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भाई-बहन -सत्यवती मल्लिक

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“माँ जी!…हाय!माँ जी!…हाय!”
एक बार,दो बार,पर तीसरी बार,”हाय हाय!” की करुण पुकार सावित्री सहन न कर सकी।कार्बन पेपर और डिजाइन की कॉपी वहीं कुर्सी पर पटककर शीघ्र ही उसने बाथरूम के दरवाजे से बाहर खड़े कमल को गोद में उठा लिया और पुचकारते हुए कहा,”बच्चे सवेरे-सवेरे नहीं रोते।”
“तो निर्मला मेरा गाना क्यों गाती है,और उसने क्यों मेरी सारी कमीज छींटे डालकर गीली कर दी है?”
        स्नानागार में अभी तक पतली आवाज में निर्मला गुनगुना रही थी,”एक…लड़का….था….वह…रोता..रहता।”
“बड़ी दुष्ट लड़की है।नहाकर बाहर निकले तो सही,ऐसा पीटूँ कि वह भी जाने।”माँ से यह आश्वासन पाकर कमल कपड़े बदलने चला गया।
     न जाने कितनी मंगल कामनाओं,भावनाओं और आशीर्वादों को लेकर सावित्री ने अपने भाई के जन्म दिन पर उपहार भेजने के लिए एक श्वेत रेशमी कपड़े पर तितली का सुन्दर डिज़ाइन सोचा है।हलके नीले,सुनहरे और गहरे लाल रंग के रेशम के तारों के साथ-ही-साथ जाने कितनी मीठी स्मृतियाँ भी उसके अंतस्तल में उठ-उठ कर बिंधी-सी जा रही हैं और अनेक वन,पर्वत,नदी नाले तथा मैदान के पार दूर से एक मुखाकृति बार-बार नेत्रों के सम्मुख आकार उसके रोम-रोम को पुलकित कर रही है।
    कभी ऐसा भी लगने लगता है,मानो सामने दीवार पर लटकी हुई नरेंद्र की तसवीर हँसकर बोल उठेगी।सावित्री की आँखों में प्रेमाश्रु छलक उठे।तितली का एक पंख काढ़ा जा चूका है,किन्तु दूसरा आरंभ करने से पूर्व ही कमल की सिसकियों और आँसुओं ने सावित्री को वहाँ से उठने को विवश कर दिया।
      स्कूल की चीजों को बैग में डालते हुए निर्मला के निकट खड़े होकर सावित्री ने कड़ककर कहा,”निर्मला, तुझे शर्म नहीं आती क्या?इतनी बड़ी हो गयी है?इतनी बड़ी हो गयी है!कमल तुझसे पूरे चार वर्ष छोटा है।किसी चीज़ को उसे छूने तक नहीं देती।हर घड़ी वह बेचारा रोता रहता है।अगर उसने तेरे पेंसिल बॉक्स को तनिक देख लिया तो क्या हुआ?”
   निर्मला सिर नीचे किये मुस्करा रही थी।यह देखकर सावित्री का पारा और भी अधिक चढ़ गया।उसने ऊँचे स्वर में कहना शुरू किया-“रानी जी,बड़े होने पर पता चलेगा,जब इन्हीं दुर्लभ सूरतों को देखने के लिए भी तरसोगी।भाई-बहन सदा साथ-साथ नहीं रहते।”
          माँ को झिड़कियों ने बालिका के नन्हे मस्तिष्क को एक उलझन में डाल दिया।आश्चर्यान्वित हो वह केवल माँ के क्रुद्ध चेहरे की ओर स्थिर,गंभीर,कुतूहलपूर्ण दृष्टि डालकर रह गयी।
