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दो वृद्ध व्यक्ति – प्रेमचंद (तोल्स्तोय की Two Old Men का भावानुवाद)

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प्रेमचंद ने तोल्स्तोय की कई कहानियों का भारतीयकरण किया है. इन्हें अनुवाद कहने की जगह भावानुवाद कहना ज्यादा सही होगा. प्रस्तुत है ऐसी ही एक कहानी Two Old Men का भावानुवाद

एक गांव में अर्जुन और मोहन नाम के दो किसान रहते थे. अर्जुन धनी था, मोहन साधारण पुरुष था. उन्होंने चिरकाल से बद्रीनारायण की यात्रा का इरादा कर रखा था.
अर्जुन बड़ा सुशील, साहसी और दृढ था. दो बार गांव का चौधरी रहकर उसने बड़ा अच्छा काम किया था. उसके दो लड़के तथा एक पोता था. उसकी साठ वर्ष की अवस्था थी, परन्तु दाढ़ी अभी तक नहीं पकी थी.
मोहन प्रसन्न बदन, दयालु और मिलनसार था. उसके दो पुत्र थे, एक घर में था, दूसरा बाहर नौकरी पर गया हुआ था. वह खुद घर में बैठाबैठा बढई का काम करता था.
बद्रीनारायण की यात्रा का संकल्प किए उन्हें बहुत दिन हो चुके थे. अर्जुन को छुट्टी ही नहीं मिलती थी. एक काम समाप्त होता था कि दूसरा आकर घेर लेता था. पहले पोते का ब्याह करना था, फिर छोटे लड़के का गौना आ गया, इसके पीछे मकान बनना प्रारम्भ हो गया. एक दिन बाहर लकड़ी पर बैठकर दोनों बूढों में बातें होने लगी.
मोहन-क्यों भाई, अब यात्रा करने का विचार कब है?
अर्जुन-जरा ठहरो. अब की वर्ष अच्छा नहीं लगा. मैंने यह समझा था कि सौ रुपये में मकान तैयार हो जाएगा. तीन सौ रुपये लगा चुके हैं, अभी दिल्ली दूर है. अगले वर्ष चलेंगे.
मोहन-शुभ कार्य में देरी करना अच्छा नहीं होता. मेरे विचार में तो तुरंत चल देना ही उचित है, दिन बहुत अच्छे हैं.
अर्जुन-दिन तो अच्छे हैं, पर मकान को क्या करुं! इसे किस पर छोडूं?
मोहन-क्या कोई संभालने वाला ही नहीं, बड़े लड़के को सौंप दो.
अर्जुन-उसका क्या भरोसा है.
मोहन-वाहवाह, भला बताओ तो कि मरने पर कौन संभालेगा? इससे तो यह अच्छा है कि जीतेजी संभाल लें. और तुम सुख से जीवन व्यतीत करो.
अर्जुन-यह सत्य है, पर किसी काम में हाथ लगाकर उसे पूरा करने की इच्छा सभी की होती है.
मोहन-तो काम कभी पूरा नहीं होता, कुछ न कुछ कसर रह ही जाती है. कल ही की बात है कि रामनवमी के लिए स्त्रियां कई दिन से तैयारी कर रही थीं-कहीं लिपाई होती थी, कहीं आटा पीसा जाता था. इतने में रामनवमी आ पहुंची. बहू बोली, परमेश्वर की बड़ी कृपा है कि त्योहार बिना बुलाए ही आ जाते हैं, नहीं तो हम अपनी तैयारी ही करती रहें.
अर्जुन-एक बात और है, इस मकान पर मेरा बहुत रुपया खर्च हो गया है. इस समय रुपये का भी तोड़ा है. कमसे-कम सौ रुपये तो हों, नहीं तो यात्रा कैसे होगी.
मोहन-(हंसकर) अहा हा! जो जितना धनवान होता है, वह उतना ही कंगाल होता है. तुम और रुपये की चिंता! जाने दो. मैं सच कहता हूं, इस समय मेरे पास एक सौ रुपये भी नहीं, परन्तु जब चलने का निश्चय हो जायेगा, तो रुपया भी कहीं न कहीं से अवश्य आ ही जाएगा. बस, यह बतलाओ कि चलना कब है?
अर्जुन-तुमने रुपये जोड़ रखे होंगे, नहीं तो कहां से आ जाएगा, बताओ तो सही.
मोहन-कुछ घर में से, कुछ माल बेचकर. पड़ोसी कुछ चौखट आदि मोल लेना चाहता है, उसे सस्ती दे दूंगा.
अर्जुन-सस्ती बेचने पर पछतावा होगा.
मोहन-मैं सिवाय पाप के और किसी बात पर नहीं पछताता. आत्मा से कौन चीज़ प्यारी है!
अर्जुन-यह सब ठीक है, परन्तु घर के कामकाज बिसराना भी उचित नहीं.
मोहन-और आत्मा को बिसारना तो और भी बुरा है. जब कोई बात मन में ठान ली तो उसे बिना पूरा किए न छोड़ना चाहिए.
2
अन्त में चलना निश्चय हो गया. चार दिन पीछे जब विदा होने का समय आया, तो अर्जुन बड़े लड़के को समझाने लगा कि मकान पर छत इस प्रकार डालना, भूसी बखार में इस भांति जमा कर देना, मंडी में जाकर अनाज इस भाव से बेचना, रुपये संभालकर रखना, ऐसा न हो खो जावें, घर का प्रबंध ऐसा रखना कि किसी प्रकार की हानि न होने पावे. उसका समझाना समाप्त ही न होता था.
इसके प्रतिकूल मोहन ने अपनी स्त्री से केवल इतना ही कहा कि तुम चतुर हो, सावधानी से काम करती रहना.
मोहन तो घर से प्रसन्न मुख बाहर निकला और गांव छोड़ते ही घर के सारे बखेड़े भूल गया. साथी को प्रसन्न रखना, सुखपूर्वक यात्रा कर घर लौट आना उसका मन्तव्य था. राह चलता था तो ईश्वरसम्बन्धी कोई भजन गाता था या किसी महापुरुष की कथा कहता. सड़क पर अथवा सराय में जिस किसी से भेंट हो जाती, उससे बड़ी नम्रता से बोलता.
अर्जुन भी चुपके चुपके चल तो रहा था, परन्तु उसका चित्त व्याकुल था. सदैव घर की चिंता लगी रहती थी. लड़का अनजान है, कौन जाने क्या कर बैठे. अमुक बात कहना भूल आया. ओहो, देखूँ, मकान की छत पड़ती है या नहीं. यही विचार उसे हरदम घेरे रहते थे. यहां तक कि कभी कभी लौट जाने को तैयार हो जाता था.

