संध्या के बाद – सुमित्रानंदन पंत May 20, 2018 जाड़ों की सूनी द्वाभा में झूल रही निशि छाया गहरी, डूब रहे निष्प्रभ विषाद में खेत, बाग़, गृह, तरु, तट, लहरी। बिरहा गाते गाड़ी वाले, भूँक भूँक कर लड़ते कूकर,