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उसने अपनी छोटी- छोटी आंखें खोलीं । सामने मम्मी-पापा खड़े थे । उनको देखकर उसके चेहरे के भावों में कोई परिवर्तन नहीं आया । मानो कुछ ना हुआ हो । कुछ ना देखा हो । अगर कुछ देखा भी तो महत्वहीन । तभी बेड के किनारे खड़ी दादी पर उसकी नजर पड़ी। उनको देखते ही वह चिल्लाई, “दिद्दा दिद्दा, चुट्टू लग गयी । मम्मी ने मारा ।” अचानक मनीष और रंजना की नजरें मिलीं । दरवाजे की तरफ गईं और फिर नीचे झुक गईं । यह दृश्य आज के समाज की परिभाषा गढ़ता है । परिस्थितियों की भी, समय की भी और व्यक्ति की स्वयं से बड़ी हो चुकी महत्वकांक्षाओं की भी । दो  मिनट के वक्फ़े ने ही मनीष और रंजना को झकझोर कर रख दिया । मानो उस दिन रिती घायल हुई थी । आज मनीष और रंजना दोनों द्रवित हो गए, रिती की एक निगाह से ही । वर्तमान क्षण से पहले जब भी रंजना सोचती थी, स्वयं से पूछती थी कि क्या उस दिन का उसका निर्णय सही था ? तो अचानक से उसकी आँखों के आगे गहरा काला पर्दा आ जाता था । वो निर्णय नहीं कर पाती थी । उसको लगता था कि बहुत पास पहुँच गयी है निर्णय के पर फिर वहाँ से कोई डोर, कोई लालच उसको वापस खींच लाता था । पर आज मानो उसके सारे संशय मिट गए । सभी कुछ एकदम साफ हो गया । साथ ही साफ हो गयी उसकी आगे की जीवन राह भी ।

रिती, हां रिती ही है उसका नाम । उम्र 3 साल और 4 महीने । मनीष और रंजना की इकलौती संतान । मनीष और रंजना ने लव मैरिज की थी । दोनों ही प्राईवेट बैंक में उच्च पद पर कार्यरत थे । वहीं दोनों पहली बार मिले ।  फिर लगभग 2 साल की कोर्टशिप और फिर शादी । शादी के बाद शुरु-शुरु में तो सब कुछ अच्छा रहा । दोनों ही अच्छे पद पर कार्यरत थे । दोनों ही दिल खोलकर खर्च करने वाले । 2 साल तक दोनों खूब घूमे, मौज मस्ती की । दरअसल मनीष का मानना था कि ज़िंदगी में जो भी करो प्लान करके करो “वी हैव टू गिव द वे, प्लानिंग और मैस, अवर चॉइस” यही मनीष के जीवन जीने का फलसफा था । वहीं रंजना इसके बिल्कुल उलट । उसका मानना था, जब जीवन में बहुत कुछ हमारे हाथ में नहीं है तो प्लानिंग का क्या फायदा । उसका मानना था कि जीवन पानी के जहाज की तरह नहीं है जिसकी दिशा कप्तान निर्धारित करेगा । वरन जीवन तो लहरों पे डोलती हुई एक कश्ती के समान है । जिसमें कहाँ जाना है लहरें निर्धारित करेंगी । हालांकि चप्पू तो हमारे हाथ में है पर आखिर कश्ती की किस्मत तो लहरों की मौज पर ही निर्भर है । परिवार आगे बढ़ाने के मामले में मनीष की ही चली । 2 साल बाद  मनीष ने निर्णय लिया कि अब हमको परिवार बढ़ाना चाहिए, इसी के परिणामस्वरुप रिती का जन्म हुआ । रिती के जन्म के समय रंजना को 6 महीने का मात्रत्व अवकाश मिल गया था । दोनों ही प्रथम मातृत्व पितृत्व सुख का आनंद लेते रहे । 6 महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला। 6 महीने बाद रंजना ने अपनी छुट्टी को 3 महीने के लिए और बढ़ाने की अर्जी मनीष से ऑफिस में भिजवाई । उसको पूरा विश्वास था कि उसकी अनेक वर्षों की संस्था के प्रति समर्पित कार्यनिष्ठा व मेहनत की वजह से उसको आसानी से 3 महीने की छुट्टी मिल जाएगी पर उसी शाम को रंजना का फोन बजा ।

रंजना – “हैलो ।”

फोन पर- “हैलो रंजना मैं ए.जी.एम कृपलानी बोल रहा हूं ।”

रंजना- “जी सर,गुड इवनिंग,कैसे हैं आप ?”

