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मेरी हजामत

अनुमानित समय : 15 मिनट-

आपने सुना होगा कि कुछ लोग भाड़ झोंकने दिल्ली जाते हैं, कोयला ढोने कलकत्ता जाते हैं और बीड़ी बेचने बम्बई जाते हैं. मैं अपनी हजामत बनवाने लखनऊ गया था.

लखनऊ पहले सिर्फ अवध की राजधानी थी, अब महात्मा बटलर की कृपा से सारे संयुक्त प्रान्त की राजधानी है. कई सुविधाओं का खयाल करते हुए यह मानना पड़ता है कि राजधानी होने के योग्य यह है भी. पहले तो रेवड़ियां अच्छी मिलती हैं, जो आसानी से जेब में भरकर कौंसिल चेम्बर में खायी जा सकती हैं; दूसरे नवाबजादियों का भाव सस्ता है जो बाहर से आये हुए कौंसिल के मेम्बरों का गृहस्थाश्रम बनाये रखने में मदद पहुंचाती हैं; तीसरे पार्कों की बहुतायत है जिनमें कौंसिल की ताती-ताती स्पीचों के बाद माथा ठंडा करने की जगह मिल जाती है. तब भला बताइये कि इन सुभीतों के आगे इलाहाबाद को कौन पूछेगा? वहां सिवाय अक्षयवट के धरा ही क्या है? गवर्नमेंट की यह शर्त थी कि यदि अक्षयवट का नाम बदलकर बटलर-वट रख दिया जाए, तो इलाहाबाद को तलाक न दिया जाए; पर हिन्दुओं की धर्मान्धता के कारण ऐसा नहीं हो सका. हैली साहब के आने पर इलाहाबादियों ने उनके पास भी अपनी दुःख-गाथा पहुंचायी, पर उन्होंने कहा कि ‘अधिक-से-अधिक मैं यही वादा कर सकता हूं कि साल में एक बार इलाहाबाद आकर त्रिवेणी-संगम पर सिर मुंड़वा जाऊं.’ खैर, जाने दीजिये, अपने राम को क्या, एक राजधानी से मतलब, चाहे कहीं भी हो. इन्हीं सब झगड़ों से अलग रहने के लिए मैं बाबा विश्वनाथ की राजधानी काशी में रहता हूं. मैं तो इलाहाबाद का नाम भी न लेता, पर क्या करूं, उसका रंडापा देखकर दया आ ही जाती है.

सच बात यह है कि न लखनऊ मेरे ऊपर फिदा है और न मैं लखनऊ पर. जब से सिर गंजा होने लगा, तब से मैंने फिदा होने की आदत ही छोड़ दी. लखनऊ मैं कई बार गया हूं. नगर ऐसा कोई बुरा नहीं है. सड़कें बहुत चौड़ी हैं, जिन पर मोटरों को लड़ने में कोई बाधा नहीं पहुंचती. हिंदू होटल कई हैं, जहां हिंदू लोग कुशासन पर बैठकर हिंदू बिस्कुट और हिंदू कलिया खाते हैं. स्कूल और कॉलेजों की भरभार है, जहां देश के नवयुवक दिन-दहाड़े अपना भविष्य सुधारते हैं. तांगे और इक्के बेशुमार हैं, जिन्हें अधिकतर नवाबजादे ही हांकते हैं. भांड़ों की पैदावार यहां अच्छी हो जाती है. ‘जनानी दुकानें’ हर गली-कूचे में दिन-रात खुली रहती हैं, जहां प्रमेह का विनिमय बड़े धड़ल्ले से होता रहता है. शादी-विवाह के अवसर पर यहां के निवासी कचालू और ककड़ी का भोज देते हैं. अण्डा यहां की साग-भाजी है, जिसे उबालने के लिए हरिद्वार से गंगाजल मंगाया जाता है. सुना है कि यहां सीधी टोपी देखकर सड़क पर निकलना मना है. मकड़ी के जाले की पोशाक यहां के शौकीन अधिक पसंद करते हैं. पर्दे की रस्म सबको बहुत प्रिय है, यहां तक कि हवाई जहाज अगर शहर के ऊपर से उड़कर जाता है, तो उड़ानेवाले को आंख पर पट्टी बांध लेनी होती है.

नजाकत की तो यहां हद हो गयी है. रोज ही अखबारों में खबर आती है कि अमुक बाग में रात के समय कोई कली चटकी, जिसका परिणाम यह हुआ कि आसपास की औरतों के कानों की झिल्लियां फट गयीं. जब ऐसी घटनाएं अकसर होने लगीं, तो सरकार को लाचार होकर यह घोषणा करानी पड़ी कि शहर के भीतर रात में कोई ‘गुल’ न खिला करे.

एक बार मेरे एक मित्र रेल से सफर कर रहे थे. उनके बगल में एक मुसलमान सज्जन भी बैठे हुए थे, जो लखनऊ के रहनेवाले थे-और इसीलिए अवश्य ही कोई नवाब रहे होंगे. लखनऊ स्टेशन पर दोनों आदमियों ने ककड़ियां खरीदीं. मुसलमान सज्जन ने नफासत से ककड़ियों को छीलकर छोटे-छोटे टुकड़े किये और फिर एक-एक टुकड़े को सूंघकर बाहर फेंकने लगे. मित्र से न देखा गया. उन्होंने पूछा कि आप इन्हें खाते क्यों नहीं, सूंघ-सूंघ कर बाहर क्यों फेंक रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि ककड़ियों के खाने में कोई मजा नहीं, उनकी खुशबू ही असल चीज है. इसके बाद मेरे मित्र ने भी मुसलमान सज्जन का अनुकरण किया. अन्तर इतना था कि वे खिड़की के रास्ते बाहर फेंक रह थे और मेरे मित्र मुंह के रास्ते अन्दर.

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए कि लखनऊ के दो दलों में एक अच्छी भिड़ंत हो गयी. दोनों भाइयों ने प्रेम से एक-दूसरे का फस्त खोल दिया, आपस में कुछ पटा-बनेठी का अभ्यास कर लिया गया और कंकड़ों के कुमकुमे भी छोड़े गये. मेरे एक मित्र को ठीक इसी अवसर पर किसी बड़े जरूरी काम का स्मरण हो आया और वे घर की रक्षा अपनी स्त्री पर छोड़कर डाकगाड़ी से हांफते हुए बनारस चले आये. मैंने उनसे कुल ब्यौरा पूछना चाहा, पर दंगे को उन्होंने अपनी खिड़की की चिक में से देखा था, इसलिए ठीक हाल न बता सके. तब मैंने लखनऊ-स्थित निज सवांददाता को लिखा जो वहां के एक गण्यमान्य सज्जन हैं और अखिल भारतवर्षीय अहिफेलन-मण्डल के संस्थापक भी हैं. उन्होंने तार द्वारा मुझे सूचित किया कि अखबार वाले झगड़े की तह तक नहीं पहुंच पाये हैं. वास्तविक कारण झगड़े का यह था कि नित्य शाम को कुछ लोग गोमती के किनारे जाया करते थे और आटे की रामनामी गोलियां मछलियों को खिलाते थे. मुसलमानों ने कहा कि ऐसा करना अप्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों को हिंदू बनाने का प्रयत्न करना है; क्योंकि मछलियां रामनामी गोलियां खाएंगी और फिर उन मछलियों को मुसलमान भी खायेंगे और इसी तरह धीरे-धीरे उनमें राम-नाम का प्रचार बढ़ेगा. बिलकुल ठीक है. इस संबंध में मुसलमानों की दूरदर्शिता सराहनीय है. लोग उड़ती चिड़िया पहचानते हैं, ये तैरती मछली पहचान गये. हिंदू सदा के घोंघा हैं, सबसे हारे तो मछलियों द्वारा शुद्धि का पैगाम भेजने चले.

करीब तीन सौ वर्ष हुए, बेनी नाम के प्रसिद्ध कवि घुड़दौड़ देखने लखनऊ गये थे. उस समय वहां म्युनिसिपैलिटी का इंतजाम अच्छा नहीं था. उन्होंने एक शिकायत म्युनिसिपैलिटी की उस समय के समाचारपत्रों में छपवायी, जो इस प्रकार है-

गड़ि जात बाजी और गयन्दगन अड़ि जात

सुतुर अकड़ि जात मुसकिल गऊक.

दामन उठाय पांय धोखे से धरत, होत

आप गरकाप रहि जात पाग मऊ की.

बेनि कवि कहें देखि थरथर कांपै गात

रथन के पथ ना विपद बरदऊकी.

बार-बार कहत पुकार करतार तो सों

मीच है कबूल पै न कीच लखनऊ की.

अब लखनऊ की सड़कों की यह दशा नहीं रही. जब से लखनऊ यूनिवर्सिटी बन गयी है, तब से सड़कों पर धूल रहने ही नहीं पाती, कीचड़ होगा कहां से? हर साल सैकड़ों वकील और ग्रेजुएट पास होते हैं, जो आरंभ में ख्वाहमख्वाह थोड़े दिनों तक धूल फांकते हैं. इसी से अपने-आप सड़कें साफ होती रहती हैं, म्यूनिसिपैलिटी को विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता. वर्तमान नगर तो वास्तव में अतीव सुंदर है, और जब से प्रांतीय सरकार का अखाड़ा यहां आ गया है, तब से तो सोने में सुगंध आ गयी है.

इधर मुझे एक विशेष काम से लखनऊ जाना पड़ा. वहां मेरा एक बड़ा आवश्यक काम अटका हुआ है. मैंने मन्नत मानी है कि यदि मेरा काम हो गया तो देश-भर के पण्डों को एक-एक लंगोट उपहार स्वरूप भेंट करूंगा. भाग्य ने यदि इस बार मेरे साथ आंख-मिचौनी न खेली तो शायद काम हो भी जाए. यों तो भाग्य से मेरी पैदायशी दुश्मनी है, मैं उसे छछूंदर की तरह महकता हूं. महात्मा गांधी ने अछूतोद्धार के लिए इतना प्रयत्न किया, पर भाग्य ने मुझे अभी तक अछूत ही समझ रखा है. मुझे ‘शॉक’ इस बात का रहता है कि किस्मत मुझे देखकर न जाने क्यों घूँघट काढ़ लेती है, मैं यद्यपि न तो उसका ससुर हूँ, न जेठ. यह नहीं होता कि घूंघट के भीतर ही से कभी-कभी मुसकरा दिया करे, खैर.

आप जानते होंगे कि पारसाल अवध में एक बहुत बड़े तालुकेदार राजा गावदीसिंह का लखनऊ में ‘काशीवास’ हो गया. राजा साहब मरे थे लखनऊ में, पर देश के कई दिग्गज पंडितों ने यह व्यवस्था दी कि चूंकि मरते समय उनके मुख से ‘काशी’ शब्द निकला था, इसलिए उनके मरने को साधारण मरना न कहकर ‘काशीवास’ ही कहना उचित है. पता लगाने पर मालूम हुआ कि राजा साहब ने मरते समय अपनी अंतिम सांस बटोरकर काशी नामक अपने पुराने खिदमतगार को पुकारा था-‘अरे कशिया, उल्लू का पट्ठा.’

खैर, राजा साहब को लेने के लिए जो यमदूत उस समय आये थे, वे कुछ ऐसे उजड्ड थे कि उन्होंने राजा साहब को फुरसत के साथ मरने का मौका नहीं दिया. इतनी जल्दी मचायी कि वे अपनी स्टेट का कोई उचित प्रबंध भी न कर सके और चल बसे. लड़का नाबालिग था और जमींदारी के जरूरी कामों में सिर्फ गाली बकना अभी तक सीख पाया था. ऐसी अवस्था में यह आवश्यक हो गया कि स्टेट के सुप्रबंध के लिए एक अच्छा मैनेजर नियुक्त किया जाए. फलतः कमिश्नर साहब की आज्ञा से, कलेक्टर साहब की मर्जी से, जण्ट साहब की सलाह से, डिप्टी साहब की राय से और बैरिस्टर साहब की मदद से एक विज्ञापन का मसविदा तैयार कराया गया कि अमुक स्टेट के लिए एक मैनेजर की आवश्यकता है. विज्ञापन अखबारों में छाप दिया गया. सिर्फ ऐसे लोगों की अर्जियां मांगी थीं, जिन्हें नाच-मुजरे का शौक हो और छठे-छमासे इलाकों के काम को देख लेने की फुरसत. विज्ञापन पढ़ते ही मैंने निश्चय कर लिया कि यही मौका है अपने कर्म की रेख पर मेख मारने का. मैं इस स्थान के लिए सर्वथा उपयुक्त हूं, मेरे अस्तित्व में यदि यह स्थान रिक्त रहे तो उस स्टेट का दुर्भाग्य.

विज्ञापन में फुरसत की आवश्यकता बतायी गयी थी. भला फुरसत की कौन-सी कमी मुझे है! मेरे पास फुरसत के सिवा और है ही क्या? मेरी पढ़ायी-लिखायी भी निहायत फुरसत के साथ हुई थी और जब से कॉलेज छोड़ा है, तब से फुरसत के अथाह समुद्र में गोते लगा रहा हूं. यों कहिये कि इस समय फुरसत ही मेरी चौहद्दी है.

रहा नाच-गुजरे का शौक. कुछ तो यह है भी, बाकी राज-काज के सिलसिले में हो ही जायेगा. मेरा यह सदा से विश्वास है कि नाच-मुजरा कोई बुरी चीज नहीं हैं. रईसों के धन के लिए यह एक बहुत जरूरी जुलाब है. कोषबद्ध भी कोष्ठबद्ध की तरह एक भयानक रोग है. आखिर इतने रईस जो नाच-मुजरे से प्रेम रखते हैं, वे सब-के-सब क्या जहन्नुम की सड़क पीट रहे हैं? देश के प्रायः सभी बड़े-बूढ़े सेठ-साहूकार, राजे-महराजे और संत-मंहत जिस प्रथा को अभिनन्दनीय समझें, उसकी तरफ हम-आप कौन होते हैं कि अंगुली उठाएँ? एक मठाधीश ने मुझसे कहा कि यदि मंगलामुखी का नाच न हो, तो कृष्णाष्टमी के दिन ठाकुरजी का जन्म कैसे हो? ठीक ही है, नवजात ठाकुरजी के कर्कश ‘केहांव, केहांव’ को कर्ण-मधुर बनाने के लिए आवश्यक है कि उसके साथ दो-चार कोकिल-कंठ वालियों की गिरकिरी का पुट दे दिया जाए.

पहले तो नाच-मुजरा किसी हालत से पाप नहीं कहा जा सकता और यदि पाप है भी, तो क्या हम हिंदू ऐसे डरपोक हैं कि पाप के डर से परपंरा की प्रथा छोड़ देंगे? परमात्मा भी कितना अन्यायी है! मुसलमानों के लिए मरने के बाद भी हूरों का प्रबंध है; पर हम हिंदू जीते-जी जो कुछ कर लें वही बहुत है. उस पर कुछ अप्सराएं हैं जरूर, पर देवताओं ने पहले ही से उन्हें अपने हत्थे चढ़ा रखा है.

सबसे बड़ी बात इस संबंध में सोचने की यह है कि जिन बेचारियों ने नाचना-गाना सीख लिया है, वे अब कंठी लेकर कहां जाएं? काबुल जाकर सुर्खी कूटें-या लंका जाकर रावण के वंशजों का पता लगाएं-या बंगाल की खाड़ी में डुबकी मारें-या गले में रस्सी बांधकर झूला झूलें-या क्या करें? आप इनको लेकर अपने घर बसाने पर राजी हों तो ये आज आप के साथ पानी में मिसरी की तरह धुल-मिल जाएं. आखिर इनके शरीर में भी तो वही पेट-रूपी ‘भूतों की हवेली’ बनी हुई है! आपके फरहरी उपदेश से तो वह भरेगा नहीं. उसके लिए कोई प्रबंध कीजिये. जैसे लाखों रुपये देवालय, चिकित्सालय, विद्यालय और अनाथालय बनवाने में लगाते हैं, वैसे ही दस-पांच लाख पतुरियालय बनवाने में खर्च कर डालिये. ईश्वर ने अगर मुझे धन दिया तो मैं अवश्य एक ‘पतुरियालय’ खोलकर समाज-सेवा करूंगा. उसका पता मैं प्रकाशित कर दूंगा.

हां, तो इस विज्ञापन को देखकर कितने फुरसत के सताये हुए नवयुवकों के मुंह में लार के चश्मे फूट पड़े. नियुक्ति न जाने कैसे लखनऊ के कमिश्नर साहब के हाथ में थी. विज्ञापन निकलने के कुछ ही घंटों बाद से कमिश्नर साहब के ऊपर अर्जियों के ओले बरसने लगे. मैंने भी झट से बारह पेज की अर्जी लिखकर बैरंग रवाना कर दी.

अर्जी भेज देने के बाद हृदय में इस बात की खलबली पड़ी कि देखें कोई उत्तर आता है या नहीं. चार-पांच दिन तक तो मारे चिंता के नींद नहीं आयी, मुश्किल से दो घंटे दिन में और सात घंटे रात में सो सका. जब कभी डाकिये को देख पाता तो उसके गले से लिपटकर पूछता कि ‘प्यारे! कोई मेरी भी चिट्ठी है?’ देर होते देखकर मुझे यह भी चिंता हुई कि कहीं कमिश्नर साहब को लंगड़े बुखार ने तो नहीं धर दबाया. एक बार इरादा हुआ कि उनको लिखें कि आशा करता हूं, आप सपरिवार कुशल से होंगे; पर इसी बीच में उनका एक खत आ ही गया. इस पत्र को मैंने बड़े यत्न से रख छोड़ा है. यदि काम हो गया तो ठीक ही है, नहीं दिखाने के लिए रहेगा कि मुझे ऐसी अच्छी जगह मिल रही थी पर मैंने ली नहीं.

अब मैं इस उधेड़-बुन में लगा कि राह-खर्च के वास्ते कुछ रोकड़ा जुटाना चाहिए. जब से रुपयों ने मेरी जेब में हड़ताल डाल दी, तब से मैं अपने पास छदाम रखना भी हराम समझता हूं; और जरूरत तो क्या है? पान-पत्ता दोस्तों के यहां, नाश्ता-पानी ससुराल में और भोजन सन्नों में कर लेता हूं. यदि आपने पुराणों के पन्ने उलटे होंगे तो अवश्य जानते होंगे कि मेरी जेब की ऐसी सोचनीय दशा क्यों, कैसे और कब से हुई. भगवान् ने वामन-रूप धारण करके दानवराज बलि से तीन पग भूमि मांगी. बलि ने बिना वकीलों की राय लिये उन्हें तीन पग भूमि संकल्प कर दी. परिणाम यह हुआ कि दो ही पग में वामन भगवान् ने स्वर्ग और मर्त्यलोक नाप डाला; तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान ही नहीं बचा. जब बलि ने देखा कि किसी प्रकार छुटकारा नहीं है, तब चुपके से उन्होंने मेरी जेब की ओर इशारा कर दिया और वामन भगवान् तीसरे पग से उसे नापकर चलते हुए.

बहुत दिनों के बाद यह एक ऐसी परिस्थिति आ पड़ी थी, जो बिना कुछ रुपयों के हल होती नहीं दीख पड़ती थी. बहुत सोच-विचार के बाद मैंने कुछ कर्ज लेने का निश्चय किया. अर्थशास्त्र का कई मन्वन्तर लगातार अध्ययन करके मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि कर्ज लेना सभ्य समाज की अनुकरणीय सुव्यवस्थाओं में है. खाना-पीना, सोना और कर्ज लेना शरीर के धर्म हैं. जब इतनी बड़ी गवर्नमेंट कर्ज लेती है तो हम-आप उसकी प्रजा होकर क्यों न लें? यूरोप में लोग ऋण के बल पर महासमर छेड़ देते हैं. मैं अपने देश में ऋण के बल पर सफर भी न करूं.

पर कहीं कर्ज मिले तब तो! कितने ही दोस्त और साथियों के दरवाजे खटखटाये, पर सब व्यर्थ. किसी का कोई मर गया था, किसी का कोई मरनेवाला था, किसी के सेफ की ताली खो गयी थी और कोई बड़े लाट की जमानत मांगता था. एक मित्र ने कहा कि रुपये तुम्हें जरूर देता, पर कल ही मेरी बिरादरी की पंचायत हुई जिसमें यह तय पाया कि अगर कोई किसी को उधार देगा तो जाति से बाहर कर दिया जायेगा. क्या ऐन वक्त से पंचायत हुई थी.

