Skip to content

नंदी की चोरी -पहले स्थान पर चयनित हल

0 0 votes
Article Rating

अनिल शर्मा की बात सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। सभी अवाक रह गये। किसी के मुंह से कोई बात नहीं निकल रही थी।
धर्मपाल ने चौंक कर अनिल शर्मा को देखा और बोला, ‘क्या साहब, क्या कह रहे हैं, आपको चोर का पता भी चल गया?‘
‘हां बिल्कुल, यूं ही हमारा नाम अनिल शर्मा थोड़े ही है। आज तुझे भी पता चलेगा कि तेरे साहब का दिमाग कितना जोर चलता है।’
‘तो सर बताइये न’ धर्मपाल ने कहा। यह सुनकर अनिल शर्मा मुस्कुराया। अब तक उससे तू-तड़ाक की भाषा और कभी-कभार साहब कहकर संबोधित करने वाला धर्मपाल अब उसे सर कह रहा था।
लेकिन तबतक देबीप्रसाद परिदा बोल उठा, ‘अरे साहब अगर आपको पता है कि चोर कौन है और मेरी नंदी कहां है तो बताइये न। इतनी घनघोर बारिश में हम सभी का वक्त क्यों खराब कर रहे हैं?’
अनिल शर्मा तत्काल गंभीर हुआ, ‘ घनघोर बारिश? जी हां बारिश। देबीप्रसाद जी, इस बारिश ने ही आपकी नंदी का पता बताया है। आपको पता नहीं कि ये बारिश आपके कितने काम आई है। वरना चोर ने इतनी शातिर चाल चली थी कि उसे कामयाबी जरूर मिलती। भला हो दिल्ली की बारिश का, सॉरी, घनघोर बारिश का।’
तबतक रेस्तरां का मैनेजर, राजेश मखीजा और मालविका परिदा अपने-अपने अचंभे से बाहर आ गये थे। मालविका ने कहा, ‘ सर तो बताइये न कहां है नंदी, कौन है चोर?’
अनिल शर्मा ने कहा, ‘ मैडम चोर वो है जिसके पास चोरी का मौका और उद्देश्य था। बारिश की वजह से जो हालात पैदा हुए उस स्थिति में कोई और चोर हो ही नहीं सकता था।’
‘हां तो कौन है चोर, बताइये न’, मालविका अधैर्य हो रही थी।
‘अरे मैडम आप ये पूछ रही हैं। आपको तो अच्छी तरह पता होना चाहिए’ अनिल शर्मा ने मजे लेते हुए कहा।
‘मुझे क्यों’, मालविका की आवाज तेज हो गयी थी।
‘क्योंकि चोरी का पता तो सबसे पहले चोर को होता है न। है कि नहीं’ दार्शनिक के अंदाज में अनिल शर्मा ने कहा।
‘क्या कह रहे आप’ मालविका चिल्लाई। ‘ आप मुझे चोर कह रहे हैं। आप पागल तो नहीं हो गये। अपने ही घर में मैं भला क्यों चोरी करूंगी।’
‘ पैसा। पैसा ही वह वजह है जिसके लिए दुनिया भर में सबसे ज्यादा क्राइम होते हैं। आपने बीमे की रकम के लिए के लिए इस चोरी को अंजाम दिया। लेकिन आपको ये मुगालता हो गया था कि हम पुलिसवाले बेवकूफ हैं और आप आसानी से अपनी करतूत से लाभ हासिल कर लेंगी।’
देबीप्रसाद ने कहा, ‘ मिस्टर आप मेरे ही घर में मेरी ही बीवी को चोर ठहरा रहे हैं। आखिर आप कैसे कह सकते हैं कि नंदी की चोरी मालविका ने की है।’
‘बिल्कुल आसानी से, देखिये, नंदी की मूर्ति आपके घर में आपकी आलमारी में रखी थी। मूसलाधार बारिश के बीच राजेश मखीजा चाइनीज खाना लेकर आया। इसके बाद राजेश चला जाता है। मालविका कहती है कि फिल्म देखकर वह ड्राइंगरूम में आई और दरवाजा खुला देखा, फिर उसने आलमारी चेक की और एक मूर्ति, नंदी की मूर्ति, को गायब पाया।‘