फोन पर- “मैं ठीक हूँ रंजना एंड आइ होप तुम भी ठीक ही होगी । लेकिन यह क्या है तुम्हारे पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए हम लोगों ने तुमको 6 महीने की छुट्टी में 1 दिन भी ऑफिस नहीं बुलाया । पर लगता है तुम इसका गलत फायदा उठा रही हो। आज तुमने फिर छुट्टी की एप्लीकेशन भिजवा दी । इट्स नॉट एक्सैप्टेबिल एट ऑल । तुम कल ही ऑफिस ज्वाइन करो ।”

रंजना- “बट सर अभी मेरी बेटी बहुत छोटी है । शी रियली नीड्स मी । सर प्लीज  मुझे एक बार 3 महीने की छुट्टी दे दीजिए । उसके बाद मैं इस फाइनेंसियल ईयर के बचे हुए तीन महीनों में ही 6 महीने के बराबर का बिज़नेस ला कर दिखा दूंगी ।”

फोन पर- “आर यू जोकिंग ऑर वॉट रंजना ? सुनो संस्था किसी के पारिवारिक सरोकारों से नहीं चलती है । पर्सनल एंड से मैं तुम्हारे लिए जितना कर सकता था, वह कर चुका हूं। अब तुम कल ज्वाइन कर लो, अदरवॉइस आई विल टेक स्टर्न एक्शन अगेंस्ट यू और वैसे भी दिस वाज योर पीक टाइम । कैरियर के इतने गोल्डन पीरियड में तुमने ऐसा डिसीजन कैसे ले लिया बच्चा पैदा करने का ? आई डोंट थिंक इट्स ए वाइज़ डिसीजन, एनीवे कल तुम ऑफिस ज्वाइन करो ।”

रंजना-“ सर …  ।”

लाइन कट गयी । रंजना का चेहरा गुस्से से लाल हो गया । मन किया कि अभी फिर से फोन लगाए और खूब खरी-खोटी सुनाये ए. जी. एम. को । आखिर वो कौन होता है उसके घरेलू फैसलों पर बोलने वाला ? उसके आत्म – सम्मान , निजता और सबसे बड़ी बात उसकी कोख पर हमला बोलने वाला । पर इस तरह के फैसलों के लिए बहुत बड़ी जिजीविषा, समर्थता और साहस की जरूरत होती है और रंजना अपने अंदर इतना साहस नहीं जुटा पायी ।

शाम को रंजना ने पूरी स्थिति मनीष को बताई ।

रंजना- “आप मेरी एप्लीकेशन ऑफिस मे दे आए थे ।”

मनीष- “हां दे आया था क्या हुआ ?”

रंजना- “आज मेरे पास ए.जी.एम कृपलानी साहब का फोन आया था । छुट्टी मंजूर नहीं हुई है । कल से जॉइन करने को आदेश दिया है ।”

मनीष- “अरे फिर क्या किया जाए ? तुम ऐसा करो एक बार फिर से रिक्वेस्ट करके देख

लो ।”

रंजना – “नहीं ।, मुझे मालूम है अब रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नहीं होगी। अगर तुम कहो तो लीव विद आउट पे ले लूं ।”

मनीष- “ओफ्फो रंजना, तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो ? मकान की ई॰ एम॰ आई॰  देने के बाद मेरी सैलरी से बचता ही क्या है ? और फिर वी हैव टू प्लान फॉर द फ्यूचर ऑफ अवर डॉटर ।”

रंजना (चिढ़कर)- “फिर क्या करें तुम ही कुछ सजेस्ट करो ?”