3

चलतेचलते एक महीना पीछे वे पहाड़ पर पहुंच गए. पहाड़ी बड़े अतिथि सेवक होते हैं. अब तक यह मोल का अन्न खाते रहे थे. अब उनकी खातिरदारी होने लगी.
आगे चलकर वे ऐसे देश में पहुंचे, जहां दुर्घट अकाल पड़ा हुआ था. खेतियाँ सब सूख गई थीं, अनाज का एक दाना भी नहीं उगा था. धनवान कंगाल हो गए थे. धनहीन देश को छोड़कर भीख मांगने बाहर भाग गए थे.
यहां उन्हें कुछ कष्ट हुआ, अन्न कम मिलता था और वह भी बड़ा महंगा. रात को उन्होंने एक जगह विश्राम किया. अगले दिन चलते चलते एक गांव मिला. गांव के बाहर एक झोंपड़ा था. मोहन थक गया था, बोला-मुझे प्यास लगी है. तुम चलो, मैं इस झोंपड़े से पानी पीकर अभी तुम्हें आ मिलता हूं. अर्जुन बोला-अच्छा, पी आओ. मैं धीरे धीरे चलता हूं.
झोंपड़े के पास जाकर मोहन ने देखा कि उसके आगे धूप में एक मनुष्य पड़ा है. मोहन ने उससे पानी मांगा, उसने कोई उत्तर नहीं दिया. मोहन ने समझा कि कोई रोगी है.
समीप जाने पर झोंपड़े के भीतर एक बालक के रोने का शब्द सुनायी दिया. किवाड़ खुले हुए थे. वह भीतर चला गया.

4

उसने देखा कि नंगे सिर केवल एक चादर ओढ़े एक बुढ़िया धरती पर बैठी है, पास में भूख का मारा हुआ एक बालक बैठा रोटी, रोटी, पुकार रहा है. चूल्हे के पास एक स्त्री तड़प रही है, उसकी आंखें बन्द हैं, कंठ रुका हुआ है.

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2 thoughts on “दो वृद्ध व्यक्ति – प्रेमचंद (तोल्स्तोय की Two Old Men का भावानुवाद)

  1. टॉलस्टॉय की कहानियाँ, जो प्रेमचंद द्वारा अनूदित हो,उन्हें पढ़ने का बहुत मन था।प्रेमचंद एक महान कथाकार ही नहीं,एक अच्छे अनुवादक भी थे।ऊपर से उन्होंने इस कहानी को तो भारतीय रंग में भी रंग दिया।बहुत बढ़िया।उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद।

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