कहा जाता है कि आवश्यकता आविष्कारों की जननी है. जब मैंने देखा कि ऋण उधार पाने की कोई आशा नहीं है तब एक उपाय सोच निकाला जो अंत में अचूक साबित हुआ. रात में स्त्री को सोती हुई पाकर उसके एक हाथ का पेंचदार कड़ा उतार लाया. पुराने जमाने में राजा नल ने इस तरकीब की रजिस्ट्री कराई थी-दमयन्ती को सोई हुई पाकर उसकी आधी साड़ी फाड़कर चंपत हो गये थे.

कड़े को बंधक रखकर मैंने कुछ रुपये खड़े कर लिये और झट टिकट कटाकर रेल पर सवार हो गया. रास्ते में कोई भी उल्लेखनीय घटना नहीं हुई, यहां तक कि एक बार भी मेरी गाड़ी ने किसी दूसरी गाड़ी से टक्कर नहीं ली. हां, एक बात मैंने बड़ी विचित्र देखी, वह यह कि जब गाड़ी जोर से चलती थी तो ऐसा जान पड़ता था कि आस-पास के मकान और पेड़ भी एक ओर दौड़ते जा रहे हैं. इसका कारण मैंने प्रमुख विज्ञानवेत्ता प्रो. रामदास गौड़ से पूछा. उन्होंने उत्तर दिया कि आपका प्रश्न टेढ़ा है. मैं स्वयं भी इस विषय पर बहुत दिनों से गौर कर रहा हूं. इसका उत्तर पाने के लिए आपको वैज्ञानिक अद्वैतवाद का सहारा लेना पड़ेगा. सुनिए-

जिस प्रकार माया-ब्रह्म के संश्लेष-जन्म अन्योन्याश्रय की अनावच्छित्र शक्यता के संबद्घघर्ष और समवायीकरण से हेतु-हेतु-मद्भूतत्व का आविर्भाव होकर, विधेय-प्राधान्य और अनुभवगम्य द्वंद्व-रूपता तथा उपबृंहण विकल्पाभासों में अस्मद्युस्मद का भ्रम होता है, ठीक उसी प्रकार रेल की सवारी में आस-पास की स्थावर चीजें जंगम प्रतीत होती हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उत्तर ने मेरे मस्तिष्क के लिए ब्राह्मीघृत का काम किया.

तीसरे पहर रेल ने मुझे लखनऊ स्टेशन पर उतार दिया. कुली और तांगेवालों की छाती पर मूंग दलता हुआ मैं पैदल ही, गठरी बगल में दबाकर, वहां से चलता हुआ. मैं आजकल के छड़ी के सहारे चलनेवाले नौजवानों-सा नहीं हूं कि एक छोटी-सी गठरी ले चलने में कमर की तौलियां खिसक जातीं. मैं अब यह सोच रहा था कि ठहरूं कहां? शहर में किसी से भी परिचित नहीं था. होटल में ठहरता तो टोटल कहां से चुकाता, इतने रुपये पास थे नहीं. कुछ निश्चय नहीं कर पाया. घूमते-घूमते संध्या हो गयी और थोड़ी देर में समस्त नगर बिजली की रोशनी से ‘चमकायमान’ हो उठा. कुछ भूख-मिश्रित नींद भी मालूम पड़ने लगी; पेट को कुछ दे-दिलाकर शांत किया और एक निर्जन सड़क के किनारे पड़कर ‘जहैं पड़े मुसल, तहैं छेम कुसल’ को चरितार्थ करने लगा.

सुबह मेरी नींद खुली तो देखा कि छह बजा है. कमिश्नर साहब से मुझे नौ बजे मिलना था. मैंने सोचा कि अभी समय काफी है, दाढ़ी बनवा लूं; क्योंकि अफसर-गण ऐसे लोगों से नहीं मिलना चाहते जो अपने मुंह पर कांटों की खेती करते हैं. मुझे दाढ़ी बनवाने का खयाल भी न आता, पर एक मक्खी ने बार-बार मेरे चेहरे पर बैठकर मुझे याद दिलायी. उसे मारने के लिए झुंझलाकर ज्यों ही मैंने अपने मुंह पर एक तमाचा लगाया, त्यों ही ऐसा जान पड़ा कि हथेली में कांटे चुभ गए, दाढ़ी इस कदर बढ़ आयी थी. जब खुद अपने हाथों को इतनी तकलीफ हुई तब अगर किसी वजह से कमिश्नर साहब एक चपत मार बैठे तो उनकी कोमल हथेलियां छिदकर छलनी हो जाएंगी. यह खयाल एक राजभक्त को व्यग्र कर देने के लिए काफी था. मैंने तत्क्षण निश्चय किया कि दाढ़ी साफ कराकर ही साहब से मिलूंगा.

लखनऊ में गली-गली नाई हैं. मैं एक ऐसी दुकान में पिल पड़ा और नाई की प्रतीक्षा करने लगा जो संभवतः थोड़ी देर के लिए किसी काम से बाहर गया था. कमरे में एक शुभ्र वस्त्रधारी सज्जन भी बैठे थे जो शायद मेरी ही तरह दुकान के मालिक की प्रतीक्षा कर रहे थे. जब मुझे करीब आधा घंटा इंतजार करते हो गया और नाई के दर्शन न हुए, तो मैंने घबराकर इन्हीं सज्जन से पूछा कि आप बता सकते हैं कि इस दुकान का मालिक कहां मर गया है? आधा घंटे से उसके इंतजार में बैठा हूं, पर उस कमबख्त का पता नहीं है. उस शुभ्र वस्त्रधारी सज्जन ने इसका जो उत्तर दिया उससे मैं बड़ा लज्जित हुआ. उन्होंने कहा-महाशय! मैं ही इस दुकान का मालिक हूं और आपकी दाढ़ी बनाऊंगा तो मैं ही बनाऊंगा. आपने आते ही अपना अभिप्राय तो बताया नहीं, चुपके से बैठ रहे, मैंने जाना कि आप रास्ते की थकावट दूर कर रहे हैं, अब आपकी दाढ़ी उसी हालत में बन सकती है जब आप उन बेजा अलफाज को वापस लें, जिन्हें आपने अभी मेरी शान में कह डाले हैं.

सुभान तेरी कुदरत! भला मैं ख्वाब देख रहा था कि ऐसे सुन्दर वस्त्रों से आच्छादित, कुर्सी पर आसीन, देखने में मुअज्जिज जेन्टलमैन पेशे से हज्जाम हैं. हमारी काशी में हज्जाम हैं, पर वे बेचारे तो कांख में किसबत और हाथ में लुटिया लिये घूमते रहते हैं. मैंने अपनी गलती के लिए उनसे केवल क्षमा ही नहीं मांगी बल्कि यह भी वायदा किया कि अब किसी शुभ्र वस्त्रधारी को देखूंगा तो पहले उन्हें हज्जाम समझकर तब दूसरा कुछ समझूंगा.

इसके बाद नापितवर ने प्रसन्न होकर कहा-‘‘यहां आइए.’’

मैं उनके पास गया.

कुर्सी की ओर इशारा करके-‘‘बैठ जाइए.’’

मैं कुर्सी पर बैठ गया.

‘‘सिर उठाइए.’’

मैंने सिर उठाया.

‘‘आंखें बंद कीजिए.’’

मैंने आंखें बंद कीं.

‘‘ईश्वर का ध्यान कीजिए.’’

मैंने ईश्वर का ध्यान किया.

‘‘परमात्मा से अपने गुनाहों की माफी मांग लीजिए.’’

मैंने ऐसा ही किया, गो अपने गुनाहों की फेहरिस्त मैं मकान ही पर भूल आया था. यह सब किया तो, पर समझ में न आया कि क्यों. ईश्वर का ध्यान करना और अपने गुनाहों की माफी मांगना बहुत अच्छे काम हैं, लेकिन मौके से. दाढ़ी बनवाने के पूर्व इन कार्रवाइयों का क्या मौका था-यह मेरी समझ में नहीं समाया. आखिर मैंने दबी जबान पूछा कि आपने यह जो धार्मिक कवायद मुझसे करायी, उसका क्या अर्थ है? उत्तर मिला-‘‘दाढ़ी बनवाना आग से खेलना है; मेरा तेज उस्तरा बराबर आपके चेहरे पर नाचता रहेगा; कहीं बहककर आपके गले में लग गया तो निश्चय जानिए कि आपका काम तमाम हो जाएगा. इसलिए आपकी आत्मा को हर तरह से तैयार रहना चाहिए कि कौन जाने संसार से कूच करना ही पड़े.’’

नाहक पूछने गया. अनजाने जो कुछ हो जाता वह तो सहन करना ही पड़ता. पूछकर मुफ्त में जड़ैया-बुखार मोल लेने गया. घरवालों और घरवाली की सुध से आंखें डबडबा उठीं. सोचने लगा कि देखूं, अब इन आंखों से काशी के ‘बन बाग-तड़ाग’ निहारता हूं या नहीं.

नापिता-कुल-कमल-दिवाकर ने छप-छप ध्वनि के साथ दो चुल्लू पानी से मेरे मुख पर तर्पण किया. इसका अर्थ मैंने यह लगाया कि अब मेरी दाढ़ी भिगोयी जा रही है. इसके बाद उन्होंने एक छोटा-सा झाड़ू और एक बट्टी साबुन कहीं से बरामद किया. हिन्दी व्याकरण के जाननेवाले छोटे से झाड़ू को झड़ुआइन कहेंगे-जैसे साढ़ू, सढ़ुआइन-पर अंग्रेजी जाननेवाले उसे शेविंग ब्रुश के नाम से पुकारेंगे. खैर, साबुन और शेविंग ब्रुश के संयुक्त उद्योग से मेरा मुंह थोड़ी देर में क्षीरसागर का मानचित्र बन गया. नापितवर ने कृपा करके थोड़ा साबुन मेरी आंखों में भी चले जाने दिया, जिससे मुझे दिव्य दृष्टि का आनन्द मिलने लगा.

यह सब तो हो रहा था, पर बीच-बीच में नापितवर बड़ी कुरुचिपूर्ण निगाहों से मेरी ओर देखते जाते थे. उन्होंने ऐसा कहा तो नहीं, पर अन्य तरीकों से यह भाव प्रकट कर दिया कि मेरे मुख की बनावट उनको बिलकुल नापसन्द थी. मुझे स्वयं भी अपने मुख की बनावट के दुरुस्त होने में सन्देह है; पर अब तो चाहे भला है या बुरा, है तो अपना मुंह.

नापितवर ने अब उस्तरे का प्रयोग आरम्भ किया. उस्तरे की सूरत से यह साफ जाहिर होता था कि कभी उसने किसी आरी से आशनाई कर ली थी. उसे देखकर मेरे शरीर में भूकम्प-सा आने लगा. यदि थोड़ी देर के लिए मेरा मुख चन्द्रमा मान लिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि यह उस्तरा राहु बनकर मेरे मुखचन्द्र को ग्रसने आ रहा था.

नापितवर ने पूछा-‘कहिये, क्या साफ करूं और क्या छोड़ दूं?’

मैंने अत्यन्त नम्रता के साथ उत्तर दिया कि दाढ़ी तो साफ ही कर दीजिये, भौं और बरौनी यदि कोई अड़चन न डालें तो उन्हें छोड़ दीजिये. और मूंछों के बारे में जैसी आपकी राय हो वैसा ही करिये.

इसके बाद जो कुछ हुआ उसका ब्यौरेवार वर्णन मैं नहीं कर सकता. अपनी जान की पड़ी थी, ब्यौरा कहां मैं नोट करता. इतना याद है कि उस्तरे ने वह-वह पैंतरे दिखलाये कि मैं काठ बन गया. चेहरे पर खर-खर-खरर-खरर-खर-खर-खर का संगीत हो रहा था और मैं अपने सी-सी-उफ-सी-सी-उफ से ठेक भर रहा था. जब कभी इससे छुट्टी मिलती तो हनुमान चालीसा का पाठ करने लगता.

इतना मुझे अच्छी तरह याद है कि नापितवार को जब-जब मेरा मुंह दाहिने-बाएं घुमाना होता था, तो मेरी नाक पकड़कर घुमा देते थे. यद्यपि उनका ऐसा करना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध नहीं था, क्योंकि मुंह का यह स्वाभाविक धर्म है कि जिधर-जिधर नाक जाए, उधर-उधर वह भी जाए; पर इस प्रकार की धर-पकड़ से मेरी नाक चुटैली हो चली और मैंने नापितवर से कहा-‘‘आपको मेरा मुंह दाहिने-बाएं घुमाना हो तो या तो आप मुझसे कह दिया करिये, मैं स्वयं अपना मुंह घुमा लिया करूंगा, नहीं तो मेरे दोनों कान हाजिर हैं, जिनको बचपन से पकड़े जाने की आदत है. नाक के बजाय इनको पकड़कर दाहिने-बाएं जैसे चाहिए, घुमा लीजिये, पर मेरी इकलौती नाक से यदि आप मुंह घुमाने का काम न लें तो मैं आपका बड़ा एहसान मानूं.’’

मुझे अपनी नाक ही की पड़ी थी, पर यहाँ तो उस्तरे के दुर्दांन्त प्रलयचक्र से मेरी मौखिक आकृति का सर्वांशतः संहार होता दिखायी पड़ता था, और उसके रोकने का कोई उपाय भी न था. यदि नापितवर ने अपना काम अधूरे पर ही छोड़ दिया होता, तो मैं उन्हें हार्दिक धन्यवाद देता और अपने बचे-खुचे मुख से ही अपनी जिंदगी काट लेता, पर इतने सस्ते छूटना भाग्य में नहीं लिखा था. उस्तरे की लपलपाती जिह्वा सारे मुख को चाटती चली जा रही थी. देखते-देखते मुंह का एक परत चमड़ा छील डाला गया. एक बार प्राणभिक्षा मांगने के लिए मैंने मुंह खोलना चाहा, पर उस्तरे ने मुख-विवर में घुसने की इच्छा प्रकट करके मुझे फौरन मुंह बन्द करने के लिए बाध्य किया.

अधिक क्या कहूं, यही समझिये कि बड़े संकट में प्राण पड़ा हुआ था. सोचने लगा कि इतनी अकारथ गयी. कुछ परमार्थ नहीं कमाया, अब चला-चली के समय हाथ मलना हाथ लगा. एक ज्योतिषी ने मुझे बताया कि तुम्हारी मृत्यु किसी सुन्दर देव-स्थान में होगी, पर मुझे यह नहीं मालूम था कि देव-स्थान का अर्थ हजामत की दुकान है.

एक बार मेरी स्त्री ने मुझे अपने पैर के नाखून बनाने के लिए कहा था, पर मैंने मारे शान के नहीं बनाये. सम्भवतः आज उसी पाप का फल भोग रहा था.

इसमें तो कोई संदेह नहीं कि जितने जख्म इस समय मुंह पर लगे थे, उतने गत यूरोपियन महासमर में लगे होते तो मैं अब तक भारत का सिपहसालार बना दिया गया होता. इन विचारों ने मुझे और भी दुःखित कर दिया और मैं आंख बन्द करके सोचने लगा कि वैतरणी का पाट कुल कितना चौड़ा है.

आखिर इस कृत्य का भी अन्त हुआ और नापितवर ने मुझे कुर्सी से उठने की अनुमति दी. इसमें कोई शक नहीं कि मेरी नयी जिन्दगी हुई. उठकर मैंने अपनी नाक टटोली. देखकर खुशी हुई कि नाक करीब-करीब ज्यों-की-त्यों थी; पर जब मैंने अपने मुंह पर हाथ रखा तो ऐसा जान पड़ा कि मुंह पर खून की क्यारियां बन गयी हैं. नापितवर से मैंने आईना मांगा, पर उन्होंने देने से इनकार किया और कहा-‘आपका मुंह इस काबिल नहीं है कि आप आईना देखें.’

मेरा अनुमान है कि किसी ऐसे ही नाई से काम पड़ने पर कबीर साहब ने लिखा था-‘मुखड़ा क्या देखे दरपन में.’

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मैला आँचल : एक विचार यह भी

अनुमानित समय : 2 मिनट-

‘मैला आँचल’ ? वही उपन्यास जिसमे हिंदी का एक भी शुद्ध वाक्य नहीं है ? जिसे पढ़कर लगता है कि कथानक की भूमि में सती-सावित्री के चरण चिन्हों पर चलने वाली एक भी आदर्श भारतीय नारी नहीं है ? मद्य-निषेध के दिनों में जिसमे ताड़ी और महुए के रस की इतनी प्रशस्ति गाई गई है कि लेखक जैसे नशे का ही प्रचारक हो. सरकार ऐसी पुस्तकों को प्रचारित ही कैसे होने देती है जी !

वही ‘मैला आँचल’ न जिसमे लेखक ने न जाने लोक गीतों के किस संग्रह से गीतों के टुकड़े चुराकर जहाँ-तहाँ चस्पा कर दिए हैं ? क्यों जी, इन्हें तो उपन्यास लिखने के बाद ही इधर-उधर भरा गया होगा?

‘मैला आँचल’ ! हैरत है उन पाठकों और समीक्षकों की अक्ल पर जो इसकी तुलना ‘गोदान’ से करने का सहस कर बैठे ! उछालिए साहब, उछालिये ! जिसे चाहे प्रेमचंद बना दीजिये, रविंद्रनाथ बना दीजिये, गोर्की बना दीजिये ! ज़माना ही डुग्गी पीटने का है !

तुमने तो पढ़ा है न ‘मैला आँचल’ ? कहानी बताओगे ? कह सकते हो उसके हीरो का नाम ? कोई घटना-सूत्र ? नहीं न ! कहता ही था. न कहानी है, न कोई चरित्र ही पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक छा सका है. सिर्फ ढोल-मृदंग बजाकर ‘इंकिलास ज़िंदाबाग’ जरूर किया गया है. ‘पार्टी’ और ‘कलस्टर’ और ‘संघर्क’ और ‘जकसैन’ – भोंडे शब्द भरकर हिंदी को भ्रष्ट करने का कुप्रयास खूब सफल हुआ है.

मुझे तो लगता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में या यूँ कहूँ कि हिंदी-साहित्यिकों की आँखों में, ऐसी धुल-झोंकाई इससे पहले कभी नहीं हुई. ‘मैला आँचल’, ‘मैला आँचल’ सुनते-सुनते कान पाक गए. धूल-भरा मैला-सा आँचल ! लेखक ने इस धूल की बात तो स्वयं भूमिका में कबूल कर ली है एक तरह से !! फिर भी …

अरे, हमने तो यहाँ तक सुना है, ‘मैला आँचल’ नकल है किसी बंगला पुस्तक की और बंगला पुस्तक के मूल लेखक जाने किस लाज से कह रहे हैं, ‘नहीं ‘मैला आँचल’ अद्वितीय मौलिक कृति है.’ एक दूसरे समीक्षक ने यह भी कह दिया, जाने कैसे, कि यदि कोई कृतियाँ एक ही पृष्ठभूमि पर लिखी गयी विभिन्न हो सकती है तो ये है !
पत्थर पड़े हैं उन कुन्द जेहन आलोचकों के और तारीफ़ के पुल बंधने वालों के जो इसे ग्रेट नावल कह रहे हैं. ग्रेट नावल की तो एक ही परख हमे मालूम है, उसका अनुवाद कर देखिये ! कीजिये तो ‘मैला आँचल’ का अनुवाद अंग्रेजी में, फिर देखिये उसका थोथापन !

अरे भाई, उस मूरख, गंवार लेखक ने न केवल समीक्षाकों को ही भरमाया है, पाठकों पर भी लद बैठा है. देखते-देखते, सुनते हैं, समूचा एडिशन ही बिक गया – न्यूज़प्रिंट के सस्ता कागज़ पर छपा. एक कॉपी भी नहीं मिलती कई महीनों से !

(मैला आंचल का यह अनूठा विज्ञापन स्वयं फणीश्वरनाथ रेणु ने तैयार किया था.)