मनीष- “कल तुम ऑफिस ज्वाइन कर लो । मैं कल की छुट्टी ले लेता हूं और मेड के बारे में पता करता हूं ।”

रंजना- “ठीक है ।”

अगले दिन शाम तक मनीष ने भारी भाग – दौड़  करके एक मेड को ढूंढ निकाला । इस मामले में मनीष की किस्मत भी अच्छी रही । उसका एक फ्रेंड हाल ही में नोएडा शिफ्ट हुआ था, उसने अपनी मेड, श्यामला, के बारे में मनीष को बताया । मनीष ने मेड से बात करके मामला सैटल कर लिया ।

अगले दिन से मनीष और रंजना दोनों ऑफिस जाने लगे । मेड सुबह 8:45 पर आ जाती थी । रंजना अपने लिए और मनीष के लिए खाना तैयार करती और रिती का दूध बनाती । श्यामला अपना खाना साथ ही लेकर आती थी । सुबह जब रंजना ऑफिस के लिए निकलती तो रिती रोने लगती तब श्यामला उसे आहिस्ता से उठाकर दूसरे कमरे में ले जाती। रंजना भी अपने आँसू पोछती हुई ऑफिस चली जाती । मनीष के लिए सब नॉर्मल हो गया । मानो रिती के लिए मेड रखकर वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गया था । लगभग 6 महीने तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा । एक दिन रंजना को किसी मीटिंग के सिलसिले में अपने फ्लैट के पास ही आना था । उसका मन नहीं माना सोचा चलो रिती से मिलती चलूँ । फ्लैट की एक चाबी उसके पास रहती थी सो वह सीधा ताला खोल कर ड्राइंग रूम में पहुंच गई । देखती है कि रिती का पैर सोफे से बंधा हुआ है । पास ही खाली दूध की बोतल रखी हुई है । रिती शांत नजरों से दरवाजे को देख रही थी । रंजना के आने पर भी उसके चेहरे के भाव परिवर्तित नहीं हुए, मानो यकीन ना हुआ हो कि मां आ गई है । मेड शायद बेडरूम में थी । टीवी चलने की आवाज़ आ रही थी । रंजना का मन तो किया कि अभी मेड को बुलाकर खरी खोटी सुनाऊँ । उसके कदम स्वतः ही बेडरूम के दरवाजे की तरफ बढ़े पर तभी उसके पर्स से एक लेटर निकल कर गिर पड़ा । रंजना उसको उठाने के लिए झुकी । तभी उसको तुरंत ध्यान आया कि मनीष ने कितनी मेहनत से मेड को  ढूंढा था । आजकल बड़े शहरों में कोई मेड मिलती कहां है । मिलती भी है तो 10:00 से 6:00 बजे के लिए, उसकी जरूरत थी सुबह 9:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक की । नई मेड मिलने में कम से कम 7 दिन का टाइम लग जाएगा और फिर यह मार्च का महीना था । उसका अप्रेजल भी इसी महीने होना था । इस साल उसका प्रमोशन भी ड्यू था । दो-तीन दिन की छुट्टी भी वो अफोर्ड नहीं कर सकती है । इसी उधेड़बुन में रंजना फंसी हुई थी । उसको दोनों में से किसी एक का चुनाव करना था । उसने आहिस्ता से चुनाव किया । चुपचाप वापस लौटी, दरवाजा जस का तस बंद कर दिया । तभी शायद रिती को कुछ समझ आया कि मां आई थी । वो बंद होते दरवाजे से चिल्लाई-“ मम्मा मम्मा” । पर तब तक रंजना जा चुकी थी ।

