँचल फैलाकर अम्मा, वही पेड़ के नीचे
ईश्वर से विनती करती, बैठी आँखे मीचे
तुम्हे ध्यान में लगी देख मै, धीरे-धीरे आता
और तुम्हारे आँचल के नीचे छिप जाता

तुब घबराकर आँख खोलती और माँ खुश हो जाती
इसी तरह खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मै भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे

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कहानियाँ प्रेमचंदोत्तर कथा साहित्य

हींगवाला- सुभद्राकुमारी चौहान

अनुमानित समय : 5 मिनट-
लगभग 35 साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया । हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी – अम्मा… हींग लोगी?”
पीठ पर बँधे हुए पीपे को खोलकर उसने, नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया । भीतर बरामदे से नौ – दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया – अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ !”

पर खान भला क्यों जाने लगा ? जरा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता हुआ बोला- अम्मा, हींग ले लो, अम्मां ! हम अपने देश जाता हैं, बहुत दिनों में लौटेगा ।”  सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली – हींग तो बहुत-सी ले रखी है खान ! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी ।”
वह उसी स्वर में फिर बोला-हेरा हींग है मां, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती है । एक ही तोला ले लो, पर लो जरूर ।इतना कहकर फौरन एक डिब्बा सावित्री के सामने सरकाते हुए कहा- तुम और कुछ मत देखो मां, यह हींग एक नंबर है, हम तुम्हें धोखा नहीं देगा ।
सावित्री बोली- पर हींग लेकर करूंगी क्या ढेर-सी तो रखी है ।खान ने कहा-कुछ भी ले लो अम्मां! हम देने के लिए आया है, घर में पड़ी रहेगी । हम अपने देश कूं जाता है । खुदा जाने, कब लौटेगा ?” और खान बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हींग तोलने लगा । इस पर सावित्री के बच्चे नाराज हुए । सभी बोल उठे-मत लेना मां, तुम कभी न लेना । जबरदस्ती तोले जा रहा है ।सावित्री ने किसी की बात का उत्तर न देकर, हींग की पुड़िया ले ली । पूछा-कितने पैसे हुए खान ?”