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नाखून क्यों बढ़ते हैं? – हजारी प्रसाद द्विवेदी

अनुमानित समय : 2 मिनट-

बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी लड़की ने उस दिन पूछ लिया कि नाखून क्यों बढते हैं, तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका। हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्चे कुछ दिन तक अगर उन्हें बढ़ने दें, तो माँ-बाप अकसर उन्हें डाँटा करते हैं। पर कोई नहीं जनता कि ये अभागे नाखून क्यों इस प्रकार बढ़ा करते हैं। काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे; पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर। आखिर ये इतने बेहया क्यों हैं?

कुछ लाख वर्षों की बात है, जब मनुष्य जंगली था; बनमानुष जैसा। उसे नाखून की जरूरत थी। उसकी जीवन रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे। दाँत भी थे, पर नाखून के बाद ही उसका स्थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ना पड़ता था, नाखून उसके लिए आवश्यक अंग था। फिर वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा। पत्थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचन्द्रजी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्त्र थे)। उसने हड्डियों के भी हथियार बनाये। इन हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत और सब से ऐतिहासिक था देवताओं के राजा का वज्र, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। मनुष्य और आगे बढ़ा। उसने धातु के हथियार बनाये। जिनके पास लोहे के शस्त्र और अस्त्र थे, वे विजयी हुए। देवताओं के राजा तक को मनुष्यों के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी कि मनुष्यों के राजा के पास लोहे के अस्त्र थे। असुरों के पास अनेक विधाएँ थीं, पर लोहे के अस्त्र नहीं थे, शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थीं। आर्य विजयी हुए। फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया। नाग हारे, सुपर्ण हारे, यक्ष हारे, गन्धर्व हारे, असुर हारे, राक्षस हारे। लोहे के अस्त्रों ने बाजी मार ली। इतिहास आगे बढ़ा। पलीते-वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने बमवर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड़-भरे घाट तक घसीटा है, यह सबको मालूम है। नख-धर मनुष्य अब भी बढ़ रहे हैं। अब भी प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है, अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष पहले के नख-दन्तावलम्बी जीव हो – पशु के साथ एक ही सतह पर विचरने वाले और चरने वाले।

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सोना हिरनी -महादेवी वर्मा

अनुमानित समय : 10 मिनट-

 

सोना की आज अचानक स्मृति हो आने का कारण है। मेरे परिचित स्वर्गीय डाक्टर धीरेन्द्र नाथ वसु की पौत्री सस्मिता ने लिखा है :

‘गत वर्ष अपने पड़ोसी से मुझे एक हिरन मिला था। बीते कुछ महीनों में हम उससे बहुत स्नेह करने लगे हैं। परन्तु अब मैं अनुभव करती हूँ कि सघन जंगल से सम्बद्ध रहने के कारण तथा अब बड़े हो जाने के कारण उसे घूमने के लिए अधिक विस्तृत स्थान चाहिए।

‘क्या कृपा करके उसे स्वीकार करेंगी? सचमुच मैं आपकी बहुत आभारी हूँगी, क्योंकि आप जानती हैं, मैं उसे ऐसे व्यक्ति को नहीं देना चाहती, जो उससे बुरा व्यवहार करे। मेरा विश्वास है, आपके यहाँ उसकी भली भाँति देखभाल हो सकेगी।’

कई वर्ष पूर्व मैंने निश्चय किया कि अब हिरन नहीं पालूँगी, परन्तु आज उस नियम को भंग किए बिना इस कोमल-प्राण जीव की रक्षा सम्भव नहीं है।

सोना भी इसी प्रकार अचानक आई थी, परन्तु वह तब तक अपनी शैशवावस्था भी पार नहीं कर सकी थी। सुनहरे रंग के रेशमी लच्छों की गाँठ के समान उसका कोमल लघु शरीर था। छोटा-सा मुँह और बड़ी-बड़ी पानीदार आँखें। देखती थी तो लगता था कि अभी छलक पड़ेंगी। उनमें प्रसुप्त गति की बिजली की लहर आँखों में कौंध जाती थी।

सब उसके सरल शिशु रूप से इतने प्रभावित हुए कि किसी चम्पकवर्णा रूपसी के उपयुक्त सोना, सुवर्णा, स्वर्णलेखा आदि नाम उसका परिचय बन गए।

परन्तु उस बेचारे हरिण-शावक की कथा तो मिट्टी की ऐसी व्यथा कथा है, जिसे मनुष्य निष्ठुरता गढ़ती है। वह न किसी दुर्लभ खान के अमूल्य हीरे की कथा है और न अथाह समुद्र के महार्घ मोती की।

निर्जीव वस्तुओं से मनुष्य अपने शरीर का प्रसाधन मात्र करता है, अत: उनकी स्थिति में परिवर्तन के अतिरिक्त कुछ कथनीय नहीं रहता। परन्तु सजीव से उसे शरीर या अहंकार का जैसा पोषण अभीष्ट है, उसमें जीवन-मृत्यु का संघर्ष है, जो सारी जीवनकथा का तत्व है।

जिन्होंने हरीतिमा में लहराते हुए मैदान पर छलाँगें भरते हुए हिरनों के झुंड को देखा होगा, वही उस अद्भुत, गतिशील सौन्दर्य की कल्पना कर सकता है। मानो तरल मरकत के समुद्र में सुनहले फेनवाली लहरों का उद्वेलन हो। परन्तु जीवन के इस चल सौन्दर्य के प्रति शिकारी का आकर्षण नहीं रहता।

मैं प्राय: सोचती हूँ कि मनुष्य जीवन की ऐसी सुन्दर ऊर्जा को निष्क्रिय और जड़ बनाने के कार्य को मनोरंजन कैसे कहता है।

मनुष्य मृत्यु को असुन्दर ही नहीं, अपवित्र भी मानता है। उसके प्रियतम आत्मीय जन का शव भी उसके निकट अपवित्र, अस्पृश्य तथा भयजनक हो उठता है। जब मृत्यु इतनी अपवित्र और असुन्दर है, तब उसे बाँटते घूमना क्यों अपवित्र और असुन्दर कार्य नहीं है, यह मैं समझ नहीं पाती।

आकाश में रंगबिरंगे फूलों की घटाओं के समान उड़ते हुए और वीणा, वंशी, मुरज, जलतरंग आदि का वृन्दवादन (आर्केस्ट्रा) बजाते हुए पक्षी कितने सुन्दर जान पड़ते हैं। मनुष्य ने बन्दूक उठाई, निशाना साधा और कई गाते-उड़ते पक्षी धरती पर ढेले के समान आ गिरे। किसी की लाल-पीली चोंचवाली गर्दन टूट गई है, किसी के पीले सुन्दर पंजे टेढ़े हो गए हैं और किसी के इन्द्रधनुषी पंख बिखर गए हैं। क्षतविक्षत रक्तस्नात उन मृत-अर्धमृत लघु गातों में न अब संगीत है; न सौन्दर्य, परन्तु तब भी मारनेवाला अपनी सफलता पर नाच उठता है।

पक्षिजगत में ही नही, पशुजगत में भी मनुष्य की ध्वंसलीला ऐसी ही निष्ठुर है। पशुजगत में हिरन जैसा निरीह और सुन्दर पशु नहीं है – उसकी आँखें तो मानो करुणा की चित्रलिपि हैं। परन्तु इसका भी गतिमय, सजीव सौन्दर्य मनुष्य का मनोरंजन करने में असमर्थ है। मानव को, जो जीवन का श्रेष्ठतम रूप है, जीवन के अन्य रूपों के प्रति इतनी वितृष्णा और विरक्ति और मृत्यु के प्रति इतना मोह और इतना आकर्षण क्यों?

बेचारी सोना भी मनुष्य की इसी निष्ठुर मनोरंजनप्रियता के कारण अपने अरण्य-परिवेश और स्वजाति से दूर मानव समाज में आ पड़ी थी।

प्रशान्त वनस्थली में जब अलस भाव से रोमन्थन करता हुआ मृग समूह शिकारियों की आहट से चौंककर भागा, तब सोना की माँ सद्य:प्रसूता होने के कारण भागने में असमर्थ रही। सद्य:जात मृगशिशु तो भाग नहीं सकता था, अत: मृगी माँ ने अपनी सन्तान को अपने शरीर की ओट में सुरक्षित रखने के प्रयास में प्राण दिए।

पता नहीं, दया के कारण या कौतुकप्रियता के कारण शिकारी मृत हिरनी के साथ उसके रक्त से सने और ठंडे स्तनों से चिपटे हुए शावक को जीवित उठा लाए। उनमें से किसी के परिवार की सदय गृहिणी और बच्चों ने उसे पानी मिला दूध पिला-पिलाकर दो-चार दिन जीवित रखा।

सुस्मिता वसु के समान ही किसी बालिका को मेरा स्मरण हो आया और वह उस अनाथ शावक को मुमूर्ष अवस्था में मेरे पास ले आई। शावक अवांछित तो था ही, उसके बचने की आशा भी धूमिल थी, परन्तु मैंने उसे स्वीकार कर लिया। स्निग्ध सुनहले रंग के कारण सब उसे सोना कहने लगे। दूध पिलाने की शीशी, ग्लूकोज, बकरी का दूध आदि सब कुछ एकत्र करके, उसे पालने का कठिन अनुष्ठान आरम्भ हुआ।

उसका मुख इतना छोटा-सा था कि उसमें शीशी का निपल समाता ही नहीं था – उस पर उसे पीना भी नहीं आता था। फिर धीरे-धीरे उसे पीना ही नहीं, दूध की बोतल पहचानना भी आ गया। आँगन में कूदते-फाँदते हुए भी भक्तिन को बोतल साफ करते देखकर वह दौड़ आती और अपनी तरल चकित आँखों से उसे ऐसे देखने लगती, मानो वह कोई सजीव मित्र हो।

उसने रात में मेरे पलंग के पाये से सटकर बैठना सीख लिया था, पर वहाँ गंदा न करने की आदत कुछ दिनों के अभ्यास से पड़ सकी। अँधेरा होते ही वह मेरे कमरे में पलंग के पास आ बैठती और फिर सवेरा होने पर ही बाहर निकलती।

उसका दिन भर का कार्यकलाप भी एक प्रकार से निश्चित था। विद्यालय और छात्रावास की विद्यार्थिनियों के निकट पहले वह कौतुक का कारण रही, परन्तु कुछ दिन बीत जाने पर वह उनकी ऐसी प्रिय साथिन बन गई, जिसके बिना उनका किसी काम में मन नहीं लगता था।

दूध पीकर और भीगे चने खाकर सोना कुछ देर कम्पाउण्ड में चारों पैरों को सन्तुलित कर चौकड़ी भरती। फिर वह छात्रावास पहुँचती और प्रत्येक कमरे का भीतर, बाहर निरीक्षण करती। सवेरे छात्रावास में विचित्र-सी क्रियाशीलता रहती है – कोई छात्रा हाथ-मुँह धोती है, कोई बालों में कंघी करती है, कोई साड़ी बदलती है, कोई अपनी मेज की सफाई करती है, कोई स्नान करके भीगे कपड़े सूखने के लिए फैलाती है और कोई पूजा करती है। सोना के पहुँच जाने पर इस विविध कर्म-संकुलता में एक नया काम और जुड़ जाता था। कोई छात्रा उसके माथे पर कुमकुम का बड़ा-सा टीका लगा देती, कोई गले में रिबन बाँध देती और कोई पूजा के बताशे खिला देती।

मेस में उसके पहुँचते ही छात्राएँ ही नहीं, नौकर-चाकर तक दौड़ आते और सभी उसे कुछ-न-कुछ खिलाने को उतावले रहते, परन्तु उसे बिस्कुट को छोड़कर कम खाद्य पदार्थ पसन्द थे।

छात्रावास का जागरण और जलपान अध्याय समाप्त होने पर वह घास के मैदान में कभी दूब चरती और कभी उस पर लोटती रहती। मेरे भोजन का समय वह किस प्रकार जान लेती थी, यह समझने का उपाय नहीं है, परन्तु वह ठीक उसी समय भीतर आ जाती और तब तक मुझसे सटी खड़ी रहती जब तक मेरा खाना समाप्त न हो जाता। कुछ चावल, रोटी आदि उसका भी प्राप्य रहता था, परन्तु उसे कच्ची सब्जी ही अधिक भाती थी।

घंटी बजते ही वह फिर प्रार्थना के मैदान में पहुँच जाती और उसके समाप्त होने पर छात्रावास के समान ही कक्षाओं के भीतर-बाहर चक्कर लगाना आरम्भ करती।

उसे छोटे बच्चे अधिक प्रिय थे, क्योंकि उनके साथ खेलने का अधिक अवकाश रहता था। वे पंक्तिबद्ध खड़े होकर सोना-सोना पुकारते और वह उनके ऊपर से छ्लाँग लगाकर एक ओर से दूसरी ओर कूदती रहती। सरकस जैसा खेल कभी घंटों चलता, क्योंकि खेल के घंटों में बच्चों की कक्षा के उपरान्त दूसरी आती रहती।

मेरे प्रति स्नेह-प्रदर्शन के उसके कई प्रकार थे। बाहर खड़े होने पर वह सामने या पीछे से छ्लाँग लगाती और मेरे सिर के ऊपर से दूसरी ओर निकल जाती। प्राय: देखनेवालों को भय होता था कि उसके पैरों से मेरे सिर पर चोट न लग जावे, परन्तु वह पैरों को इस प्रकार सिकोड़े रहती थी और मेरे सिर को इतनी ऊँचाई से लाँघती थी कि चोट लगने की कोई सम्भावना ही नहीं रहती थी।

भीतर आने पर वह मेरे पैरों से अपना शरीर रगड़ने लगती। मेरे बैठे रहने पर वह साड़ी का छोर मुँह में भर लेती और कभी पीछे चुपचाप खड़े होकर चोटी ही चबा डालती। डाँटने पर वह अपनी बड़ी गोल और चकित आँखों में ऐसी अनिर्वचनीय जिज्ञासा भरकर एकटक देखने लगती कि हँसी आ जाती।

कविगुरु कालिदास ने अपने नाटक में मृगी-मृग-शावक आदि को इतना महत्व क्यों दिया है, यह हिरन पालने के उपरान्त ही ज्ञात होता है।

पालने पर वह पशु न रहकर ऐसा स्नेही संगी बन जाता है, जो मनुष्य के एकान्त शून्य को भर देता है, परन्तु खीझ उत्पन्न करने वाली जिज्ञासा से उसे बेझिल नहीं बनाता। यदि मनुष्य दूसरे मनुष्य से केवल नेत्रों से बात कर सकता, तो बहुत-से विवाद समाप्त हो जाते, परन्तु प्रकृति को यह अभीष्ट नहीं रहा होगा।

सम्भवत: इसी से मनुष्य वाणी द्वारा परस्पर किए गए आघातों और सार्थक शब्दभार से अपने प्राणों पर इन भाषाहीन जीवों की स्नेह तरल दृष्टि का चन्दन लेप लगाकर स्वस्थ और आश्वस्त होना चाहता है।

सरस्वती वाणी से ध्वनित-प्रतिध्वनित कण्व के आश्रम में ऋषियों, ऋषि-पत्नियों, ऋषि-कुमार-कुमारिकाओं के साथ मूक अज्ञान मृगों की स्थिति भी अनिवार्य है। मन्त्रपूत कुटियों के द्वार को नीहारकण चाहने वाले मृग रुँध लेते हैं। विदा लेती हुई शकुन्तला का गुरुजनों के उपदेश-आशीर्वाद से बेझिल अंचल, उसका अपत्यवत पालित मृगछौना थाम लेता है।

यस्य त्वया व्रणविरोपणमिंडगुदीनां

तैलं न्यषिच्यत मुखे कुशसूचिविद्धे।

श्यामाकमुष्टि परिवर्धिंतको जहाति

सो यं न पुत्रकृतक: पदवीं मृगस्ते॥

– अभिज्ञानशाकुन्तलम्

शकुन्तला के प्रश्न करने पर कि कौन मेरा अंचल खींच रहा है, कण्व कहते है :

कुश के काँटे से जिसका मुख छिद जाने पर तू उसे अच्छा करने के लिए हिंगोट का तेल लगाती थी, जिसे तूने मुट्ठी भर-भर सावाँ के दानों से पाला है, जो तेरे निकट पुत्रवत् है, वही तेरा मृग तुझे रोक रहा है।

साहित्य ही नहीं, लोकगीतों की मर्मस्पर्शिता में भी मृगों का विशेष योगदान रहता है।

पशु मनुष्य के निश्छल स्नेह से परिचित रहते हैं, उनकी ऊँची-नीची सामाजिक स्थितियों से नहीं, यह सत्य मुझे सोना से अनायास प्राप्त हो गया।

अनेक विद्यार्थिनियों की भारी-भरकम गुरूजी से सोना को क्या लेना-देना था। वह तो उस दृष्टि को पहचानती थी, जिसमें उसके लिए स्नेह छलकता था और उन हाथों को जानती थी, जिन्होंने यत्नपूर्वक दूध की बोतल उसके मुख से लगाई थी।

यदि सोना को अपने स्नेह की अभिव्यक्ति के लिए मेरे सिर के ऊपर से कूदना आवश्यक लगेगा तो वह कूदेगी ही। मेरी किसी अन्य परिस्थिति से प्रभावित होना, उसके लिए सम्भव ही नहीं था।

कुत्ता स्वामी और सेवक का अन्तर जानता है और स्वामी की स्नेह या क्रोध की प्रत्येक मुद्रा से परिचित रहता है। स्नेह से बुलाने पर वह गदगद होकर निकट आ जाता है और क्रोध करते ही सभीत और दयनीय बनकर दुबक जाता है।

पर हिरन यह अन्तर नहीं जानता, अत: उसका अपने पालनेवाले से डरना कठिन है। यदि उस पर क्रोध किया जावे तो वह अपनी चकित आँखों में और अधिक विस्मय भरकर पालनेवाले की दृष्टि से दृष्टि मिलाकर खड़ा रहेगा – मानो पूछता हो, क्या यह उचित है? वह केवल स्नेह पहचानता है, जिसकी स्वीकृति जताने के लिए उसकी विशेष चेष्टाएँ हैं।

मेरी बिल्ली गोधूली, कुत्ते हेमन्त-वसन्त, कुत्ती फ्लोरा सब पहले इस नए अतिथि को देखकर रुष्ट हुए, परन्तु सोना ने थोड़े ही दिनों में सबसे सख्य स्थापित कर लिया। फिर तो वह घास पर लेट जाती और कुत्ते-बिल्ली उस पर उछलते-कूदते रहते। कोई उसके कान खींचता, कोई पैर और जब वे इस खेल में तन्मय हो जाते, तब वह अचानक चौकड़ी भरकर भागती और वे गिरते-पड़ते उसके पीछे दौड़ लगाते।

वर्ष भर का समय बीत जाने पर सोना हरिण शावक से हरिणी में परिवर्तित होने लगी। उसके शरीर के पीताभ रोयें ताम्रवर्णी झलक देने लगे। टाँगें अधिक सुडौल और खुरों के कालेपन में चमक आ गई। ग्रीवा अधिक बंकिम और लचीली हो गई। पीठ में भराव वाला उतार-चढ़ाव और स्निग्धता दिखाई देने लगी। परन्तु सबसे अधिक विशेषता तो उसकी आँखों और दृष्टि में मिलती थी। आँखों के चारों ओर खिंची कज्जल कोर में नीले गोलक और दृष्टि ऐसी लगती थी, मानो नीलम के बल्बों में उजली विद्युत का स्फुरण हो।

सम्भवत: अब उसमें वन तथा स्वजाति का स्मृति-संस्कार जागने लगा था। प्राय: सूने मैदान में वह गर्दन ऊँची करके किसी की आहट की प्रतीक्षा में खड़ी रहती। वासन्ती हवा बहने पर यह मूक प्रतीक्षा और अधिक मार्मिक हो उठती। शैशव के साथियों और उनकी उछ्ल-कूद से अब उसका पहले जैसा मनोरंजन नहीं होता था, अत: उसकी प्रतीक्षा के क्षण अधिक होते जाते थे।

इसी बीच फ्लोरा ने भक्तिन की कुछ अँधेरी कोठरी के एकान्त कोने में चार बच्चों को जन्म दिया और वह खेल के संगियों को भूल कर अपनी नवीन सृष्टि के संरक्षण में व्यस्त हो गई। एक-दो दिन सोना अपनी सखी को खोजती रही, फिर उसे इतने लघु जीवों से घिरा देख कर उसकी स्वाभाविक चकित दृष्टि गम्भीर विस्मय से भर गई।