रंजना के पर्स से गिरा कागज दरअसल अप्रेजल इंटरव्यू के लिए बुलावा पत्र था । रंजना आज अपने उसी निर्णय के लिए पछता  रही थी । दरअसल कभी- कभी हम अपनी महत्वकांक्षाओं को अपने जीवन में इतना महत्व दे देते हैं कि फिर चाह कर भी उनसे पीछा नहीं छुटा पाते । कुछ झूठी मारीचिकाओं  में इतना फंस जाते हैं कि समझ ही नहीं पाते कि हमारा वर्तमान कदम हमारी आगे की ज़िंदगी को कितना प्रभावित करेगा । हम खो देते हैं वर्तमान में हमारे सम्मुख मौजूद छोटी- छोटी खुशियों को भविष्य के नामालूम बड़े- बड़े सपनों के लिए । कुछ ऐसा ही रंजना के साथ हुआ ।

शाम को उसने पूरी घटना मनीष को बताई । उसको उम्मीद थी कि मनीष यह सब सुनकर बहुत गुस्सा करेगा पर उसकी उम्मीद के विपरीत वार्तालाप रहा ।

मनीष- “तुमने एकदम सही निर्णय लिया । वह तो एन टाइम पर मेरा एक फ्रेंड नोएडा शिफ्ट कर रहा था तो हमें मेड इतनी आसानी से मिल गई । अन्यथा बड़ी मुश्किल हो जाती । आखिर हम जो भी करते हैं, जो भी सहते हैं, है तो रिती के भविष्य के लिए ही ना ।”

रंजना ने मन ही मन में सोचा- यह कैसा भविष्य है ? भविष्य तो तब अच्छा होगा जब हम उसको अच्छा वर्तमान दे पाएंगे । जो संस्कार रिती को अपनी मां से मिलते क्या वह मेड दे पाएगी ?

रंजना – “ठीक है लेकिन तुम इस बात को अपने दिमाग में रखो, कोई नई मेड मिलते ही इसकी छुट्टी कर देंगे ।”

मनीष – “ओके, मैं कल से ही नई मेड को ढूँढता हूँ । बट यू नो दिस इज़ नॉट सो ईज़ी नॉउ ए डेज़ ।”

यह कहकर दोनों सो गए । बात आई गई हो गई । लेकिन कहीं ना कहीं यह घटना रंजना के दिलो दिमाग पर बसी रही । रिती की दादी के आते ही उसने मेड को डिसमिस कर दिया । जब भी दादी आती रिती को भी जैसे एक नई दुनिया मिल जाती । चीचो मिल जाती, गार्ड अंकल मिल जाते । दादी के आते ही उसको फ्लैट से नीचे जाने का मौका मिलता वरना तो पूरे दिन सुबह से शाम तक फ्लैट में ही बंद रहती । रिती के ढाई साल का हो जाने तक मनीष और रंजना दोनों का ही प्रमोशन हो चुका था । दोनों और ज्यादा  बिजी हो चुके थे । निर्णय लिया गया कि रिती को किसी क्रैश में डाला जाए । मनीष और रंजना ने काफी ढूंढा पर पूरे शहर में कोई ऐसा क्रैश नहीं मिला जहां सुबह 8:00 बजे से लेकर शाम 8:00 बजे तक रिती  को रख सकें । आखिर में काफी चिरौरी  करने पर और मुद्रा खर्च करने के बाद शहर के एक दूसरे कोने पर स्थित मिसेज चेचवानी अपने क्रैश में रिती को शाम तक रखने को तैयार हुई । मनीष और रंजना की व्यस्तता और बढ़ गई । सुबह रंजना को 6:00 बजे उठना पड़ता, 8:00 बजे तक मनीष रिती को लेकर क्रैश में छोड़ने चला जाता और वहीं से अपने ऑफिस निकल जाता । रंजना भी 8:30 बजे तक ऑफिस के लिए निकल जाती । मनीष शाम को 9:00 बजे तक रिती को लेकर घर आता । तब दोनों इतना थक चुके होते कि सिर्फ खाना खाते और सोने चले जाते । उनकी दिनचर्या पूरी तरह से मशीनी हो चुकी थी । क्रैश  में रिती को भी काफी दोस्त मिल गए थे । दिनभर तो वह खेलती रहती पर शाम को 5:00 बजे के बाद फिर वह अकेली रह जाती थी । मिसेज चेचवानी का घर पहले तल पर था । वो शाम को हॉल में लाइट जलाकर रिती को छोड़ देती । ऐसे में रिती को डर लगता । वह एक किनारे खिलौनों में दुबकी रहती । जब तक कि पापा आकर उसको आजाद नहीं करवाते । इसी बीच अगर मिसेज चेचवानी को डायपर चेंज करना पड़ता तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता । ऐसे ही एक शाम को  मनीष क्रैश के सामने पहुंचा तो मिसेज चेचवानी ने उसको अंदर बुला लिया ।