‘तो क्या खराबी है इस बयान में?’ देबीप्रसाद ने कहा।
‘खराबी तो कुछ नहीं बस एक गलती हो गयी कि बारिश हो गयी। दरअसल इस मूसलाधार बारिश में जब हम घर में आये तो हमारे कमरे में घुसने से पहले घर बिल्कुल साफ-सुथरा था। हमारे घुसने पर ही हमारे जूते, रेनकोट वगैरह से घर में पानी-कीचड़ वगैरह से निशान बने। लेकिन ऐसे निशान तो हमारे आने से पहले तो बिल्कुल नहीं थे। घर बिल्कुल साफ था। यानी बाहर का कोई आदमी घर में प्रवेश कर ही नहीं सकता। या तो व्हीलचेयर पर बैठे आपने, मिस्टर देबीप्रसाद, आपने चोरी की या फिर चल फिर सकने लायक आपकी पत्नी ने।’
‘ये भी तो हो सकता है कि दरवाजा सचमुच खुला था, बाहर के किसी आदमी ने न सही, हमारी बिल्डिंग के किसी आदमी ने चोरी की, जो भीगा न हो।’ देबीप्रसाद का बीवी को बचाना जारी था।
‘जी वो संभावना तो मालविका जी ने पहले ही खारिज कर दी। उन्होंने कहा है कि दुनिया में किसी तीसरे से उनका कोई संबंध ही नहीं था। मूर्तियों के कीमती होने की बात केवल इसके जानकार ही जान सकते हैं। यानी किसी जानकार ने चोरी की। लेकिन जानकार ने सबसे कीमती नटराज की मूर्ति नहीं चुरायी जिससे उसे और अधिक पैसे मिलते। क्योंकि नटराज की मूर्ति का बीमा नहीं था। उसने चुरायी तो केवल वह मूर्ति जिसका बीमा 30 करोड़ रुपये का था।’
तबतक थाने से इंस्पेक्टर लाव-लश्कर के साथ फ्लैट में पहुंच चुका था। कुछ ही देर में उसने अनिल शर्मा से सारी जानकारी हासिल कर ली। मालविका सिर झुकाकर कुर्सी पर बैठ गयी थी। देबीप्रसाद की उम्र कुछ ही देर में मानों कई साल बढ़ गयी थी।’
धर्मपाल झिझकता हुआ अनिल शर्मा के पास जाकर फुसफुसाया, ‘लेकिन साहब मालविका ने ये ड्रामा क्यों रचा। पैसे के लिए वो मूर्तियां बेच भी सकती थी।’
‘भाई वो जानती थी कि देबीप्रसाद कभी भी मूर्तियों को बेचने के लिए राजी नहीं होगा। मूर्तियां ही बेचनी रहती तो ऐसी हालत में वो रहता ही क्यों, पहले ही न बेच देता। ’
‘लेकिन मालविका नटराज की मूर्ति भी चुरा सकती थी। उसे बेचती तो काफी पैसे मिलते’
‘ अरे इतनी कीमती मूर्ति बेचना हंसी-खेल नहीं। इसके लिए बड़े अपराधियों, अंडरवर्ल्ड, तस्करों आदि से संबंध होना जरूरी है। मालविका कैसे करती ये सब। उसने आसान रास्ता चुना। मूर्ति गायब करके बीमे की रकम हासिल करना और अपनी आर्थिक दुश्वारियों से निजात पाना।’
‘लेकिन साहब अब क्या होगा? मालविका क्या गिरफ्तार होगी?’
‘पता नहीं, शायद देबीप्रसाद अपनी शिकायत वापस ले लें। शायद गिरफ्तार हो भी जाये मालविका। लेकिन हमलोगों को इससे क्या। हमारी ड्यूटी तो खत्म हो गयी। अब चलो भाई काफी देर हो गयी। बाकी का काम थानेवाले संभाल ही लेंगे। चौरसिया की दुकान पर चलते हैं। इतनी रात गये कश का इंतजाम तो वही भला आदमी कर सकता है।’
‘जी साहब, सही कहा’ धर्मपाल ने अदब से कहा।
दोनों इंस्पेक्टर से विदा लेकर लिफ्ट की ओर बढ़ गये।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
सभी टिप्पणियाँ देखें