एक दिन देखा, फ्लोरा कहीं बाहर घूमने गई है और सोना भक्तिन की कोठरी में निश्चिन्त लेटी है। पिल्ले आँखें बन्द करने के कारण चीं-चीं करते हुए सोना के उदर में दूध खोज रहे थे। तब से सोना के नित्य के कार्यक्रम में पिल्लों के बीच लेट जाना भी सम्मिलित हो गया। आश्चर्य की बात यह थी कि फ्लोरा, हेमन्त, वसन्त या गोधूली को तो अपने बच्चों के पास फटकने भी नहीं देती थी, परन्तु सोना के संरक्षण में उन्हें छोड़कर आश्वस्त भाव से इधर-उधर घूमने चली जाती थी।

सम्भवत: वह सोना की स्नेही और अहिंसक प्रकृति से परिचित हो गई थी। पिल्लों के बड़े होने पर और उनकी आँखें खुल जाने पर सोना ने उन्हें भी अपने पीछे घूमनेवाली सेना में सम्मिलित कर लिया और मानो इस वृद्धि के उपलक्ष में आनन्दोत्सव मनाने के लिए अधिक देर तक मेरे सिर के आरपार चौकड़ी भरती रही। पर कुछ दिनों के उपरान्त जब यह आनन्दोत्सव पुराना पड़ गया, तब उसकी शब्दहीन, संज्ञाहीन प्रतीक्षा की स्तब्ध घड़ियाँ फिर लौट आईं।

उसी वर्ष गर्मियों में मेरा बद्रीनाथ-यात्रा का कार्यक्रम बना। प्राय: मैं अपने पालतू जीवों के कारण प्रवास कम करती हूँ। उनकी देखरेख के लिए सेवक रहने पर भी मैं उन्हें छोड़कर आश्वस्त नहीं हो पाती। भक्तिन, अनुरूप (नौकर) आदि तो साथ जाने वाले थे ही, पालतू जीवों में से मैंने फ्लोरा को साथ ले जाने का निश्चिय किया, क्योंकि वह मेरे बिना रह नहीं सकती थी।

छात्रावास बन्द था, अत: सोना के नित्य नैमित्तिक कार्य-कलाप भी बन्द हो गए थे। मेरी उपस्थिति का भी अभाव था, अत: उसके आनन्दोल्लास के लिए भी अवकाश कम था।

हेमन्त-वसन्त मेरी यात्रा और तज्जनित अनुपस्थिति से परिचित हो चुके थे। होल्डाल बिछाकर उसमें बिस्तर रखते ही वे दौड़कर उस पर लेट जाते और भौंकने तथा क्रन्दन की ध्वनियों के सम्मिलित स्वर में मुझे मानो उपालम्भ देने लगते। यदि उन्हें बाँध न रखा जाता तो वे कार में घुसकर बैठ जाते या उसके पीछे-पीछे दौड़कर स्टेशन तक जा पहुँचते। परन्तु जब मैं चली जाती, तब वे उदास भाव से मेरे लौटने की प्रतीक्षा करने लगते।

सोना की सहज चेतना में मेरी यात्रा जैसी स्थिति का बोध था, नप्रत्यावर्तन का; इसी से उसकी निराश जिज्ञासा और विस्मय का अनुमान मेरे लिए सहज था।

पैदल जाने-आने के निश्चय के कारण बद्रीनाथ की यात्रा में ग्रीष्मावकाश समाप्त हो गया। 2 जुलाई को लौटकर जब मैं बँगले के द्वार पर आ खड़ी हुई, तब बिछुड़े हुए पालतू जीवों में कोलाहल होने लगा।

गोधूली कूदकर कन्धे पर आ बैठी। हेमन्त-वसन्त मेरे चारों ओर परिक्रमा करके हर्ष की ध्वनियों में मेरा स्वागत करने लगे। पर मेरी दृष्टि सोना को खोजने लगी। क्यों वह अपना उल्लास व्यक्त करने के लिए मेरे सिर के ऊपर से छ्लाँग नहीं लगाती? सोना कहाँ है, पूछने पर माली आँखें पोंछने लगा और चपरासी, चौकीदार एक-दूसरे का मुख देखने लगे। वे लोग, आने के साथ ही मुझे कोई दु:खद समाचार नहीं देना चाहते थे, परन्तु माली की भावुकता ने बिना बोले ही उसे दे डाला।

ज्ञात हुआ कि छात्रावास के सन्नाटे और फ्लोरा के तथा मेरे अभाव के कारण सोना इतनी अस्थिर हो गई थी कि इधर-उधर कुछ खोजती-सी वह प्राय: कम्पाउण्ड से बाहर निकल जाती थी। इतनी बड़ी हिरनी को पालनेवाले तो कम थे, परन्तु उससे खाद्य और स्वाद प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों का बाहुल्य था। इसी आशंका से माली ने उसे मैदान में एक लम्बी रस्सी से बाँधना आरम्भ कर दिया था।

एक दिन न जाने किस स्तब्धता की स्थिति में बन्धन की सीमा भूलकर बहुत ऊचाँई तक उछली और रस्सी के कारण मुख के बल धरती पर आ गिरी। वही उसकी अन्तिम साँस और अन्तिम उछाल थी।

सब उस सुनहले रेशम की गठरी के शरीर को गंगा में प्रवाहित कर आए और इस प्रकार किसी निर्जन वन में जन्मी और जन-संकुलता में पली सोना की करुण कथा का अन्त हुआ।

सब सुनकर मैंने निश्चय किया था कि हिरन नहीं पालूँगी, पर संयोग से फिर हिरन ही पालना पड़ रहा है।

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घीसा – महादेवी वर्मा

अनुमानित समय : 14 मिनट-

महादेवी वर्मा के जन्मदिन पर विशेष 

वर्तमान की कौन-सी अज्ञात प्रेरणा हमारे अतीत की किसी भूली हुई कथा को सम्पूर्ण मार्मिकता के साथ दोहरा जाती है, यह जान लेना सहज होता तो मैं भी आज गांव के उस मलिन सहमे नन्हे-से विद्यार्थी की सहसा याद आ जाने का कारण बता सकती, जो एक छोटी लहर के समान ही मेरे जीवन-तट को अपनी सारी आर्द्रता से छूकर अनन्त जलराशि में विलीन हो गया है।

गंगा पार झूंसी के खंडहर और उसके आस-पास के गांवों के प्रति मेरा जैसा अकारण आकर्षण रहा है, उसे देखकर ही सम्भवत: लोग जन्म-जन्मान्तर के संबंध का व्यंग करने लगे हैं। है भी तो आश्चर्य की बात! जिस अवकाश के समय को लोग इष्ट-मित्रों से मिलने, उत्सवों में सम्मिलित होने तथा अन्य आमोद-प्रमोद के लिए सुरक्षित रखते हैं, उसी को मैं इस खंडहर और उसके क्षत-विक्षत चरणों पर पछाड़ें खाती हुई भागीरथी के तट पर काट ही नहीं, सुख से काट देती हूं।

दूर-पास बसे हुए गुड़ियों के बड़े-बड़े घरौंदों के समान लगने वाले कुछ लिपे-पुते, कुछ जीर्ण-शीर्ण घरों से स्त्रियों का झुण्ड पीतल-तांबे के चमचमाते मिट्टी के नए लाल और पुराने बदरंग घड़े लेकर गंगाजल भरने आता है, उसे भी मैं पहचान गई हूं। उनमें कोई बूटेदार लाल, कोई कुछ सफेद और कोई मैल और सूत में अद्वैत स्थापित करने वाली, कोई कुछ नई और कोई छेदों से चलनी बनी हुई धोती पहने रहती हैं। किसी की मोम लगी पाटियों के बीच में एक अंगुल चौड़ी सिंदूर-रेखा अस्त होते हुए सूर्य की किरणों में चमकती रहती है और किसी की कड़वे तेल से भी अपरिचित रूखी जटा बनी हुई छोटी-छोटी लटें मुख को घेर कर उसकी उदासी को और अधिक केन्द्रित कर देती हैं। किसी की सांवली गोल कलाई पर शहर की कच्ची नगदार चूड़ियों के नग रह-रहकर हीरे-से चमक जाते हैं और किसी के दुर्बल काले पहुंचे पर लाख की पीली मैली चूड़ियां काले पत्थर पर मटमैले चन्दन की लकीरें जान पड़ती हैं। कोई अपने गिलट के कड़े-युक्त हाथ घड़े की ओट में छिपाने का प्रयत्न-सा करती रहती है और कोई चांदी के पछेली-ककना की झनकार के साथ ही बात करती है।

किसी के कान में लाख की पैसे वाली तरकी धोती से कभी-कभी झांक भर लेती है और किसी की ढारें लम्बी जंज़ीर से गला और गाल एक करती रहती है। किसी के गुदना गुदे गेहुंए पैरों में चांदी के कड़े सुडौलता की परिधि-सी लगते हैं और किसी की फैली उंगलियों और सफेद एड़ियों के साथ मिली हुइ स्याही रांगे और कांसे के कड़ों को लोहे की साफ की हुई बेड़ियां बना देती हैं।

वे सब पहले हाथ-मुंह धोती हैं, फिर पानी में कुछ घुसकर घड़ा भर लेती हैं – तब घड़ा किनारे रख, सिर पर इंडुरी ठीक करती हुई मेरी ओर देखकर कभी-मलिन, कभी-उजली, कभी दु:ख की व्यथा-भरी, कभी सुख की कथा-भरी मुस्कान से मुस्करा देती हैं। अपने-मेरे बीच का अन्तर उन्हें ज्ञात है, तभी कदाचित् वे मुस्कान के सेतु से उसका वार-पार जोड़ना नहीं भूलतीं।

ग्वालों के बालक अपनी चरती हुई गाय-भैसों में से किसी को उस ओर बहकते देखकर ही लकुटी लेकर दौड़ पड़ते, गडरियों के बच्चे अपने झुंड की एक भी बकरी या भेड़ को उस ओर बढ़ते देखकर कान पकड़कर खींच ले जाते हैं और व्यर्थ दिन भर गिल्ली-डंडा खेलने वाले निठल्ले लड़के भी बीच-बीच में नज़र बचाकर मेरा रुख देखना नहीं भूलते।

उस पार शहर में दूध बेचने जाते या लौटते हुए ग्वाले, किले में काम करने जाते या घर आते हुए मज़दूर, नाव बांधते या खोलते हुए मल्लाह, कभी-कभी ‘चुनरी त रंगाउव लाल मजीठी हो’ गाते-गाते मुझ पर दृष्टि पड़ते ही अचकचा कर चुप हो जाते हैं। कुछ विशेष सभ्य होने का गर्व करने वालों से मुझे एक सलज्ज नमस्कार भी प्राप्त हो जाता है।

XXX

कह नहीं सकती, कब और कैसे मुझे उन बालकों को कुछ सिखाने का ध्यान आया, पर जब बिना कार्यकारिणी के, निर्वाचन के, बिना पदाधिकारियों के चुनाव के, बिना भवन के, बिना चंदे की अपील के और सारांश यह कि बिना किसी चिर-परिचित समारोह के, मेरे विद्यार्थी पीपल के पेड़ की घनी छाया में मेरे चारों ओर एकत्र हो गए, तब मैं बड़ी कठिनाई से गुरु के उपयुक्त गम्भीरता का भार वहन कर सकी।

और वे जिज्ञासु कैसे थे सो कैसे बताऊं! कुछ कानों में बालियां और हाथों में कड़े पहने धुले कुरते और ऊंची धोती में नगर और ग्राम का सम्मिश्रण जान पड़ते थे, कुछ अपने बड़े भाई का पांव तक लम्बा कुरता पहने खेत में डराने के लिए खड़े किए हुए नकली आदमी का स्मरण दिलाते थे, कुछ उभरी पसलियों, बड़े पेट और टेढ़ी दुर्बल टांगों के कारण अनुमान से ही मनुष्य-संतान की परिभाषा में आ सकते थे और कुछ अपने दुर्बल, रूखे और मलिन मुखों की करुण सौम्यता और निष्प्रभ पीली आंखों में संसार भर की उपेक्षा बटोर बैठे थे; पर घीसा उनमें अकेला ही रहा और आज भी मेरी स्मृति में अकेला ही आता है।

वह गोधूली मुझे अब तक नहीं भूली। संध्या के लाल सुनहली आभा वाले उड़ते हुए दुकूल पर रात्रि ने मानो छिपकर अंजन की मूठ चला दी थी। मेरा नाव वाला कुछ चिंतित-सा लहरों की ओर देख रहा था; बूढ़ी भक्तिन मेरी किताबें, कागज़-कलम आदि सम्भाल कर नाव पर रख कर बढ़ते अंधकार पर खिजलाकर बुदबुदा रही थी या मुझे कुछ सनकी बनाने वाले विधाता पर, यह समझना कठिन था। बेचारी मेरे साथ रहते-रहते दस लम्बे वर्ष काट आई है, नौकरानी से अपने-आपको एक प्रकार की अभिभाविका मानने लगी है; परन्तु मेरी सनक का दुष्परिणाम सहने के अतिरिक्त उसे क्या मिला है? सहसा ममता से मेरा मन भर आया; परन्तु नाव की ओर बढ़ते हुए मेरे पैर, फैलते हुए अंधकार में से एक स्त्री-मूर्ति को अपनी ओर आता देख ठिठक रहे। सांवले, कुछ लम्बे-से मुखड़े में पतले स्याह ओठ कुछ अधिक स्पष्ट हो रहे थे। आंखें छोटी पर व्यथा से आर्द्र थीं। मलिन, बिना किनारी की गाढ़े की धोती ने उसके सलूकारहित अंगों को भलीभांति ढक लिया था, परन्तु तब भी शरीर की सुडौलता का आभास मिल रहा था। कंधे पर हाथ रखकर वह जिस दुर्बल अर्धनग्न बालक को अपने पैरों से चिपकाए हुए थी, उसे मैंने संध्या के झुटपुटे में ठीक से नहीं देखा।

स्त्री ने रुक-रुककर कुछ शब्दों और कुछ संकेत में जो कहा, उससे मैं केवल यह समझ सकी कि उसके पति नहीं हैं, दूसरों के घर लीपने-पोतने का काम करने वह चली जाती है और उसका यह अकेला लड़का ऐसे ही घूमता रहता है। मैं इसे भी और बच्चों के साथ बैठने दिया करूं, तो यह कुछ तो सीख सके।

दूसरे इतवार को मैंने उसे सबसे पीछे अकेले एक ओर दुबक कर बैठे हुए देखा। पक्का रंग, पर गठन में विशेष सुडौल, मलिन मुख जिसमें दो पीली, पर सचेत आंखें जड़ी-सी जान पड़ती थीं। कसकर बंद किए हुए पतले ओठों की दृढ़ता और सिर पर खड़े हुए छोटे-छोटे रूखे बालों की उग्रता उसके मुख की संकोच भरी कोमलता से विद्रोह कर रही थी। उभरी हड्डियों वाली गर्दन को सम्भाले हुए झुके कंधों से, रक्तहीन मटमैली हथेलियों और टेढ़े-मेढ़े कटे हुए नाखूनों युक्त हाथों वाली पतली बांहें ऐसी झूलती थीं, जैसे ड्रामा में विष्णु बनने वाले की दो नकली भुजाएं। निरन्तर दौड़ते रहने के कारण उस लचीले शरीर में दुबले पैर ही विशेष पुष्ट जान पड़ते थे। बस ऐसा ही था वह, न नाम में कवित्व की गुंजाइश, न शरीर में।

पर उसकी सचेत आंखों में न जाने कौन-सी जिज्ञासा भरी थी। वे निरन्तर घड़ी की तरह खुली मेरे मुख पर टिकी ही रहती थीं। मानो मेरी सारी विद्या-बुद्धि को सीख लेना ही उनका ध्येय था।

लड़के उससे कुछ खिंचे-खिंचे से रहते थे। इसलिए नहीं कि यह कोरी था, वरन् इसलिए कि किसी की मां, किसी की नानी, किसी की बुआ आदि ने घीसा से दूर रहने की नितांत आवश्यकता उन्हें कान पकड़-पकड़ कर समझा दी थी। यह भी उन्होंने बताया और बताया घीसा के सबसे अधिक कुरूप नाम का रहस्य। बाप तो जन्म से पहले ही नहीं रहा। घर में कोई देखने-भालने वाला न होने के कारण मां उसे बंदरिया के बच्चे के समान चिपकाए फिरती थी। उसे एक ओर लिटाकर जब वह मज़दूरी के काम में लग जाती थी, तब पेट के बल घसिट-घसिट कर बालक संसार के प्रथम अनुभव के साथ-साथ इस नाम की योग्यता भी प्राप्त करता जाता था।

फिर धीरे-धीरे अन्य स्त्रियां भी मुझे आते-जाते रोककर अनेक प्रकार की भाव-भंगिमा के साथ एक विचित्र सांकेतिक भाषा में घीसा की जन्म-जात अयोग्यता का परिचय देने लगीं। क्रमश: मैंने उसके नाम के अतिरिक्त और कुछ भी जाना।

उसका बाप था तो कोरी, पर बड़ा ही अभिमानी और भला आदमी बनने का इच्छुक। डलिया आदि बुनने का काम छोड़कर वह थोड़ी बढ़ई गिरी सीख आया और केवल इतना ही नहीं, एक दिन चुपचाप दूसरे गांव से युवती वधू लाकर उसने अपने गांव की सब सजातीय सुंदरी बालिकाओं को उपेक्षित और उनके योग्य माता-पिता को निराश कर डाला। मनुष्य इतना अन्याय सह सकता है, परन्तु ऐसे अवसर पर भगवान की असहिष्णुता प्रसिद्ध ही है। इसी से जब गांव के चौखट-किवाड़ बनाकर और ठाकुरों के घरों में सफेदी करके उसने कुछ ठाट-बाट से रहना आरम्भ किया, तब अचानक हैजे के बहाने वह वहां बुला लिया गया, जहां न जाने का बहाना न उसकी बुद्धि सोच सकी, न अभिमान।

पर स्त्री भी कम गर्वीली न निकली। गांव के अनेक विधुर और अविवाहित कोरियों ने केवल उदारतावश ही उसकी नैया पार लगाने का उत्तरदायित्व लेना चाहा; परन्तु उसने केवल कोरा उत्तर ही नहीं दिया, प्रत्युत उसे नमक-मिर्च लगाकर तीत भी कर दिया। कहा – ‘हम सिंघ के मेहरा डिग्री होइके का सियारन के ब्याब।’ फिर बिना स्वर-ताल के आंसू गिराकर, बाल खोलकर, चूड़ियां फोड़कर और बिना किनारे की धोती पहनकर जब उसने बड़े घर की विधवा का स्वांग भरना आरम्भ किया, तब तो सारा समाज क्षोभ के समुद्र में डूबने-उतराने लगा। उस पर घीसा बाप के मरने के बाद हुआ है। हुआ तो वास्तव में छह महीने बाद, परन्तु उस समय के संबंध में क्या कहा जाए, जिसका कभी एक क्षण वर्ष-सा बीतता है और कभी एक वर्ष क्षण हो जाता है। इसी से यदि छह मास का समय रबर की तरह खिंचकर एक साल की अवधि तक पहुंच गया, तो इसमें गांव वालों का क्या दोष!