मिसेज चेचवानी – “मि॰ मनीष प्लीज पार्क योर कार एंड कम इनसाइड ।”

मनीष ने कार पार्क की और अंदर पहुंचा ।

मनीष- “जी मिसेज चेचवानी क्या हुआ ?”

मिसेज चेचवानी –“आप लोगों की इतनी रिक्वेस्ट करने पर मैं रिती को शाम तक रखने के लिए तैयार हो गई थी पर मेरे लिए अब यह संभव नहीं है ।”

मनीष- “ऐसा क्या हो गया ?”

मिसेज चेचवानी- “अरे मैं शाम से चार बार इसका डायपर चेंज कर चुकी हूं । बाकी बच्चे भी हैं मेरे यहां, इतनी एज होने के बाद भी अभी तक रिती पोट्टी बता नहीं पाती है । पूरे दिन में सबसे ज्यादा शैतानी भी यही करती है ।”

मनीष- “मैं देखता हूं मैडम । अभी आप एक मौका और दीजिए प्लीज ।”

मिसेज चेचवानी- “ओके लेट अस सी । बट आप लोगों को सिखाना चाहिए । रिमेम्बर दिस इज लास्ट चान्स ।”

आज मनीष को रिती पर बहुत गुस्सा आया । रिती चुपचाप सीट बेल्ट लगा कर कार में बैठी हुई थी । आज उसने टॉफी की जिद भी नहीं की ।

बिल्डिंग में घुसते ही गार्ड अंकल  मिल गए । उन्होने रिती को गोद में ले लिया । रिती  भी उनसे ‘गार्ड अंकल’ ‘गार्ड अंकल’ कह कर लिपट गई । चौकीदार ने अपनी जेब से एक टॉफी निकालकर रिती को दे दी । इसी दौरान मनीष गाड़ी पार्क करके आया तो उसने यह नजारा देखा । उसका पहले से ही खौला हुआ खून और खौल उठा । उसने आव देखा ना ताव चौकीदार को पीछे से एक थप्पड़ जड़ दिया । रिती गार्ड अंकल की गोद से उतर कर एक किनारे सहम कर खड़ी हो गई ।

“अरे तेरी वजह से यह भी बिगड़ गई है । साले तेरी हिम्मत कैसे हुई उसको गोद में लेने की ?” – मनीष गुस्से से बोला ।

“गलती हो गई, गलती हो गई साहब” कहकर चौकीदार रोने लगा ।

तब तक शोर सुनकर रंजना भी फ्लैट से बाहर आ गई और मनीष को खींचकर फ्लैट के अंदर ले गई । मनीष अंदर आने तक लगातार गालियां बके जा रहा था । अंदर आकर मनीष ने रिती को पकड़कर जोर से झकझोर दिया ।

मनीष – “अबकी बार से में यह बिल्कुल भी बर्दास्त नहीं करूंगा ।”

रंजना – “अरे बच्ची को छोड़ो, छोड़ो उसको ।”

मनीष – ”इट वाज योर डिसीजन । मैंने पहले ही कहा था अभी थोड़ा वेट करते हैं ।”

रंजना रोने लगी । उसे याद आया कि यही आदमी है जिसका हर काम रिती के भविष्य के लिए होता है । आज उस निमित्त मात्र को ही कोस रहा है जिसके भविष्य के लिए संघर्ष करने का वो दावा करता है । अजीब विडंबना है ।

