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काव्य संसार

अहा ग्राम्य जीवन – मैथिलीशरण गुप्त

अनुमानित समय : < 1 मिनट-

अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है,
क्यों न इसे सबका मन चाहे,
थोड़े में निर्वाह यहाँ है,
ऐसी सुविधा और कहाँ है ?

यहाँ शहर की बात नहीं है,
अपनी-अपनी घात नहीं है,
आडम्बर का नाम नहीं है,
अनाचार का नाम नहीं है।

यहाँ गटकटे चोर नहीं है,
तरह-तरह के शोर नहीं है,
सीधे-साधे भोले-भाले,
हैं ग्रामीण मनुष्य निराले ।

एक-दूसरे की ममता हैं,
सबमें प्रेममयी समता है,
अपना या ईश्वर का बल है,
अंत:करण अतीव सरल है ।

छोटे-से मिट्टी के घर हैं,
लिपे-पुते हैं, स्वच्छ-सुघर हैं
गोपद-चिह्नित आँगन-तट हैं,
रक्खे एक और जल-घट हैं ।

खपरैलों पर बेंले छाई,
फूली-फली हरी मन भाईं,
अतिथि कहीं जब आ जाता है,
वह आतिथ्य यहाँ पाता है ।

ठहराया जाता है ऐसे,
कोई संबंधी हो जैसे,
जगती कहीं ज्ञान की ज्योति,
शिक्षा की यदि कमी न होती

तो ये ग्राम स्वर्ग बन जाते
पूर्ण शांति रस में सन जाते।

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सखि वे मुझसे कह कर जाते – मैथिलीशरण गुप्त

अनुमानित समय : < 1 मिनट-

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में –
क्षात्र-धर्म के नाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते ?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।