XXX

यह कथा अनेक क्षेपकोमय विस्तार के साथ सुनाई तो गई थी मेरा मन फेरने के लिए और फिरा भी, परन्तु किसी सनातन नियम से कथा वाचक की ओर न फिरकर कथा के नायकों की ओर फिर गया और इस प्रकार घीसा मेरे और अधिक निकट आ गया। वह अपना जीवन-संबंधी अपवाद कदाचित् पूरा नहीं समझ पाया था; परन्तु अधूरे का भी प्रभाव उस पर कम न था, क्योंकि वह सबको अपनी छाया से इस प्रकार बचाता रहता था, मानो उसे कोई छूत की बीमारी हो।

पढ़ने, उसे सबसे पहले समझने, उसे व्यवहार के समय स्मरण रखने, पुस्तक का उत्तरदायित्व बड़ी गम्भीरता से निभाने में उसके समान कोई चतुर न था। इसी से कभी-कभी मन चाहता था कि उसकी मां से उसे मांग ले जाऊं और अपने पास रखकर उसके विकास की उचित व्यवस्था कर दूं – परन्तु उस उपेक्षिता, पर मानिनी विधवा का वही एक सहारा था। वह अपने पति का स्थान छोड़ने पर प्रस्तुत न होगी, यह भी मेरा मन जानता था और उस बालक के बिना उसका जीवन कितना दुर्वह हो सकता है, यह भी मुझसे छिपा न था। फिर नौ साल के कर्त्तव्यपरायण घीसा की गुरु-भक्ति देखकर उसकी मातृ-भक्ति के संबंध में कुछ संदेह करने का स्थान ही नहीं रह जाता था और इस तरह घीसा ही उन्हीं कठोर परिस्थितियों में रहा, जहां क्रूरतम नियति ने केवल अपने मनोविनोद के लिए ही उसे रख दिया था।

शनिश्चर के दिन ही वह अपने छोटे दुर्बल हाथों से पीपल की छाया को गोबर-मिट्टी से पीला चिकनापन दे आता था। फिर इतवार को मां के मज़दूरी पर जाते ही एक मैले, फटे कपड़े में बंधी मोटी-रोटी और कुछ नमक या थोड़ा चबेना और एक डली गुड़ बगल में दबाकर, पीपल की छाया को एक बार फिर झाड़ने-बुहारने के पश्चात् वह गंगा के तट पर आ बैठता और अपनी पीली सतेज आंखों पर क्षीण सांवले हाथ की छाया कर दूर-दूर तक दृष्टि को दौड़ाता रहता। जैसे ही उसे मेरी नीली सफेद नाव की झलक दिखाई पड़ती, वैसे ही वह अपनी पतली टांगों पर तीर के समान उड़ता और बिना नाम लिए हुए ही साथियों को सुनाने के लिए गुरु साहब कहता हुआ फिर पेड़ के नीचे पहुंच जाता, जहां न जाने कितनी बार दुहराये-तिहराये हुए कार्यक्रम की एक अंतिम आवृत्ति आवश्यक हो उठती। पेड़ की नीची डाल पर रखी हुई मेरी शीतलपाटी उतार कर बार-बार झाड़-पोंछकर बिछाई जाती, कभी काम न आने वाली सूखी स्याही से काली कच्चे कांच की दवात, टूटे निब और उखड़े हुए रंगवाले भूरे, हरे कलम के साथ पेड़ के कोटर से निकालकर यथास्थान रख दी जाती और तब इस विचित्र पाठशाला का विचित्र मंत्री और निराला विद्यार्थी कुछ आगे बढ़कर मेरे सप्रणाम स्वागत के लिए प्रस्तुत हो जाता।

महीने में चार दिन ही मैं वहां पहुंच सकती थी और कभी-कभी काम की अधिकता से एक-आध छुट्टी का दिन और भी निकल जाता था; पर उस थोड़े से समय और इने-गिने दिनों में भी मुझे उस बालक के हृदय का जैसा परिचय मिला, वह चित्र के एलबम के समान निरन्तर नवीन-सा लगता है।

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मुझे आज भी वह दिन नहीं भूलता जब मैंने बिना कपड़ों का प्रबंध किए हुए ही उन बेचारों को सफाई का महत्व समझाते-समझाते थका डालने की मूर्खता की। दूसरे इतवार को सब जैसे-के-तैसे ही सामने थे – केवल कुछ गंगाजी में मुंह इस तरह धो आए थे कि मैल अनेक रेखाओं में विभक्त हो गया था, कुछ के हाथ-पांव ऐसे घिसे थे कि शेष मलिन शरीर के साथ वे अलग जोड़े हुए से लगते थे। और कुछ न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी की कहावत चरितार्थ करने के लिए मैले फटे कुरते घर ही छोड़ कर ऐसे अस्थिपंजरमय रूप में आ उपस्थित हुए थे, जिसमें उनके प्राण, रहने पर ही आश्चर्य है। घीसा गायब था। पूछने पर लड़के काना-फूसी करने को या एक साथ सभी उसकी अनुपस्थिति का कारण सुनाने को आतुर होने लगे। एक-एक शब्द जोड़-तोड़कर समझना पड़ा कि घीसा मां से कपड़ा धोने के साबुन के लिए तभी से कह रहा था – मां को मज़दूरी के पैसे मिले नहीं और दुकानदार ने नाज़ लेकर साबुन दिया नहीं। कल रात को मां को पैसे मिले और आज सबेरे वह सब काम छोड़कर पहले साबुन लेने गई। अभी लौटी है, अत: घीसा कपड़े धो रहा है, क्योंकि गुरु साहब ने कहा था कि नहा-धोकर साफ कपड़े पहन कर आना। और अभागे के पास कपड़े ही क्या थे। किसी दयावती का दिया हुआ एक पुराना कुरता, जिसकी एक आस्तीन आधी थी और एक अंगोछा-जैसा फटा टुकड़ा। जब घीसा नहाकर गीला अंगोछा लपेटे और आधा भीगा कुरता पहने अपराधी के समान मेरे सामने आ खड़ा हुआ, तब आंखें ही नहीं, मेरा रोम-रोम गीला हो गया। उस समय समझ में आया कि द्रोणाचार्य ने अपने शिष्य से अंगूठा कैसे कटवा दिया था।

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एक दिन न जाने क्या सोचकर मैं उन विद्यार्थियों के लिए 5-6 सेर जलेबियां ले गई; पर कुछ तोलने वाले की सफाई से, कुछ तुलवाने वाले की समझदारी से और कुछ वहां की छीना-झपटी के कारण प्रत्येक को पांच से अधिक न मिल सकीं। एक कहता था – मुझे एक कम मिली, दूसरे ने बताया – मेरी अमुक ने छीन ली। तीसरे को घर में सोते हुए छोटे भाई के लिए चाहिए, चौथे को किसी और की याद आ गई। पर इस कोलाहल में अपने हिस्से की जलेबियां लेकर घीसा कहां खिसक गया, यह कोई न जान सका। एक नटखट अपने साथी से कह रहा था – “सार एक ठो पिलवा पाले है, ओही का देय बरे गा होई।” पर मेरी दृष्टि से संकुचित होकर चुप रह गया और तब तक घीसा लौटा ही। उसका सब हिसाब ठीक था – जलखई वाले छन्ने में दो जलेबियां लपेट कर वह माई के लिए छप्पर में खोंस आया है, एक उसने अपने पाले हुए, बिना मां के कुत्ते के पिल्ले को खिला दी और दो स्वयं खा लीं। “और चाहिए” पूछने पर उसकी संकोच भरी आंखें झुक गईं – ओठ कुछ हिले। पता चला कि पिल्ले को उससे कम मिली है। “दें तो गुरु साहब पिल्ले को ही एक और दे दें।”

XXX

और होली के पहले की एक घटना तो मेरी स्मृति में ऐसे गहरे रंगों से अंकित है, जिसका धुल सकना सहज नहीं। उन दिनों हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य धीरे-धीरे बढ़ रहा था और किसी दिन उसके चरम सीमा तक पहुंच जाने की पूर्ण सम्भावना थी। घीसा दो सप्ताह से ज्वर में पड़ा था – दवा मैं भिजवा देती थी; परन्तु देखभाल का कोई ठीक प्रबंध न हो पाता था। दो-चार दिन उसकी मां स्वयं बैठी रही। फिर एक अंधी बुढ़िया को बैठाकर काम पर जाने लगी।

इतवार की सांझ को मैं बच्चों को विदा दे, घीसा को देखने चली; परन्तु पीपल के पचास पग दूर पहुंचते-पहुंचते उसी को डगमगाते पैरों से गिरते-पड़ते अपनी ओर आते देख, मेरा मन उद्विग्न हो उठा। वह तो इधर पंद्रह दिन से उठा ही नहीं था; अत: मुझे उसके सन्निपातग्रस्त होने का ही संदेह हुआ। उसके सूखे शरीर में तरल विद्युत-सी दौड़ रही थी, आंखें और भी सतेज और मुख ऐसा था जैसे हल्की आंच में धीरे-धीरे लाल होने वाला लोहे का टुकड़ा।

पर उसके वात-ग्रस्त होने से भी अधिक चिंताजनक उसकी समझदारी की कहानी निकली। वह प्यास से जाग गया था; पानी पास मिला नहीं और मनियां की अंधी आजी से मांगना ठीक न समझकर वह चुपचाप कष्ट सहने लगा। इतने में मुल्लू के कक्का ने पार से लौटकर दरवाज़े से ही अंधी को बताया कि शहर में दंगा हो रहा है और तब उसे गुरु साहब का ध्यान आया। मुल्लू के कक्का के हटते ही वह ऐसे हौले-हौले उठा कि बुढ़िया को पता ही न चला और कभी दीवार, कभी पेड़ का सहारा लेता-लेता इस ओर भागा। अब वह गुरु साहब के गोड़ धर कर यहीं पड़ा रहेगा; पर पार किसी तरह भी न जाने देगा।

तब मेरी समस्या और भी जटिल हो गई। पार तो मुझे पहुंचना था ही; पर साथ ही बीमार घीसा को ऐसे समझाकर, जिससे उसकी स्थिति और गंभीर न हो जाए। पर सदा के संकोची, नम्र और आज्ञाकारी घीसा का इस दृढ़ और हठी बालक में पता ही न चलता था। उसने परसाल ऐसे ही अवसर पर हताहत दो मल्लाह देखे थे और कदाचित् इस समय उसका रोग से विकृत मस्तिष्क उन चित्रों में गहरा रंग भर कर मेरी उलझन को और उलझा रहा था। पर उसे समझाने का प्रयत्न करते-करते अचानक ही मैंने एक ऐसा तार छू दिया, जिसका स्वर मेरे लिए भी नया था। यह सुनते ही कि मेरे पास रेल में बैठकर दूर-दूर से आए हुए बहुत से विद्यार्थी हैं जो अपनी मां के पास साल भर में एक बार ही पहुंच पाते हैं और जो मेरे न जाने से अकेले घबरा जाएंगे, घीसा का सारा हठ, सारा विरोध ऐसे बह गया जैसे वह कभी था ही नहीं। और तब घीसा के समान तर्क की क्षमता किसमें थी! जो सांझ को अपनी माई के पास नहीं जा सकते, उनके पास गुरु साहब को जाना ही चाहिए। घीसा रोकेगा, तो उसके भगवान जी गुस्सा हो जाएंगे, क्योंकि वे ही तो घीसा को अकेला बेकार घूमता देखकर गुरु साहब को भेज देते हैं, आदि-आदि उसके तर्कों का स्मरण कर आज भी मन भर आता है। परन्तु उस दिन मुझे आपत्ति से बचाने के लिए अपने बुखार से जलते हुए अशक्त शरीर को घसीट लाने वाले घीसा को जब उसकी टूटी खटिया पर लिटा कर मैं लौटी, तब मेरे मन में कौतूहल की मात्रा ही अधिक थी।

इसके उपरांत घीसा अच्छा हो गया और धूल और सूखी पत्तियों को बांध कर उन्मत्त के समान घूमने वाली गर्मी की हवा से उसका रोज़ संग्राम छिड़ने लगा – झाड़ते-झाड़ते ही वह पाठशाला धूल-धूसरित होकर भूरे, पीले और कुछ हरे पत्तों की चादर में छिपकर तथा कंकालशेषी शाखाओं में उलझते, सूखे पत्तों को पुकारते वायु की संतप्त सरसर से मुखरित होकर उस भ्रान्त बालक को चिढ़ाने लगती। तब मैंने तीसरे पहर से संध्या समय तक वहां रहने का निश्चय किया; परन्तु पता चला घीसा किसकिसाती आंखों को मलता और पुस्तक से बार-बार धूल झाड़ता हुआ दिन भर वहीं पेड़ के नीचे बैठा रहता है, मानो वह किसी प्राचीन युग का तपोव्रती अनागरिक ब्रह्मचारी हो, जिसकी तपस्या भंग के लिए ही लू के झोंके आते हैं।

इस प्रकार चलते-चलते समय ने जब दाईं छूने के लिए दौड़े हुए बालक के समान झपट कर उस दिन पर उंगली धर दी, जब मुझे उन लोगों को छोड़ जाना था, तब तो मेरा मन बहुत ही अस्थिर हो उठा। कुछ बालक उदास थे और कुछ खेलने की छुट्टी से प्रसन्न! कुछ जानना चाहते थे कि छुट्टियों के दिन चूने की टिपकियां रखकर गिने जाएं, या कोयले की लकीरें खींचकर। कुछ के सामने बरसात में चूते हुए घर में आठ पृष्ठ की पुस्तक बचा रखने का प्रश्न था और कुछ कागज़ों पर चूहों के आक्रमण की ही समस्या का समाधान चाहते थे। ऐसे महत्वपूर्ण कोलाहल में घीसा न जाने कैसे अपना रहना अनावश्यक समझ लेता था, अत: सदा के समान आज भी मैं उसे न खोज पाई। जब मैं कुछ चिंतित-सी वहां से चली, तब मन भारी-भारी हो रहा था, आंखों में कोहरा-सा घिर-घिर आता था। वास्तव में उन दिनों डॉक्टरों को मेरे पेट में फोड़ा होने का संदेह हो रहा था – ऑपरेशन की सम्भावना थी। कब लौटूंगी या नहीं लौटूंगी, यही सोचते-सोचते मैंने फिर कर चारों ओर जो आर्द्र दृष्टि डाली, वह कुछ समय तक उन परिचित स्थानों को भेंट कर वहीं उलझ रही।

पृथ्वी के उच्छवास के समान उठते हुए धुंधलेपन में वे कच्चे पर आकंठ-मग्न हो गए थे – केवल फूस के मटमैले और खपरैल के कत्थई और काले छप्पर, वर्षा में बढ़ी गंगा के मिट्टी जैसे जल में पुरानी नावों के समान जान पड़ते थे। कछार की बालू में दूर तक फैले तरबूज़ और खरबूज़ेे के खेत अपनी सिर की और फूस के मुठ्ठियों, टट्टियों और रखवाली के लिए बनी पर्णकुटियों के कारण जल में बसे किसी आदिम द्वीप का स्मरण दिलाते थे। उनमें एक-दो दीए जल चुके थे, तब मैंने दूर पर एक छोटा-सा काला धब्बा आगे बढ़ता देखा। वह घीसा ही होगा, यह मैंने दूर से ही जान लिया। आज गुरु साहब को उसे विदा देना है, यह उसका नन्हा हृदय अपनी पूरी संवेदना-शक्ति से जान रहा था, इसमें संदेह नहीं था। परन्तु उस उपेक्षित बालक के मन में मेरे लिए कितनी सरल ममता और मेरे बिछोह की कितनी गहरी व्यथा हो सकती है, यह जानना मेरे लिए शेष था।

निकट आने पर देखा कि उस धूमिल गोधूली में बादामी कागज़ पर काले चित्र के समान लगने वाला नंगे बदन घीसा एक बड़ा तरबूज़ दोनों हाथों में सम्हाले था, जिसमें बीच के कुछ कटे भाग में से भीतर की ईषत-लक्ष्य ललाई चारों ओर के गहरे हरेपन में कुछ बन्द गुलाबी फूल-जैसी जान पड़ती थी।

घीसा के पास न पैसा था न खेत – तब क्या वह इसे चुरा लाया है! मन का संदेह बाहर आया ही और तब मैंने जाना कि जीवन का खरा सोना छिपाने के लिए मलिन शरीर को बनाने वाला ईश्वर उस बूढ़े आदमी से भिन्न नहीं, जो अपनी सोने की मोहर को कच्ची मिट्टी की दीवार में रखकर निश्चिंत हो जाता है। घीसा गुरु साहब से झूठ बोलना भगवान जी से झूठ बोलना समझता है। वह तरबूज़ कई दिन पहले देख आया था। माई के लौटने में जाने क्यों देर हो गई, तब उसे अकेले ही खेत पर जाना पड़ा। वहां खेत वाले का लड़का था, जिसकी उसके नए कुरते पर बहुत दिन से नज़र थी। प्राय: सुना-सुना कर कहता था कि जिनकी भूख जुठी पत्तल से बुझ सकती है, उनके लिए परोसा लगाने वाले पागल होते हैं। उसने कहा – पैसा नहीं है, तो कुरता दे जाओ। और घीसा आज तरबूज़ न लेता, तो कल उसका क्या करता। इससे कुरता दे आया; पर गुरु साहब को चिंता करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि गर्मी में वह कुरता पहनता ही नहीं और जाने-आने के लिए पुराना ठीक रहेगा। तरबूज़ सफेद न हो, इसलिए कटवाना पड़ा – मीठा है या नहीं यह देखने के लिए, उंगली से कुछ निकाल भी लेना पड़ा।

गुरु साहब न लें, तो घीसा रात भर रोएगा – छुट्टी भर रोएगा। ले जावें तो वह रोज़ नहा-धोकर पेड़ के नीचे पढ़ा हुआ पाठ दोहराता रहेगा और छुट्टी के बाद पूरी किताब पट्टी पर लिखकर दिखा सकेगा।

और तब अपने स्नेह में प्रगल्भ उस बालक के सिर पर हाथ रखकर मैं भावातिरेक से ही निश्चल हो रही। उस तट पर किसी गुरु को किसी शिष्य से कभी ऐसी दक्षिणा मिली होगी, ऐसा मुझे विश्वास नहीं; परन्तु उस दक्षिणा के सामने संसार में अब तक सारे आदान-प्रदान फीके जान पड़े।

फिर घीसा के सुख का विशेष प्रबंध कर मैं बाहर चली गई और लौटते-लौटते कई महीने लग गए। इस बीच में उसका कोई समाचार न मिलना ही सम्भव था। जब फिर उस ओर जाने का मुझे अवकाश मिल सका, तब घीसा को उसके भगवान जी ने सदा के लिए पढ़ने से अवकाश दे दिया था – आज वह कहानी दोहराने की मुझ में शक्ति नहीं है; पर सम्भव है आज के कल, कल के कुछ दिन, दिनों के मास और मास के वर्ष बन जाने पर मैं दार्शनिक के समान धीर-भाव से उस छोटे जीवन का उपेक्षित अंत बन सकूंगी। अभी मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है कि मैं अन्य मलिन मुखों में उसकी छाया ढूंढ़ती रहूं।

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हाहाकार – रामधारी सिंह दिनकर

अनुमानित समय : 4 मिनट-

दिव की ज्वलित शिखा सी उड़ तुम जब से लिपट गयी जीवन में,
तृषावंत मैं घूम रहा कविते ! तब से व्याकुल त्रिभुवन में !

उर में दाह, कंठ में ज्वाला, सम्मुख यह प्रभु का मरुथल है,
जहाँ पथिक जल की झांकी में एक बूँद के लिए विकल है।

घर-घर देखा धुआं पर, सुना, विश्व में आग लगी है,
‘जल ही जल’ जन-जन रटता है, कंठ-कंठ में प्यास जगी है।

सूख गया रस श्याम गगन का एक घुन विष जग का पीकर,
ऊपर ही ऊपर जल जाते सृष्टि-ताप से पावस सीकर !

मनुज-वंश के अश्रु-योग से जिस दिन हुआ सिन्धु-जल खारा,
गिरी ने चीर लिया निज उर, मैं ललक पड़ा लख जल की धारा।

पर विस्मित रह गया, लगी पीने जब वही मुझे सुधी खोकर,
कहती- ‘गिरी को फाड़ चली हूँ मैं भी बड़ी विपासित होकर’।

यह वैषम्य नियति का मुझपर, किस्मत बढ़ी धन्य उन कवि की,
जिनके हित कविते ! बनतीं तुम झांकी नग्न अनावृत छवि की ।

दुखी विश्व से दूर जिन्हें लेकर आकाश कुसुम के वन में,
खेल रहीं तुम अलस जलद सी किसी दिव्य नंदन-कानन में।

भूषन-वासन जहाँ कुसुमों के, कहीं कुलिस का नाम नहीं है।
दिन-भर सुमन-हार-गुम्फन को छोड़ दूसरा काम नहीं है।

वही धन्य, जिनको लेकर तुम बसीं कल्पना के शतदल पर,
जिनका स्वप्न तोड़ पाती है मिटटी नहीं चरण-तल बजकर !

मेरी भी यह चाह विलासिनी ! सुन्दरता को शीश झुकाऊं,
जिधर-जिधर मधुमयी बसी हो, उधर वसंतानिल बन जाऊं !