    करीब आधा घण्टा बाद किंचित उदास-सा मुख लिए निर्मला जब कमल को साथ लेकर स्कूल चली गयी,तब सावित्री को अपनी सारी वक्तृता सारहीन प्रतीत होने लगी।सहसा उसे याद आने लगी कुछ वर्ष पूर्व की बात।तब वह नरेंद्र से क्यों रूठ गयी थी।छिः!एक तुच्छ-सी बात पर…किन्तु  आज जो बात उसे तुच्छ जान पड़ती है,उन दिनों उसी तुच्छ निकृष्ट,ज़रा-सी बात ने इतना उग्र रूप क्यों धारण कर लिया था,जिसके कारण भाई-बहन ने आपस में पूरे एक महीने तक एक भी बात न की थी।एकाएक सावित्री के चेहरे पर हँसी प्रस्फुटित हो उठी, जब उसे स्मरण हो आया नरेंद्र का दिन रात नए-नए रिकार्ड लाकर ग्रामोफोन पर बजाना और एक दोस्त से दूरबीन माँगकर आते-जाते बहन के कमरे की ओर झाँकना कि किसी तरह उन दोनों चीज़ों का प्रभाव सावित्री पर पड़ रहा है या नहीं।उसे यह भी याद करके खूब हँसी आयी कि कैसे मौन धारण किये हुए मिठाई की तश्तरी नरेंद्र के कमरे में रख आती थी।
     टेबिल-क्लाथ पुनः हाथ में लेकर काढ़ते हुए सावित्री ने मन-ही-मन प्रतिज्ञा की कि अब से वह बच्चों को बिलकुल डाँट-फटकार नहीं बताएगी।किन्तु इधरे बारह बजे की आधी छुट्टी में खाने के समय फिर कई अभियोग कमल की ओर से मौजूद थे-“निर्मला मुझे अपने साथ-साथ नहीं चलने देती,पीछे छोड़ आती है और गधा कहती है।”
 मामला कुछ गंभीर न था।और दिन होता तो शायद निर्मला की इन शरारतों को सावित्री हँसी समझकर टाल देती,परंतु यह उद्दंड लड़की सवेरे से ही उसके प्रिय तथा आवश्यक कार्य में बार-बार बाधा डाल रही है।एक हलकी चपत निर्मल के लगाते हुए माँ ने डाँटकर कहा-“बस,कल ही तेरा नाम।स्कूल से कटवा दिया जाएगा।यह सब अंग्रेजी स्कूल की शिक्षा का ही नतीजा है।
  ज़रा-सी लड़की ने घर-भर में आफत मचा रखी है।अभी से भाई की शक्ल-सूरत नहीं भाती;बड़ी होने पर न जाने क्या करेगी।”
  फिर थाली में पूरी-तरकारी डालकर बच्चों के आगे रखते हुए ज़रा धीमे स्वर में कहा-“देखो निर्मला, जब मैं तुम्हारे बराबर की थी,तो अपने भाई-बहनों को कभी तंग नहीं करती थी;कभी अपने माता पिता को दुख नहीं देती थी।”किन्तु यह बात कहते हुए ही भीतर सावित्री को कुछ झिड़क-सी हो आई।
    “हम दोनों सीता के घर जुलूस देखेंगे माँ, अच्छा!” कमल ने विनम्र स्वर में अनुमति चाही।
   “नहीं जी,क्या अपने घर से दिखाई नहीं पड़ता।” दरवाजे की ओट में निर्मला खड़ी थी।”कैसी चालाक लड़की है।इस गरीब को आगे करती है,जब खुद कुछ कहना होता है।”  “जाओ,जाना हो तो।”सावित्री ने झुँझलाकर उत्तर दिया।
      पाँच बजे मुहर्रम का जुलूस निकालने वाला था।पलभर में चौराहे पर सैकड़ों मनुष्यों की भीड़ इकट्ठी हो गयी।सावित्री का ध्यान कभी काले-हरे रंग-बिरंगे वस्त्र पहने जनसमूह की ओर और कभी जुलूस के कारण रुकी हुई मोटर-गाड़ियों में बैठे व्यक्तियों की ओर अनायास ही खिंच रहा था।और इधर बालिका निर्मला के होश-हवास एकाएक गुम-से हो गए,जब उसे सारे घर में कमल की परछाई तक नज़र न आयी।व्याकुल सी हो वह एक कमरे से दूसरे में और फिर बरामदे में पंखहीन पक्षी की नाईं फड़फड़ाती हुई दौड़ने लगी।उसकी आँखों के आगे अँधेरा-सा छा गया।उसे सबकुछ सुनसान-सा प्रतीत होने लगा।वह माँ से कई बार  छोटे बच्चों के भीड़-भाड़ में खो जाने का हाल सुन चुकी थी।आह….उसका भैया…कमल…वह क्या करे।