पैंतीस पैसे अम्मां!खान ने उत्तर दिया । सावित्री ने सात पैसे तोले के भाव से पांच तोले का दाम, पैंतीस पैसे लाकर खान को दे दिए । खान सलाम करके चला गया । पर बच्चों को मां की यह बात अच्छी न लगीं ।
बड़े लड़के ने कहा-मां, तुमने खान को वैसे ही पैंतीस पैसे दे दिए । हींग की कुछ जरूरत नहीं थी ।”  छोटा मां से चिढ़कर बोला-दो मां, पैंतीस पैसे हमको भी दो । हम बिना लिए न रहेंगे ।लड़की जिसकी उम्र आठ साल की थी, बड़े गंभीर स्वर में बोली-तुम मां से पैसा न मांगो । वह तुम्हें न देंगी । उनका बेटा वही खान है ।सावित्री को बच्चों की बातों पर हँसी आ रही थी । उसने अपनी हँसी दबाकर बनावटी क्रोध से कहा-चलो-चलो, बड़ी बातें बनाने लग गए हो । खाना तैयार है, खाओ ।
छोटा बोला- पहले पैसे दो । तुमने खान को दिए हैं ।
सावित्री ने कहा- खान ने पैसे के बदले में हींग दी है । तुम क्या दोगे?” छोटा बोला- मिट्टी देंगे ।” सावित्री हँस पड़ी- अच्छा चलो, पहले खाना खा लो, फिर मैं रुपया तुड़वाकर तीनों को पैसे दूंगी ।”
खाना खाते-खाते हिसाब लगाया । तीनों में बराबर पैसे कैसे बंटे ? छोटा कुछ पैसे कम लेने की बात पर बिगड़ पड़ा-कभी नहीं, मैं कम पैसे नहीं लूंगा!दोनों में मारपीट हो चुकी होती, यदि मुन्नी थोड़े कम पैसे स्वयं लेना स्वीकार न कर लेती । 
कई महीने बीत गए । सावित्री की सब हींग खत्म हो गई । इस बीच होली आई । होली के अवसर पर शहर में खासी मारपीट हो गई थी । सावित्री कभी- कभी सोचती, हींग वाला खान तो नहीं मार डाला गया? न जाने क्यों, उस हींग वाले खान की याद उसे प्राय: आ जाया करती थी । एक दिन सवेरे-सवेरे सावित्री उसी मौलसिरी के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठी कुछ बुन रही थी । उसने सुना, उसके पति किसी से कड़े स्वर में कह रहे हैं- क्या काम है ?’ भीतर मत जाओ । यहाँ आओ । ” उत्तर मिला-हींग है, हेरा हींग । और खान तब तक आंगन मैं सावित्री के सामने पहुँच चुका था । खान को देखते ही सावित्री ने कहा- बहुत दिनों में आए खान ! हींग तो कब की खत्म हो गई ।” 
खान बोला- अपने देश गया था अम्मां, परसों ही तो लौटा हूँ । सावित्री ने कहा- यहाँ तो बहुत जोरों का दंगा हो गया है ।”  खान बोला-सुना, समझ नहीं है लड़ने वालों में ।”
सावित्री बोली-खान, तुम हमारे घर चले आए । तुम्हें डर नहीं लगा ?”
दोनों कानों पर हाथ रखते हुए खान बोला-ऐसी बात मत करो अम्मां । बेटे को भी क्या मां से डर हुआ है, जो मुझे होता ?” और इसके बाद ही उसने अपना डिब्बा खोला और एक छटांक हींग तोलकर सावित्री को दे दी । रेजगारी दोनों में से किसी के पास नहीं थी । खान ने कहा कि वह पैसा फिर आकर ले जाएगा । सावित्री को सलाम करके वह चला गया ।
इस बार लोग दशहरा दूने उत्साह के साथ मनाने की तैयारी में थे । चार बजे शाम को मां काली का जुलूस निकलने वाला था ।  पुलिस का काफी प्रबंध था । सावित्री के बच्चों ने कहा- “हम भी काली का जुलूस देखने जाएंगे ।”
सावित्री के पति शहर से बाहर गए थे । सावित्री स्वभाव से भीरु थी । उसने बच्चों को पैसों का, खिलौनों का, सिनेमा का, न जाने कितने प्रलोभन दिए पर बच्चे न माने, सो न माने । नौकर रामू भी जुलूस देखने को बहुत उत्सुक हो रहा था । उसने कहा-  “भेज दो न मां जी, मैं अभी दिखाकर लिए आता हूँ ।”  लाचार होकर सावित्री को जुलूस देखने के लिए बच्चों को बाहर भेजना पड़ा । उसने बार-बार रामू को ताकीद की कि दिन रहते ही वह बच्चों को लेकर लौट आए ।
बच्चों को भेजने के साथ ही सावित्री लौटने की प्रतीक्षा करने लगी । देखते-ही-देखते दिन ढल चला । अंधेरा भी बढ़ने लगा, पर बच्चे न लौटे अब सावित्री को न भीतर चैन था, न बाहर । इतने में उसे -कुछ आदमी सड़क पर भागते हुए जान पड़े । वह दौड़कर बाहर आई, पूछा-ऐसे भागे क्यों जा रहे हो ? जुलूस तो निकल गया न ।”
एक आदमी बोला-दंगा हो गया जी, बडा भारी दंगा!सावित्री के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए । तभी कुछ लोग तेजी से आते हुए दिखे । सावित्री ने उन्हें भी रोका । उन्होंने भी कहा-दंगा हो गया है!
अब सावित्री क्या करे ? उन्हीं में से एक से कहा-भाई, तुम मेरे बच्चों की खबर ला दो । दो लड़के हैं, एक लड़की । मैं तुम्हें मुंह मांगा इनाम दूंगी ।एक देहाती ने जवाब दिया-क्या हम तुम्हारे बच्चों को पहचानते हैं मां जी ? ” यह कहकर वह चला गया ।
सावित्री सोचने लगी, सच तो है, इतनी भीड़ में भला कोई मेरे बच्चों को खोजे भी कैसे? पर अब वह भी करें, तो क्या करें? उसे रह-रहकर अपने पर क्रोध आ रहा था । आखिर उसने बच्चों को भेजा ही क्यों ? वे तो बच्चे ठहरे, जिद तो करते ही, पर भेजना उसके हाथ की बात थी । सावित्री पागल-सी हो गई । बच्चों की मंगल-कामना के लिए उसने सभी देवी-देवता मना डाले । शोरगुल बढ़कर शांत हो गया । रात के साथ-साथ नीरवता बढ़ चली । पर उसके बच्चे लौटकर न आए । सावित्री हताश हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी । उसी समय उसे वही चिरपरिचित स्वर सुनाई पड़ा- “अम्मा!
सावित्री दौड़कर बाहर आई उसने देखा, उसके तीनों बच्चे खान के साथ सकुशल लौट आए हैं । खान ने सावित्री को देखते ही कहा-वक्त अच्छा नहीं हैं अम्मां! बच्चों को ऐसी भीड़-भाड़ में बाहर न भेजा करो ।बच्चे दौड़कर मां से लिपट गए ।