एक चाह कवि की यह देखूं, छिपकर कभी पहुँच मालिनी तट,
किस प्रकार चलती मुनिबाला यौवनवती लिए कटी पर घट !

झांकूं उस माधवी-कुंज में, जो बन रहा स्वर्ग कानन में;
प्रथम परस की जहाँ लालिमा सिहर रही तरुणी- आनन में ।

जनारण्य से दूर स्वप्न में मैं भी निज संसार बसाऊँ,
जग का आर्त्तनाद सुन अपना हृदय फाड़ने से बच जाऊँ ।

मिट जाती ज्यों किरण बिहँस सारा दिन कर लहरों पर झिल–मिल,
खो जाऊँ त्यों हर्ष मनाता, मैं भी निज स्वप्नों से हिलमिल ।

पर, नभ में न कुटी बन पाती, मैंने कितनी युक्ति लगायी,
आधी मिटती कभी कल्पना, कभी उजड़ती बनी-बनायी ।

रह-रह पंखहीन खग-सा मैं गिर पड़ता भू की हलचल में ;
झटिका एक बहा ले जाती स्वप्न-राज्य आँसू के जल में ।

कुपित देव की शाप-शिखा जब विद्युत् बन सिर पर छा जाती,
उठता चीख हृदय विद्रोही, अन्ध भावनाएँ जल जातीं ।

निरख प्रतीची-रक्त-मेघ में अस्तप्राय रवि का मुख-मंडल,
पिघल-पिघल कर चू पड़ता है दृग से क्षुभित, विवश अंतस्तल ।

रणित विषम रागिनी मरण की आज विकट हिंसा-उत्सव में;
दबे हुए अभिशाप मनुज के लगे उदित होने फिर भव में ।

शोणित से रंग रही शुभ्र पट संस्कृति निठुर लिए करवालें,
जला रही निज सिंहपौर पर दलित-दीन की अस्थि मशालें।

घूम रही सभ्यता दानवी, ‘शांति ! शांति !’ करती भूतल में,
पूछे कोई, भिगो रही वह क्यों अपने विष दन्त गरल में।

टांक रही हो सुई चरम पर, शांत रहें हम, तनिक न डोलें,
यही शान्ति, गर्दन कटती हो, पर हम अपनी जीभ न खोलें ?

बोलें कुछ मत क्षुधित, रोटियां श्वान छीन खाएं यदि कर से,
यही शांति, जब वे आयें, हम निकल जाएँ चुपके निज घर से ?

हमीं पढ़ें पाठ संस्कृति के खड़े गोलियों की छाया में;
यही शान्ति, वे मौन रहें जब आग लगे उनकी काया में ?

चूस रहे हों दनुज रक्त, पर, हों मत दलित प्रबुद्ध कुमारी !
हो न कहीं प्रतिकार पाप का, शांति या कि यह युद्ध कुमारी !

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है,
छूटे कभी संग बैलों का , ऐसा कोई याम नहीं है।

मुख में जीभ, शक्ति भुज में, जीवन में सुख का नाम नहीं है,
वसन कहाँ ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है।

विभव-स्वप्न से दूर, भूमि पर यह दुखमय संसार कुमारी!
खलिहानों में जहाँ मचा करता है हाहाकार कुमारी!

बैलों के ये बंधू वर्ष भर, क्या जाने, कैसे जीते हैं ?
बंधी जीभ, आँखे विषष्ण, गम खा, शायद आंसू पीते हैं।

पर, शिशु का क्या हाल, सीख पाया न अभी जो आंसू पीना ?
चूस-चूस सूखा स्तन माँ का सो जाता रो-विलप नगीना।

विवश देखती माँ, अंचल से नन्ही जान तड़प उड़ जाती,
अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती।

कब्र-कब्र में अबुध बालकों की भूखी हड्डी रोती है,
‘दूध-दूध !’ की कदम कदम पर सारी रात सदा होती है।

‘दूध-दूध !’ ओ वत्स ! मंदिरों में बहरे पाषाण यहाँ हैं,
‘दूध-दूध !’ तारे, बोलो, इन बच्चों के भगवान् कहाँ हैं ?

‘दूध-दूध !’ दुनिया सोती है, लाऊं दूध कहाँ, किस घर से ?
‘दूध-दूध !’ हे देव गगन के ! कुछ बूँदें टपका अम्बर से !

‘दूध-दूध !’ गंगा तू ही अपने पानी को दूध बना दे,
‘दूध-दूध !’ उफ़ ! है कोई, भूखे मुर्दों को जरा मना दे ?

‘दूध-दूध !’ फिर ‘दूध !’ अरे क्या याद दुख की खो न सकोगे ?
‘दूध-दूध !’ मरकर भी क्या तुम बिना दूध के सो न सकोगे ?

वे भी यहीं, दूध से जो अपने श्वानों को नहलाते हैं।
वे बच्चे भी यही, कब्र में ‘दूध-दूध !’ जो चिल्लाते हैं।

बेक़सूर, नन्हे देवों का शाप विश्व पर पड़ा हिमालय !
हिला चाहता मूल सृष्टि का, देख रहा क्या खड़ा हिमालय ?

‘दूध-दूध !’ फिर सदा कब्र की, आज दूध लाना ही होगा,
जहाँ दूध के घड़े मिलें, उस मंजिल पर जाना ही होगा !

जय मानव की धरा साक्षिणी ! जय विशाल अम्बर की जय हो !
जय गिरिराज ! विन्ध्यगिरी, जय-जय ! हिंदमहासागर की जय हो !

हटो व्योम के मेघ ! पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं,
‘दूध, दूध ! …’ ओ वत्स ! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं !

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काव्य संसार विविध

पथ की पहचान – हरिवंशराय बच्चन

अनुमानित समय : 2 मिनट-

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले

पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी,
अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा ख़तम हो जाएगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे
कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें अपनी उमर, अपने समय में,
और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में,
किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती,
आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा, व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ, यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है,
तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

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विविध

‘रिक्याविक’ पर निर्मल वर्मा : ‘सफ़ेद रातें और हवा’ से कुछ अंश

अनुमानित समय : 3 मिनट-

हर शहर के दो चेहरे (या शायद ज्यादा? ) होते हैं, एक वह जो किसी ‘पिक्चर पोस्टकार्ड’ या ‘गाइड बुक’ में देखा जा सकता है –एक स्टैण्डर्ड चेहरा, जो सबके लिए एक सा है; दूसरा उसका अपना निजी, जो दुलहिन के चेहरे-सा घूंघट के पीछे छिपा रहता है. उसका सुख, उसका अवसाद, उसके अलग-अलग मूड, बदली के दिन अलग और जब धूप हो तो बिलकुल अलग; हर बार जब घूंघट उठता है, लगता है, जैसे चेहरा कुछ बदल गया है, जैसे वह बिलकुल वह नहीं, जो पहले देखा था.

       क्योंकि दरअसल अजनबी शहरों की यात्रा एक किस्म का बहता पानी है, जिस प्रकार एक यूनानी दार्शनिक के कथनानुसार एक ही दरिया में दो व्यक्ति नहीं नहाते, हालाँकि दरिया वही रहता है, उसी तरह दो अलग-अलग व्यक्ति एक ही शहर में नहीं आते, हालाँकि शहर वही रहता है.

       इसीलिए कभी-कभी सोचता हूँ, जितने भी ‘पिक्चर-पोस्टकार्ड’ अलग-अलग शहरों से मैंने अपने दोस्तों को भेजे हैं, उन्हें वापस मंगा लूँ, कम से कम वे कार्ड तो अवश्य ही, जिन पर रिक्याविक की मुहर लगी है, क्योंकि यदि आप इस उपमा की अनुमति दें तो रिक्याविक का शहर उस प्रेमिका की मानिंद है, जिसकी सही पहचान चेहरे में न होकर समूची देह, और उसके अलग-अलग अंगों में छिपी रहती है.

       उलझन और भी बढ़ जाती है, जब हर कदम पर अंतर्विरोधों का सामना करना पड़े. आइसलैंड की इस राजधानी का नाम है रिक्याविक—‘धुएँ का शहर’. नार्वे से जब पहले पहल ‘वाइकिंग्स’ यहाँ आये थे, तो गरम पानी के झरनों से उठते हुए धुएँ को देखकर उन्होंने इस शहर का नामकरण किया था. लेकिन सच पूछा जाए, तो शहर का धुएँ से दूर का संबंध भी नहीं. यूरोप के किसी भी नगर में मैंने हवा इतनी साफ़, हल्की और सफ़ेद (यदि हवा को सफ़ेद कहा जा सके) नहीं देखी. शायद इसलिए कि यहाँ के निवासी कोयले का प्रयोग बिलकुल नहीं करते, न खाना पकाने के लिए, न कमरों को गर्म रखने के लिए. गरम पानी के झरनों से समूचे शहर को बिजली बैठे-बिठाए मिल जाती है. आप अनुमान लगाएं, ऐसे शहर में एक भारतवासी के सुख का, जो ज़िंदगी-भर धुएँ में ही रह कर अंत में धुएं में ही लीन हो जाता है.

      नाम की चर्चा हो रही है, तो आइसलैंड का ही नाम लीजिये. इतना भ्रामक नाम शायद किसी दूसरे देश का नहीं. रिक्याविक के बाहर जाते ही चारों ओर हल्की धूप में उमगती हरियाली को देखकर कभी-कभी मन में भ्रम होने लगता है कि कहीं हम गलत देश में तो नहीं आ गए हैं. मेरे आइसलैंडी मित्रों का कहना है कि जाड़े के दिनों में भी कुछ उत्तरी भागों को छोड़कर बर्फ़ ज्यादा नहीं पड़ती और रिक्याविक तो कभी-कभी बर्फ से बिलकुल अछूता रह जाता है. सुना है, एक बार अंगरेज़ी कवि (अब अमरीकी) ऑडेन ने सुझाव दिया था कि आइसलैंड का नाम ग्रीनलैंड और ग्रीनलैंड का नाम आइसलैंड कर देना चाहिए. ऑडेन के जीवन-दर्शन में मुझे ज्यादा भरोसा नहीं, किन्तु उनके इस सुझाव से मैं पूर्णतया सहमत हूँ. कम-से-कम इससे आइसलैंडी ‘टूरिस्ट ब्यूरो’ को काफी तसल्ली मिलेगी, जो पिछले वर्षों से इस बात को लेकर परेशान है कि आइसलैंड का नाम बेवजह सैलानियों को आतंकित कर देता है.

     रिक्याविक का कोई विशेष व्यक्तित्व या स्वभाव है—जैसा हम पेरिस या प्राग के बारे में कह सकते हैं—इसमें मुझे संदेह है. आखिर तक मैं निश्चय नहीं कर सका कि मैं रिक्याविक का कौन-सा ख़ास चेहरा चुनकर वापस लौटूंगा? वह –जिसका हर दिन-रात समुद्र की लहरों में घुलता रहता है, या जहाज़ों, मछली पकड़ने की नौकाओं और बासी-खट्टी गंध से घिरे बंदरगाह, या एक पहाड़ी क़स्बा, जो मध्यरात्रि के जामुनी आलोक में उनींदा-सा पड़ा रहता है अथवा छोटे-छोटे रंग-बिरंगे मकानों का लिलिपुटियन नगर, वॉल्ट डिस्नी का परी-देश ! रिक्याविक शायद यह सब कुछ है, फिर भी जब मैं आँख मूंदकर याद करता हूँ, तो इनमें से कोई भी चीज़ सामने नहीं आती. याद आती है सिर्फ रिक्याविक की हवा .

      सच मानिए, आइसलैंड आने से पहले मुझे नहीं मालूम था कि हवा का असली जादू क्या होता है.

(चीड़ों पर चाँदनी में संकलित सफ़ेद रातें और हवा से )

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संवत्सर –अज्ञेय

अनुमानित समय : 6 मिनट-

मैं उन लोगों में से नहीं हूँ, जो बड़े तड़के उठकर टहलने जाते हैं और पौ फटने से पहले ही लौट भी आते हैं. ऐसे लोगों का विशेष प्रशंसक भी नहीं हूँ. ये लोग रोज़ नियमपूर्वक इतनी जल्दी उठ लेते हैं, इससे तो प्रभावित हूँ; और तर्क के लिए यह भी मान लूँगा कि सवेरे की हवा बहुत अच्छी होती है. लेकिन मैं घूमने जाता हूँ तो अँधेरा तो देखने नहीं जाता – कम-से-कम रोज़ केवल अँधकार देखने की बात तो मेरी समझ में नहीं आती. कभी- कभी अवश्य अँधेरा भी सुंदर लगता है. और उसकी यह उपयोगिता भी मैं स्वीकार कर लूँगा कि वह अपने को देखने में सहायक होता है. अपने को देखना भी कभी-कभी तो ठीक है.

      बाहर निकल कर नयी-नयी धूप देखी तो बढ़ता चला गया और पाया कि सैर को निकल पड़ा हूँ. उन ब्राह्म मुहूर्त वालों की तरह मेरे लिए सैर का अर्थ केवल सड़क की लंबाई नापना नहीं है, इसलिए जब सैर को निकल ही पड़ा तो बगीचे की ओर मुड़ गया. जानता था कि फूल इन दिनों नहीं होंगे और घास पर कुहरा भी होगा और गहरी ओस तो होगी ही. पर ओस पर धूप का अपना सौन्दर्य होता है.

      ओस पर धूप की ओर भी लोगों का ध्यान जाता है और गया है: लेकिन सोचता हूँ कि कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोग जो चीज़ देखते हैं उसकी तरफ़ उनका ‘ध्यान’ जाता है और उनकी ‘दृष्टि’ नहीं जाती. अब ओस की बूँद को ही लीजिये : आप उसे देखें और सवेरे की धूप में देखें तो कई चीज़ें देखने की होती हैं. वैसे उम्र के भी भार से घास की अनी नीचे को झुक जा सकती है: कितनी नरम है घास लेकिन कितनी जिजीविषु ! धूप में ओस की बूँद कैसी चमक उठती है और धूप-किरणों को रंगों में विकसित कर देती है. छायावादी मुहावरे में कहा जाता है कि ‘मरकत-शिला पर हीरक-कण’ बिखरे हैं. लेकिन मैं छायावादी नहीं हूँ और मुझे दूब की हरियाली पर ओस मरकत-शिला पर हीरक-कण की अपेक्षा कहीं अधिक सुंदर और प्राणवान् दिखती है.

     लेकिन मैं कह रहा था कि बहुत से लोग ध्यान देते हैं और देखते नहीं हैं. अब उन लोगों को क्या कहिए जिन्हें ओस की बूँद में केवल नश्वरता दिखती है और धूप का चमत्कार नहीं दिखता: यह ठीक है कि धूप पड़ते ही ओस की बूँद भाप बन कर उड़ने लगती है. यह भी ठीक है कि भोर की पहली किरण के साथ ही प्रायः हवा भी सरसरा उठती है और घास की पत्तियों के हिलने से ओस की बूँदें एक-दूसरे से मिलती हैं और मिलते ही भार के कारण झर जाती हैं- देखने वाले न हों तो इसमें यह भी ‘देखेंगे’ कि मिलन का क्षण भी कितना नश्वर है.

     लेकिन जो लोग देखना भूल कर केवल ध्यान देने में खो जाते हैं वे भी ध्यान भी तो पूरा नहीं देते: नहीं तो ध्यान में तो यह बात भी आनी चाहिए कि  ये सारी छोटी क्रियाएँ एक महान प्रक्रिया की अंग हैं और वह महान प्रक्रिया न सान्त है, न नश्वर है. अगर हमें जो सामने है उसे देखना नहीं है, उसकी ओर केवल ध्यान देना है, तो ध्यान देने की बात नश्वरता की नहीं बल्कि इस अनाद्यंत प्रक्रिया की है जिसमें ओस की बूँद भी है और घास की पत्ती भी, हमारा ध्यान, हमारी दृष्टि और स्वयं हम भी; जिसमें किरण ही नहीं, सूर्य,चंद्र, तारा-मंडल सभी कुछ है.

    ओस की बूँद ही क्यों, मैं तो झरते पत्ते को देखकर भी अटक जाता हूँ. सचमुच अटक जाता हूँ, पहले झरना ही लीजिये. एक तरफ़ वह झर कर गिरता है तो दूसरी तरफ़ वह झरना, प्रपात की स्त्रोतस्विता है : पत्ता भी झरता है और वन-झरना भी झरता है और वन झरने की धार भी झरती है – और उसका झरना ही अनन्त प्रक्रिया है. झरता पत्ता भी अगर एक ओर अपने अन्त का संकेत देता है तो दूसरी ओर क्या उस प्रक्रिया का भी संकेत नहीं देता जिसमें अन्त है ही नहीं, केवल अर्थ-क्रियाओं की सनातनता है? इसीलिए झरता पत्ता तो मैंने कई बार देखा है, लेकिन हर बार उसमें अटक गया हूँ. और तब से तो चिरकाल के लिए उसमें अटक गया हूँ जबसे मैंने देखा कि डाल से झरता पत्ता नीचे न गिर कर अधर में ही एक दूसरी डाल से अटक गया – जो दूसरी डाल अभी हरी थी :
झरना : झरता पत्ता

हरी डाल से

अटक गया

मेरी समझ में तो यह प्रक्रिया का पूर्ण चित्र है और मैं इसी चित्र में बहुत अटका हूँ. मेरी दीठ भी वहीँ अटकी है और मेरा ध्यान भी वहीँ अटका है. नश्वरता का मेरे लिए कभी कुछ विशेष अर्थ नहीं हुआ, लेकिन हर चीज़ मिटती हुई किसी प्राणवान चीज़ की प्राणवत्ता में अपना योग दे जाती है, यह मैंने बार-बार देखा है और हर बार पाया है कि इससे एक अंतःस्फूर्ति मिलती है जो स्वयं प्राणदायिनी है. हो सकता है ऐसा इसलिए है कि मैं जंगलों में अधिक रहा हूँ, प्रकृति के निकट अधिक रहा हूँ.

         तर्क के लिए तो कोई यह भी स्मरण दिला सकता है कि ध्यान (ज्झान) परंपरा के श्रमण भी प्रकृति के निकट रहते थे और प्रकृति से उन्हें नश्वरता-भंगुरता- का ही सन्देश मिलता था.  लेकिन मैं कहूँगा कि ध्यान-सम्प्रदाय की चर्चा में केवल यहीं तक जाकर रुक जाना उसे अधूरा ही देखना-समझना है. वे प्रकृति के निकट रहने का आग्रह करते थे तो केवल नश्वरता की याद बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि ‘सतत आवर्तन’ की याद बनाए रखने के लिए. जो कुछ है सब मिटता जाएगा—लेकिन मिट जाने के लिए नहीं, इसलिए कि दूसरा कुछ बनता जाएगा.

         पुराने आरण्यक-आश्रमिक भी प्रकृति के निकट रहते थे. वे भी देखते थे कि जो बनता है वह मिटता भी है. लेकिन इस देखने में उन्होंने जीवन की नश्वरता नहीं देखी. मुझे लगता है कि वे लोग देखकर भी देखते रह सके, केवल ध्यान में नहीं खो गए. उन्होंने जीवन को नश्वर नहीं माना, सनातन आवर्तन-प्रक्रिया में योग देने से अपना हाथ नहीं खींचा. ओस की बूँद में धूप की चमक देखकर उन्हें मृत्यु का स्मरण नहीं आया बल्कि उन्होंने उस सवितृ का स्तवन किया जो सारी प्रक्रिया की गति बढ़ाता है. साथ-साथ हमारी प्रत्यभिज्ञा-संपन्न बुद्धि की भी—धियो यो नः प्रचोदयात् . तभी तो वे कह सके: देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति.

          मेरी समझ में तो ऐसा देखना ही देखना है जो कि ध्यान में ऐसा खो नहीं जाता कि दिखना बंद हो जाए—जिसमें केंद्रित अवधारणा ‘देखने’ की गहराई बढ़ाकर उसे ‘पहचान’ का रूप दे देती है, केवल रूपक अथवा रूपकात्मक चिंतन का आधार नहीं बना देती.