     नीचे की सड़क पर भाँति-भाँति के रंग-बिरंगे खिलौने,नए-नए ढंग के गुब्बारे,कागज के पंखे,पतंग और भिन्न-भिन्न प्रकार के सुर निकलते हुए बाजे लाकर बेचने वालों ने बलजगत के प्रति एक सम्मोहन जाल-सा बिछा रखा है।निर्मला जन सब चित्ताकर्षक चीजों को बिना देखे-सुने ही भीड़-भाड़ को चीरती हुई वेगपूर्वक भागती-भागती सीता के घर भी हो आई,पर कमल तो वहाँ भी नहीं है।रोते-रोते निर्मला की आँखें सूज आईं,चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ गया।आख़िर वह हिचकियाँ लेते हुए रुँधे गले से माँ के पास जाकर बोली-“कमल…कमल तो सीता के घर भी नहीं है।”
    सावित्री का तन-बदन एक बार सहसा काँप उठा।क्षणभर में भीड़,मोटर और गाड़ियों के भय से अनिष्ट आशंकाएँ उसकी आँखों के आगे घूम-सी गईं,किन्तु वह अपने भीरु लड़के की नस-नस से परिचित थी।उसे पूरा विश्वास था कि कमल ज़रूर ही कहीं-न-कहीं किसी दुकान पर खड़ा होकर अथवा किसी नौकर के साथ जुलूस देख रहा होगा;फिर भी उसने फूट-फूटकर रोती हुई निर्मला को हृदय से नहीं लगाया और न उसे धीरज ही बँधाया बल्कि आश्चर्यचकित-सी हो,आश्वासन का एक शब्द कहे बिना मानो वह अपनी लड़की की रुलाई को समझने का प्रयत्न कर रही थी।रह-रहकर एक संदेह-सा उसके मन में उठने लगा-“मुझसे भी अधिक,भला माँ के दिल से भी ज्यादा किसी और को दर्द चिंता हो सकती है?”
    जुलूस समाप्त हो गया।क्रमशः दर्शकों के झुण्ड भी छिन्न-भिन्न होने लगे।मोटर-गाड़ियों का धड़ाधड़ आना-जाना पूर्ववत जारी हो गया और सामने ही फुटपाथ पर सफ़ेद निकर और सफ़ेद कमीज़ पहने पड़ोसी डॉक्टर साहब के नौकर के हाथ में हाथ लटकाए कमल किशोर घर आता हुआ दिखाई दिया।सीढ़ियों में से फिर सिसकने की आवाज़ सुनकर सावित्री तो मन्त्र-मुग्ध सी रह गयी।कमल को दृष्टि-पाश में बाँधे निर्मला दुगुने वेग से रो रही है।उसके कोमल गुलाबी गाल मोटे-मोटे आँसुओं से भीगे जा रहे हैं और वह बार-बार कमल का मुख चूम-चूमकर कह रही है-“पगले!तू कहाँ चला गया था?तू क्यों चला गया था?”
 सावित्री का हृदय उमड़ आया;पुनीत प्रेम के इस दृश्य को देखकर एक आनंद की धारा उसके अंतस्तल में बहने लगी।झरते हुए आँसुओं के साथ उसने कमल की जगह निर्मला को छाती से लगा कर उसका मुँह चूम लिया और कहा-“बेटा, बहन को प्यार करो।देखो वह तुम्हारी ख़ातिर कितना रोई है।तुम बिना कहे क्यों चले जाते हो?”
    निर्मला का इतना आदर होते देखकर कमल बोल उठा-“तो मैं क्या वहां नहीं रोया था!”
  “तुम क्यों रोये थे जी?”-माँ ने कुतूहलवश पूछा।
“मुझे गुब्बारा लेना था,पैसा नहीं था।”
निर्मला ने दौड़कर अपनी जमा की हुई चवन्नी के पैसों में से दो गुब्बारे और दो कागज के खिलौने कमल को लाकर दिए और फिर उसे भुजाओं में जकड़कर कहा-“गधे!तू क्यों चला गया था?”
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chandan kumar

कहानी ठीक ठाक है।

आनंद कुमार सिंह

हृदयस्पर्शी। ऐसी कहानियां हमारी संवेदनाओं को आज भी जिंदा रखने का काम करती हैं।

विक्की

???????????

Paramjit

बहुत ही मार्मिक कहानी। बहनों की याद आ गई । बचपना याद आ गया ☺☺??