अंजना – “यह तुम्हारा या और ज्यादा कहें हमारा सामूहिक निर्णय था ।”

मनीष – “था, पर तुम्हें ज्यादा जल्दी थी । मैंने कहा था कि अभी 2 साल और वेट करते हैं ।”

यह कहकर मनीष क्लब के लिए निकल गया ।

रंजना की समझ में नहीं आ रहा था कि  क्या करे । रिती एक तरफ सहमी खड़ी थी । रंजना ने उसको चिपका लिया । रंजना को मनीष के मूड का पता था । वह जल्दी ठीक होने वाला नहीं था । यही विडंबना है वर्तमान वक़्त की । हम जिस उद्देश्य की प्राप्ति के सारे प्रयास कर रहे होते हैं, कहीं ना कहीं वही खोता जा रहा है । मानो फलक की तलाश में तेजी से, और तेजी से दौड़ा जा रहा है व्यक्ति,पर फलक भला कभी किसी की पकड़ में आया है । बिल्कुल महत्वकांक्षाओं की तरह,आप जितना आगे बढ़ो  महत्वकांक्षाएं भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है, अनंत आकाश की तरह ।  इस दौड़ में पहले व्यक्ति  थकता है, फिर लड़खड़ाता है, और अंत में गिर जाता है पर दूरी कम नहीं होती है । महत्वकांक्षाएं बढ़ती जाती है जरूरतें बढ़ती जाती हैं । जब अंतरात्मा पुकारने लगती है कि अब बहुत हुआ, तब व्यक्ति बहाने ढूंढता है, बच्चों का भविष्य, अच्छा घर । रंजना कहीं ना कहीं रिती की मजबूरी समझ रही थी, दिन भर मनीष और रंजना बाहर ही रहते थे । शाम को जब वो लौट कर आते थे तो एकदम थके हुए ऐसे में क्रैश के बच्चों में पहली बार उसको प्यार मिला, ऐसे लोग मिले जिनके पास समय था उसके लिए, शायद इसीलिए ज्यादा मुखर थी रिती क्रैश में और ज्यादा शैतान भी ।  रंजना यही सब सोचते हुए सो गई । अगली सुबह रंजना जल्दी उठ गई उसने रिती को तैयार किया । रिती को प्यार किया । मनीष बाहर खड़ा होकर बार-बार गाड़ी का हॉर्न बजा रहा था । रंजना ने रिती को कंघी की और बाहर ले जाने लगी । पर रिती रंजना के पैरों में लिपट जा रही थी ।

रंजना ने पूछा, “बेटा, क्या हुआ ?”

रिती – “मम्मी  पोट्टी ,पोट्टी ।”

बाहर मनीष लगातार हॉर्न बजा रहा था । रंजना पर अजीब सी झुंझलाहट सवार हो गयी । उसने गुस्से में अपना पैर झटका । रिती का सिर जाकर डाइनिंग टेबल से टकराया और वह बेहोश हो गई । तब तक मनीष गुस्से में बड़बड़ाता हुआ ऊपर आ चुका था । उसने यह सब  देखा तो तुरंत ही रिती को अस्पताल की तरफ लेकर भागा । पूरे 12 घंटे बाद रिती को होश आया । इसके बाद जिस तरह से उनको देखकर रिती के चेहरे पर मुर्दनी छा गयी, इस एक घटना ने मनीष और रंजना दोनों की आंखें खोल दी ।

अब रिती की दादी स्थायी रूप से उसके साथ रहती हैं । मनीष और रंजना ने भी निर्णय लिया कि अब रिती के आत्मनिर्भर होने तक एक व्यक्ति प्रमोशन नहीं लेगा ।

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अंकुर मिश्रा

अंकुर मिश्र

वैसे तो ग्रेजुएट इंजीनियर हैं, CAIIB पास हैं और वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं, पर इनका पहला प्यार कहानियाँ ही हैं। रचनाएँ और लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पहला कहानी संग्रह 'the ज़िंदगी' प्रकाशित

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