         और कभी-कभी सोचता हूँ कि वनाश्रम में बैठा हुआ यह दर्शक-चिंतक कैसे द्रष्टा बन गया—कितनी दूर-दूर तक वह नहीं देखता रहा ! इसीलिए तो वह कभी मरण का दार्शनिक नहीं बना, जीवन का ही दार्शनिक बना रहा और निरंतर जीवन का ही स्तवन करता रहा. यहाँ तक कि मृतक के संस्कार में भी वह यह नहीं भूला कि जो देह शव होकर अपवित्र हो जाती है वह भी प्रक्रिया में पड़कर जो जीवित है उसकी प्राणवत्ता में योग देती है—धुआँ बनकर, चाँदनी बनकर, मेघ बनकर, वर्षा बनकर, पृथ्वी की उर्वरा शक्ति बनकर….

         वह द्रष्टा देखता है कि प्रक्रिया सनातन है: प्रक्रिया भी है और सनातन भी है इसलिए मूलतः स्थिर भी है और गतिमान भी है. शिव भी है और शक्ति भी, पुरुष भी है और प्रकृति भी, काल भी है और ऋत भी, सत्य भी है और ऋतु भी. उस द्रष्टा के लिए संवत्सर प्रजापति था. संवत्सर मृत्यु भी था, लेकिन वह विनाश नहीं करता था क्योंकि उसके पास ऋतु-कर्म का अक्षय भंडार था. संवत्सर ही एक यज्ञ था : रातें यज्ञ-सामग्री का अक्षय भंडार थीं और दिवस उस अग्नि-चयन की यजुष्मती ईंटें थीं. संवत्सर ही अग्नि था जो सब के भीतर क्रियाशील प्राण-स्रोत है. और इस यज्ञ में जीव-मात्र निरंतर योग दे रहा था—बिना उसके योग के संवत्सर की गति नहीं थी. और प्रजापति भी मानो पंगु होकर रह जाता था.

          और यह भी नहीं कि बौद्ध चिंतन ने भी केवल नश्वरता को ही देखा. उसके लिए भी प्रक्रिया प्रधान थी और सनातन थी, नश्वरता तो उसका एक लक्षण मात्र था. उसके तर्क में भी तो काल सनातन था और दिक् की वैसी कोई सत्ता नहीं थी. आश्चर्य होता है जब आज हम पाते हैं कि आधुनिक वैज्ञानिक भी जब यह देखता है कि न तो वह दिक् का सहारा लिए बिना काल को प्रमाणित कर सकता है, न काल का सहारा लिए बिना दिक् को प्रमाणित कर सकता है, तब वह देश काल सातत्य की अवधारणा करके मानो सारी समस्या ही टाल जाता है. यह जो सातत्य है यह बौद्धों के संसार से कहाँ भिन्न है ? – यानी कहाँ भिन्न है जहाँ तक कि उस भेद को जान सकना हमारे लिए संभव है या होगा ! इसी बात में न, कि बौद्ध चिंतक की अवधारणा में इसकी गुंजाइश थी कि हम कभी उस प्रक्रिया के बाहर चले जाएँ—काल ही निर्वापित हो जाए —-और वैज्ञानिक उस सातत्य से बाहर किसी तरह के ‘होने’ की कल्पना नहीं करता, नहीं कर सकता? लेकिन जहाँ तक परिणाम का प्रश्न है, न तो हम देश-काल-सातत्य के बाहर जाकर उसे देख सकते हैं, न निर्वाण में पहुँचकर जान सकते हैं कि वह क्या होता है. उसके बारे में कुछ पूछना अतिप्रश्न हो जाता है. यम भी नचिकेता को यह आशीर्वाद देकर भी कि ‘तेरे जैसे पूछने वाले और भी हुआ करें!’ इस प्रश्न पर पहुंचकर उसे टोक देता है. ….

        सचमुच कुछ प्रश्नों की सफलता इसी बात में होती है कि हम उस प्रश्न पर पहुँच गए हैं. उस प्रश्न का उत्तर भी हो, इसकी अपेक्षा वहाँ नहीं रहती. दूसरे शब्दों में, ऐसे प्रश्नों का सही उत्तर यही होता है कि यह जिज्ञासु भाव लेकर हम जीवन की ओर लौट आएँ और उसे जिज्ञासुवत् हो जिएँ. निरे छिद्रान्वेषी को भले ही यह लगता रहे कि वह प्रश्न अनुत्तरित रह गया, वह अपना काम पूरा कर चुका होता है; उसने अर्थवत्ता का एक नया आयाम हमारे समक्ष खोल दिया होता है. जो इस प्रश्न तक पहुँच जाते हैं, साहस करके यह प्रश्न पूछ लेते हैं, उनका जीवन ही बदल जाता है. शायद पहुँचे हुए होने का अर्थ यही है— उस प्रश्न-भाव तक पहुँचे हुए होना. जिसके सहारे हम जीवन के एक दूसरे आयाम की देहरी पर पहुँच जाते हैं. मुझे तो लगता है कि यहाँ पहुँचना उस बिंदु पर पहुँचना है जहाँ हम केवल ऋतु में न जीकर काल में जीने लगते हैं, केवल प्रकृति से घिरे और बंधे न रहकर पुरुष से जुड़ जाते हैं.

       और शायद यज्ञ के यजमान मात्र न रहकर उसके प्रजापति भी हो जाते हैं.

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उत्तराफाल्गुनी के आसपास -कुबेरनाथ राय

अनुमानित समय : 14 मिनट-

वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है उत्तराफाल्गुनी। हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन-मनभावन है, बड़ी मौज रहती है, परंतु सत्ताइसवें के आते-आते घनघोर भाद्रपद के अशनि-संकेत मिलने लगते हैं और तीसी के वर्षों में हम विद्युन्मय भाद्रपद के काम, क्रोध और मोह का तमिस्त्र सुख भोगते हैं। इसी काल में अपने-अपने स्वभाव के अनुसार हमारी सिसृक्षा कृतार्थ होती है। फिर चालीसवें लगते-लगते हम भाद्रपद की अंतिम नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी में प्रवेश कर जाते हैं और दो-चार वर्ष बाद अर्थात उत्तराफाल्गुनी के अंतिम चरण में जरा और जीर्णता की आगमनी का समाचार काल-तुरंग दूर से ही हिनहिनाकर दे जाता है। वास्तव में सृजन-संपृक्त, सावधान, सतर्क, सचेत और कर्मठ जीवन जो हम जीते हैं वह है तीस और चालीस के बीच। फिर चालीस से पैंतालीस तक उत्तराफाल्गुनी का काल है। इसके अंदर पग-निक्षेप करते ही शरीर की षटउर्मियों में थकावट आने लगती है, ‘अस्ति, जायते, वर्धते’ – ये तीन धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं, उनका वेग कम होने लगता है और इनके विपरीत तीन ‘विपतरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति’ प्रबलतर हो उठती हैं, उन्हें प्रदोष-बल मिल जाता है, वे शरीर में बैठे रिपुओं के साथ साँठ-गाँठ कर लेती हैं और फल होता है, जरा के आगमन का अनुभव। पैंतालीस के बाद ही शीश पर काश फूटना शुरू हो जाता है, वातावरण में लोमड़ी बोलने लगती है, शुक और सारिका उदास हो जाते हैं, मयूर अपने श्रृंगार-कलाप का त्याग कर देता है और मानस की उत्पलवर्णा मारकन्याएँ चोवा-चंदन और चित्रसारी त्याग कर प्रव्रज्या का बल्कल-वसन धारण कर लेती हैं। अतः बचपन भले निर्मल-प्रसन्न हो, गदहपचीसी भले ही ‘मधु-मधुनी-मधूनि’ हो; परंतु जीवन का वह भाग, जिस पर हमारे जन्म लेने की सार्थकता निर्भर है, पच्चीस और चालीस या ठेल-ठालकर पैंतालीस के बीच पड़ता है। इसके पूर्व हमारे जीवन की भूमिका या तैयारी का काल है और इसके बाद ‘फलागम’ या ‘निमीसिस’ (Nemesis) की प्रतीक्षा है। जो हमारे हाथ में था, जिसे करने के लिए हम जनमे थे, वह वस्तुतः घटित होता है पच्चीस और पैंतालीस के बीच। इसके बाद तो मन और बुद्धि के वानप्रस्थ लेने का काल है – देह भले ही ‘एकमधु-दोमधु-असंख्य-मधु’ साठ वर्ष तक भोगती चले। इस पच्चीस-पैंतालीस की अवधि में भी असल हीर रचती है तीसोत्तरी। तीसोत्तरी के वर्षों का स्वभाव शाण पर चढ़ी तलवार की तरह है, वर्ष-प्रतिवर्ष उन पर नई धार, नया तेज चढ़ता जाता है चालीसवें वर्ष तक। मुझे क्रोध आता है उन लोगों पर जो विधाता ब्रह्मा को बूढ़ा कहते हैं और चित्र में तथा प्रतिमा में उन्हें वयोवृद्ध रूप में प्रस्तुत करते हैं। मैंने दक्षिण भारत के एक मंदिर में एक बार ब्रह्मा की एक अत्यंत सुंदर तीसोत्तर युवा-मूर्ति को देखा था। देखकर ही मैं कलाकार की औचित्य-मीमांसा पर मुग्ध हो गया। जो सर्जक है, जो सृष्टिकर्त्ता है, वह निश्चय ही चिरयुवा होगा। प्राचीन या बहुकालीन का अर्थ जर्जर या बूढ़ा नहीं होता है। जो सर्जक है, पिता है, ‘प्रॉफेट’ है, नई लीक का जनक है, प्रजाता है, वह रूप-माधव या रोमैंटिक काम-किशोर भले ही न हो, परंतु वह दाँत-क्षरा, बाल-झरा, गलितम् पलितम् मुंडम् कैसे हो सकता है? उसे तो अनुभवी पुंगव तीसोत्तर युवा के रूप में ही स्वीकारना होगा। जवानी एक चमाचम धारदार खड्ग है। उस पर चढ़कर असिधाराव्रत या वीराचार करनेवाली प्रतिभा ही पावक-दग्ध होंठों से देवताओं की भाषा बोल पाती है। युवा अंग के पोर-पोर में फासफोरस जलता है और युवा-मन में उस फासफोरस का रूपांतर हजार-हजार सूर्यों के सम्मिलित पावक में हो जाता है। मेरी समझ से सृष्टिकर्त्ता की, कवि की, विप्लव नायक की, सेनापति की, शूरवीर की, विद्रोही की कल्पना श्वेतकेश वृद्ध के रूप में नहीं की जा सकती। अतः प्रजापति विधाता को सदैव तीस वर्ष के पट्ठे सुंदर, युवा के सुंदर रूप में ही कल्पित करना समीचीन है।

वास्तव में तीसवाँ वर्ष जीवन के सम्मुख फण उठाए एक प्रश्न-चिह्न को उपस्थित करता है और उस प्रश्न-चिह्न को पूरा-पूरा उसका समाधान-मूल्य हमें चुकाना ही पड़ता है। किसी भी पुरुष या नारी की कीर्ति-गरिमा, इसी प्रश्न-चिह्न की गुरुता और लघुता पर निर्भर करती है। गौतम बुद्ध ने उनतीस वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर अमृत के लिए महाभिनिष्क्रमण किया। यीशु क्राइस्ट ने तीस वर्ष की अवस्था में अपना प्रथम संदेश ‘सरमन ऑन दी माउंट’ (गिरिशिखिर-प्रजनन) दिया था और तैंतीसवें वर्ष में उन्हें सलीब पर चढ़ा दिया गया। उनका समूचा उपदेश काल तीन वर्ष से भी कम रहा। वाल्मीकि के अनुसार रामचंद्र को भी तीस के आसपास ही (वास्तव में 27 वर्ष की वयस में) वनवास हुआ था। उस समय सीता की आयु अठारह वर्ष की थी और वनवास के तेरहवें वर्ष में अर्थात सीता के तीसवाँ पार करते-करते ही सीताहरण की ट्रेजेडी घटित हुई थी। अतः तीसवाँ वर्ष सदैव वरण के महामुहूर्त्त के रूप में आता है और संपूर्ण दशक उस वरण और तेज के दाह से अविष्ट रहता है। तीसोत्तर दशक जीवन का घनघोर कुरुक्षेत्र है। यह काल गदहपचीसी के विपरीत एक क्षुरधार काल है, जिस पर चढ़कर पुरुष या नारी अपने को अविष्कृत करते हैं, अपने मर्म और धर्म के प्रति अपने को सत्य करते हैं तथा अपनी अस्तित्वगत महिमा उद्घाटित करते हैं अथवा कम-से-कम ऐसा करने का अवसर तो अवश्य पाते हैं। चालीसा लगने के बाद पैंतालीस तक ‘यथास्थिति’ की उत्तराफाल्गुनी चलती है। पर इसमें ही जीवन की प्रतिकूल और अनुकूल उर्मियाँ परस्पर के संतुलित को खोना प्रारंभ कर देती हैं और प्राणशक्ति अवरोहण की ओर उन्मुख हो जाती है। इसके बाद अनुकूल उर्मियाँ स्पष्टतः थकहर होने लगती हैं और प्रतिकूल उर्मियाँ प्रबल होकर देह की गाँठ-गाँठ में बैठे रिपुओं से मेल कर बैठती हैं, मन हारने लगता है, सृष्टि अनाकर्षक और रति प्रतिकूल लगने लगती है, बुद्धि का तेज घट जाता है और वह स्वीकारपंथी (कनफर्मिस्ट) होने लगती है एवं आत्मा की दाहक तेजीमयी शक्ति पर विकार का धूम्र छाने लगता है। मैं तो यहाँ पर पैंतालीसवें वर्ष की बात कर रहा हूँ। परंतु मुझे स्मरण आती है दोस्तीव्हस्की – जिसने चालीस के बाद ही जीवन को धिक्कार दे दिया था : ‘मैं चालीस वर्ष जी चुका। चालीस वर्ष ही तो असली जीवन-काल है। तुम जानते हो कि चालीसवाँ माने चरम बुढ़ापा। दरअसल चालीस से ज्यादा जीना असभ्यता है, अश्लीलता है, अनैतिकता है। भला चालीस से आगे कौन जीता है? मूर्ख लोग और व्यर्थ लोग’ (‘नोट्स फ्रॉम अंडर ग्राउंड’ से) दोस्तोव्हस्की की इस उक्ति का यदि शाब्दिक अर्थ न लिया जाय तो मेरी समझ से इसका यही अर्थ होगा कि चालीस वर्ष के बाद जीवन के सहज लक्षणों का, परिवर्तन-परिवर्धन-सृजन का आत्मिक और मानसिक स्तरों पर ह्रास होने लगता है। पर मैं ‘साठा तब पाठा’ की उक्तिवाली गंगा की कछार का निवासी हूँ, इसी से इस अवधि को पाँच वर्ष और आगे बढ़ाकर देखता हूँ, यद्यपि दोस्तोव्हस्की की मूल थीसिस मुझे सही लगती है। शक्तिक्षय की प्रक्रिया चालीस के बाद ही प्रारंभ हो जाती है, यद्यपि वह अस्पष्ट रहती है।

मैं इस समय 1972 ईस्वी अपना अड़तीसवाँ पावस झेल रहा हूँ। पूर्वाफाल्गुनी का विकारग्रस्त यौवन जल पी-पीकर मैं ‘क्षिप्त’ से भी आगे एक पग ‘विक्षिप्त’ हो चुका हूँ और शीघ्र ही मोहमूढ़ होनेवाला हूँ! भाद्र की पहली नक्षत्र है मघा। मघा में अगाध जल है। पृथ्वी की तृषा आश्लेषा और मघा के जल से ही तृप्त होती है। यदि मघा में धरती की प्यास नहीं बुझी तो उसे अगले संवत्सर तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। न केवल परिमाण में, बल्कि गुण में भी मघा का जल श्रेष्ठ है। मघा-मेष की झड़ी झकोर का स्तव-गान कवि और किसान दोनो खूब करते हैं : ‘बरसै मघा झकोरि-झकोरी। मोर दुइ नैन चुवै जस ओरी।’ मघा बरसी, मानो दूध बरसा, मधु बरसा। इस मघा के बाद आती है पूर्वाफाल्गुनी जो बड़ी ही रद्दी-कंडम नक्षत्र है। इसका पानी फसल जायदाद के लिए हानिकारक तो है ही, उत्तर भारत में बाढ़-वर्षा का भय भी सर्वाधिक इसी नक्षत्र-काल में रहता है। इसी से उत्तर भारतीय गंगातीरी किसान इसे एक कीर्तिनाशा-कर्मनाशा नक्षत्र मानते हैं। इसके बाद आती है उत्तराफाल्गुनी, भाद्रपद की अंतिम नक्षत्र, जो समूचे पावस में मघा के बाद दूसरी उत्तम नक्षत्र है। इसका पानी स्वास्थ्यप्रद और सौभाग्यकारक होता है। इस अड़तीसवें पावस में अपने जीवन का पूर्वाफाल्गुनी काल भोग रहा हूँ, यद्यपि साथ-ही साथ द्वार पर उत्तराफाल्गुनी का आगमन भी देख रहा हूँ। चालीस आने में अब कितनी देर ही है।

अतः आज पूर्वाफाल्गुनी का अंतिम पानपात्र मेरे होंठों से संलग्न है। क्रोध मेरी खुराक है, लोभ मेरा नयन-अंजन है और काम-भुजंग मेरा क्रीड़ा-सहचर है। इनको ही मैं क्रमशः विद्रोह, प्रगति और नवलेखन कहकर पुकारता हूँ। भले ही यह विकार-जल हो, भले ही इसमें श्रेय-प्रेय, गति-मुक्ति कुछ भी न हो। परंतु इसमें जीर्णता और जर्जरता नहीं। यह जरा और वृद्धत्व का प्रतीक नहीं। पूर्वाफाल्गुनी द्वारा प्रदत्त विक्षिप्तता भी यौवन का ही एक अनुभव है। मुझे लग रहा था कि मेरे भीतर कोई उपंग बजा रहा है क्योंकि मेरे सम्मुख द्वार पर काल-नट्टिन अर्थात् उत्तराफाल्गुनी त्रिभंग रूप में खड़ी है और मैं उसमें मार की तीन कन्याओं तृषा-रति-आर्त्ति को एक साथ देख रहा हूँ। कांचनपद्म कांति, कर-पल्लव, कुणितकेश, बिंबाधर, विशाल बंकिम भ्रू, दक्षिणावर्त नाभि, और त्रिवली रेखा से युक्त इस भुवन-मोहन रूप को मैं देख रहा हूँ और इसको आगमनी में अपने भीतर बजती उपंग को निरंतर सुन रहा हूँ। उपंग एक विचित्र बाजा है। काल-पुरुषों की उँगलियाँ चटाक-चटाक पड़ती है और आहत नाद का छंदोबद्ध रूप निकलता है बीच-बीच में हिचकी के साथ। यह हिचकी भी उसी काल-विदूषक की भँड़ैती है और यह उपंग के तालबद्ध स्वर को अधिक सजीव और मार्मिक कर देती है। मैं अपने भीतर बजते यौवन का यह उपंग-संगीत सुन रहा हूँ और अपने मनोविकारों का छककर पान कर रहा हूँ। मुझे कोई चिंता नहीं। अभी वानप्रस्थ का शरद काल आने में काफी देर है। इस क्षण उसकी क्या चिंता करूँ? इस क्षण तो बस मौज ही मौज है, भले ही वह कटुतिक्त मौज क्यों न हो; काम भुजंग के डँसने पर तो नीम भी मीठी लगती है। अतः यह काल-नटी, यह पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी, यह ‘नैनाजोगिन’ कितनी भी भ्रान्ति, माया या मृगजल क्यों न हो, मैं इसके रूप में आबद्ध हूँ। इसमें मुझे वही स्वाद आ रहा है जो मायापति भगवान को अपनी माया के काम मधु का स्वाद लेते समय प्राप्त होता है और जिस स्वाद को लेने के लिए वे परमपद के भास्वर सिंहासन को छोड़कर हम लोगों के बीच बार-बार आते हैं। अतः इस समय मुझे कोई चिंता, कोई परवाह नहीं।

परंतु एक न एक दिन वह क्षण भी निश्चय ही उपस्थित होगा जिसकी श्रंगारहीन शरद यवनिका के पीछे जीर्ण हेमंत और मृत्युशीतल शिशिर की प्रेतछाया झलकती रहेगी। ‘उस दिन, तुम क्या करोगे? है तुम्हारे पास कोई बीज-मंत्र, कोई टोटका, कोई धारणी-मंत्र जिससे तुम अगले बीस-बाईस वर्षों के लिए इस उत्तराफाल्गुनी के पगों को स्तंभित कर दो और वह अगले बीस-बाईस वर्ष तुम्हारे द्वारदेश पर, शिथिल दक्षिण चरण, ईषत कृंचित जानु के साथ आभंग मुद्रा में नतग्रीव खड़ी रहे और तुम्हारे हुकुम की प्रतीक्षा करती रहे? है कोई ऐसा जीवन-दर्शन, ऐसा सिद्धाचार, ऐसी काया सिद्धि जिससे बाहर-बाहर शरद-शिशिर, पतझार-हेमंत आएँ और जूझते-हार खाते चले जाएँ। परंतु मनस की द्वार-देहरी पर यह उत्तराफाल्गुनी एक रस साठ वर्ष की आयु तक बनी रहे? है कोई ऐसा उपाय? यह प्रश्न रह-रहकर मैं स्वयं अपने ही से पूछता हूँ। आज से तेरह वर्ष पूर्व भी मैंने इस प्रश्न पर चिंता की थी और उक्त चिंतन से जो समाधान निकला उसे मैंने कार्य-रूप में परिणत कर दिया। परंतु इन तेरह वर्षों में असंख्य भाव-प्रतिभाओं के मुंडपात हुए हैं और आज मैं मूल्यों के कबंध-वन में भाव-प्रतिभाओं के केतु-कांतार में बैठा हूँ। आज जगत वही नहीं रहा जो तेरह वर्ष पूर्व था। एक ग्रीक दार्शनिक की उक्ति है कि एक नदी में हम दुबारा हाथ नहीं डाल सकते, क्योंकि नदी की धार क्षण-प्रतिक्षण और ही और होती जा रही है। काल-प्रवाह भी एक नदी है और इसकी भी कोई बूँद स्थिर नहीं। अतः शताब्दी के आठवें दशक के इस प्रथम चरण में मुझे उसी प्रश्न को पुनः-पुनः सोचना है : कैसे जीर्णता या जरा को, यदि संपूर्णतः जीतना असंभव हो तो भी फाँकी देकर यथासंभव दूरी तक वंचित रखा जाए? कैसे अपने दैहिक यौवन को नहीं, तो मानसिक यौवन को ही निरंतर धारदार और चिरंजीवी रखा जाय? उस दिन तो मैंने सीधा-सीधा उत्तर ढूँढ़ निकाला था : ‘ययाति की तरह पुत्रों से यौवन उधार लेकर।’ अर्थात मैं कोई नौकरी न करके कॉलेज में अध्यापन करूँ तो मुझ पचपन या साठ वर्ष की आयु तक युवा शिष्य-शिष्याओं के मध्य वास करने का अवसर सुलम होगा। मैं इनकी आशा-आकांक्षा, उत्साह, साहस, उद्यमता आदि से वैसे ही अनुप्राणित और आविष्ट रहूँगा जैसे चुंबकीय आकर्षण-क्षेत्र में पड़कर साधारण लोहा भी चुंबक बन जाता है।

परंतु विगत दशक के अंतिम दो वर्षों में जब मेरे ये बालखिल्य सहचरगण छिन्नमस्ता राजनीति के रँगरूट बनने लगे, जब इन्होंने मेरे गुरुओं, गांधी-विवेकानंद-विद्यासागर-सर आशुतोष, की प्रतिमाओं का एवं उनके द्वारा प्रति-पादित मूल्यों का, अनर्गल मुंडपात करना शुरू कर दिया, जब इनके नए दार्शनिकों ने कहना प्रारंभ किया कि आध्यापक और छात्र के बीच भी श्रेणी-शत्रुओं का संबंध है क्योंकि अध्यापक भी ‘स्थापित व्यवस्था’ का एक अंग है और ‘व्यवस्था’ का भंजन ही श्रेष्ठतम पुरुषार्थ है, तब देश में घटित होती हुई इन घटनाओं पर विचार करके और क्रांति तथा ‘नई पीढ़ी’ के दार्शनिकों – यथा हिबर्ट मारक्यूज, चेग्वारा, ब्रैंडिटकोहन आदि की चिंतनधारा से यथासंभव अल्प स्वल्पे परिचय पा करके मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मैं इन अपने भाइयों, अपने हृदय के टुकड़ों के साथ जो आज छिन्नमस्ता राजनीति के रँगरूट हैं, कुछ ही दूर तक, आधे रास्ते ही जा सकता हूँ। विविध प्रकार के नारों से आक्रांत ये नए ‘पुरूरवा’ (‘पुरूरवा’ का शब्दार्थ होता है ‘रवों’ (आवाजों या नारों) से आक्रांत या पूरित पुरुष। ‘ययाति’ पुरानी पीढ़ी का प्रतीक है तो पुरूरवा नई पीढ़ी का।) यदि मुझे यौवन उधार देंगे भी तो बदले में मुझे भी कबंध में रूपांतरित होने को कहेंगे। और मैं कैसे अपना चेहरा, अपनी आत्म-सत्ता, अपना व्यक्तित्व त्याग दूँ? ‘छिन्नमस्त’ पुरुष बनकर यौवन लेने से क्या लाभ? बिना मस्तक के बिना अपने निजी नयन-मुख-कान के इस उधार प्राप्त नवयौवन का नया अर्थ होगा? रूप, रस, गंध और गान से वंचित रह जाऊँगा। केवल शिश्नोदरवाला व्यक्तित्व लेकर कौन जीवन-यौवन भोगना चाहेगा? कम-से-कम बुद्धिजीवी तो नहीं ही। आत्मार्थ पृथिवी त्यजेत? अतः मुझे चिरयौवन को इन शिष्य-पुरूरवाओं की नई पीढ़ी से दान के रूप में नहीं लेना है। तेरह वर्ष पहले का चिंतित समाधान आज व्यर्थ सिद्ध हो गया है। मुझे अन्यत्र चिरयौवन का अनुसंधान करना है। कहीं-न-कहीं मेरे ही अंदर अमृता कला की गाँठ होगी। उसे ही मुझे आविष्कृत करना होगा। जो बाहर-बाहर अप्राप्य है वह सब-कुछ भीतर-भीतर सुलभ है। मैं अपने ही हृदय समुद्र का मंथन करके प्राण और अमृत के स्रोत किसी चंद्रमा को आविष्कृत करूँगा। तेरह वर्ष पुराना समाधान आज काम नहीं आ सकता।

मैं मानता हूँ कि समाज और शासन में शब्दों के व्यूह के पीछे एक कपट पाला जा रहा है। मैं बालखिल्यों के क्रोध की सार्थकता को स्वीकार करता हूँ। पर साथ ही छिन्नमस्ता शैली के सस्ते रंगांध और आत्मघाती समाधान को भी मैं बेहिचक बिना शील-मुरौवत के अस्वीकार करता हूँ। अपना मस्तक काटकर स्वयं उसी का रक्त पीना तंत्राचार-वीराचार हो सकता है परंतु यह न तो क्रांति है और न समर। पुरानी पीढ़ी का चिरयक्षत्व मुझे भी अच्छा नहीं लगता। मैं भी चाहता हूँ कि वह पीढ़ी अब खिजाब-आरसी का परित्याग करके संन्यास ले ले। शासन और व्यवस्था के पुतली घरों की मशीन-कन्याएँ उनकी बूढ़ी उँगलियों के सूत्र-संचालन से ऊब गई हैं और उनकी गति में रह-रह कर छंद-पतन हो रहा है। यह बिल्कुल न्याय-संगत प्रस्ताव है कि पूर्व पीढ़ी अपनी मनुस्मृति और कौपीन बगल में दबाकर पुतलीघर से बाहर हो जाय और नई पीढ़ी को, अर्थात हमें और हमारे बालखिल्यों को अपने भविष्य के यश-अपयश का पट स्वयं बुनने का अवसर दे जिससे वे भी अपने कल्पित नक्शे, अपने अर्जित हुनर को इस कीर्तिपट पर काढ़ने का अवसर पा सकें। यह सब सही है। परंतु क्या इन सब बातों की संपूर्ण सिद्धि के लिए इस पुतलीघर का ही अग्निदाह, पुरानी पीढ़ी द्वारा बुने कीर्तिपट के विस्तार का दाह, उनके श्रम फल का तिरस्कार आदि आवश्यक हैं? क्या ऐसा सब करना एक आत्मघाती प्रक्रिया नहीं? इस स्थल पर डॉ. राधाकृष्णन या आचार्य विनोबा भावे की राय को उद्धृत करूँ तो वह क्रांति के इन ‘दुग्ध कुमारों’ के लिए कौड़ी की तीन ही होगी। अतः मैं लेनिन जैसे महान क्रांतिकारी की राय उद्धृत कर रहा हूँ! 1922 ई. मैं लेनिन ने लिखा था, ‘उस सारी सभ्यता-संस्कृति को जो पूँजीवाद निर्मित कर गया है, हमें स्वीकार करना होगा। और उसके द्वारा ही समाजवाद गढ़ना होगा। पूर्व पीढ़ी के सारे ज्ञान, सारे विज्ञान, सारी यांत्रिकी को स्वीकृत कर लेना होगा। उसकी सारी कला को स्वीकार कर लेना होगा… हम सर्वहारा संस्कृति के निर्माण की समस्या तब तक हल नहीं कर सकते जब तक यह बात साफ-साफ न समझ लें कि मनुष्य जाति के सारे विकास और संपूर्ण सांस्कृतिक ज्ञान को आहरण किए बिना यह संभव नहीं, और उसे समझ कर सर्वहारा संस्कृति की पुनर्रचना करने में हम सफल हो सकेंगे। ‘सर्वहारा संस्कृति’ अज्ञात शून्य से उपजनेवाली चीज नहीं और न यह उन लोगों के द्वारा गढ़ी ही जा सकती है जो सर्वहारा संस्कृति के विशेषज्ञ विद्वान कहे जाते हैं ये सब बातें मूर्खतापूर्ण है। इनका कोई अर्थ नहीं होता। ‘सर्वहारा संस्कृति’ उसी ज्ञान का स्वाभाविक सहज विकास होगी जिसे पूँजीवादी, सामंतवादी और अमलातांत्रिक व्यवस्थाओं के जुए के नीचे हमारी संपूर्ण जाति ने विकसित किया है।’ यह बात स्वामी दयाननंद या पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी की होती तो बड़ी आसानी से कह सकते ‘मारो गोली! सब बूर्ज्वा बकवास है।’; पर कहता है क्रांतिकारियों का पितामह लेनिन, जिसे एक कट्टर बंगाली मार्क्सवादी नीरेंद्रनाथ राय ने अपनी पुस्तक ‘शेक्सपियर-हिज ऑडिएंस’ के पृष्ठ (49-50) पर उद्धृत किया है। आज प्रायः लोग पुकारकर कहते हैं : ‘देखो, देखो जोखिम उठा रहा हूँ, मूल्य भंजन कर रहा हूँ। अरे बंधु, जोखिम उठा रहे हो या नाम कमा रहे हो? यह तो आज अपने को प्रतिष्ठित बनाने और जाग्रत सिद्ध करने का सबसे सटीक तरीका ‘शॉर्टकट’ यानी तिरछा रास्ता है। जोखिम तुम नहीं उठा रहे हो तुम तो धार के साथ बह रहे हो और यह बड़ी आसान बात है। आज जोखिम वह उठा रहा है जो नदी की वर्तमान धारा के प्रतिकूल, धार के हुकुम को स्वीकारते हुए कह रहा है : ‘मूल्य भी क्या तोड़ने की चीज है जो तोड़ोगे? वह बदला जा सकता है तोड़ा नहीं जा सकता। मूल्य स्थिर या सनातन नहीं होता, यह भी मान लेता हूँ। परंतु एक अविच्छिन्न मूल्य-प्रवाह, एक सनातन मूल्य-परंपरा का अस्तित्व तो मानना ही होगा।’ नए बालखिल्य दार्शनिक कहेंगे – ‘यह धार के विपरीत जाना हुआ। यह तो प्रतिक्रियावाद है।’ ऐसी अवस्था में मेरा उन्हें उत्तर है : ‘कभी-कभी नदी की धार पथभ्रष्ट भी हो जाती है। वह सदैव प्रगति की दिशा में ही नहीं बहती। वह स्वभाव से अधोगति की ओर जानेवाली होती है। और आज? आज तो वन्याकाल है। वन्याकाल में धार पथभ्रष्ट रहती है। वह कर्मनाशा-कीर्तिनाशा-कालमुखी बनकर हमारे गाँव को रसातल में पहुँचाने आ रही है। अतः इस क्षण हमारी प्यारी नदी ही शत्रुरूपा हो गई है। और यदि गाँव को बचाना है तो हम धार के प्रतिकूल समर करेंगे। यदि हम अपना घर-द्वार फूँककर तमाशा देखकर मौज लेनेवाले आत्मभोगी ‘नीरो’ की संतानें नहीं है तों हमें इस नदी से समर करना ही होगा। यही हमारी जिजीविषा की माँग है। और इसके प्रतिकूल जो कुछ कहा जा रहा है, वह ‘नई पीढ़ी’ की बात हो या पुरानी की, मुमुक्षा का मुक्ति भोग है। यह सब विद्रोह नहीं बूर्ज्वा डेथविश का नया रूप है।’

अतः मै धार के साथ न बहकर अकेले-अकेले अपने अंदर की अमृता कला का अविष्कार करने को कृत संकल्प हूँ। बिना रोध के, बिना तट के जो धार है वह कालमुखी वन्या है, रोधवती और तटिनी नहीं। यों यह तो मैं मानता ही हूँ कि सर्जक या रचनाकार के लिए ‘नॉनकनफर्मिस्ट’ होना जरूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती। अतः मुझे भी विद्रोही दर्शनों से अपने को किसी न किसी रूप में आजीवन संयुक्त रखना ही है। एक लेखक होने के नाते यही मेरी नियति है, और इस तथ्य को अस्वीकृत करने का अर्थ है अपनी सिसृक्षा की सारी संभावनाओं का अवरोध। परंतु लेखक, कवि या किसी भी साहित्येतर क्षेत्र के सर्जक या विधाता को यह बात भी गाँठ में बाँध लेनी चाहिए कि शत-प्रतिशत अस्वीकार या ‘नॉनकनफर्मिज्म’ से भी रचना या सृजन असंभव हो जाता है। पुराने के अस्वीकार से ही नए का आविष्कार संभव है। यह कुछ हद तक ठीक है। परंतु नए भावों या विचारों के ‘उद्गम’ के बाद ‘उपकरण’ या अभिव्यक्ति के साधन का प्रश्न उठता है और इसके लिए ‘नॉनकनफर्मिज्म’ को त्यागकर पचहत्तर प्रतिशत पुराने उपकरणों में से ही निर्वाचित-संशोधित करके कुछ को स्वीकार कर लेना होता है। रचना की ‘आइडिया’ के आविष्कार के लिए तो अवश्य ‘विद्रोही मन’ चाहिए। परंतु रचना का कार्य (प्रॉसेस) आइडिया के आविष्कार के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। रचना-प्रक्रिया में ‘स्वीकारवादी मन’ की भी उतनी ही आवश्यकता है। अन्यथा ‘आइडिया’ या ज्ञान का ‘क्रिया’ में रूपांतर संभव नहीं। अतः प्रत्येक सर्जक या विधाता, जीवन के चाहे जिस क्षेत्र की बात हो, ‘विद्रोही’ और ‘स्वीकारवादी’ दोनों साथ ही साथ होता है। ‘शत-प्रतिशत अस्वीकार’ के फैशनेबुल दर्शन के प्रति मेरा आक्षेप यह भी है कि यह एक स्वयं आरोपित ‘नो एक्जिट’ (द्वारा या वातायन रहित अवरुद्ध कक्ष) है, इसको लेकर बहुत आगे तक नहीं जाया जा सकता है। यह दर्शन विषय और विधा दोनों की नकारात्मक सीमा बाँधकर बैठा है। और इसके द्वारा अपने ‘स्व’ को भी पूरा-पूरा नहीं पहचाना जा सकता है; तो ‘स्व’ से बाहर, इतिहास और समाज को समझने की तो बात ही नहीं उठती। यह ‘शत-प्रतिशत अस्वीकार’ का दर्शन कभी अस्तित्ववाद का चेहरा लेकर आता है तो कभी नव्य मार्क्सवाद का (क्लासिकल मार्क्सवाद से भिन्न); और ये दोनों मानसिक-बौद्धिक स्तर पर मौसेरे भाई हैं। ये एक ही ह्रासोन्मुखी संस्कृति की संतानें हैं। योगशास्त्र में मन की पाँच अवस्थाएँ कही गई हैं : क्षिप्त, विक्षिप्त, विमूढ़, निरुद्ध और आरूढ़। ये दोनों दर्शन विमूढ़ स्थिति के दो भिन्न संस्करण हैं, अतः दोनों त्याज्य हैं।

यह बाढ़-वन्या का काल है। नदी अपनी दिशा भूलकर, कूल छोड़कर उन्मुक्त हो गई है, अतः बुद्धजीवी वर्ग से धीरता और संयम अपेक्षित है। घबराकर वन्या की पथभ्रष्ट धार के प्रति आत्मसमर्पण करने की अपेक्षा जल के उत्तरण, वन्या के ‘उतार’ की प्रतीक्षा करना अधिक उचित है। पानी हटने पर नदी फिर कूलों के बीच लौट जाएगी। नदी अपनी शय्या यदि बदल भी दे, तो भी नई शय्या के साथ कोई कूल, कोई अवरोध तो उसे स्वीकार करना ही होगा। यह नया कूल भी उसी पुराने कूल के ही समानान्तर होगा। नदी तब भी समुद्रमुखी ही रहेगी। उलटकर हिमाचलमुखी कभी नहीं हो सकती। अतः इस वन्या नाट्य के विष्कंभक के बीच का समय मैं न तो बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ और न बहुत चिंताजनक। मैं बिल्कुल अविचलित हूँ। मेरा विश्वास है कि कल नहीं तो परसों हम अर्थात पुरानी पीढ़ी का युवा और मेरे बालखिल्य छात्र-छात्राएँ अर्थात नई युवा पीढ़ी, दोनों मिलकर इस शासन एवं व्यवस्था के पुतलीघर की नृत्य कन्याओं के कत्थक नृत्य को साथ-साथ संचालित करेंगे। यह पुतलीघर ऐसा है कि इसमें अनुशासित संयमित तालबद्ध कत्थक ही चल सकता है। अन्यथा जरा भी छंद पतन होने पर कोई न कोई भयावह पुतली एक ही झपट्टे में हड्डी आँत तक का भक्षण कर डालेगी क्योंकि इन पुतलियों में से कोई-कोई विषकन्याएँ भी हैं। अतः मैं चेष्टा करूँगा कि अपने अंदर की अमृता कला का आविष्कार करके इस उत्तराफाल्गुनी काल को बीस बाइस वर्ष के लिए अपने अंतर में स्थिर अचल कर दूँ, बाहर-बाहर चाहे शरद बहे या निदाघ हू-हू करे। तब मैं अपने बालखिल्य सहचरों के साथ व्यवस्था की इन पुतलियों का छंदोबद्ध नृत्य भोग सकूँगा। और एक दिन वह भी आएगा जब कोई चिल्लाकर मेरे कानों में कहेगा ‘फाइव ओ’ क्लाक! पाँच बज गए!’ कोई मेरे शीश पर घंटा बजा जाएगा, कोई मेरे हृदय में बोल जायगा : ‘बहुत हुआ। बहुत भोगा। अब नहीं। अब, अहं अमृतं इच्छामि। अहं वानप्रस्थ चरिष्यामि।’ और तब मैं व्यवस्था के पुतलीघर की इन यंत्रकन्याओं से माफी माँगकर उत्तर-पुरुष की जय जयकार बोलते हुए मंच से बाहर आ जाऊँगा और अपने को विसर्जित कर दूँगा लोकारण्य में, खो जाऊँगा अपरिचित, वृक्षोपम, अवसर प्राप्त, रिटायर्ड स्थाणुओं के महाकांतार में। पर अभी नहीं। अभी तो मैं विश्वेश्वर के साँड़ की तरह जवान हूँ।